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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति

है. (४)
इन्द्रासोमा युवमङ्ग तरुत्रमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथे.
युवं शुष्मं नर्यं चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनाषाहमुग्रा.. (५)
हे इंद्र एवं सोम! तुम हमें उद्धार करने वाला, संतानयुक्त एवं प्रशंसनीय धन शीघ्र दो. हे
अति शूरो! तुम मानवों में कल्याणकारी एवं शत्रुसेनाओं को हराने वाला बल बढ़ाओ. (५)
सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति
यो अद्रिभित्प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान्.
द्विबर्हज्मा प्राघर्मसत्पिता न आ रोदसी वृषभो रोरवीति.. (१)
पर्वत का भेदन करने वाले, सबसे पहले उत्पन्न, सत्ययुक्त, अंगिरा के पुत्र, यज्ञ के भागी,
दोनों लोकों में गतिशील, अतिशय दीप्त स्थान में रहने वाले एवं हमारे पालनकर्त्ता बृहस्पति
कामपूरक बनकर धरती-आकाश में गर्जन करते हैं. (१)
जनाय चिद्य ईवत उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार.
घ्नन्वॄत्राणि वि पुरो दर्दरीति जयञ्छत्रूँरमित्रान्पृत्सु साहन्.. (२)
जो बृहस्पति स्तुति करने वाले को यज्ञ में स्थान देते हैं, वे ही ढकने वाले अंधकार को
दूर करते हुए युद्धों में शत्रुओं को जीतते हैं एवं अमित्रों को हराते हैं. वे राक्षसों के नगरों को
बार-बार जलाते हैं. (२)
बृहस्पतिः समजयदद्वसूनि महो व्रजान् गोमतो देव एषः.
अपः सिषासन्तत्स्व१ रप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः.. (३)
इन बृहस्पति देव ने असुरों के धनों के साथ-साथ उनकी गायों से पूर्ण गोचर भूमि को
जीता था. बृहस्पति किसी के द्वारा न रोके जाते हुए यज्ञकर्म द्वारा स्वर्ग को भोगने की इच्छा
करते हैं एवं मंत्रों द्वारा शत्रु का नाश करते हैं. (३)
सूक्त—७४ देवता—सोम व रुद्र
सोमारुद्रा धारयेथामसुर्यं१ प्र वामिष्टयोऽरमश्रुवन्तु.
दमेदमे सप्त रत्ना दधाना शं नो भूतं द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१)
हे सोम एवं रुद्र! तुम हमें असुरों के समान शक्ति दो. हमारे यज्ञ प्रत्येक घर में तुम्हें पूरी
तरह व्याप्त करें. हे सात रत्न धारण करने वालो! तुम हमारे अतिरिक्त दो पैर वाले मानवों एवं
चार पैर वाले पशुओं के लिए कल्याणकारी बनो. (१)
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सोमारुद्रा वि वृहतं विषूचीममीवा या नो गयमाविवेश.
आरे बाधेथां निर्ऋतिं पराचैरस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु.. (२)
हे सोम एवं रुद्र! हमारे घर में जो रोग समाया हुआ है, उसे दूर भगाओ एवं दरिद्रता को
बाधा पहुंचाकर हमसे दूर भगाओ. हमारे पास कल्याणकारी अन्न हो. (२)
सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मे विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्.
अव स्यतं मुञ्चतं यन्नो अस्ति तनूषु बद्धं कृतमेनो अस्मत्.. (३)
हे सोम एवं रुद्र! तुम हमारे शरीर को लाभ पहुंचाने वाली सभी ओषधियां धारण करो.
हमारे द्वारा किया हुआ जो पाप हमारे शरीर में बंधा है, उसे शिथिल करके दूर भगाओ. (३)
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृळतं नः.
प्र नो मुञ्चतं वरुणस्य पाशाद् गोपायतं नः सुमनस्यमाना.. (४)
हे सोम एवं रुद्र! तुम दीप्त धनुष वाले, तेज बाणों वाले एवं शोभनसुख देने वाले हो.
शोभनस्तोत्रों की इच्छा करते हुए तुम दोनों इस संसार में हमें सुखी बनाओ, वरुण के पाशों से
छुड़ाओ एवं हमारी रक्षा करो. (४)
सूक्त—७५ देवता—वर्म आदि
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे.
अनाविद्धया तन्वा जय त्वं स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु.. (१)
युद्धों के आरंभ होने पर यह राजा जब कवच पहन कर जाता है, तब इसका रूप बादल
के समान जान पड़ता है. हे राजा! तुम शत्रुओं द्वारा बिना बिंधे शरीर से जय प्राप्त करो.
कवच की यह महिमा तुम्हारी रक्षा करे. (१)
धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम.
धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम.. (२)
हम धनुष के द्वारा गायों एवं युद्ध को जीतेंगे. हम धनुष की सहायता से शत्रुओं की
उद्धत एवं मदवाली सेनाओं को जीतेंगे. हमारा धनुष शत्रुओं की अभिलाषाएं नष्ट करे. हम
धनुष द्वारा सब दिशाओं को जीतें. (२)
वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रियं सखायं परिषस्वजाना.
योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इयं समने पारयन्ती.. (३)
युद्धभूमि में पार लगाने वाली यह धनुष की डोरी धनुष पर विस्तृत होकर प्रिय वचन
बोलने की अभिलाषा सी करती हुई प्यारी बातें कहने के लिए धनुर्धारी के कान के समीप

आती है. पति का आलिंगन करके बात करने वाली नारी के समान यह डोरी बाण को छूकर
शब्द करती है. (३)
ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे.
अप शत्रून् विध्यतां संविदाने आर्ती इमे विष्फुँरन्ती अमित्रान्.. (४)
धनुष की दोनों कोटियां परस्पर प्रिय आचरण करने वाली नारियों के समान कार्य करती
हुई युद्ध में राजा की इस प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार माता पुत्र की रक्षा करती है. ये परस्पर
विरोध छोड़कर जाती हुई इस राजा के अमित्रों को मारकर शत्रुओं को बेध दें. (४)
बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य.
इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः.. (५)
यह तरकस बहुत से बाणों का पिता है. बहुत से बाण इसके पुत्र हैं. बाण निकालने पर
इससे त्रिश्चा शब्द होता है. तरकस योद्धा की पीठ पर बंधा हुआ है, युद्धों को जानकर बाणों
को जन्म देता है एवं सब सेनाओं को जीतता है. (५)
रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्रयत्र कामयते सुसारथिः.
अभीशूनां महिमानं पनायत मनः पश्चादनु यच्छन्ति रश्मयः.. (६)
उत्तम सारथि रथ पर बैठकर अपने सामने वाले घोड़ों को जहां चाहता है, वहां ले जाता
है. हे मनुष्यो! उन लगामों की महिमा बखानो. घोड़े के मुंह से पीछे की ओर जाती हुई लगामें
सारथि के मन के अनुसार घोड़ों को वश में करती हैं. (६)
तीव्रान् घोषान् कृण्वते वृषपाणयोऽश्वा रथेभिः सह वाजयन्तः.
अवक्रामन्तः प्रपदैरमित्रान् क्षिणन्ति शत्रूँरनपव्ययन्तः.. (७)
धूल उड़ाते हुए एवं रथों के साथ तेज दौड़ते हुए घोड़े जोर से हिनहिनाते हैं. वे युद्ध से न
भागते हुए हिंसक शत्रुओं को अपनी टापों से कुचलते हैं. (७)
रथवाहनं हविरस्य नाम यत्रायुधं निहितमस्य वर्म.
तत्रा रथमुप शग्मं सदेम विश्वाहा वयं सुमनस्यमानाः.. (८)
हवि जिस प्रकार अग्नि को बढ़ाता है, उसी प्रकार रथ द्वारा ढोया गया शत्रुओं का धन
इस राजा को बढ़ाता है. रथ पर राजा के आयुध और कवच रखे रहते हैं. प्रसन्नचित्त हम
भरद्वाजवंशी सदा उस रथ के पास जावें. (८)
स्वादुषद्सदः पितरो वयोधाः कृच्छ्रेश्रितः शक्तिवन्तो गभीराः.
चित्रसेना इषुबला अमृध्राः सतोवीरा उरवो व्रातसाहाः.. (९)
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रथ की रक्षा करने वाले सैनिक शत्रु के स्वादिष्ट अन्न को नष्ट करके अपने योद्धाओं को
अन्न देने वाले एवं विपत्ति में आश्रय लेने योग्य हैं. ये सैनिक शक्तिशाली, गंभीर, विचित्रसेना
वाले, बाणरूपी शक्ति वाले, हिंसित न होने वाले, वीरतापूर्ण, विशाल एवं शत्रुसमूहों को हराने
वाले हैं. (९)
ब्राह्मणासः पितरः सोम्यासः शिवे नो द्यावापृथिवी अनेहसा.
पूषा नः पातु दुरिताद् ऋतावृधो रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत.. (१०)
हे ब्राह्मणो, पितरो और यज्ञ को बढ़ाने वाले सोम तैयार करने वालो! हमारी रक्षा करो.
पापरहित द्यावा-पृथिवी हमारा कल्याण करें. पूषा पाप से हमारी रक्षा करें. शत्रु हमारा स्वामी
न बने. (१०)
सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता.
यत्रा नरः सं च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यंसन्.. (११)
बाण शोभनपंख धारण करता है. हिरण का सींग इसका दांत है. गाय से बनी तांत द्वारा
बंधा हुआ बाण प्रेरणा के अनुसार लक्ष्य पर गिरता है. नेता जहां मिलकर या अलग-अलग
घूमते हैं, वहां ये बाण हमें शरण दें. (११)
ऋजीते परि वृङ्ग्धि नोऽश्मा भवतु नस्तनूः.
सोमो अधि ब्रवीतु नोऽदितिः शर्म यच्छतु.. (१२)
हे बाण! हमें सब प्रकार से बढ़ाओ. हमारा शरीर पत्थर के समान हो. सोम हमारा
पक्षपात करता हुआ बोले. अदिति हमें सुख दें. (१२)
आ जङ्घन्तिसान्वेषां जघनाँ उपजिघ्नते. अश्वाजनि प्रचेतसोऽश्वान्तसमत्सु चोदय..
(१३)
हे कोड़े! उत्तम ज्ञान वाले सारथि तुम्हारे द्वारा घोड़ों को पीठ और जांघों पर चोट करते
हैं. तुम युद्ध में घोड़ों को प्रेरणा दो. (१३)
अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतं परिबाधमानः.
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः.. (१४)
धनुषधारी के हाथ में बंधा हुआ चमड़ा धनुष की डोरी की चोट से हाथ की रक्षा करता
हुआ सांप के समान लिपटा है एवं सब बातों को जानता हुआ पौरुष द्वारा धनुषधारी की रक्षा
करता है. (१४)
आलाक्ता या रुरुशीर्ष्ण्यथो यस्या अयो मुखम्.
इदं पर्जन्यरेतस इष्वै देव्यै बृहन्नमः.. (१५)
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जहर में बुझे हुए, हिंसक नोक वाले, लोहे के अग्रभाग वाले एवं पर्जन्य से उत्पन्न
विशाल बाण देव को नमस्कार है. (१५)
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते.
गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः.. (१६)
हे मंत्र द्वारा तेज किए हुए एवं हिंसाकुशल बाण! तुम छोड़े जाने पर जाओ और शत्रुओं
पर गिरो. उन में से किसी को भी मत छोड़ना. (१६)
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव.
तत्रा नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (१७)
जिस युद्ध में मुंडितशिर कुमारों के समान बाण गिरते हैं, वहां ब्रह्मणस्पति एवं अदिति
हमें सदा सुख दें. (१७)
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्.
उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु.. (१८)
हे राजन्! मैं तुम्हारे मर्मस्थलों को कवच से ढकता हूं. राजा सोम तुम्हें अमृत से ढकें.
वरुण तुम्हें बड़े से बड़ा सुख दें. तुम्हारी विजय पाने के बाद देव प्रसन्न हों. (१८)
यो नः स्वो अरणो यश्च निष्ट्यो जिघांसति.
देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम्.. (१९)
हमारे जो परिवारी जन हमसे प्रसन्न नहीं हैं एवं जो दूर रहकर हमें मारना चाहते हैं,
सभी देव उन्हें मारें. मंत्र ही हमारी रक्षा करने वाले कवच हैं. (१९)