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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे.

इममिन्द्रो अदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा.
तस्मै सोमो अधि ब्रवत्तस्मा उ ब्रह्मणस्पतिः.. (३)
इंद्र ने ध्रुव हवि पाकर इस राजा को स्थिर बनाया है. सोम एवं ब्रह्मणस्पति ने उसे
आशीर्वाद दिया है. (३)
ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे.
ध्रुवं विश्वमिदं जगद् ध्रुवो राजा विशामयम्.. (४)
जिस प्रकार द्युलोक, धरती, ये पर्वत एवं सारा विश्व ध्रुव है, उसी प्रकार प्रजाओं के बीच
यह राजा भी अविचल रहे. (४)
ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः.
ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (५)
हे राजन्! राजा वरुण, देव बृहस्पति, इंद्र एवं अग्नि तुम्हारे राज्य ध्रुव रूप में धारण करें.
(५)
ध्रुवं ध्रुवेण हविषाभि सोमं मृशामसि.
अथो त इन्द्रः केवलीर्विशो बलिहृतस्करत्.. (६)
हे राजन्! हम अविनाशी पुरोडाश के साथ स्थिर सोमरस को मिलाते हैं इसलिए इंद्र ने
तुम्हारी प्रजाओं को भक्त एवं कर देने वाली बनाया है. (६)
सूक्त—१७४ देवता—राजस्तुति
अभीवर्तेन हविषा येनेन्द्रो अभिवावृते. तेनास्मान्ब्रह्मणस्पतेऽभि राष्ट्राय वर्तय.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! जिस हवि से इंद्र ने सब कुछ प्राप्त किया है, हम उसी हवि से यज्ञ करते
हैं. तुम हमें राज्यप्राप्ति में लगाओ. (१)
अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः.
अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो न इरस्यति.. (२)
हे राजन्! शत्रुओं, सेना लेकर चढ़ाई करने वालों, दानरहित लोगों एवं हमसे द्वेष करने
वालों को पराजित करो. (२)
अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृतत्.
अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तो यथाससि.. (३)
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हे राजन्! सविता देव, सोम एवं सभी प्राणी तुम्हारे अनुकूल हो गए हैं. इस प्रकार तुम
सबका आश्रय पा गए हो. (३)
येनेन्द्रो हविषा कृत्व्यभवद् द्युम्न्युत्तमः. इदं तदक्रि देवा असपत्नः किलाभुवम्.. (४)
हे देवो! जिस हवि द्वारा इंद्र यज्ञकर्म वाले यशस्वी एवं उत्तम बने हैं, उसी हव्य द्वारा मैंने
यज्ञ किया है. मैं इसीसे शत्रुरहित बना हूं. (४)
असपत्नः सपत्नहाभिराष्ट्रो विषासहिः. यथाहमेषां भूतानां विराजानि जनस्य च.. (५)
शत्रुरहित, शत्रुनाशक एवं शत्रुपराभवकारी मैं इन प्रजाओं एवं मंत्री आदि सेवकों का
स्वामी बना हूं. (५)
सूक्त—१७५ देवता—सोमरस निचोड़ने के
पत्थर
प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा. धूर्षु युज्यध्वं सुनुत.. (१)
हे पथरो! सविता देव अपने प्रेरणात्मक कर्म से तुम्हें सोमरस निचोड़ने में लगावें. तुम
सभी स्थानों में नियुक्त होकर सोमरस निचोड़ो. (१)
ग्रावाणो अप दुच्छुनामप सेधत दुर्मतिम्. उस्राः कर्तन भेषजम्.. (२)
हे पथरो! दुःख पहुंचाने वाली प्रजा एवं दुर्बुद्धि को हमसे दूर करो. तुम गायों को हमारे
लिए ओषधि तुल्य बनाओ. (२)
ग्रावाण उपरेष्वा महीयन्ते सजोषसः. वृष्णे दधतो वृष्ण्यम्.. (३)
छोटे पत्थर आपस में मिलकर बड़े पत्थर पर शोभा पा रहे हैं. ये पत्थर रस बरसाने
वाले सोम के प्रति अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं. (३)
ग्रावाणः सविता नु वो देवः सुवतु धर्मणा. यजमानाय सुन्वते.. (४)
हे पथरो! सविता देव सोमयज्ञ करने वाले यजमान के लिए सोमरस निचोड़ने के काम
में तुम्हें लगावें. (४)
सूक्त—१७६ देवता—ऋभु एवं अग्नि
प्र सूनव ऋभूणां बृहन्नवन्त वृजना. क्षामा ये विश्वधायसोऽश्रन्धेनुं न मातरम्.. (१)
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ऋभुओं के पुत्र विशाल युद्ध करने के लिए निकले. बछड़ा जिस प्रकार दुधारू गाय के
दूध को पीता है, उसी प्रकार ऋभुगण सारी धरती पर फैल गए. (१)
प्र देवं देव्या धिया भरता जातवेदसम्. हव्या नो वक्षदानुषक् .. (२)
हे ऋत्विजो! ज्ञानी अग्नि देव को दिव्य स्तोत्र से प्रसन्न करो. अग्नि विधि के अनुसार
हमारा हव्य वहन करें. (२)
अयमु ष्य प्र देवयुर्होता यज्ञाय नीयते. रथा न योरभीवृतो घृणीवाञ्चेतति त्मना.. (३)
ये वही अग्नि हैं, जो देवों के यजन की अभिलाषा रखते हैं एवं होता हैं. यज्ञ के लिए
इन्हें स्थापित किया जाता है. अग्नि रथ के समान हव्यवहनकर्त्ता, ऋत्विज्, यजमान आदि से
घिरे हुए, किरणों से युक्त एवं स्वयं ही यज्ञ पूरा करने वाले हैं. (३)
अयमग्निरुरुष्यत्यमृतादिव जन्मनः सहसश्चित्सहीयान्देवो जीवातवे कृतः.. (४)
ये अग्नि देवों के समान मानवों के भय से भी रक्षा करते हैं. यह अतिशय शक्तिशाली
एवं आयुवृद्धि के लिए उत्पन्न हुए हैं. (४)
सूक्त—१७७ देवता—माया
पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति विपश्चितः.
समुद्रे अन्तः कवयो वि चक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः.. (१)
विद्वानों ने विचार करके मन की आंखों से जीवात्मारूपी पक्षी को देखा. उसे असुरों की
माया घेर चुकी थी. उन विद्वानों ने सूर्यमंडल के मध्य में देखा. उन विधाताओं ने सूर्यकिरणों
के स्थान में जाने की अभिलाषा की. (१)
पतङ्गो वाचं मनसा बिभर्ति तां गन्धर्वोऽवदद् गर्भे अन्तः.
तां द्योतमानां स्वर्यं मनीषामृतस्य पदे कवयो नि पान्ति.. (२)
वह आत्मारूपी पक्षी मन ही मन वचन को धारण करता है. गंधर्व ने यह बात उसे गर्भ
में ही बताई है. विद्वान् लोग सत्य के मार्ग में उस दीप्तिशालिनी, स्वर्ग देने वाली एवं वृद्धि की
स्वामिनी वाणी की रक्षा करते हैं. (२)
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्.
स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (३)
मैंने रक्षक सूर्य को कभी पतित होते नहीं देखा, वे कभी समीपवर्ती और कभी दूरवर्ती
मार्ग से चलते हैं. वे कभी बहुत से वस्त्र एक साथ और कभी अलग-अलग पहनते हैं. वे
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