ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव
सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव
उषासानक्ता बृहती सुपेशसा द्यावाक्षामा वरुणो मित्रो अर्यमा.
इन्द्रं हुवे मरुतः पर्वताँ अप आदित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः.. (१)
मैं महान् एवं शोभनरूप वाली उषा व रात्रि और द्यावा-पृथिवी, वरुण, मित्र, अर्यमा, इंद्र,
मरुद्गण, पर्वतसमूह, जलों, आदित्यों, अंतरिक्ष एवं अन्य देवों को यज्ञ में बुलाता हूं. (१)
द्यौश्च नः पृथिवी च प्रचेतस ऋतावरी रक्षतामंहसे रिषः.
मा दुर्विदत्रा निर्ऋतिर्न ईशत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (२)
शोभन बुद्धि वाली एवं यज्ञ के योग्य द्यावा-पृथिवी हमें हिंसकों एवं पाप से बचावें. बुरी
बुद्धि वाली मृत्यु हम पर अधिकार न कर सके. हम आज देवों की उसी रक्षा की याचना करते
हैं. (२)
विश्वस्मान्नो अदितिः पात्वंहसो माता मित्रस्य वरुणस्य रेवतः.
स्वर्वज्ज्योतिरवृकं नशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (३)
धन के स्वामी मित्र और वरुण की माता अदिति पाप से हमारी रक्षा करें. हम
विनाशरहित ज्योति को पूर्णरूप से शीघ्र प्राप्त करें. देवों से आज हम उसी रक्षा की याचना
करते हैं. (३)
ग्रावा वदन्नप रक्षांसि सेधतु दुष्ष्वप्न्यं निर्ऋतिं विश्वमत्रिणम्.
आदित्यं शर्म मरुतामशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (४)
सोमरस निचोड़ने के काम आने वाले दोनों पत्थर शब्द करते हुए राक्षसों को दूर भगावें
एवं बुरे सपनों, मृत्यु और सबको खाने वाले राक्षसों को हमसे हटावें. हम आदित्यों एवं मरुतों
से संबंधित सुख प्राप्त करें. हम आज देवों की उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (४)
इन्द्रो बर्हिः सीदतु पिन्वतामिळा बृहस्पतिः सामभिर्ऋक्क्वौ अर्चतु.
सुप्रकेतं जीवसे मन्म धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (५)
इंद्र भली प्रकार कुश पर बैठें. स्तुतिवचन विशेषरूप से बोले जावें. साममंत्रों द्वारा
प्रशंसित बृहस्पति हमारी अभिलाषा पूरी करें. हम जीवन के लिए शोभन ज्ञान एवं धन प्राप्त
करें. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (५)
दिविस्पृशं यज्ञमस्माकमश्विना जीराध्वरं कृणुतं सुम्नमिष्टये.
प्राचीनरश्मिमाहुतं घृतेन तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे यज्ञ को स्वर्ग छूने वाला, शीघ्र गतियुक्त व हिंसारहित
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बनाओ. तुम हमारी अभिलाषापूर्ति के लिए हमें सुख दो तथा घृत द्वारा आहुति दी गई अग्नि
को देवों के प्रति अभिमुख बनाओ. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं.
(६)
उप ह्वये सुहवं मारुतं गणं पावकम्ऋष्वं सख्याय शंभुवम्.
रायस्पोषं सौश्रवसाय धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (७)
मैं शोभन आह्वान वाले, शुद्धिकर्त्ता, दर्शनीय, सुखदाता व धन के पोषक मरुद्गण को
मित्रता पाने के लिए बुलाता हूं तथा विशेषरूप से अन्न पाने के लिए मैं उनका ध्यान करता हूं.
हम आज देवों से विशेष रक्षा की याचना करते हैं. (७)
अपां पेरुं जीवधन्यं भरामहे देवाव्यं सुहवमध्वरश्रियम्.
सुरश्मिं सोममिन्द्रियं यमीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (८)
हम जल का पालन करने वाले, जीवों को धन्य करने वाले, देवों को तृप्ति देने वाले,
शोभन स्तुति वाले, यज्ञ की शोभा व शोभन दीप्तियुक्त सोम को धारण करते हैं एवं उनसे
शक्ति की याचना करते हैं. आज हम देवों से वही प्रसिद्ध रक्षा मांगते हैं. (८)
सनेम तत्सुसनिता सनित्वभिर्वयं जीवा जीवपुत्रा अनागसः.
ब्रह्मद्विषो विष्वगेनो भरेरत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (९)
हम और हमारे पुत्र दीर्घजीवी तथा अपराधरहित बनकर एवं अपनी संतान के साथ
बांटकर सोमरस का पान करें. हम ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले लोग सब प्रकार के पापों से
पूर्ण हों. आज हम देवों से उसी रक्षा की याचना करते हैं. (९)
ये स्था मनोर्यज्ञियास्ते शृणोतन यद्वो देवा ईमहे तद्ददातन.
जैत्रं क्रतुं रयिमद्वीरवद्यशस्तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (१०)
हे मनुष्यों का यज्ञ पाने के योग्य देवो! तुम हमारी स्तुति सुनो. हम तुमसे जो कुछ मांगते
हैं, वह हमें दो. हमें जय प्रदान करने वाला ज्ञान व धन एवं संतान से युक्त यश दो. आज हम
देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (१०)
महदद्य महतामा वृणीमहेऽवो देवानां बृहतामनर्वणाम्.
यथा वसु वीरजातं नशामहै तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (११)
हम आज श्रेष्ठ, महान् और अद्वितीय देवों से अधिक रक्षा की प्रार्थना करते हैं. आज
हम देवों से उसी विशेष रक्षा की प्रार्थना करते हैं, जिससे हमें धन एवं संतान प्राप्त हो सके.
(११)
महो अग्नेः समिधानस्य शर्मण्यनागा मित्रे वरुणे स्वस्तये.
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श्रेष्ठे स्याम सवितुः सवीमनि तद्देवानांमवो अद्या वृणीमहे.. (१२)
हम महान् एवं प्रज्वलित अग्नि से सुख व मित्रवरुण से पापहीनता तथा कल्याण प्राप्त
करें. हम सूर्य से सर्वोत्तम सुख प्राप्त करें. आज हमें देवों से उसी विशेष रक्षा की याचना करते
हैं. (१२)
ये सवितुः सत्यसवस्य विश्वे मित्रस्य व्रते वरुणस्य देवाः.
ते सौभगं वीरवद्गोमदप्नो दधातन द्रविणं चित्रमस्मे.. (१३)
जो देव सत्य स्वभाव वाले सविता, मित्र और वरुण के यज्ञ में उपस्थित रहते हैं, वे हमें
सौभाग्य, संतान एवं गायों से युक्त अन्न, पूजनीय धन एवं पुण्यकर्म दें. (१३)
सविता पश्चात्तात्सविता पुरस्तात्सवितोत्तरात्तात्सविताधरात्तात्.
सविता नः सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः.. (१४)
सूर्य देव हमें पश्चिम, पूर्व, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में सभी अभिलषित धन प्रदान करें
एवं दीर्घ आयु दें. (१४)
सूक्त—३७ देवता—सूर्य
नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृतं सपर्यत.
दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शंसत.. (१)
हे ऋत्विजो! तुम मित्र और वरुण को देखने वाले महान्, दीप्तिशाली, दूर रहते हुए भी
सबको देखने वाले, देवों के वंश में उत्पन्न, संसार का ज्ञान कराने वाले एवं स्वर्ग के पुत्रतुल्य
सूर्य को नमस्कार करके यज्ञ आदि से उनकी पूजा तथा प्रशंसा करो. (१)
सा मा सत्योक्तिः परि पातु विश्वतो द्यावा च यत्र ततनन्नहानि च.
विश्वमन्यन्नि विशते यदेजति विश्वाहापो विश्वाहोदेति सूर्यः.. (२)
ये सत्यवचन मेरी सभी प्रकार से रक्षा करें, जिनके सहारे आकाश एवं दिन स्थित हैं,
सभी प्राणी जिनके आश्रित हैं, जिनके प्रभाव से प्राणिसमूह गति करता है, जल बहता है एवं
सदा सूर्य उगता है. (२)
न ते अदेवः प्रदिवो नि वासते यदेतशेभिः पतरै रथर्यसि.
प्राचीनमन्यदनु वर्तते रज उदन्येन ज्योतिषा यासि सूर्य.. (३)
हे सूर्य देव! जब तुम अपने गतिशील घोड़ों को रथ में जोड़ने की इच्छा करते हो, तब
कोई भी प्राचीन राक्षस तुम्हारे समीप नहीं रहता. तुम्हारी वह प्रसिद्ध ज्योति जल के पीछे
चलती है, जिसके साथ तुम उदित होते हो. (३)
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येन सूर्य ज्योतिषा बाधसे तमो जगच्च विश्वमुदियर्षि भानुना.
तेनास्मद्विश्वामनिरामनाहुतिमपामीवामप दुष्ष्वप्न्यं सुव.. (४)
हे सूर्य देव! तुम जिस ज्योति से अंधकार का नाश करते हो एवं जिस किरण से सारे
संसार को चमकाते हो, उसी के द्वारा हमारा अन्नाभाव, यज्ञहीनता, रोगसमूह एवं बुरे स्वप्न नष्ट
करो. (४)
विश्वस्य हि प्रेषितो रक्षसि व्रतमहेळयन्नुच्चरसि स्वधा अनु.
यदद्य त्वा सूर्योपब्रवामहै तं नो देवा अनु मसीरत क्रतुम्.. (५)
हे प्रेरित सूर्य देव! तुम क्रोध न करते हुए सभी यजमानों के यज्ञों की रक्षा करते हो एवं
प्रातःकाल के यज्ञ के बाद उदित होते हो. आज जब हम तुम्हारा नाम लें, तभी देव हमारे यज्ञ
को स्वीकार करें. (५)
तं नो द्यावापृथिवी तन्न आप इन्द्रः शृण्वन्तु मरुतो हवं वचः.
मा शूने भूम सूर्यस्य सन्दृशि भद्रं जीवन्तो जरणामशीमहि.. (६)
द्यावा-पृथिवी, इंद्र, जल एवं मरुत् हमारा आह्वान एवं स्तुतिवचन सुनें. हम सूर्य की
कृपादृष्टि पाकर दुःख प्राप्त न करें, अपितु चिरकाल तक प्राण धारण करते हुए कल्याण एवं
यौवन का भोग करें. (६)
विश्वाहा त्वा सुमनसः सुचक्षसः प्रजावन्तो अनमीवा अनागसः.
उद्यन्तं त्वा मित्रमहो दिवेदिवे ज्योग्जीवाः प्रति पश्येम सूर्य.. (७)
हे सूर्य देव! हम प्रसन्नमन, सुदर्शन, संतानयुक्त, रोगरहित एवं निष्पाप होकर सदा
तुम्हारा यज्ञ करें. हे मित्रों का आदर करने वाले सूर्य! हम चिरंजीवी बनकर तुम्हें प्रतिदिन
उदित होता हुआ देखें. (७)
महि ज्योतिर्बिभ्रतं त्वा विचक्षण भास्वन्तं चक्षुषेचक्षुषे मयः.
आरोहन्तं बृहतः पाजसस्परि वयं जीवाः प्रति पश्येम सूर्य.. (८)
हे विशेष दृष्टि वाले सूर्य! हम चिरंजीवी बनकर प्रतिदिन तुम्हारा दर्शन करें. तुम महान्
ज्योति धारण करने वाले, दीप्तिशाली, सब देखने वालों की आंखों के लिए सुखकर एवं
महान् सागर के ऊपर आरोहण करते हो. (८)
यस्य ते विश्वा भुवनानि केतुना प्र चेरते नि च विशन्ते अक्तुभिः.
अनागास्त्वेन हरिकेश सूर्याह्नाह्ना नो वस्यसावस्यसोदिहि.. (९)
हे हरे बालों वाले सूर्य! तुम्हारी जिस पहचान के कारण सभी प्राणी विशेष रूप से गति
करते हैं और रात के समय विश्राम करते हैं, तुम अपनी पहचान को लेकर प्रतिदिन उगो एवं
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हम तुम्हें देखें. (९)
शं नो भव चक्षसा शं नो अह्ना शं भानुना शं हिमा शं घृणेन.
यथा शमध्वञ्छमसद् दुरोणे तत्सूर्य द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१०)
हे सूर्य! तुम अपने तेज, दिवस, किरण, शीतलता एवं उष्णता के द्वारा हमारे लिए
कल्याणकारी बनो. हम चाहे मार्ग में हों या अपने घर में, तुम हमें यह विचित्र संपत्ति दो. (१०)
अस्माकं देवा उभयाय जन्मने शर्म यच्छत द्विपदे चतुष्पदे.
अदत्पिबदूर्जयमानमाशितं तदस्मे शं योररपो दधातन.. (११)
हे देवो! तुम हमारे द्विपद और चतुष्पद दोनों प्रकार के प्राणियों को सुख दो. सब प्राणी
खाते-पीते एवं शक्तिशाली बनें. तुम प्राणियों को सुख एवं पापहीनता प्रदान करो. (११)
यद्वो देवाश्चकृम जिह्वया गुरु मनसो वा प्रयुती देवहेळनम्.
अरावा यो नो अभि दुच्छुनायते तस्मिन्तदेनो वसवो नि धेतन.. (१२)
हे निवासस्थान देने वाले देवो! हमने वचन अथवा मन के प्रयोग से तुम्हारा जो अपमान
किया है, उस पाप को तुम उस पर डालो जो हम पर आक्रमण करके हमारे प्रति पाप का
आचरण करता है. (१२)
सूक्त—३८ देवता—इंद्र
अस्मिन्न इन्द्र पृत्सुतौ यशस्वति शिमीवति क्रन्दसि प्राव सातये.
यत्र गोषाता धृषितेषु खादिषु विष्वक्पतन्ति दिद्यवो नृषाह्ये.. (१)
हे इंद्र! तुम यश देने वाले व परस्पर प्रहारों से युक्त युद्ध में सिंहनाद करते हो एवं धन
पाने के लिए हमारी रक्षा करते हो. गायों का लाभ कराने वाले एवं मानवों को पराजित करने
वाले युद्ध में योद्धा एक-दूसरे को नष्ट करते हैं एवं दीप्त आयुध चारों ओर गिरते हैं. (१)
स नः क्षुमन्तं सदने व्यूर्णुहि गोअर्णसं रयिमिन्द्र श्रवाय्यम्.
स्याम ते जयतः शक्र मेदिनो यथा वयमुशमसि तद्वसो कृधि.. (२)
हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम हमारे घर में इतनी प्रशंसनीय संपत्ति भर दो कि गाएं सागर के जल
के समान पर्याप्त मात्रा में हों. हे शक्र! हम तुम्हारी विजय पर शक्तिशाली बनें. हे वासदाता
इंद्र! हम जो कामना करें, उसे पूरा करो. (२)
यो नो दास आर्यो वा पुरुष्टुतादेव इन्द्र युधये चिकेतति.
अस्माभिषे सुसहाः सन्तु शत्रवस्त्वया वयं तान्वनुयाम सङ्गमे.. (३)
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हे बहुतों द्वारा प्रशंसित इंद्र! जो दास, आर्य अथवा राक्षस हमारे साथ युद्ध करना चाहते
हैं. वे सब शत्रु तुम्हारी कृपा से हमारे द्वारा सरलता से हार जावें. हम तुम्हारी कृपा से उन्हें
युद्ध में मार डालें. (३)
यो दभ्रेभिर्हव्यो यश्च भूरिभिर्यो अभीके वरिवोविन्नृषाह्ये.
तं विखादे सस्निमद्य श्रुतं नरमर्वाञ्चमिन्द्रमवसे करामहे.. (४)
जो इंद्र मानव संहारक युद्ध में धन प्राप्त करते हैं, वे चाहे थोड़े मनुष्यों द्वारा पुकारे जावें
अथवा बहुतों द्वारा उन पर शुद्ध, सर्वत्र प्रसिद्ध एवं यज्ञ के नेता इंद्र को आज हम अपने
अनुकूल बनाते हैं. (४)
स्ववृजं हि त्वामहमिन्द्र शुश्रवानानुदं वृषभ रध्रचोदनम्.
प्र मुञ्चस्व परि कुत्सादिहा गहि किमु त्वावान्मुष्कयोर्बद्ध आसते.. (५)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! हमने सुना है कि तुम स्वयं अपने बंधन काटने वाले, आशातीत
बल देने वाले एवं अपने भक्त के प्रेरक हो. तुम यहां आओ और कुत्स के बंधन से स्वयं को
बनते हो. लोग तुम्हें अंधे और दुर्बलों का ही नहीं, यज्ञ का वैद्य भी कहते हैं. (३)
युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुनर्युवानं चरथाय तक्षथुः.
निष्टौग्र्यमूहथुरद्भ्यस्परि विश्वेत्ता वां सवनेषु प्रवाच्या.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार बढ़ई पुराने रथ को नया बनाकर चलने योग्य कर देता
है, उसी प्रकार तुमने वृद्ध च्यवन ऋषि को जवान बनाकर चलने-फिरने लायक कर दिया था.
तुमने तुग्र के पुत्र भुज्यु को जल के ऊपर तैराकर किनारे पर लगा दिया था. तुम्हारे वे कार्य
यज्ञ के समय विशेषरूप से वर्णन करने योग्य हैं. (४)
पुराणा वां वीर्या३ प्र ब्रवा जनेऽथो हासथुर्भिषजा मयोभुवा.
ता वां नु नव्याववसे करामहेऽयं नासत्या श्रदरिर्यथा दधत्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! मैं लोगों के सामने तुम्हारे सभी पुराने वीर कर्मों का वर्णन करती हूं.
तुम दोनों सुख देने वाले वैद्य हो. मैं तुमसे रक्षा पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करती हूं. मेरी
स्तुति पर यजमान श्रद्धा करते हैं. (५)
इयं वामह्वे शृणुतं मे अश्विना पुत्रायेव पितरा मह्यं शिक्षतम्.
अनापिरज्ञा असजात्यामतिः पुरा तस्या अभिशस्तेरव स्पृतम्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. जिस प्रकार पिता पुत्र को
सीख देता है, उसी प्रकार तुम मुझे सिखाओ. मैं बंधुरहित, ज्ञानशून्य जातिरहित एवं बुद्धिहीन
हूं. तुम दुर्गति से पहले ही मेरी रक्षा करो. (६)
युवं रथेन विमदाय शुन्ध्युवं न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषणाम्.
युवं हवं वध्रिमत्या अगच्छतं युवं सुषुतिं चक्रथुः पुरन्धये.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुम पुरुमित्र की कन्या शुंध्युव को विमद के साथ विवाह करने के
लिए रथ द्वारा ले गए थे. तुम वध्रिमती द्वारा बुलाए जाने पर आए थे एवं तुमने उस बुद्धिमती
के लिए शोभन ऐश्वर्य दिया था. (७)
युवं विप्रस्य जरणामुपेयुषः पुनः कलेरकृणुतं युवद्वयः.
युवं वन्दनमृश्यदादुदूपथुर्युवं सद्यो विश्पलामेतवे कृथः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने बुढ़ापे को प्राप्त एवं मेधावी कलि ऋषि को दुबारा जवान बना
दिया था. तुमने वंदन नामक ऋषि को कुएं से निकाला था एवं लंगड़ी विश्पला को लोहे का
पैर लगाकर चलने योग्य बना दिया था. (८)
युवं ह रेभं वृषणा गुहा हितमुदैरयतं ममृवांसमश्विना.
युवमृबीसमुत तप्तमत्रय ओमन्वन्तं चक्रथुः सप्तवध्रये.. (९)
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हे अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! तुमने गुफा में पड़े हुए एवं मरणासन्न रेभ ऋषि को
बाहर निकाला था. तुमने सात बंधनों से बंधे एवं जलते हुए अग्निकुंड में फेंके गए अत्रि ऋषि
के लिए वर्षा करके अग्नि शांत कर दी थी. (९)
युवं श्वेतं पेदवेऽश्विनाश्वं नवभिर्वाजैर्नवती च वाजिनम्.
चर्कृत्यं ददथुर्द्र्रावयत्सखं भगं न नृभ्यो हव्यं मयोभुवम्.. (१०)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने राजा पेदु के लिए निन्यानवे घोड़ों के साथ एक शक्तिशाली
घोड़ा दिया था. वह घोड़ा शत्रुओं पर विजय पाने वाला व शत्रुओं के मित्रों को भगाने वाला
था. वह मनुष्यों के लिए आह्वान करने योग्य, सुखदाता एवं धन के समान सेवनीय था. (१०)
न तं राजानावदिते कुतश्चन नांहो अश्नोति दुरितं नकिर्भयम्.
यमश्विना सुहवा रुद्रवर्तनी पुरोरथं कृणुथः पत्न्या सह.. (११)
हे स्वामी! दीनतारहित, शोभन आह्वान वाले एवं प्रशंसनीय मार्ग वाले अश्विनीकुमारो!
तुम जिस पतिपत्नी को अपने रथ के अगले भाग में बैठा लेते हो, उसे न पाप लगता है, न
दुर्दशा उसके पास आती है और न उसे किसी से भय रहता है. (११)
आ तेन यातं मनसो जवीयसा रथं यं वामृभवश्चक्रुरश्विना.
यस्य योगे दुहिता जायते दिव उभे अहनी सुदिने विवस्वतः.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! मन के समान वेगशाली उसी रथ पर बैठकर आओ, जिसे तुम्हारे
लिए ऋभु नामक देवों ने बनाया था एवं जिस रथ के संयोग से सूर्यपुत्री उषा जन्म लेती है व
सूर्य से शोभन दिन-रात उत्पन्न होते हैं. (१२)
ता वर्तिर्यातं जयुषा वि पर्वतमपिन्वतं शयवे धेनुमश्विना.
वृकस्य चिद्वर्तिकामन्तरास्याद्युवं शचीभिर्ग्रसिताममुञ्चतम्.. (१३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम उसी जयशील रथ के द्वारा पर्वत की ओर जाने वाले मार्ग पर
जाओ एवं शंयु के लिए बूढ़ी गाय को पुनः दुधारू बना दो. तुमने भेड़िए के मुंह में फंसी हुई
वर्तिका नामक चिड़िया को अपने कर्मों के प्रभाव से छुड़ाया था. (१३)
एतं वां स्तोममश्विनावकर्मातक्षाम भृगवो न रथम्.
न्यमृक्षाम योषणां न मर्ये नित्यं न सूनुं तनयं दधानाः.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! भृगुवंशियों ने जिस प्रकार रथ बनाया, उसी प्रकार हमने तुम्हारे लिए
यह स्तोत्र बनाया है. जिस प्रकार दामाद को देने के लिए कन्या का शृंगार किया जाता है,
उसी प्रकार हमने यह रथ सजाया है. हम इस स्तोत्र को यज्ञकर्त्ता पुत्र के समान सदा धारण
करते हैं. (१४)
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