रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र ८६
वाली, कान्तियुक्त लम्बी भुजा वाली, कमल समान नेत्र वाली,
सतोगुणी देवी स्त्री कहलाती है ।
—:❊:—
अप्सरा स्त्री
सुन्दर रूप, गायन प्रिय, मीठे खट्टे पदार्थों में रुचि रखनेवाली,
मृगनयनी, गन्धर्व-विद्यापरायणा, सत, रज, गुणयुक्ता स्त्री अप्सरा
कहलाती है ।
—:❊:—
यक्षिणी स्त्री
दयालु, गुणों की खान, दीन-रक्षिका, स्थूलोदरा, मजबूत शरीर
वाली, जिसकी जंघा और कण्ठ लाल हों, दृढ़मती, धनी, लाल
आँख वाली, रज, तम गुणों से युक्त स्त्री यक्षिणी कहलाती है ।
—:❊:—
राक्षसी स्त्री
भयंकर बड़ी बड़ी आँखों वाली, लाल और श्याम-वर्ण युक्त,
कामी, क्रोधी, निर्दयी, लम्बे स्थूल अंग वाली, दुष्ट बुद्धि, बिल्ली
की-सी आँखों वाली, शराबी, अच्छे मनुष्यों से द्वेष करने वाली
तमोगुणी स्त्री राक्षसी कहाती है ।
६० असली कोकशास्त्र
कृत्या स्त्री
क्रोधिनी, दयाहीना, पाप-कर्म करने वाली, क्रूर स्वभावा, बहु-
भोजी, बकरी की गन्ध वाली, अतिशय मैली, कडुवा, खट्टा पदार्थ
चाहने वाली, कौवे के समान शब्द करने वाली, विश्वासघातिनी
मन-मलीन स्त्री कृत्या कहाती है ।
—:०:—
स्त्रियों के त्रिगुणात्मक लक्षण
गूढास्थिग्रन्थिगुल्फा मृदुमधुरवचाः
श्लेष्मला पद्मभङ्गी,
व्यक्तास्थिग्रन्थिगुल्फा युवतिरशिशिरै
रङ्गकैः पित्तला स्यात् ।
रूक्षा शीतोष्णगात्री वदति बहुतरं
वातला श्लेष्मलापि,
स्यादुष्णा नव्यसूता शिशिरतरतनु
र्गर्भिणी पित्तलापि ॥
१—जिसके हड्डी में ही ग्रन्थी तथा गुल्मा छिपे हुए हों, सरल
मीठा बोलने वाली, कमल सदृश्य को
असली कोकशास्त्र ६१
२—जिसकी ग्रन्थी, गुल्म, हड्डी से बाहर दिखायी देते हों,
गरम अंग वाली, पित्त प्रकृतिका स्त्री कहलाती है ।
३—रूखे, उष्ण, शीतल, शरीर वाली, बहुभाषिणी स्त्री वात
प्रकृतिका कहाती है ।
—०—
स्त्रियों के त्रिगुणात्मक भेद से
तृप्ति लक्षण
अचिरलघुचिरोच्चैः कालभावावसानाः,
प्रमददहनगाढद्वारगुह्या क्रमेण ।
सततशिशिरकालोपेतहेमन्त वर्षा-
मधुषु निधुवनेच्छा संप्रदागे प्रदिष्टा ॥
१—कफ प्रकृति वाली नारी जल्दी तृप्त होनेवाली तथा बहुत
रज गिराने वाली होती है ।
२—पित्त प्रकृति वाली स्त्री कफ प्रकृति वाली से अधिक काल
में छूटने वाली तथा उसकी योनि गर्म होती है ।
३—वात प्रकृति वाली स्त्री सिकुड़ी हुई योनि वाली, तथा
बहुत देर में बहने वाली होती है ।
कफ प्रकृति वाली शिशिर और वसन्त में, पित्त प्रकृति वाली
वर्षा और शरद में वात प्रकृति वाली वसन्त और ग्रीष्म में सम्भोग
में हितकर होती हैं ।
६२ असली कोकशास्त्र
देवसत्वा स्त्री
सुरभिशुचिशरीर-सुप्रसन्नानना च ।
प्रचुरधनजनाढ्यां भामिनी देवसत्वा ॥
सुगन्धि से पवित्र देह वाली, सुप्रसन्नमुखी, धन-धान्य सम्पन्ना,
बड़े कुटुम्ब वाली, देव स्वभाव वाली स्त्री देवसत्वा कहलाती है ।
—०—
यक्षसत्वा स्त्री
व्यपगतगुरुलज्जोद्यानपानार्णवाद्रौ ।
स्पृहन्ति रातिसिद्धयै रोक्षणा यक्ष सत्वा ॥
माता, पिता और गुरुजनों के सम्मुख निर्लज्जता पूर्वक बर्तने
वाली, समुद्र, पर्वत और वनादि स्थानों में सम्भोग चाहने वाली,
क्रोधयुक्ता स्त्री यक्षसत्वा कहलाती है ।
—०—
मनुष्य सत्वा स्त्री
भवति सरलचित्ता दक्षिणातिथिषुरक्ता ।
स्फुटमिहनरसत्वा खिद्यते नोपवासैः ॥
सरल स्वभाव वाली, चतुरा, अतिथि-पूजिका, उपवास न
चाहने वाली, स्त्री मनुष्यसत्वा कहलाती है ।
—०—
असली कोकशास्त्र ६३
नागसत्वा स्त्री
श्वसिति बहुतरं या जृम्भते भ्रन्तिशीला ।
स्वापितसततमेव व्याकुला नागसत्वा ॥
सुशीतल श्वास लेने वाली, अधिक घूमने वाली, जम्भाई और
अंगड़ाई लेने वाली, अधिक काल तक सोने वाली, सर्प की भाँति
चंचल स्वभाव वाली स्त्री नागसत्वा कहलाती है ।
गन्धर्वसत्वा स्त्री
अपेतरुषोज्ज्वलदीप्तिवेषांस्रग्गन्धधूपादिषुबद्धरागाम्
सङ्गीतलीलाकुशलां कलज्ञांगन्धर्वसत्वां युवतींवदन्ती
क्रोधयुक्ता, स्वच्छ वस्त्र धारिणी, सुगन्धित पुष्पमाला धारिणी,
वेष-भूषा चाहने वाली, गाने बजाने में कुशल, अनेक तरह की कला
जानने वाली स्त्री गन्धर्व सत्वा कहलाती है ।
पिशाचसत्वा स्त्री
मनोजिह्मनाऽतिब हुभुक् प्रकटोष्णगात्री ।
भुङ्क्ते च मद्य पललादि पिशाच सत्वा ॥
निराभिमानिनी अनेक तरह के बहुत पदार्थ खाने वाली, तथा
गर्म शरीर वाली, मांस और शराब में विशेष रुचि रखनेवाली स्त्री
पिशाच सत्वा कहलाती है ।
६४ असली कोकशास्त्र
काकसत्वा स्त्री
दृष्टिं मुहुर्भ्रमयति प्रबलाशनात्ति ।
रुद्धं गमेति विपुलां किल काक सत्वा ॥
इधर-उधर बार बार देखने वाली, अधिक घूमने वाली, सर्वदा
कौए के समान क्षुधातुर रहने वाली स्त्री काकसत्वा कहलाती है ।
-:०:-
बानरसत्वा स्त्री
उद्भ्रान्तदृक्करजदन्तरणप्रसक्ता ।
स्याद्वानरप्रकृतिरस्थिरचित्तवृत्तिः ॥
जिसकी दृष्टि पागल की भांति चंचल हो, जिसके दाँत और
नख तीखे हों, वह बानर के समान चंचल स्वभाव वाली स्त्री
बानरसत्वा कहलाती है ।
-:०:-
गर्दभसत्वा स्त्री
या दृष्टविप्रियवचोरचना च नारी ।
रक्त विटप प्रहरणे खर सात्विका सा ॥
व्यर्थ बकवाद करने वाली, कामुकी, बुद्धिहीना गर्दभ के समान
स्वभाव वाली स्त्री गर्दभसत्वा कहलाती है ।
असली कोकशास्त्र ६५
योग्यायोग्य जोडे
सामान्ये नरनारीणां गर्भाधानं च जायते ।
हीनाधिक्येऽप्रजत्वं च कृशत्वं च परस्पस्परात् ॥
समान बल और क्रिया वाले स्त्री पुरुषों का संयोग उत्तम
सन्तान उत्पन्न कर सकता है। हीन बल क्रिया वालों का संयोग
गुण हीन, बल हीन, रोगी, अल्पायु सन्तान उत्पन्न करने वाला
होता है । इस लिए चाहिए कि शास्त्र मदानुसार जैसे स्त्री पुरुषों
का मिलन कहा गया है, वैसों का ही संयोग मिलाना चाहिए ।
कौन स्त्री किस पुरुष से सन्तुष्ट होकर सुखी होती है अब यह
बतलाया जाता है ।
शशकं पद्मिनी तुष्टा चित्रिणी रमते मृगम् ।
वृषभं शंखिनी तुष्टा हस्तिनी रमते हयम् ॥
शशक लक्षण-युक्त पुरुष पद्मिनी लक्षण वाली स्त्री से सन्तुष्ट
होता है तथा पद्मिनी शशक से । चित्रिणी मृग परस्पर एक दूसरे
से सुखी होते हैं । वृषभ संज्ञक पुरुष शंखिनी और हय-संज्ञक
हस्तिनी से सन्तुष्ट होते हैं । इस लिए इनका जोड़ा बुद्धिमानों को
मिलाना चाहिए । विपरीत योग मिलाने से हानि होती है ।
पद्मिनी मृग योग
मृग संज्ञक पुरुष के साथ यदि पद्मिनी का योग मिला दिया
जाय तो उससे उत्पन्न पुत्र बलवान होगा किन्तु पूर्ण सुखी न
६६ असली कोकशास्त्र
होकर दुखी भी होगा । यदि पुत्री होगी तो धन-हीन और अल्पायु
होगी ।
पद्मिनी वृषभ योग
वृषभ संज्ञक पुरुष से पद्मिनी का संयोग होने पर जो पुत्र पैदा
होगा वह बैल के समान परिश्रमी और दुराचार युक्त होगा, यदि
पुत्री होगी तो कुलटा, व्यभिचारिणी होगी ।
पद्मिनी अश्व योग
यदि पद्मिनी का अश्वसंज्ञक पुरुष से योग होगा तो उनका
पुत्र रोगी या नपुंसक होगा और यदि कन्या होगी तो सती, पति-
परायणा, बुद्धिमती, सुलक्षण होगी ।
चित्रिणी शशक योग
शशक और चित्रिणी के संयोग से उत्पन्न पुत्र सुशील सुन्दर
स्वभाव वाला होते हुए भी अल्पायु होगा । किन्तु पुत्री पर-पुरुष-
गामिनी और दुःख भोगने वाली होगी ।
चित्रिणी वृषभ योग
वृषभ और चित्रिणी के संयोग से उत्पन्न सन्तान बचपन में
ही मरने वाली होती है अथवा गर्भ में ही मर जाती है ।
७ असली कोकशास्त्र ६७
चित्रिणी अश्व योग
अश्व संज्ञक पुरुष के साथ चित्रिणी का संयोग होने से अल्प-
काल जीनेवाला पुत्र उत्पन्न होता है और पुत्री एकाक्षिणी (कानी)
होती है तथा उसका रंग श्वेत होता है ।
शंखिनी शशक योग
शशक संज्ञक पुरुष का शंखिनी के साथ योग होने पर जो पुत्र
पैदा होता है वह धर्मात्मा और सत्य-प्रिय होता है किन्तु कन्या
बड़ी आयु वाली होकर भी क्रोधिनी होती है ।
शंखिनी मृग योग
मृग संज्ञक पुरुष के योग से शंखिनी में उत्पन्न होने वाला पुत्र
दयालु सर्व-प्रिय होता है ओर कन्या भी अति सुन्दरी और कुटुम्ब
वाली होती है ।
शंखिनी अश्व योग
अश्व पुरुष का शंखिनी से योग होने पर पुत्र दुर्बल-बुद्धि
कमजोर और जन्मान्ध होता है। कन्या पति प्राणहारिणी, निर्लज्ज
और व्यभिचारिणी होती है ।
६८ असली कोकशास्त्र
हस्तिनी शशक योग
शशक संज्ञक पुरुष का हस्तिनी के साथ संयोग होने पर जो
पुत्र जन्म लेता है वह दुर्बलाङ्ग और स्वल्पायु होता है। तथा कन्या
भी वैसी दुर्बला, कम उमर वाली होती हुई खूबसूरत अवश्य होती
है। शशक पुरुष से हस्तिनी स्त्री तृप्त नहीं होती। दोनों दुःखी
रहते हैं। इस लिए असम्मान योग सर्वदा त्याज्य समझना
चाहिए।
हस्तिनी मृग योग
मृग संज्ञक पुरुष का हस्तिनी के साथ संयोग होने से जो पुत्र
उत्पन्न होता है, वह पशु के समान बुद्धि वाला होता है, और
कन्या पतिघातिनी कुलटा होती है।
हस्तिनी वृषभ योग
हस्तिनी का वृषभ संज्ञक पुरुष के साथ संयोग होने से जो
पुत्र होता है वह बलवान युद्ध-प्रिय होता है किन्तु दुराचारी भी
होता है ओर कन्या दुराचारिणी होती है।
विवाह के पूर्व स्त्री-पुरुष के लक्षणों का मिलान कर लेना
चाहिए। जिसका जिसके साथ योग मिलता हो उसके साथ मिला
देना चाहिए। तब किसी प्रकार की हानि नहीं हो सकती।
असली कोकशास्त्र ६६
नायिका विचार
बाला स्यात् षोड़शान्दात्तदुपरि तरुणी
त्रिंशतिर्यावदूर्ध्वं,
प्रौढ़ा स्यात्पञ्च पञ्चाशदवधिपरतो
वृद्धतामेति नारी ।
दीर्घा कृष्णा च तन्वी चिरविरहवती
निम्नकच्छा श्लथास्युः,
स्थूला गौरी च खर्वा सतत रतिपरा
व्यूढ़ कच्छा घनास्युः ॥
रति शास्त्र के जानने वालों ने सोलह वर्ष तक की आयु वाली,
स्त्री को बाला ही माना है। और तीस वर्ष तक को तरुणी । तत्-
पश्चात् पचपन वर्ष तक की प्रौढ़ा, कहाती है । ये तीन अवस्था
वाली रमणियें ही सम्भोग योग्य कहाती हैं । पचपन वर्ष से बाद
वृद्धा स्त्री सम्भोग योग्य नहीं रहती ।
बाला
जब शैशवावस्था को पार कर लड़की वाल्यावस्था में पदार्पण
करती है तब उसके उन अंगों का विकास आरम्भ होता है जो उसे
पुरुष की ओर जाने से संकोच पैदा कराते हैं और साथ ही चुम्बक
की भाँति उसे पुरुष की ओर खिंचाव भी पैदा करते हैं ।—उन
१०० असली कोकशास्त्र
अंगों पर चमक और कठोरता आती जाती है जो उनके परिपक्व
होने की द्योतक होती है।
वह बाला जब परिपूर्णाङ्ग हो जाती है तब उसमें इतना संकोच
भाव उत्पन्न हो जाता है कि वह जिन पुरुषों में बिना संकोच के
आती-जाती थी, फिर नहीं आ पाती। उसकी शैशव-चपलता के
स्थान पर लज्जा और गम्भीरता अपना अधिकार जमा लेती है।
उसका कटिभाग सूक्ष्म और वक्षस्थल उभर आता है। वह
हमेशा अपने शरीर के सब अंगों को कपड़े से ढँके रहती है और
मनुष्यों की दृष्टि से बहुत बचती है। उसकी काम-वासनायें जाग
उठती हैं किन्तु उसके मन में इतनी लज्जा और संकोच होता है
कि वह अपने नायक से प्रकट नहीं कर सकती, इसी नायिका का
नाम मुग्धा है।
इसी मुग्धा बालिका के हृदय में मान जाग उठता है। वह मान
का अभिनय करने लगती है। सखियों से बुलाये जाने पर मुँह घुमा
लेती तथा इठला कर चलती है। उस समय उसे मानिनी कहते
हैं। किन्तु यह उसका मान चिरस्थायी नहीं होता, क्षणिक होता
है। झट स्वयं ही बोलने लगती है और फिर गम्भीर हो जाती है।
किसी एकान्त स्थान में बैठकर अनेक रंग-बिरंगे वस्त्रों और
आभूषणों को पहन-पहन कर पति के पास जाने के लिए श्रृङ्गार
करती है। किन्तु अपनी प्रिय सखी को आते देखकर सब वस्त्रा-
भूषण उतार देती है। श्रृङ्गार को ऐसा अस्त-व्यस्त कर देती है,
असली कोकशास्त्र १०१
मानो उसने श्रृंगार किया नहीं था। सखियों के प्रेरणा करने पर
भी वह कोई वस्तु नहीं पहनती । अनमनी सी होकर झुँझलाती
और वहाँ से हट जाती है ।
अकेले पति के पास नहीं जाती, सखियों के साथ-साथ जाती
और साथ ही लौट भी आती है। पति को देखने की इच्छा रखने
पर भी नजर भर कर देख नहीं पाती । उनकी नजर पड़ते ही
अपनी दृष्टि दूसरी ओर या नीचे कर लेती है । पति के स्पर्श मा ।
से उसका शरीर अति हर्षित होकर रोमाञ्चित हो उठता है और
साथ ही सारे शरोर में कँपकँपी छूट पड़ती है ।
पसीने से उसकी देह तर-बतर हो जाती है। पति के बार बार
अनुरोध करने पर भी उसके मुख से एक भी शब्द नहीं निकलता।
चेष्टा करने पर भी उससे बोला नहीं जाता, मानो उसकी जबान
को लकवा मार गया हो ।
पति से विशेष परिचय हो जाने पर उनके प्रश्नों का कुछ स्फुट
उत्तर देती है। धीरे-धीरे झिझक कम हो जाने पर तिर्छों चितवन
के साथ पति की ओर देखती है । आँखें चार हो जाने पर मान
करती हुई कुछ मुस्करा देती है। पति उसके ऐसे कार्य-कलाप को
देखकर उन्मत्त हो उठता है और उसे बाहु-पाश में अवेष्ठित करने
की चेष्टा करता है। वह बाला काम-सिक्त होकर काम-कला के
प्रभाव से अनूठी दिखायी देने लगती है। उसकी भौं कमान की
भाँति तन-तन कर आकुञ्चित होती है। लज्जा भरी आँखें पलकों में
१०२ असली कोकशास्त्र
नाचने लगती हैं। देह में हलकी कँपकँपी होती है। उस पुलकित
तन्वी मुग्धा बाला को देखकर उसका पति मुग्ध हो जाता है।
सखियों से की हुई पति की प्रशंसा सुनकर वह मन ही मन
बहुत प्रसन्न होती है किन्तु अपने मुँह से किसी प्रकार का सहयोग
नहीं देती। यदि सखियें उसका मनोभाव जानने के लिये उसके
मुख की ओर देखती हैं तो वह अपना मुख दूसरी ओर इस भाँति
फेर लेती है मानो उसने उनकी कोई बात सुनी ही नहीं और न
सुनना ही चाहती है। अनुभविता होने से तरुणी या प्रौढ़ा उसके
मनोगत-भाव को समझ पाती हैं अन्य नहीं।
रति सदन में पति के पास जाने के समय पति से दिये हुए
सम्पूर्ण आभूषणों को एकान्त में पहनती है और फिर आइने में
अपने श्रृङ्गार को देखकर खुश होती है। वह अपना पति के पास
जाना अपनी प्रिय सखियों को भी प्रगट करना नहीं चाहती। इस
लिए शब्द करने वाले सभी आभूषणों को उतार देती है और
करधनी आदि का शब्द रोकने के लिए उसे कसकर बाँध देती है।
जब दबे पाँव अलक्षित रूप से रति-गृह में पहुँच जाती है तब फिर
आभूषणों से सजकर कटाक्ष बाण छोड़ती हुई पति के सम्मुख जा
खड़ी होती है। उपरोक्त आचरण काम-विह्वला लज्जाशील मुग्धा
बालाओं के होते हैं।
सम्भोग के अनन्तर उसका सभी श्रृंगार बिगड़ जाता है। वह
अपनी उस अवस्था को देखकर बहुत लज्जित होती है। पति के
असली कोकशास्त्र १०३
सम्मुख स्थिर रहना कठिन हो जाता है। कभी-कभी मुग्धा पुरुष
को पराजित करने के लिये कामावेश में पुरुषारूढ़ भी हो जाती है,
किन्तु स्रावित हो जाने के कारण शिथिल होकर कटी बेल की भाँति
पति के वक्षस्थल पर गिर पड़ती है।
तरुणी
मुग्धा या बाला रमण की इच्छा रखती हुई भी स्वयं पति से
रुख नहीं मिलाती, पति से बार-बार आकृष्ट किये जाने पर ही रति
क्रिया में प्रवृत्त होती है। किन्तु तरुणी अभ्यस्ता नारी होने से रति
लालसा से परिपूर्ण होती है। उसकी सभी काम-कलायें जागृत
होती हैं। वह स्वयं भी वैसी ही उन्मत्ता होती है जैसा उसका
पति। वह वस्त्राभूषणों की अपेक्षा पति को अधिक प्यार करती
है। उसकी पति के पास रहने की विशेष इच्छा होती है। किन्तु
पति से मिलते समय वह आभूषण अवश्य पहन लेती है। उसका
उद्देश्य है पति प्रसन्न रहे और उसकी मनोभिलाषा में बाधा उत्पन्न
न हो। वह अपने कामोत्तेजक अंगों को किसी बहाने से नंगा कर
देती है। ये उसकी आतुरता के चिह्न होते हैं। वह सखियों में
स्वयं पति की प्रशंसा करती और सुनना चाहती है। उसका पति
में विशेष अनुराग होता है।
—:०:—
१०४ असली कोकशास्त्र
प्रौढा
प्रौढ़ा में पति के सम्मुख लज्जा का अभाव-सा हो जाता है ।
उसमें किसी प्रकार का संकोच भाव शेष नहीं रह जाता । वह पति
का साथ एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ना चाहती । उसका
प्रत्येक अंग सुगठित और मनोहर होता है । उसकी मदमाती चाल
मन को लुभाती है । उसकी मदभरी आँखों में सदा नायक की
सूरत नाचती रहती है । भोग-विलास प्रिय नायक को वह अपनी
कुशलता से आनन्द विभोर कर देती है । उस काम-कला-निपुण
सुन्दरी को आलिंगन, चुम्बन, नखच्छेदन और आसनादि भेद
बहुत प्रिय लगते हैं ।
वृद्धा
वृद्धा आदर करने मीठी-मीठी बात करने, कथा-कहानी सुनने-
सुनाने से तृप्त हो जाती है । उसे रति सम्बन्धी बातों से कुछ
विशेष आनन्द प्राप्त नहीं होता ।
स्त्री प्रसङ्ग
परमपिता परमात्मा ने सृष्टि की रचना के लिये दो शक्तियें
निर्माण की हैं । एक प्राण, और दूसरी रयि । प्राण और रयि शक्ति
के एक साथ मिलने से एक नयी वस्तु पैदा हो जाती है । गेहूँ,
चना उर्द और बनस्पत्यादि सभी इसी नियम से उत्पन्न होते हैं ।
असली कोकशास्त्र १०५
इसमें प्राण और रयि शक्ति हमेशा विद्यमान रहती है। जो सूर्य
और चन्द्र से प्राप्त होती है। सूर्य शक्ति को धारण करनेवाली प्राण
और चन्द्र शक्ति को धारण करनेवाली रयि शक्ति होती है। इन्हीं
प्राण वा रयि शक्ति को पुंषत्व वा स्त्रीत्व, वीर्य या रज कह सकते
हैं। इन शक्तियों को ठीक समय तक परिपक्व कर लेने पर जो
सन्तान उत्पन्न होती है, वह बलवती और सदैव निरोग रहनेवाली
होती है। इस लिए रज-वीर्य को परिपक्व अवस्था के पूर्व कभी
नाश न होने देना चाहिए।
परिपक्व रज-वीर्य भी यदि परिमाण से अधिक नाश कर दिये
जाते हैं तो उनका भी परिणाम उलटा ही होता है। स्त्री-पुरुष के
सम्बन्ध का प्रयोजन सन्तानोत्पत्ति मात्र है। जैसे कहा है:—
प्रजननार्थं स्त्रियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्च मानवाः ।
किन्तु आजकल लोग ठीक इसके विपरीत आचरण करते हैं।
अर्थात् उन्होंने स्त्री को सन्तानोत्पत्ति का साधन न समझ कर भोग
मात्र का साधन समझ रखा है। भोग-विलास करते हुए संयोगवश
यदि गर्भ रह जाय तो वे आनन्दित होने की अपेक्षा अत्यन्त दुखित
होते हैं और उस गर्भ को गिराने के लिए वैद्यों, डाक्टरों और
मन्त्र-तन्त्र करने वालों से उपाय पूछा करते हैं। यदि दुर्भाग्यवश
कोई अदूरदर्शी लोभी गर्भपात का उपाय बतानेवाला मिल गया,
तो उस स्त्री का सर्वनाश ही समझना चाहिये। वह इतने भयंकर
रोगों से पीड़ित हो जाती है कि उसे अन्त में प्राणों से हाथ धोना
१०६ असली कोकशास्त्र
पड़ता है। दैवसंयोग से यदि सन्तान उत्पन्न हो गयी तो वह
वीर्यहीन, क्षीणकाय, सदैव रोगी रहने वाली और अल्पायु पैदा
होती है।
पुरुष स्त्री के साथ अधिक सम्भोग करने में अपनी बहादुरी
समझता है और समझता है कि स्त्री मेरे इस कर्म से प्रसन्न होकर
मेरे आधीन रहेगी, किन्तु यह उसकी भारी भूल होती है। स्त्री
विषयी पुरुष को अधिक पसन्द नहीं करती। क्योंकि स्त्री एक बार
श्रवित होने पर अपनी अष्टगुण शक्ति का नाश कर बैठती है और
पुरुष की केवल एक गुण शक्ति ही नष्ट होती है। काम-लोलुप
पुरुष का वीर्य अपरिपक्व होने से पतला एवं निर्जीव हो जाता है
और वह स्त्री के साथ भोग करने में अधिक काल तक ठहर नहीं
पाता। स्त्री की भी यही अवस्था होती है। दोनों के निर्वीर्य हो
जाने पर प्रेम की मात्रा घट जाती है, एक दूसरे का आकर्षण
सदैव के लिए लुप्त हो जाता है। बहुधा ऐसे स्त्री-पुरुष पर-पुरुष
और पर-स्त्री-गामी हो जाते हैं।
गर्भ स्थिर हो जाने पर भी प्रायः लोग स्त्री-प्रसंग नहीं त्यागते
उसका प्रभाव स्त्री-पुरुष की तन्दुरुस्ती पर ही नहीं पड़ता, वरन
गर्भस्थ बालक पर इतना बुरा पड़ता है कि अंग-भंग, टेढ़ा-कुबड़ा और
दिमाग का खराब तथा विषयी पैदा होता है। उस पाप का भागी
माता-पिता को ही होना पड़ता है। यह पवित्र कार्य मूर्खतावश
ऐसा गन्दा बना दिया है कि जिसमें अपने शरीर, बल, धन, मान,
असली कोकशास्त्र १०७
मर्यादा सभी का नाश करता हुआ मनुष्य सुख समझता है।
ऐसे वीर्यहीन पुरुषों को जब सन्तान उत्पन्न नहीं होती, तब
वे देवी देवता, मियाँमदार से सन्तान माँगते फिरते हैं, परमात्मा
के नियम को तोड़नेवाले के लिए, कभी सफलता नहीं मिल सकती।
इस लिए वे सन्तानहीन जिन्दगी भर भाग्य को दोष देकर रोया
करते हैं। इस लिए सुख की कामना करनेवाले स्त्री-पुरुषों को
चाहिए कि वे शास्त्र मर्यादानुसार अपने आपको सुरक्षित रखते
हुए 'नयमपूर्वक बरतें। तभी स्त्री प्रसंग का सच्चा सुख प्राप्त
कर सकते हैं।
—:o:—
सुहाग रात
यह वह रात है, जिस रात को नयी सृष्टि उत्पन्न करने के लिए
रयि और प्राण-शक्ति का पहला मिलन होता है। दोनों स्त्री पुरुष
एक दूसरे से बिलकुल अपरिचित होते हैं, एक दूसरे से संकुचित,
परस्पर मनोभाव से अनभिज्ञ, परस्पर मिलने की इच्छा रखने वाले
होते हैं। किन्तु संकोचवश कौन किसके साथ कैसा सम्भाषण
आरम्भ करे, इस बात की विवेचना ही हृदयों में अति वेग के साथ
हो रही होती है। यद्यपि उनका यह सम्बन्ध उनके जीवनभर के
लिए होता है, तथापि वे एकाकि अपने हियाव को शीघ्र तोड़ नहीं
पाते। यह ठीक भी है। उस समय उन्हें बड़ी सावधानी से ही
१०८ असली कोकशास्त्र
काम लेना चाहिए । क्योंकि उस समय के बर्ताव का प्रभाव
जिन्दगीभर उनके दिलों पर अमिट रूप से ऐसा अंकित हो जाता
है कि जो भुलाये भी नहीं भूलता ।
कारण यह है कि उन दोनों के पूर्व चरित्र का सच्चा भाव उस
प्रथम मिलन में ही मालूम होता है। यदि सुक्ष्म रीति से दोनों स्त्री
पुरुष एक दूसरे के बर्ताव को लक्ष्य करें, तो मनुष्य की सम्पूर्ण
जिन्दगी का परिचय उन्हें उसी समय हो सकता है । भुक्तभोगी
स्त्री-पुरुष के विचार छिप नहीं सकते । कठोरता, मृदुता, सच्चाई,
प्रेम, सरलता आदि गुण-दोषों का भेद उस छोटे से समय में बड़ी
सरल रीति से स्पष्ट हो जाता है । जिन स्त्री-पुरुषों में उस समय
किसी प्रकार का प्रकृति-विरुद्ध भेद-भाव हो जाता है, वह ताबे
जिन्दगी निकाले नहीं निकलता । इस लिए वह प्रथम रात्रि बड़े
संयम और शिष्टता के साथ निबाहनी उचित है । और ठीक उसी
रात्रि के समान अपनी सारी जिन्दगी बना लेनी चाहिए ।
प्रथम रात्रि में पति-पत्नि जब एक पलंग पर बैठे हों तब उन्हें
परस्पर एक दूसरे के प्रति मधुर आदर-सूचक शब्दों का प्रयोग
करना चाहिए । जिनमें एक दूसरे का सम्मान भलीभाँति भरा हो ।
स्त्री को पहले बोलने का साहस नहीं होता । इस लिए पुरुष को
चाहिए कि वह ऐसे छोटे-छोटे प्रश्न करे जिनका जवाब 'हाँ' या
'ना' में ही केवल हो सकता हो । स्त्री एकाएक तीन-चार अक्षर
का उत्तर नहीं दे सकती । प्रश्न करने के बाद पति को इस बात का