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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 440 में से

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१०० असली कोकशास्त्र
अंगों पर चमक और कठोरता आती जाती है जो उनके परिपक्व
होने की द्योतक होती है।
वह बाला जब परिपूर्णाङ्ग हो जाती है तब उसमें इतना संकोच
भाव उत्पन्न हो जाता है कि वह जिन पुरुषों में बिना संकोच के
आती-जाती थी, फिर नहीं आ पाती। उसकी शैशव-चपलता के
स्थान पर लज्जा और गम्भीरता अपना अधिकार जमा लेती है।
उसका कटिभाग सूक्ष्म और वक्षस्थल उभर आता है। वह
हमेशा अपने शरीर के सब अंगों को कपड़े से ढँके रहती है और
मनुष्यों की दृष्टि से बहुत बचती है। उसकी काम-वासनायें जाग
उठती हैं किन्तु उसके मन में इतनी लज्जा और संकोच होता है
कि वह अपने नायक से प्रकट नहीं कर सकती, इसी नायिका का
नाम मुग्धा है।
इसी मुग्धा बालिका के हृदय में मान जाग उठता है। वह मान
का अभिनय करने लगती है। सखियों से बुलाये जाने पर मुँह घुमा
लेती तथा इठला कर चलती है। उस समय उसे मानिनी कहते
हैं। किन्तु यह उसका मान चिरस्थायी नहीं होता, क्षणिक होता
है। झट स्वयं ही बोलने लगती है और फिर गम्भीर हो जाती है।
किसी एकान्त स्थान में बैठकर अनेक रंग-बिरंगे वस्त्रों और
आभूषणों को पहन-पहन कर पति के पास जाने के लिए श्रृङ्गार
करती है। किन्तु अपनी प्रिय सखी को आते देखकर सब वस्त्रा-
भूषण उतार देती है। श्रृङ्गार को ऐसा अस्त-व्यस्त कर देती है,