ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१६६ देवता—मरुद्गण
हे मरुतो! यह स्तोत्र एवं यह स्तुतिरूप वाणी प्रसन्नता देने वाली है एवं शरीर को पुष्ट
करने के लिए तुम्हें प्राप्त होती है. हम बल, अन्न एवं जयशील दान प्राप्त करें.” (१५)
सूक्त—१६६ देवता—मरुद्गण
तन्नु वोचाम रभसाय जन्मने पूर्वं महित्वं वृषभस्य केतवे.
ऐधेव यामन्मरुतस्तुविष्मणो युधेव शक्रास्तविषाणि कर्तन.. (१)
हे मरुतो! मैं तुम्हारे प्राचीनतम महत्त्व का इसलिए वर्णन कर रहा हूं कि तुम यज्ञवेदी पर
शीघ्र आकर यज्ञ संपन्न कराओ. हे गमन के समय विशाल ध्वनि करने वाले एवं समस्त कार्य
करने में समर्थ! तुम्हारे यज्ञस्थल में आते ही समिधाओं की ज्वाला उसी प्रकार महती हो
जाती है, जिस प्रकार तुम रण में अपना पराक्रम दिखाते हो. (१)
नित्यं न सूनुं मधु बिभ्रत उप क्रीळन्ति क्रीळा विदथेषु घृष्वयः.
नक्षन्ति रुद्रा अवसा नमस्विनं न मर्धन्ति स्वतवसो हविष्कृतम्.. (२)
प्रिय पुत्र के समान मधुर हव्य धारण करने वाले एवं यज्ञों में रक्षा करने में प्रवृत्त
मरुद्गण प्रसन्नचित्त होकर क्रीड़ा करते हैं. नम्र यजमान की रक्षा के लिए स्वाधीन शक्ति वाले
एवं यजमान को कभी कष्ट न पहुंचाने वाले रुद्रपुत्र मरुद्गण आते हैं. (२)
यस्मा ऊमासी अमृता अरासत रासस्पोषं च हविषा ददाशुषे.
उक्षन्त्यस्मै मरुतो हिता इव पुरू रजांसि पयसा मयोभुवः.. (३)
हवि देने वाले जिस यजमान की आहुति के कारण प्रसन्न, सबके रक्षक एवं मरणरहित
मरुद्गण अधिक मात्रा में धन देते हैं, उसी यजमान के हितकारी सखा के समान मरुद्गण
सारे संसार को सुखरूपी जल से भली-भांति सींचते हैं. (३)
आ ये रजांसि तविषीभिरव्यत प्र व एवासः स्वयतासो अध्वजन्.
भयन्ते विश्वा भुवनानि हर्म्या चित्रो वो यामः प्रयतास्वृष्टिषु.. (४)
हे मरुतो! तुम्हारे घोड़े अपनी शक्ति के द्वारा सारे संसार का भ्रमण करते हैं. वे सारथि
के बिना ही तेज चलते हैं. तुम्हारी गति इतनी विचित्र है कि तुम्हारे चलने से समस्त प्राणी और
अट्टालिकाएं उसी प्रकार कांप उठती हैं, जिस प्रकार कोई युद्ध में उठी हुई तलवार को
देखकर कांपता है. (४)
यत् त्वेषयामा नदयन्त पर्वतान्दिवो वा पृष्ठं नर्या अचुच्यवुः.
विश्वो वो अज्मन्भयते वनस्पती रथीयन्तीव प्र जिहीत ओषधिः.. (५)
शीघ्र गति वाले मरुद्गण जिस समय पर्वतों एवं गुफाओं को गुंजाते हैं अथवा मानवों के
कल्याण हेतु पर्वतों की चोटियों पर चढ़ते हैं, उस समय तुम्हारे गमन के कारण समस्त
वनस्पतियां डर जाती हैं और जिस प्रकार रथ पर बैठी स्त्री एक स्थान से दूसरे स्थान पर चली
जाती है, उसी प्रकार उड़कर दूर पहुंच जाती हैं। (५)
यूयं न उग्रा मरुतः सुचेतुनारिष्टग्रामाः सुमतिं पिपर्तन.
यत्रा वो विद्युद्रदति क्रिविर्दती रिणाति पश्वः सुधितेव बर्हणा.. (६)
हे विशाल शक्ति संपन्न मरुतो! तुम शोभनचित्त एवं हिंसारहित होकर हमारी सुबुद्धि को
बढ़ाओ. जिस समय तुम्हारी चलते हुए दांतों वाली बिजली बादलों को प्रकाशित करती है,
उस समय वह तलवार के समान पशुओं का नाश करती है. (६)
प्र स्कम्भदेष्णा अनवभ्रराधसोऽलातृणासो विदथेषु सुष्टुताः.
अर्चन्त्यर्कं मदिरस्य पतिये विदुर्वीरस्य प्रथमानि पौंस्या.. (७)
अविरत दान वाले, नाशरहित धन वाले, सकल शत्रुनाशक एवं यज्ञों में भली प्रकार
स्तुति पाने वाले मरुद्गण यज्ञ में अपने मित्र इंद्र की अर्चना करते हैं, क्योंकि वे शत्रुनाशक इंद्र
के पूर्वकृत वीर कर्मों को जानते हैं. (७)
शतभुजिभिस्तमभिद्रुतेरघातपूर्भी रक्षता मरुतो यमावत.
जनं यमुग्रास्तवसो विरप्शिनः पाथना शंसात्तनयस्य पुष्ठिषु.. (८)
हे महान् तेजस्वी एवं शक्तिशाली मरुतो! जिस मनुष्य को तुमने कुटिल स्वभाव वाले
पाप से बचाया है एवं पुत्र-पौत्रादि की पुष्टि से संबंधित निंदा से रक्षा की है, उसका पालन
अगणित भोग वस्तुओं द्वारा करो. (८)
विश्वानि भद्रा मरुतो रथेषु वो मिथस्पृध्येव तविषाण्याहिता.
अंसेष्वा वः प्रपथेषु खादयोऽक्षो वश्चक्रा समया वि वावृते.. (९)
हे मरुद्गण! तुम्हारे रथों पर समस्त कल्याणकारी वस्तुएं रखी हुई हैं. तुम्हारी भुजाओं
में एक से एक शक्तिशाली शस्त्र वर्तमान हैं. सभी विश्राम स्थानों पर तुम्हारे लिए खाने की
वस्तुएं उपस्थित हैं. तुम्हारे रथों के पहिए धुरियों के साथ घूमते हैं. (९)
भूरीणि भद्रा नर्येषु बाहुषु वक्षःसु रुक्मा रभसासो अञ्जयः.
अंसेष्वेताः पविषु क्षुरा अधि वयो न पक्षान्व्यनु श्रियो धीरे.. (१०)
मानवों का कल्याण करनेवाली अपनी भुजाओं में मरुद्गण कल्याणकारी अनंत पदार्थ
धारण करते हैं. उनके वक्षस्थलों पर कांतिमय एवं स्पष्ट दीखने वाले स्वर्णाभूषण, कंधों पर
श्वेत मालाएं, वज्र के समान आयुधों पर छुरा एवं पक्षियों के पंखों के समान शोभा धारण
करते हैं. (१०)
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महान्तो मह्ना विभ्वो३ विभूतयो दूरेदृशो ये दिव्या इव स्तृभिः.
मन्द्राः सुजिह्वाः स्वरितार आसभिः संमिश्रा इन्द्रे मरुतः परिष्टुभः.. (११)
महान्, महिमामंडित, विस्तृत ऐश्वर्य वाले, आकाश के नक्षत्रों के समान दूर से प्रकाशित,
प्रसन्न, सुंदर जिह्वा वाले, मुखों से शब्द करने वाले, स्तुतिसंपन्न एवं इंद्र के सहायक मरुद्गण
हमारे यज्ञ में पधारें. (११)
तद्वः सुजाता मरुतो महित्वनं दीर्घं वो दात्रमदितेरिव व्रतम्.
इन्द्रश्चन त्यजसा वि ह्रुणाति तज्जनाय यस्मै सुकृते अराध्वम्.. (१२)
हे शोभन जन्म वाले मरुतो! तुम्हारा महत्त्व एवं दान अदिति के व्रत के समान
अविच्छिन्न है. तुम जिस पुण्यशील यजमान के लिए इष्ट धन देते हो, उसके प्रति इंद्र भी
कुटिलता नहीं करते. (१२)
तद्वो जामित्वं मरुतः परे युगे पुरू यच्छंसममृतास आवत.
अया धिया मनवे श्रुष्टिमाव्या साकं नरो दंसनैरा चिकित्रिरे.. (१३)
हे मरुद्गण! हमारे प्रति तुम्हारी प्रसिद्ध मैत्री अतीत काल में भी थी. तुम लोग हमारी
स्तुतियों की भली-भांति रक्षा करते हो एवं श्रद्धालु यजमान के यज्ञ के नेता बनकर उसके मन
की बात जान लेते हो. (१३)
येन दीर्घं मरुतः शूशवाम युष्माकेन परीणसा तुरासः.
आ यत्ततनन्व्जने जनास एभिर्यज्ञेभिस्तदभीष्टिमश्याम्.. (१४)
हे वेगशाली मरुतो! तुम्हारे महान् आगमन के पश्चात् हम दीर्घकाल तक चलने वाला
यज्ञ आरंभ करते हैं. तुम्हारा आगमन हमारे लोगों को युद्ध में विजयी बनाता है. इस प्रकार के
यज्ञों द्वारा मैं तुम्हारा उत्तम आगमन प्राप्त करूं. (१४)
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१५)
हे मरुतो! आहार के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति
स्तुतिकर्त्ता की शरीर पुष्टि की कामना से तुम्हें प्राप्त होती है. हम भी इसके द्वारा अन्न, बल
एवं दीर्घ आयु प्राप्त करें. (१५)
सूक्त—१६७ देवता—इंद्र एवं मरुत्
सहस्रं त इन्द्रोतयो नः सहस्रमिषो हरिवो गूर्ततमाः.
सहस्रं रायो मादयध्यै सहस्रिण उप नो यन्तु वाजाः.. (१)
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हे इंद्र! तुम्हारे हजारों प्रकार के रक्षण उपाय हजारों तरह से हमारे पास आवें. हे अश्वों
के स्वामी! तुम्हारे हजारों तरह के प्रसिद्ध अन्न हमें प्राप्त हों. तुम्हारे पास जो हजारों प्रकार के
धन हैं, वे हमें प्रसन्नता देने के लिए मिलें. हमें हजारों पशु प्राप्त हों. (१)
आ नोऽवोभिर्मरुतो यान्त्वच्छा ज्येष्ठेभिर्वा बृहद्दिवाः सुमायाः.
अध यदेषां नियुतः परमाः समुद्रस्य चिद्धनयन्त पारे.. (२)
मरुद्गण रक्षा के साधनों सहित हमारे पास आवें. शोभन बुद्धि वाले मरुद्गण परम
प्रसिद्ध एवं दीप्तिशाली धन के साथ हमारे समीप आवें. उनके नियुत नामक घोड़े समुद्र के
उस पार रहते हुए भी धन धारण करते हैं. (२)
मिम्यक्ष येषु सुधिता घृताची हिरण्यनिर्णिगुपरा न ऋषिः.
गुहा चरन्ती मनुषो न योषा सभावती विदथ्येव सं वाक्.. (३)
भली प्रकार स्थित, जल बरसाती हुई एवं सुनहरे रंग की बिजली मरुतों के साथ
मेघमाला, छिपे हुए स्थान में रहने वाली राजपुरुष की पत्नी अथवा यज्ञीय वाणी के समान
रहती है. (३)
परा शुभ्रा अयासो यव्या साधारण्येव मरुतो मिमिक्षुः.
न रोदसी अप नुदन्त घोरा जुषन्त वृधं सख्याय देवाः.. (४)
जिस प्रकार युवक साधारण नारी से मिलते हैं, उसी प्रकार शोभन अलंकारों वाले परम
वेगशाली एवं महान् मरुद्गण बिजली के साथ संगत होते हैं. भयंकर वर्षा करने वाले
मरुद्गण धरती और आकाश का त्याग नहीं करते. देवगण मित्रता के कारण मरुतों की उन्नति
का प्रयत्न करते हैं. (४)
जोषद्वदीमसूर्या सचध्यै विषितस्तुका रोदसी नृमणाः.
आ सूर्येव विधतो रथं गात्त्वेषप्रतीका नभसो नेत्या.. (५)
बिखरे हुए बालों वाली मरुत्-पत्नी बिजली समागम के निमित्त इनकी सेवा करती है.
जिस प्रकार सूर्य की पुत्री अश्विनीकुमारों के रथ पर सवार हुई थी, उसी प्रकार तेजस्वी शरीर
वाली चंचल बिजली मरुतों के रथ पर बैठकर यज्ञस्थल पर आती है. (५)
आस्थापयन्त युवतिं युवानः शुभे निमिश्लां विदथेषु पज्राम्.
अर्को यद्वो मरुतो हविष्मान्गायद्गाथं सुतसोमो दुवस्यन्.. (६)
नित्य तरुण मरुद्गण नियम से मिलन करने वाली एवं शक्तिशाली तरुणी बिजली को
वर्षा के लिए अपने रथ पर बैठा लेते हैं. उसी समय पूजा के मंत्र बोलते हुए हव्यदाता एवं
सोमरस निचोड़ने वाले यजमान मरुतों की सेवा करते हुए स्तुतियां पढ़ते हैं. (६)
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प्र तं विवक्मि वक्म्यो य एषां मरुतां महिमा सत्यो अस्ति.
सचा यदीं वृषमणा अहंग्युः स्थिरा चिज्जनीर्वहते सुभागाः.. (७)
मैं मरुतों की प्रशंसनीय एवं सरलता से समझ में न आने वाली महिमा का वर्णन करता
हूं. मरुतों से संबंधित बिजली बरसने की इच्छा वाली, अहंकार युक्त स्थिर सौभाग्यशालिनी
एवं जननसमर्थ प्रजाओं को धारण करने वाली है. (७)
पान्ति मित्रावरुणाववद्याच्चयत ईमर्यमो अप्रशस्तान्.
उत च्यवन्ते अच्युता ध्रुवाणि वावृध ईं मरुतो दातिवारः.. (८)
हे मरुतो! मित्र, वरुण और अर्यमा इस यज्ञ की निंदा से रक्षा करते हैं तथा यज्ञ के
दोषयुक्त पदार्थों का नाश करते हैं. इन्हीं के कारण समय पर मेघ का अच्युत एवं ध्रुव जल
टपक पड़ता है. जल की अधिकता से मित्रादि ही जगत् की रक्षा करते हैं. (८)
नही नु वो मरुतो अन्त्यस्मे आरात्ताच्चिच्छवसो अन्तमापुः.
ते धृष्णुना शवसा शूशुवांसोऽर्णो न द्वेषो धृषता परि ष्ठूः.. (९)
हे मरुद्गण! हम लोगों में से एक भी व्यक्ति दूर रहकर भी तुम्हारे बल की सीमा नहीं
जान सका. तुम शत्रुओं को हराने वाले बल से जलराशि के समान बढ़ते हो और अपनी शक्ति
से उन्हें हराते हो. (९)
वयमद्येन्द्रस्य प्रेष्ठा वयं श्वो वोचेमहि समर्यें.
वयं पुरा महि च नो अनु द्यून तन्न ऋभुक्षा नरामनु ष्यात्.. (१०)
आज हम इंद्र के अत्यंत प्रिय बनकर यज्ञ में उनकी महिमा का वर्णन करेंगे. हमने
प्राचीन काल में इंद्र की महिमा का वर्णन किया था और प्रतिदिन कर रहे हैं. इसलिए महान्
इंद्र अन्य लोगों की अपेक्षा हमारे अनुकूल बनें. (१०)
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (११)
हे मरुतो! आदर के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति इस
अभिलाषा से तुम्हारे पास जाती है कि स्तुतिकर्त्ता का शरीर पुष्ट हो. हम भी इस स्तुति द्वारा
अन्न, बल एवं दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११)
सूक्त—१६८ देवता—मरुद्गण
यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियन्धिं वो देवया उ दधिध्वे.
आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः.. (१)
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हे मरुतो! सभी यज्ञों के प्रति तुम्हारी समान भावना जान पड़ती है. तुम अपने जल-
प्रदान आदि सारे कर्मों को देवों को प्राप्त कराने के लिए धारण करते हो. मैं तुम्हें महान् स्तोत्र
के द्वारा अपने सामने इसलिए बुलाता हूं कि तुम धरती और आकाश की भली प्रकार रक्षा
कर सको. (१)
वव्रासो न यो स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः.
सहस्रियासो अपां नोर्मय आसा गावो वन्द्यासो नोक्षणः.. (२)
रूपसंपन्न, स्वयं उत्पन्न एवं कंपनशील मरुद्गण अन्न एवं स्वर्ग आदि के साधन बनकर
प्रकट होते हैं. समुद्र की लहरों के समान हजारों उत्तम दुधारू गाएं जिस प्रकार दूध देती हैं,
उसी प्रकार वे जल बरसाते हैं. (२)
सोमासो न ये सुतास्तृप्तांशवो हृत्सु पीतासो दुवसो नासते.
ऐषामंसेषु रम्भिणीव रारभे हस्तेषु खादिश्च कृतिश्च सं दधे.. (३)
जिस प्रकार सोमलता पहले जल से सींची जाने पर बढ़ती है एवं बाद में रस निचोड़कर
पीने से सेविका के समान मन को आनंद देती है, उसी प्रकार मरुद्गण भी लोगों को प्रसन्न
करते हैं. स्त्री के समान आयुध इनके कंधों को चूमते हैं एवं इनके हाथों में हस्तत्राण तथा
तलवार सुशोभित है. (३)
अव स्वयुक्ता दिव आ वृथा ययुरमर्त्याः कशया चोदत त्मना.
अरेणवस्तुविजाता अचुच्युवुर्दृळ्हानि चिन्मरुतो भ्राजदृष्टयः.. (४)
मरुद्गण एक-दूसरे से मिले हुए स्वर्ग से नीचे आते हैं. हे मरुतो! अपनी वाणी से हमें
प्रेरित करो. तेजस्वी एवं पापरहित मरुद्गण अनेक यज्ञों में जब उपस्थित होते हैं तो स्थिर
पर्वत भी कांपने लगते हैं. (४)
को वोऽन्तर्मरुत ऋष्टिविद्युतो रेजति त्मना हन्वेव जिह्वया.
धन्वच्युत इषां न यामनि पुरुप्रैषा अहन्यो३ नैतशः.. (५)
हे आयुधधारी मरुतो! जबड़ों को चलाने वाली जीभ के समान तुम्हारे भीतर रहकर तुम्हें
कौन चलाता है? अर्थात् कोई नहीं. जल बरसाने वाला बादल जिस प्रकार दिन में चलता है,
उसी प्रकार यजमान अन्न प्राप्त करने के लिए तुम्हें चलाता है. (५)
क्व स्विदस्य रजसो महस्परं क्वावरं मरुतो यस्मिन्नायय.
यच्च्यावयथ विथुरेव संहितं व्यद्रिणा पतथ त्वेषमर्णवम्.. (६)
हे मरुतो! उस विशाल वर्षा जल का आदि और अंत कहां है? जिसे बरसाने के लिए
तुम जिस समय ढीली घास के समान जल को बिखराते हो, उस समय तेजस्वी बादल को
वज्र द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर देते हो. (६)
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सातिर्न वोऽमवती स्वर्वती त्वेषा विपाका मरुतः पिपिष्वती.
भद्रा वो रातिः पृणतो न दक्षिणा पृथुञ्ज्रयी असुर्येव जञ्जती.. (७)
हे मरुतो! तुम्हारे धन के समान ही तुम्हारा दान भी प्रशंसनीय है. इंद्र तुम्हारे दान में
सहायता करते हैं. उस में सुख, तेज, फल का परिपाक एवं किसानों का कल्याण है. तुम्हारा
दान दाता की दक्षिणा के समान तुरंत फल देने वाला एवं अपनी शक्ति के समान सबको हराने
वाला है. (७)
प्रति ष्टोभन्ति सिन्धवः पविभ्यो यदभ्रियां वाचमुदीरयन्ति.
अव स्मयन्त विद्युततः पृथिव्यां यदि घृतं मरुतः प्रुष्णुवन्ति.. (८)
जिस समय नीचे गिरने वाला जल चलता है, उस समय वज्र के शब्द के समान गर्जन
करता है. जब मरुद्गण धरती पर जल बरसाते हैं, उस समय बिजली नीचे की ओर मुंह
करके प्रकट हो जाती है. (८)
असूत पृश्निर्महते रणाय त्वेषमयासां मरुतामनीकम्.
ते सप्सरासोऽजनयन्ताभ्वमादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्.. (९)
पृश्नि ने शीघ्र गति वाले मरुतों के समूह को विशाल युद्ध के लिए जन्म दिया है. समान
रूप वाले मरुतों ने जल को उत्पन्न किया. इसके पश्चात् सब लोगों ने अभिलषित अन्न के
दर्शन किए. (९)
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः.
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (१०)
हे मरुतो! आदर के योग्य मांदार्य कवि का यह स्तुतिसमूह तुम्हारे लिए है. यह स्तुति तुम्हें
इस अभिलाषा से प्राप्त होती है कि स्तुतिकर्त्ता का शरीर पुष्ट हो. हम भी इस स्तुति द्वारा
अन्न, बल एवं दीर्घ-आयु प्राप्त करें. (१०)
सूक्त—१६९ देवता—इंद्र
महश्चित्त्वमिन्द्र यत एतान्महश्चिदसि त्यजसो वरूता.
स नो वेधो मरुतां चिकित्स्वान्त्सुम्ना वनुष्व तव हि प्रेष्ठा.. (१)
हे इंद्र! तुम रक्षा करने वाले महान् मरुतों को नहीं छोड़ते हो, इसलिए तुम निश्चित रूप
से महान् हो. हे मरुतों को बुलाने वाले! तुम हमारे प्रति अनुग्रह करके हमें अत्यंत प्रिय सुख
प्रदान करो. (१)
अयुज्रन्त इन्द्र विश्वकृष्टीर्विदानासो निषिधो मर्त्यत्रा.
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मरुतां पृत्सुतिर्हासमाना स्व॑र्मीळ्हस्य प्रधनस्य सातौ.. (२)
हे इंद्र! सब मनुष्यों के स्वामी, मनुष्यों के कल्याण के लिए जल बरसाने वाले एवं
विद्वान् मरुद्गण तुम्हारे साथ मिलें. मरुतों की सेना उस युद्ध में विजय पाने के लिए हंसती
हुई सदा आगे बढ़ी है जो सुख पाने के हेतु लड़ा जाता है. (२)
अम्यक्सा त इन्द्र ऋष्टिरस्मे सनेम्यभ्वं मरुतो जुनन्ति.
अग्निश्चिद्धि ष्मातसे शुशुक्वानापो न द्वीपं दधति प्रयांसि.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारा विशेष आयुध वज्र हमारी उन्नति के लिए बादलों के पास पहुंचता है.
मरुत् भी चिरकाल से एकत्र किए हुए जल को धरती पर बरसा देते हैं. अग्नि भी महान् यज्ञ
के लिए दीप्त हुए हैं. जिस प्रकार जल द्वीपों को धारण करता है, उसी प्रकार अग्नि हव्य को
धारण करता है. (३)
त्वं तू न इन्द्र तं रयिं दा ओजिष्ठया दक्षिणयेव रातिम्.
स्तुतश्च यास्ते चकनन्त वायोः स्तनं न मध्वः पीपयन्त वाजैः.. (४)
हे दाता इंद्र! तुम वह धन हमें दो जो तुम्हारे देने योग्य है, जिस प्रकार यजमान अधिक
दक्षिणा देकर ऋत्विज् को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हें प्रसन्न करूंगा. स्तोता शीघ्र
वर देने वाले तुम्हारी स्तुति करना चाहते हैं. जिस प्रकार लोग दूध पाने के लिए नारी के स्तन
को पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार हम तुम्हें अन्न देकर पुष्ट करेंगे. (४)
त्वे राय इन्द्र तोशतमाः प्रणेतारः कस्य चिदृतायोः.
ते षु णो मरुतो मृळयन्तु ये स्मा पुरा गातूयन्तीव देवाः.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारा धन परम संतोषदाता एवं यजमान के यज्ञ को पूरा करने वाला है. वे
मरुद्गण हमें प्रसन्न करें जो पहले ही यज्ञ में आने के लिए तत्पर हैं. (५)
प्रति प्र याहीन्द्र मीळहुषो नॄन्महः पार्थिवे सदने यतस्व.
अध यदेषां पृथुबुध्नास एतांस्तीर्थे नार्यः पौंस्यानि तस्थुः.. (६)
हे इंद्र! तुम जल बरसाने वाले विश्व के नेता एवं महान् मेघों के सम्मुख जाओ एवं
अंतरिक्ष में स्थित रहकर प्रयत्न करो. जिस प्रकार युद्धक्षेत्र में राजा की सेनाएं ठहरती हैं, उसी
प्रकार मरुतों के चौड़े खुरों वाले घोड़े स्थित होते हैं. (६)
प्रति घोराणामेतानामयासां मरुतां शृण्व आयतामुपब्दिः.
ये मर्त्यं पृतनायन्तमूर्मैर्ऋणावानं न पतयन्त सर्गैः.. (७)
हे इंद्र! भयानक, काले रंग वाले एवं गमनशील मरुतों के आने का शब्द सुनाई दे रहा है.
जिस प्रकार अधम शत्रु को पीड़ा देकर उसका धन छीनते हैं, उसी प्रकार मरुद्गण अपने
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रक्षणोपायों द्वारा अपने शत्रु मेघ को गिरा लेते हैं. (७)
त्वं मानेभ्य इन्द्र विश्वजन्या रदा मरुद्भिः शुरुधो गोअग्राः.
स्तवानेभिः स्तवसे देव देवैर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (८)
हे समस्त प्राणियों को जन्म देने वाले इंद्र! तुम मरुतों के साथ आओ और अपनी
प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए शोकनाशिनी एवं जलधारण करने वाली घटा को विदीर्ण करो. हे देव!
स्तुति किए जाते हुए देवगण तुम्हारी स्तुति करते हैं. हमें अन्न, बल और दीर्घ आयु दो. (८)
सूक्त—१७० देवता—इंद्र
न नूनमस्ति नो श्वः कस्तद्वेद यदद्भुतम्.
अन्यस्य चित्तमभि सञ्चरेण्यमुताधीतं वि नश्यति.. (१)
इंद्र ने कहा—"आज या कल वास्तव में कुछ नहीं है. जो कार्य विचित्र है, उसे कौन
जानता है? अन्य लोगों का मन इतना चंचल होता है कि वे जो भी पढ़ते हैं, सो भूल जाते हैं."
(१)
किं न इन्द्र जिघांससि भ्रातरो मरुतस्तव.
तेभिः कल्पस्व साधुया मा नः समरणे वधीः.. (२)
अगस्त्य बोले—"हे इंद्र! तुम क्या मुझे मारना चाहते हो? अपने भ्राता मरुतों के साथ
जाकर भली प्रकार यज्ञ के भागों का भोग करो. संग्राम में हमारी हत्या मत करना." (२)
किं नो भ्रातरगस्त्य सखा सन्नति मन्यसे.
विद्या हि ते यथा मनोऽस्मभ्यमिन्न दित्ससि.. (३)
इंद्र बोले—"हे भाई अगस्त्य! तुम मित्र होकर हमारा अपमान क्यों कर रहे हो? तुम्हारे
मन में जो बात है, उसे हम जानते हैं. तुम हमें हव्य देना नहीं चाहते हो." (३)
अरं कृण्वन्तु वेदिं समग्निमिन्धतां पुरः. तत्रामृतस्य चेतनं यज्ञं ते तनवावहै.. (४)
हे ऋत्विजो! तुम वेदी को अलंकृत करो एवं हमारे सामने अग्नि को जलाओ. हम और
तुम उस अग्नि में अमृत की सूचना देने वाला यह करेंगे." (४)
त्वमीशिषे वसुपते वसूनां त्वं मित्राणां मित्रपते धेष्ठः.
इन्द्र त्वं मरुद्भिः सं वदस्वाध प्राशान ऋतुथा हवींषि.. (५)
अगस्त्य ने कहा—"हे धन के अधिपति, मित्रों के मित्र, सबके स्वामी एवं आश्रय इंद्र!
तुम मरुतों से कहो कि हमारा यज्ञ पूरा हो गया है. तुम ठीक समय पर आकर हमारा हव्य
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