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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (१)
मैं सबके धारणकर्त्ता एवं बलरूप पालक अन्न की शीघ्र स्तुति करता हूं. अन्न की शक्ति
से इंद्र ने वृत्र असुर के टुकड़े कर दिए थे. (१)
स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे. अस्माकमविता भव.. (२)
हे स्वादिष्ट एवं मधुर पितः! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (२)
उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः.
मयोभुरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः.. (३)
हे मंगलरूप पितः! कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ हमारे पास आओ और हमें सुख
दो. तुम हमारे लिए प्रिय रस वाले मित्र एवं अनोखे सुखदाता बनो. (३)
तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः. दिवि वाताइव श्रिताः.. (४)
हे पितः अर्थात् अन्न! जिस प्रकार आकाश में हवा व्याप्त है, उसी प्रकार तुम्हारा रस
सारे संसार में फैला हुआ है. (४)
तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो.
प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवाइवेरते.. (५)
हे परम स्वादिष्ट पितः! तुम्हारी प्रार्थना करने वाले मनुष्य तुम्हारा भोग करते हैं. तुम्हारी
कृपा से ही वे तुम्हारा दान करते हैं. तुम्हारे रस का भोग करने वाले मनुष्य गरदन ऊंची करके
चलते हैं. (५)
त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम्.
अकारि चारु केतुना तवाहिमवसावधीत्.. (६)
हे पितः! महान् देवों का मन तुम्हीं में लगा हुआ है. इंद्र ने तुम्हारी रक्षा एवं बुद्धि का
सहारा लेकर ही वृत्र का वध किया था. (६)
यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम्.
अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः.. (७)
हे मधुर पितः! जब बादल प्रसिद्ध जल बरसाने को लावें, उस समय तुम पर्याप्त भोजन
के रूप में हमारे समीप आना. (७)
यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे. वातापे पीव इद्भव.. (८)
हे शरीर! हम जौ आदि वनस्पतियों को पर्याप्त मात्रा में खाते हैं, इसलिए तुम मोटे बनो.
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