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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—२२ देवता—अग्नि

सूक्त—२२ देवता—अग्नि
अयं सो अग्निर्यस्मिन्त्सोममिन्द्रः सुतं दधे जठरे वावशानः.
सहस्रिणं वाजमत्यं न सप्तिं ससवान्त्सन्स्तूयसे जातवेदः.. (१)
यह वही अग्नि है, जिस में अभिषुत सोमरस को कामना करने वाले इंद्र ने अपने उदर में
रखा था. हे जातवेद अग्नि! हजार रूपों वाले अश्व के समान वेगशाली एवं हव्य का सेवन
करने वाले तुम्हारी स्तुति सारा संसार करता है. (१)
अग्ने यत्ते दिवि वर्चः पृथिव्यां यदोषधीष्वप्स्वा यजत्र.
येनान्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वेषः स भानुरर्णवो नृचक्षाः.. (२)
हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम्हारा जो तेज आकाश, धरती, ओषधियों एवं जल में है, जिस
तेज के द्वारा तुमने अंतरिक्ष को विस्तृत किया है, वह तेज आसमान, दीप्तिमान् सागर के
समान विस्तृत एवं मनुष्यों के लिए दर्शनीय है. (२)
अग्ने दिवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ ऊचिषे धिष्ण्या ये.
या रोचने परस्तात्सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त आपः.. (३)
हे अग्नि! तुम आकाश में व्याप्त जल को लक्ष्य करके जाते हो एवं प्राण संयुक्त देवों को
एकत्र करते हो. सूर्य के ऊपर रोचन नामक लोक में तथा सूर्य के नीचे जो जल वर्तमान हैं,
उन्हें तुम्हीं प्रेरणा देते हो. (३)
पुरीष्यासो अग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः.
जुषन्तां यज्ञमद्रुहोऽनमीवा इषो महीः.. (४)
बालू मिली हुई अग्नियां खुदाई के काम आने वाले औजारों से मिलकर इस यज्ञ का
सेवन करें तथा हमारे प्रति द्रोहरहित होकर हमें रोगरहित महान् अन्न दें. (४)
इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध.
स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५)
हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेक कर्मों की साधन रूप गौ प्रदान
करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे अनुकूल हो.
(५)
सूक्त—२३ देवता—अग्नि
निर्मथितः सुधित आ सधस्थे युवा कविरध्वरस्य प्रणेता.
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जूर्यत्स्वग्निरजरो वनेष्वत्रा दधे अमृतं जातवेदाः.. (१)
अरणिमंथन द्वारा उत्पन्न, यजमान के घर में यज्ञकुंड में स्थापित, युवा, क्रांतदर्शी, यज्ञ
पूर्ण करने वाले, जातवेद, महान् एवं अरण्यों के नष्ट होने पर भी जरारहित अग्नि इस यज्ञ में
अमृत धारण करते हैं. (१)
अमन्थिष्टां भारता रेवदग्निं देवश्रवा देववातः सुदक्षम्.
अग्ने वि पश्य बृहताभि रायेषां नो नेता भवतादनु द्यूनू.. (२)
हे अग्नि! भरत के पुत्रों—देवाश्रय एवं देववात ने शोभन सामर्थ्य तथा धनयुक्त तुम्हें
अरणिमंथन द्वारा उत्पन्न किया था. हे अग्नि! पर्याप्त धन लेकर हमारी ओर देखो एवं प्रतिदिन
हमारे अन्नों के लाने वाले बनो. (२)
दश क्षिपः पूर्व्यं सीमजीजनन्त्सुजातं मातृषु प्रियम्.
अग्निं स्तुहि दैववातं देवश्रवो यो जनानामसद्वशी.. (३)
हे अग्नि! दस उंगलियों ने तुझ पुरातन को उत्पन्न किया है. हे देवश्रव! माता के समान
अरणियों के बीच में भली प्रकार उत्पन्न, प्रिय एवं देववात द्वारा मथित अग्नि की स्तुति करो.
वे अग्नि यजमानों के वश में रहते हैं. (३)
नि त्वा दधे वर आ पृथिव्या इळायास्पदे सुदिनत्वे अह्नाम्.
दृषद्वत्यां मानुष आपयायां सरस्वत्यां रेवदग्ने दिदीहि.. (४)
हे अग्नि! उत्तम दिनों की प्राप्ति के लिए मैं तुम्हें गौ-रूप-धारिणी धरती के उत्तम स्थान
में स्थापित करता हूं. हे धनसंपन्न अग्नि! तुम दृषद्वती, आपया एवं सरस्वती नदियों के
मानव-सहित तटों पर जलो. (४)
इळामग्ने पुरुदंसं सनिं गोः शश्वत्तमं हवमानाय साध.
स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (५)
हे अग्नि! यज्ञ करने वाले मुझ यजमान को सदा अनेकानेक यज्ञकर्मों की साधन रूप गौ
प्रदान करो. हे अग्नि! हमें पुत्र एवं पौत्र प्राप्त हों तथा तुम्हारी फलदायक सुबुद्धि हमारे
अनुकूल हो. (५)
सूक्त—२४ देवता—अग्नि
अग्ने सहस्व पृतना अभिमातीरपास्य. दुष्टरस्तरन्नरातीर्वर्र्चो धा यज्ञवाहसे.. (१)
हे अग्नि! शत्रुओं की सेना को हराओ तथा यज्ञ में विघ्न डालने वालों को दूर भगाओ.
तुम अजित हो, इसलिए शत्रुओं को अपने तेज से तिरस्कृत करके यजमान को अन्न दो. (१)

अग्न इळा समिध्यसे वीतिहोत्रा अमर्त्यः. जुषस्व सू नो अध्वरम्.. (२)
हे यज्ञ को प्रेम करने वाले तथा मरणरहित अग्नि! तुम्हें उत्तर वेदी पर जलाया जाता है.
तुम हमारे यज्ञ की भली प्रकार सेवा करो. (२)
अग्ने द्युम्नेन जागृवे सहसः सूनवाहुत. इदं बर्हिः सदो मम.. (३)
हे स्वतेज से जागृत एवं बल के पुत्र अग्नि! मेरे द्वारा बुलाए हुए तुम मेरे द्वारा बिछाए
हुए कुशों पर बैठो. (३)
अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्देवेभिर्महया गिरः. यज्ञेषु य उ चायवः.. (४)
हे अग्नि! अपने पूजकों के यज्ञों में समस्त तेजस्वी अग्नियों के साथ स्तुति वचनों का
आदर करो. (४)
अग्ने दा दाशुषे रयिं वीरवन्तं परीणसम्. शिशीहि न सूनुमतः.. (५)
हे अग्नि! हव्यदाता यजमान को संतानयुक्त पर्याप्त धन दो तथा हम संतान वालों की
उन्नति करो. (५)
सूक्त—२५ देवता—अग्नि
अग्ने दिवः सूनुरसि प्रचेतास्तना पृथिव्या उत विश्ववेदाः.
ऋधग्देवाँ इह यजा चिकित्वः.. (१)
हे सर्वविषयज्ञाता तथा यज्ञकर्म के ज्ञान से युक्त अग्नि! तुम आकाश तथा धरती के पुत्र
हो. हे चेतनाशील अग्नि! तुम इस यज्ञ में अलग-अलग हवि देकर देवों का आदर करो. (१)
अग्निः सनोति वीर्याणि विद्वानत्सनोति वाजममृताय भूषण्.
स नो देवाँ एह वहा पुरुक्षो.. (२)
अग्नि स्वयं को विभूषित करके यजमान को सामर्थ्य तथा देवों को अन्न देते हैं. हे
बहुविध अन्नयुक्त अग्नि! हमारे कल्याण के निमित्त देवों को इस यज्ञ में लाओ. (२)
अग्निद्यावापृथिवी विश्वजन्ये आ भाति देवी अमृते अमूरः.
क्षयन्वाजैः पुरुश्चन्द्रो नमोभिः.. (३)
सर्वज्ञ, समस्त विश्व के स्वामी, अमित प्रकाशयुक्त, बल एवं अन्नसहित अग्नि संसार को
जन्म देने वाले, द्योतमान और मरणरहित धरती-आकाश को प्रकाशित करते हैं. (३)
अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुतावते यज्ञमिहोप यातम्.
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अमर्धन्ता सोमपेयाय देवा.. (४)
हे अग्नि! इंद्र के साथ यहां आकर यज्ञ की हिंसा न करते हुए सोम निचोड़ने वाले
यजमान के घर में सोम पीने के लिए आओ. (४)
अग्ने अपां समिध्यसे दुरोणे नित्यः सूनो सहसो जातवेदः.
सधस्थानि महयमान ऊती.. (५)
हे बल के पुत्र, अविनाशी एवं जातवेद अग्नि! रक्षा के द्वारा लोकों को महान् बनाते हुए
तुम जल के स्थान आकाश में भली प्रकार प्रकाशित होते हो. (५)
सूक्त—२६ देवता—अग्नि
वैश्वानरं मनसाग्निं निचाय्या हविष्मन्तो अनुषत्यं स्वर्विदम्.
सुदानुं देवं रथिरं वसूयवो गीर्भी रण्वं कुशिकासो हवामहे.. (१)
हे अग्नि! हव्य धारण करने वाले, धन के इच्छुक एवं कुशिक गोत्र में उत्पन्न हम लोग
तुझ वैश्वानर, सत्यप्रतिज्ञ, स्वर्गादि फल देने वाले, यज्ञ के ज्ञाता, फल देने वाले, रथ के स्वामी,
यज्ञों में जाने वाले एवं तेजस्वी अग्नि को अतःकरण से जानते हुए स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं.
(१)
तं शुभ्रमग्निमवसे हवामहे वैश्वानरं मातरिश्वानमुक्थ्यम्.
बृहस्पतिं मनुषो देवतातये विप्रं श्रोतारमतिथिं रघुष्यदम्.. (२)
हम द्योतमान, वैश्वानर, मातरिश्वा, ऋचाओं द्वारा आह्वानयोग्य, यज्ञ के स्वामी, मेधावी,
श्रोता, अतिथि, शीघ्रगामी अग्नि को अपनी रक्षा तथा यजमान के यज्ञ के निमित्त बुलाते हैं.
(२)
अश्वो न क्रन्दञ्जनिभिः समिध्यते वैश्वानरः कुशिकेभिर्युगेयुगे.
स नो अग्निः सुवीर्यं स्वश्व्यं दधातु रत्नममृतेषु जागृविः.. (३)
हिनहिनाता हुआ घोड़े का बच्चा जैसे घोड़ी के द्वारा बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार
कुशिक गोत्र वाले लोग अग्नि को प्रतिदिन बढ़ाते हैं. मरणरहित देवों में जागने वाले अग्नि हमें
उत्तम संतान एवं श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त धन दें. (३)
प्र यन्तु वाजास्तविषीभिरग्नयः शुभे सम्मिश्लाः पृषतीरयुक्षत.
बृहदुक्षो मरुतो विश्ववेदसः प्र वेपयन्ति पर्वतां अदाभ्याः.. (४)
वेग वाली अग्नियां जल की ओर जावें. बलशाली मरुतों के साथ जल में मिलकर बूंदों
को बनावें. सब कुछ जानने वाले एवं अपराजेय मरुद्गण अधिक जल से भरे हुए तथा
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