रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
६४ रसिकप्रिया
समुझाइ कहौं समुझी सब केसव झूठी सबै हमसौ जु कही हैं ।
मान कियो अपमान करौ तौ हँसौ अब कै हँसिबे कौ रही हैं ।६२।
शब्दार्थ—हितु कै = प्रेमपूर्वक । अरु = (अड़) हठ । अब कै = इस
बार (एक बार) ।
भावार्थ—(नायक-नायिका का संवाद) (नायक) 'प्रेमपूर्वक इधर
देखो'। (नायिका) 'सब देख चुकी'। (नायक) 'अच्छा प्रेम की बातें ही
सुनो'। (नायिका) 'हाँ, मैंने सब सुन लिया'। (नायक) 'यह तो कुछ
और ही बात है'। (नायिका) (अगर मेरा हठ समझते हो तो) कसम
खाओ (खाकर बतलाओ) कि वहाँ (सपत्नी के यहाँ) 'तुमने क्या
क्या कर्म किए हैं'? (नायक) 'मैंने तो समझाकर कह दिया'।
(नायिका) मैंने समझ लिया कि आपने मुझसे सब झूठी बातें कही हैं ।
(नायक) (मैं समझ गया) 'तुमने मान किया है'। (नायिका) (ऐसा
कहकर तो आप मेरा) 'अपमान कर रहे हैं'। (नायक) (अगर ऐसी बात नहीं
है) 'तो इस बार हँसो तो'। (नायिका) 'मैं तो हँस चुकी (मै नहीं हँसूंगी)' ।
अथ प्रौढ़ा-अधीरा-लक्षण— (दोहा)
(१०६) पति को अति अपराध गनि, हतन कहैं हित मानि ।
कहत अधीरा प्रौढ़ तिहि, केसवदास बखानि ।६३।
यथा— (सवैया)
(११०) हौं सुख पाइ सिखाइ रही सिख सीखे न ए सखितैं हूँ सिखाई ।
मैं बहुतै दुख पाइहू देख्यौ पै केसव क्यौंहूँ कुटेव न जाई ।
दंड दियैं बिनु साधुनिहूँ सँग छूटति क्यों खल की खलताई ।
देखहु दै मधु की पुट कोटि मिटै न घटै बिष की बिषमाई ।६४।
शब्दार्थ—मधु=शहद । बिषमाई=भयंकरता, कटुता ।
भावार्थ—(नायिका नायक की उपस्थिति में सखी से कह रही है) मैं
सुखपूर्वक (बिना अपनी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त किए) सिखाचुकी, पर इन्होंने
शिक्षा नहीं ग्रहण की (कहना नहीं माना), तूने भी तो सीख दी (क्या
परिणाम हुआ ! कुछ नहीं) । मैंने (इनकी टेव बदलने के लिए) बहुत कष्ट
उठाकर भी देख लिया, पर इनकी बुरी बान किसी प्रकार छूटती ही नहीं ।
साधुओं के संग में रहने पर भी खलों की दुष्टता बिना दंड दिए छूटती नहीं ।
विष में शहद का चाहे करोड़ों पुट दिया जाय पर विष की कटुता (शहद
की मिष्टता से) दूर नहीं हो सकती ।
६२—देखहु-देखो जू । सब हो-निबही । सब ही-सब है । अरु-अब ।
जु-जू । तही-तुही । कहो-कह्यो । समुझी ०-समुझाइ कै । सब-हम । कियौ-
किए । करौ तो-करै जो । ६३—हतन-हितन । कहै-करै । तिहि-तिय । ६४-
पाइ-खाइ । सखि-सिख । बहुत दुख पाइ-बहुतेहूँ सबाइ । दंड-देहु ।
तृतीय प्रभाव ६५
अलंकार - दृष्टान ।
सूचना - लीथोवाली और छपी प्रतियों में यह छंद नहीं है, पर हस्त-
लिखित प्रतियों में है ।
अथ प्रौढ़ा-धीराधीरा-लक्षण- ( दोहा )
(१११) मुख रूखी बातैं कहै, जिय मैं पिय की भूख ।
धीराधीरा जानिये, जैसी मीठी ऊख । ६५।
यथा-( सवैया )
(११२) हो मन मैलो न जौ लौं कछू अब छोड़हु बोलिबो बोल हँसौहैं ।
केसव औरनि सों रसरासि रसयो रसबाद सबै हम सौं हैं ।
देखहु धौं इक बार सँकोचनि आरस-लोचन आरसी सौंहैं ।
आए जू वैसेई-साज सौं आजु सु भूलि गई पिय काल्हि की सौंहैं ।
शब्दार्थ- मैलो = मलिन, उदासीन । रसरासि = आनंदपूर्णा बातें ।
रसयो=की । रसबाद = ( प्रेम के ) झगड़े । संकोच = लज्जा । सौंहै =
सामने । सौंहैं = शपथें ।
भावार्थ - (नायिका की उक्ति नायक से) हे प्रिय, (जान पड़ता है कि )
आपको कल की शपथें भूल गईं ? क्योंकि आप आज भी वैसे ही साज (वेष)
से यहाँ आए हैं ? मेरा मन आपके प्रति तब तक उदासीन ही रहेगा जब तक
आप अपने ये, हँसीवाले बोल बोलना नहीं छोड़ देते । आप औरों ( सौतों )
से तो आनंदपूर्णा बातें किया करते हैं, सारे झगड़े केवल मेरे ही साथ होते
हैं। एक बार जरा अपने संकोच और आलस्य से भरे नेत्रों को दर्पण के
सामने देख आइए ( फिर मुझसे बातें कीजिए ) । ( रात्रि के जागरण की
गवाही आपका चेहरा दे रहा है ) ।
इति स्वकीया ।
अथ परकीया-लक्षण- ( दोहा )
(११३) सब तें पर परसिद्ध जग, ताकी जु प्रिया होइ ।
परकीया तासों कहैं, परम पुराने लोइ । ६७।
शब्दार्थ - सब तें लोक और वेद दोनो से । पर=अन्य ( परपुरुष ) ।
परसिद्ध प्रसिद्ध, प्रख्यात । लोइ = लोग ।
अथ परकीया के भेद- ( दोहा ) •
(११४) परकीया द्वै भाँति पुनि, ऊढ़ा एक अनूढ़ ।
जिन्हें देखि सुनि होत बस, संतत मूढ़ अमूढ़ । ६८।
शब्दार्थ-ऊढ़ा=विवाहिता । अनूढ़ = अनूढ़ा, अविवाहिता । अमूढ़ पंडित ।
६५ - धीराधीरा-धीर अधीरा । ६६ - हो-हौं । मैलो-मैले । जो लौं-बोलौं ।
रसयो-रसो । ६७-जग-जो । ६८-जिन्हें जिनहीं । सुनि-सब । सब-हैं ।
६६ रसिकप्रिया
अथ ऊढ़ा-अनूढ़ा-लक्षण--(दोहा)
(११५) ऊढ़ा होइ बिबाहिता, अबिबाहिता अनूढ़।
तिनके कहौं बिलास अब, केसव गूढ़ अगूढ़। ६९।
शब्दार्थ—गूढ़ = गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
ऊढ़ा, यथा—(सवैया)
(११६) बैठौ सखीनि की सोभै सभा सब ही के सु नैननि माँझ बसै।
बूझै तें बात बरचाइ कहै मन ही मन केसवराइ हँसै।
खेलति है इत खेल उतै पिय चित्त खिलावति यों बिलसै।
काउ जानै नहीं दृग दौरि कबै कित ह्वै हरि आनन छूवै निकसै ७०
शब्दार्थ—सोभै = सुशोभित होती है। सु = सो, वह। सब ही० = सभी
ध्यान से उसे देख रहे हैं। बूझे तें = पूछने पर ही। बरचाइ = बड़ी कठिनाई
से। बिलसै = शोभा पाती है। कोउ...निकसै = न जाने कब उसके नेत्र दौड़-
कर किधर से श्रीकृष्ण के मुख को छूते हुए निकल जाते हैं। (बीच बीच में
वह नायक को बड़ी सफाई से देख लेती है)।
अनूढ़ा, यथा—(सवैया)
(११७) बैठी हुती ब्रजनारिन में बनि श्रीवृषभानुकुमारि सभागी।
खेलति ही सखी चौपर चारु भई तिहिं खेल खरी अनुरागी।
पीछे तें केसव बोलि उठे सुनिकै चित चातुरी आतुरी जागी।
जानी न काहू कबै हरि के सुर-मारगहीं सर सी दृग लागी। ७१।
शब्दार्थ—हुती = थी। बनि = श्रृंगार करके। सभागी = भाग्यवती।
ही = थी। खरी = अत्यंत। बोलि उठे = श्रीकृष्ण आकर बोले। चित =
चित्त में। चातुरी = चातुर्य। आतुरी = आतुरता। सुर-मारगहीं = स्वर के
मार्ग से, जिधर से उनकी वाणी आ रही थी।
भावार्थ—(सखी का वचन सखी से) श्रीवृषभानु की पुत्री भाग्यवती
राधिका ब्रजबालानों के बीच बैठी हुई थीं और हे सखी, सुन्दर चौपड़ खेल
रही थीं। उस खेल में जब वे अत्यंत अनुरक्त (लीन) हो गईं (तब) इसी
बीच में श्रीकृष्ण आए और वे पीछे की ओर से कुछ (बातें) बोल उठे,
जिन्हें सुनकर उन (राधिका) के मन में चतुरता और आतुरता दोनो जग
गईं। किसी को पता ही नहीं चला कि कब श्रीकृष्ण के स्वरमार्ग से (जिधर
से उनकी वाणी की ध्वनि आ रही थी उधर) उनके नेत्र श्रीकृष्ण के नेत्रों में
बाण की भाँति जा लगे।
६९-अविवाहिता-अनव्याहिता। अब-सब। ७०-सु-जु। तें-हि।
केसवराइ-केसवदास। ७१—चारु-चारि। मारगहीं-आर गही।
७ तृतीय प्रभाव ६७
(दोहा)
(११८) काहू सों न कहै कछू, बात अनूढ़ा गूढ़।
सखी सहेली सों कहै, ऊढ़ा गूढ़ अगूढ़।७२।
शब्दार्थ—सखी = अंतरंग सखी। सहेली = बहिरंग सखी। गूढ़ =
गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
सूचना—यह छंद पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
ऊढ़ा वचन, यथा—(सवैया)
(११६) केसवराइ की सौहैं कहै कछू एकनि आपु में होड़ परी।
एक चितै मुसकाइ इतै, उत बात कहैं बहु भाइ भरी।
चारु चकोर बिलोचन भा सो चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी।
सखि काल्हि गई हुती गोकुल हौं सबहीं मिलि द्वैज को चंद करी ७३
शब्दार्थ—सौहैं = शपथ, कसम। एकनि = कुछ लोगों में। आपु में =
आपस में। होड़ = लागडाँट, यहाँ वादविवाद। चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी =
चारो ओर से गोपिकाओं ने अंगुली दिखाकर संकेत किया।
भावार्थ—(ऊढ़ा का वचन बहिरंग सखी से) मैं आज गोकुल गई थी।
वहाँ मुझे देखकर कुछ स्त्रियाँ शपथ कर करके मेरे बारे में आपस में वाद-
विवाद करने लगीं (कोई कहती थी कि यही श्रीकृष्ण की प्रेमिका है और
कोई कहती थी नहीं)। कुछ स्त्रियाँ एक ओर तो मुझे देखकर मुसकाती थीं
और दूसरी ओर अपनी संगिनी स्त्रियों से अत्यंत भावभरी बातें करने लगती
थीं। चारो ओर से उनकी उँगलियाँ मुझे इंगित कर रही थीं। उन सबने
मिलकर तो मुझे द्वितीया का चंद्रमा ही बना डाला था। (जैसे द्वितीया के
चंद्रमा को देखकर दूसरों को दिखाने के लिए लोग उँगली से इंगित करते हैं
उसी प्रकार वे मुझ पर उँगली उठा रही थीं)।
सूचना—यह छंद भी पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
(दोहा)
(१२०) जगनायक की नायिका, बरनी केसवदास।
तिनके दरसन रस कहौं, सुनौ प्रछन्न प्रकास।७४।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां स्वकीया-
परकीयादिभेदवर्णनं नाम तृतीयः प्रभावः।३।
७३—केसवराइ-केसवदास। काल्हि-आजु। ७४—सुनौ-सुनहु, सुनि।
प्रछन्न-प्रच्छन्न।
चतुर्थ प्रभाव
अथ दर्शन-लक्षण—(दोहा)
(१२१) ए दोऊ दरसैं दरसु, होहिं सकाम सरीर ।
दरसन चारि प्रकार को, बरनत हैं कबि धीर ।१।
शब्दार्थ—चारि प्रकार = साक्षात् या प्रत्यक्ष-दर्शन, चित्र-दर्शन, स्वप्न-
दर्शन और श्रवण-दर्शन ।
(१२२) एक जु नीके देखियै, दूजें दरसन चित्र ।
तीजें सपने देखियै, चौथैं श्रवननि मित्र ।२।
शब्दार्थ—नीकें देखियै = अर्थात् प्रत्यक्ष ।
सूचना—'सरदार' की टीका में एक दोहा इसके बाद यह भी दिया
गया है—
दरसन नीके दरसि यहि, दंपति प्रवि सुख मान ।
ताहि कहत साक्षात हैं, केसवदास सुजान ।
साक्षात् दर्शन--(दोहा)
(१२३) नींद भूख दुति देह की, गई सुनतहीं जाहि ।
को जानै ह्वै है कहा, केसव देखें नाहि ।३।
शब्दार्थ—देखें = देखने पर ।
सूचना--'सरदार' की टीका में इसके बाद भी एक दोहा और दिया
गया है और कहा गया है कि केशव का नहीं जान पड़ता—
देखन को प्रिय रूप दृग, तजे सकल जगकाज ।
कोटि जतनहूँ कै रही, रहे नैन गड़ि लाज ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा—(सवैया)
(१२४) कहि केसव श्रीबृषभानु-कुमारि सिँगार सिँगारि सबै सरसै।
सबिलास चितै हरिनायक त्यों रतिनायक-सायक से बरसें ।
कबहूँ मुख देखति दर्पन लै उपमा मुख की सुखमा सरसै ।
जनु आनँदकंद सँपूरन चंद दुरयो रबि-मंडल में दरसै ।४।
शब्दार्थ—सिँगार सिँगार सबै सरसै = सब प्रकार के शृंगार सजकर
सुशोभित होती है । सबिलास = भंगिमासहित, शृंगारी चेष्टाओं से युक्त ।
१--कबि-मति । २--नीकें-नीकेंहि, नीको । दूजें-दूजो । तीर्जे-
तीजों । सपने०-सपनो जानियें । चौथैं-चौथो । श्रवननि०-श्रवन सु मित्र ।
४-सिँगार०-सिँगारि सिंगार । लै-मैं । संपूरन-सुपूरन ।
चतुर्थ प्रभाव ६६
स्यें = ओर। रतिनायक-सायक = कामदेव के बाण। उपमा० = मुख की
उपमा इस शोभा को स्पर्श करती है, मुख की शोभा ऐसी जान पड़ती है।
दुरचो = छिपा हुआ। जनु......दरसै = मानो आनंददायक पूर्ण चंद्र रविमंडल
में छिपा हुआ दिखाई पड़ रहा है (दर्पण रविमंडल है, मुख पूर्ण चंद्र है)।
अलंकार - उक्तविषया वस्तूतप्रेक्षा।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा - ( सवैया )
(१२५) पहिले तजि आरस आरसी देखि घरीकु घसे घनसारहि लै।
पुनि पोंछि गुलाब तिलौँछि फुलेल अँगौछे में आछे अँगौछनि कै।
कहि केसव मेद जुबाद सों माँजि इते पर आँजे मैं अंजन दै।
बहुरयो दुरि देखौं तौ देखौं कहा सखि लाज तौ लोचन लागियै हैं।५।
शब्दार्थ-घरीकु = घड़ी भर। घनसार = कपूर। फुलेल = फूलों में वास
कर निकाला गया सुगंधित तेल। तिलौँछि = तेल से (लगाकर) साफ
करके। अँगौछे = (अँगौछे से) पोंछा। आछे = भली भाँति। अँगौछनि
कै = अँगौछों से, रूमाल से। मेद = कस्तूरी। जुबाद = (फारसी) बिलाव
के अंडकोश से निकली हुई एक प्रकार की कस्तूरी।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति सखी से) हे सखी, पहले मैंने आलस्य
छोड़कर नेत्रों को दर्पण में देखा और घड़ी भर कपूर लेकर उनमें मला।
इसके बाद भली भाँति गुलाब से उन्हें पोंछा। फुलेल लगाकर उन्हें साफ
किया। भली भाँति अँगौछों से उन्हें पोंछा। इतना ही नहीं प्रत्युत कस्तूरी
और जुबाद से भली भाँति माँजकर (रगड़कर) उनमें अंजन लगाया। इसके
बाद मैंने छिपकर नायक को देखा, पर इतने पर भी नेत्रों में लज्जा लगी ही
(निकली नहीं)।
अलंकार-विशेषोक्ति (पूर्ण कारण के होते हुए भी कार्य न होने से)।
सूचना- 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में गुरु वस्तुओं के वर्णन में यह
सवैया लज्जा का गुरुत्व दिखाने के लिए उदाहरण में दिया गया है।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा- (सवैया)
(१२६) भाल गुही गुन लाज लटैं लपटी लर मोतिन की सुखदंनी।
ताहि बिलोकति आरसी लै कर आरस सों इक सारसनैनी।
केसव कान्ह दुरैं दरसी परसी उपमा मति की अति पैनी
सूरज-मंडल में ससि-मंडल मध्य धँसी जनु जाइ त्रिवैनी।६।
५-घरीकु-कछुक। घसे-घसै, घस्यौ। जुबाद-जिबाद, जब्बाद, जबानि।
बहुरयो-बहुरों, बहुरे। तौ-जो। देखौ०-तौ देखि रो। लागियै है-लागेइ
है, लागि अहै। ६-श्रीकृष्णजू-नायक। सवैया-विजै छंद। मति की-मति कों
मति त। जनु-मनु। जाइ-ताहि, जाहि।
१०० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—गुन लाल = लाल डोरा । सारस = कमल । दुरे = छिपे हुए ।
दरसी = दिखाई पड़ी । परसी = स्पर्श की । पैनी=तीखी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, उस ( नायिका ) ने
अपने मस्तक पर की उन लटों को लाल डोरे से गुहा जिनमें मोतियों की
सुखदायिनी लड़ियाँ लिपटी हुई थीं। (गुहने के बाद ) वह कमलनैत्रवाली
हाथ में दर्पण लेकर उसे (उसकी शोभा को ) आलस्यपूर्वक (देर लगाकर)
देखने लगी। (उसकी इस क्रिया को) श्रीकृष्ण छिपे हुए देख रहे थे ।
वह उस समय उन्हें ऐसी दिखाई पड़ी और उनकी मति को ऐसी अत्यंत
तीखी (उत्कृष्ट, अनोखी ) उपमा ने स्पर्श किया, मानो सूर्य-मंडल (लाल
मणि के दर्पण ) में चंद्रमंडल ( मुख ) हो और त्रिवेणी धँसी हो (जा
पहुँची हो) (केशकलाप श्यामवर्ण होने से यमुना, लाल डोरे सरस्वती और
मोती उज्ज्वल वर्ण होने से गंगा की शोभा दे रहे थे ) ।
अलंकार—उक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा—( सवैया )
(१२७) इक तौ उर और उरोज अनूपम तैसे मनोहर हार महा री ।
सखि चित्त चलै तरुनीनिहूँ को तरुनैन की केसव बात कहा री ।
हितु सों हित की कहि आवति है पर कौ लगि होउँ री कौतुकहारी
अब अंचल दै नँदलाल बिलोकत री दधि नोखी बिलोवनहारी।७।
शब्दार्थ—चित्त चलै तरुनीनिहूँ को = स्त्रियों का भी मन आकृष्ट हो
जाता है । तरुनैन की = तरुण युवकों ( पुरुषों) की । हितु = मित्र, संगिनी ।
अंचल दै = अंचल से ढक । नोखी = अनोखी, विचित्र । बिलोवनहारी =
मथनेवाली ।
भावार्थ---( सखी की उक्ति नायिका से ) एक तो तेरे उर (वक्षःस्थल)
और स्तन यों ही अनुपम हैं और इतने पर ( इन उरोजों पर ) हार भी तद-
नुरूप अत्यंत मनोहर पड़े हुए हैं । तेरी यह शोभा देखकर युवती स्त्रियों का
मन भी चलायमान हो जाता है ( तेरी शोभा पर आकृष्ट हो जाता है ),
फिर तरुण पुरुषों की तो बात ही क्या ! अपनी संगिनी से भलाई की बात
कहनी ही पड़ती है । (आखिर ) मैं कब तक तमाशबीन ( तेरा यह तमाशा
देखनेवाली ) बनी रहूँ ? अब तो ( इन स्तनों को ) अंचल से ढक, नंदलाल
( श्रीकृष्ण खड़े खड़े ) उसकी छटा देख रहे हैं (और तू दही मथने का बहाना
करके उन्हें देखने का मौका दे रही है) तू तो अनोखी दही मथनेवाली निकलो!
अलंकार--काव्यार्थापत्ति और अनुगुण ।
७—उर-तरु । आवति०-है बनि आवति, है परि आवति, ही परि
आवति । होउं०-होहुँ रो, होंव री ।
चतुर्थ प्रभाव १०१
सूचना--मुद्रित प्रति में यह दोहा भी है--
प्रकट काम को कल्पतरु, कहि न सकति मति मूढ़ ।
चित्रहु में हरि-मित्र की, अति अद्भुत गति गूढ़ ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा-( सवैया )
(१२८) लोचन ऐंचि लिये इत कों मन की गति जद्यपि नेहनही है ।
आनन आइ गए श्रम-सीकर रोम उठे तन कंप लही है ।
तासों कहा कहियै कहि केसव लाज-समुद्र में बूड़ि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यौं सकुची जनु बाँह गही है । ८।
शब्दार्थ--नही=नधी, जुड़ी, युक्त । श्रम-सीकर = पसीने की बूंदें ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति सखी से ) यद्यपि नायिका ने चित्र पर से
अपनी दृष्टि इधर की ओर खींच ली है तथापि मन की गति अब भी स्नेहयुक्त
है। क्योंकि उसके मुख पर पसीने की बूँदें आ गई हैं। रोएँ खड़े हो गए हैं
और शरीर ने कंप ग्रहण कर लिया है। उससे कहा भी जाय तो क्या कहा
जाय जो स्वयम् लज्जा के समुद्र में डूब रहा हो। चित्र में भी अपने प्रिय
श्रीकृष्ण को देखकर वह इस प्रकार सकुच गई है मानो उन्होंने प्रत्यक्ष ही
उसकी बाँह पकड़ ली हो ।
अलंकार-द्वितीय विभावना ।
सूचना- इसके बाद यह सवैया भी मुद्रित प्रति में है, जिसे सरदार ने
केशव का नहीं माना है-
तैं जनु मोहन कों चितयो कछु ऐसें कही जनु मोसों कही है ।
लाज तजै नहिं खेलत ही मन की गति गूढ़ कहाँ लौं लही है ।
केसव चित्रित मंदिर आजु दिखावत ही मति रीझि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यों सकुची जनु बाँह गही है ।
(१२६) श्रीराधिकाजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( कवित्त )
केसौदास नेहदसा दीपक सजोय कैसे,
ज्योति ही के ध्यान तम-तेजहि नसायहूँ ।
आँखिन सों बाँधे अन्न काहू की बुझानी भूख,
पानी की कहानी रानी प्यास क्यों बुझायहै ।
ए री मेरी इंदुमुखी इंदीवर-नंनी लखें,
इंदिरा के मंदिर में संपति सिधायहै।
ऐसे दिन ऐसं ही गंवावति गँवारि कहा,
चित्र देखें मित्र के मिले को सुख पायहै । ६।
८-गति-मति । तन-उर, श्रति, उठि। कंप०-कंप गही, कंपत ही । ६-
संजोय-संजोग । तम-तप । अन्न-अन्य । बुझानी-न भागी । रानी०-प्यास कंसे
के । इंदीवर०--इंदीबरनैन । में--क्यों । सिधायहे--समाइ है । देखें--बिना ।
१०२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—नेहु = तेल; प्रेम । दसा = अवस्था; बत्ती । सँजोय =
जला, बाल । ज्योति ही के = प्रकाश के ही । तम-तेज = अंधकार का
आधिक्य; मन का मालिन्य । अन्न = अन्न, भोजन । आँखिन० = सिर्फ अन्न
ही आँख से देखते रहने से । इंदुमुखी = चंद्रमुखी । इंदीवर० = कमल के से
नेत्रवाली । इंदिरा = लक्ष्मी । गँवारि = मूर्ख, पगली ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) तू स्नेह-दशा (प्रेम की अवस्था;
तेल और बत्ती ) से दीपक जला (प्रियतम से मिल) केवल ज्योति ( प्रिय के
शरीर की कांति ) का ध्यान करने से तम का तेज ( अंधकार की प्रचंडता,
उदासी की अधिकता ) कैसे नष्ट कर सकेगी । क्या आँखों में अन्न बाँध लेने
से ( आँखों से अन्न देखते रहने से) किसी की भूख मिटी है ( या तेरी ही भूख
मिट जायगी ) । सिर्फ पानी की कथा कहने से, मेरी रानी, प्यास कैसे
बुझेगी ? ऐ मेरी चंद्रमुखी कमलनयनी सखी क्या लक्ष्मी का चित्र ही लिख
देने से घर में संपत्ति भर जाएगी ? इन दिनों को (जब कि प्रियतम से मिलने
के अनेक अवसर प्राप्त हो सकते हैं) ऐ पगली इस प्रकार ( केवल चित्र देखने
में) तू बिताए दे रही है । क्या प्रिय का चित्र देखने से ही तुझे प्रिय से मिलने
का सुख प्राप्त हो जाएगा ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा -- ( कवित्त )
(१३०) रूठिबे को तूठिबे को मृदु मुसक्याय कै,
बिलोकिबो को भेद कछू कह्यौ न परतु है ।
केसौदास बोले बिनु बोलनि के सुनें बिनु,
हिलनि मिलनि बिनु मोहि क्यों सरतु है ।
कौ लगि अलोनो रूप प्याय प्याय राखौं नैन,
नीर देखें मीन कैसे धीरज धरतु है ।
चित्रिनी बिचित्र चित्र नीकें ही चित्तैयै मन,
चित्र में चिताएँ चित्त चौगुनो जरतु है ।१।०।
शब्दार्थ—रूठिबे को = खीझने का । तूठिबे को = रीझने का । हिलनि =
निकट जाना । मिलनि=भेंटना, आलिंगन करना । मोहि = मुग्ध होकर ।
सरतु है = पूरा होता है । अलोनो रूप = सजीव लावण्य से रहित सौंदर्य
( चित्र में लिखा होने के कारण ) । नीके ही = सँभलकर । चिताएँ = सचेत
करने से, संतोष दिलाते रहने से; सुलगाने से ।
भावार्थ-(नायक की स्वगत उक्ति) उस (प्यारी) के खीझने-रीझने,कोमल
मुसकान के साथ देखने का रहस्य कुछ कहा नहीं जा सकता । बिना उससे
१०—कह्यौ-कहि । मोहि-मोह । देखें-बिना । चित्र०-किन नीकेई ।
में चिताएं-चित्तए तें, चिताए में ।
चतुर्थ प्रभाव १०३
बोले तथा बिना उसकी बोली सुने एवम् बिना उससे हिले मिले केवल मुग्ध
होकर रह जाने से ही तो काम चल नहीं सकता। अपने नेत्रों को कब तक
अलोना रूप (चित्र के दर्शन से) पिला पिलाकर शांत रक्खूँ। (केवल चित्र
में उसकी छाया देख लेने से नेत्रों की तृप्ति नहीं होती)। क्या जल (पानिप,
शोभा) देख लेने पर मछली (आँख) धैर्य धारण कर सकती है? (चित्र
देखने पर उसको प्रत्यक्ष देखने की उत्कट इच्छा होना नेत्रों के लिए स्वाभा-
विक है)। ऐ मन, उस चित्रिणी का विचित्र चित्र सँभलकर देख, चित्र देख
देखकर संतोष करते रहने से तो चित्त चौगुना जलता है (अभिलाष उत्कट
होता जाता है)।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( सवैया )
(१३१) अंतरिच्छ-गच्छनीनि यच्छनि सुलच्छनीनि,
अच्छी अच्छी अच्छनीनि छबि छमनीय है।
किंनरी नरी सुनारि पन्नगी नगी कुमारि,
आसुरी सुरीनिहूँ निहारि नमनीय है।
भोगिन की भामिनी कि देह धरे दामिनी कि,
काम ही की कामिनी कि ऐसी कमनीय है।
चित्रहू में चित्तहि चुरावति है केसौदास,
राम की सी रमनी रमा सी रमनीय है।११।
शब्दार्थ- अंतरिच्छ-गच्छनी = आकाशचारिणी। यच्छनी = यक्षिणी ।
सुलच्छनी = शुभलक्षणसंयुक्ता । अच्छनीनि = नेत्रोंवाली । छमनीय है =
क्षमा करने योग्य है, क्षमा करने की योग्यता रखती है। किंनरी = किंनरों
की स्त्रियां । नरी = मानवी । सुनारि = सुंदर स्त्रियाँ । पन्नगी = नागकुमारी ।
नगी = पर्वतकन्याएँ । निहारि = देखकर, देखने पर । भोगिन की भामिनी =
पातालवासियों की स्त्री । कि = अथवा । नमनीय = नमस्कार 'करने योग्य ।
देह धरे = मूर्तिमती । दामिनी = बिजली । काम कामिनी = कामदेव की स्त्री
रति । कमनीय = सुंदर । राम कैसी रमनी = सीता सी । रमा = लक्ष्मी ।
रमनीय = मन को लुभानेवाली ।
भावार्थ- (नायक-वचन सखी प्रति ) आकाशचारिणी, सुलक्षणा
यक्षिणी सुनयनाओं की शोभा को भी यह क्षमा करनेवाली है (इसकी शोभा
ऐसी है कि वे ईर्ष्या करती हैं और यह उन्हें अपने सौंदर्याधिक्य के कारण
क्षमा कर देती है-अर्थात् इसकी शोभा उनसे बहुत बढ़ी चढ़ी है) किंनरियां,
सुंदर मानवी स्त्रियाँ, नागकन्याएँ, पर्वतकन्याएँ, असुरपत्नियां और सुरपत्नियां
११-कि-धौ। काम०-कामनीयौ कहा। चुरावति०-चुराए लेति कोऊ यह ।
१०४ रसिकप्रिया
इसकी शोभा देखकर प्रणाम करतीं हैं। पातालवासियों की स्त्रियाँ अथवा
मूर्तिमती विद्युत् अथवा कामदेव की ही कामिनी रति भी क्या ऐसी सुंदर है ?
( नहीं)। यह चित्ररूप में ही चित्त चुराए ले रही है। यह तो रामपत्नी
सीता और लक्ष्मी सी सुंदर है।
अलंकार-प्रतीप और उपमा ( चतुर्थ चरण में )।
अथ स्वप्नदर्शन-लक्षण--( दोहा )
(१३२) केसव दरसन स्वप्न को, सदा दुरयोई होय ।
कबहू प्रगट न जानियै, यह जानै सब कोय ।१२।
शब्दार्थ-दुरघोई= छिपा हुआ अर्थात् केवल प्रच्छन्न ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- ( सवैया )
(१३३)आतुर ह्वै उठि दौरी अली, जन आतुर ज्यौं गहिये सु गही त्यौं ।
हो मेरी रानी कहा भयो तो कहुँ बूझति केसव बूझियै री ज्यौं ।
डीठि लगी, किधौं प्रेत लग्यो कि लग्यो उर प्रीतम जाहि डरो यौं ।
आनन सीकर सी कहियै धक सोवत तें अकुलाइ उठी क्यों ।१३।
शब्दार्थ-बूझत = पूछते हैं। डीठि = नजर । सीकर = पसीने की बूंदें ।
धक = एकाएक ।
भावार्थ - ( अंतरंग-सखी-वचन नायिका प्रति ) हे सखी. उतावलों की
तरह तू उठकर दौड़ी है और जैसे उतावला जन किसी को पकड़ता है उस
प्रकार तूने मुझे पकड़ रखा है। ऐ मेरी रानी, तुमको क्या हो गया है ? मैं
तुझसे वैसे ही पूछ रही हूँ जैसे (इस अवसर पर) पूछा जाता है। तुझे नजर
लग गई है या भूत-प्रेत लग गया है या प्रियतम ने हृदय से लगाया जिससे
तू इस प्रकार डर गई है। तेरे मुख पर पसीने की बूंदें छाई हैं, तू सी सी कर
रही है। एकाएक सोते से व्याकुल होकर आखिर क्यों उठ पड़ी ?
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- (कवित्त)
(१३४) नख-पद-पदवी को पावै पढु द्रौपदी न,
एको बिसौ उरबसी उर में न आनिबी ।
लोम सी पुलोमजा न तिल सी तिलोत्तमा न,
मैलहू समान मन मेनका न मानिबी ।
जानियै न कौन जाति अब ही जगाएँ जाति,
जीवन तौ जानिहौं जौ ताहि पहिचानिबी ।
१२-जानियै-देखियै । जानै-जानत । १३-ह्वै-ज्यों। जन-जनि ।
हो-है । बूझति बूझत । बूझिये ०-बूझि रही ह्यौँ ।
चतुर्थ प्रभाव १०५
बातक सी बानी माँह, भाव सी भवानी माँह,
केसौदास रति में रतीक ज्योति जानिबी ।१४।
शब्दार्थ—पदवी = उच्चता । एकौ बिसौ = थोडा भी । उरवसी = स्वर्ग
की एक अप्सरा । उर में न आनिबी = उसके उर की बराबरी के ध्यान में
नहीं चढ़ती । पुलोमजा = इंद्राणी । तिलोत्तमा = एक अप्सरा । जानू......
पहिचानिबी = यदि उसे पहचान लूँगा तो अपने जीवन को बचा समझूँगा
(तभी जान में जान आएगी । बातक = बात ही बात । भाव = भावना,कल्पना।
भावार्थ—( नायक उक्ति सखी से ) नख और पद की उच्चता का पद
द्रौपदी नहीं प्राप्त कर सकती, उर की समता के लिए उर्वशी मन में नहीं
लाई जा सकती । उसके रोएँ की समता पुलोमजा ( इंद्राणी ) से नहीं हो
सकती, उसके तिल की समता में तिलोत्तमा कुछ नहीं है । उसके मैल के
• समान भी मेनका अप्सरा नहीं मानी जा सकती । न जाने वह किस जाति की
( सुर नर आदि में से ) है । अभी वह मुझे सोते से जगाकर चली जा रही
है । अगर उसे पहचान सका ( वह मिल गई ) तभी मैं अपने प्राणों को बचा
समझूँगा । यही नहीं फिर तो मैं यही समझूँगा कि सरस्वती में छटा की
बात ही बात है, पार्वती में शोभा की कल्पना ही कल्पना है और रति में भी
रत्ती भर ही ज्योति है ।
अलंकार—प्रतीप ।
सूचना—( १ ) यहाँ केवल वर्णमैत्री के लिए उर्वशी, तिलोत्तमा आदि
उपमानों का नाम लिया गया है, किसी विशेष प्रसिद्धि के कारण नहीं ।
( २ ) इसके बाद मुद्रित प्रतियों में निम्नलिखित दो दोहे भी
मिलते हैं जो 'केसवदास' के नहीं माने गए हैं—
भूल होइ जिहि बात की, बिन देखत ही पीव ।
सखी सुनावै गुन सवन, अंग अंग सब जीव ।१।
सील रूप गुन समुझि कै, सखी सुनावै आन ।
केसव ताको कहत हैं, दर्सन स्रवन बखानि ।२।
श्रीराधािकाजू को प्रच्छन्न श्रवणदर्शन, यथा—( सवैया )
(१३५) सौंहैं दिवाइ दिवाइ सखी इक बारक काननि आनि बसाए ।
जानै को केसव कानन तें कित ह्वै कब नैननि माँझ सिधाए ।
लाज के साज धरेई रहे सब नैननि लै मनहीं सों मिलाए ।
कैसी करौं अब क्यों निकसैं री हरैंई हरैं हिय में हरि आए ।१५।
१४—द्रोपदी-पद्मिनी । जीवन०-जान जानिहौं जौ जाहि केहूँ । बातक
सी-बात कैसी । भाव सी--भाव सो । १५--कब--हरि । सब--तब ।
१०६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ - सौहैं दिवाय० = शपथें दिला दिलाकर । इक बारक = सिर्फ
एक बार । काननि ० = कानों में ला बसाया । नैननि = नेत्रों ने । हरैं हरैँ =
धीरे धीरे ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(११६) कौ लौं पीहौ कानरस, रूप की बुझैहै प्यास,
केसौदास कैसैं न नयन भरि पीजिये ।
बीर की सौं मेरी बीर बारी है जु वारौं आनि,
नेक ,किन हसहि बलाय तेरी लीजिये ।
बरसक माँहि यह बैस अलबेली बीतैं,
दैहौ सुख सखिन क्यों अबहीं न दीजिये ।
एरी लड़बावरी अहीरी ऐसी बूझै तोहि,
नाह सों सनेह कीजै नाह सों न कीजिये ।१६।
शब्दार्थ- कौ लौं = कब तक । रस = आनंद; पानी । बीर = सखी ।
बीर = संबोधन । बारी = बालिका, छोटी । वारी आनि = आकर निछावर
होती हूँ । नेक = जरा । लड़बावरी = प्रेम में पागल, अनाड़ी । बूझै = समझ
में आता है, मन में बात उठती है । नाह = नाथ, पति । नाह = नहीं ।
भावार्थ-(बहिरंग सखी की उक्ति नायिका से) तू कब तक कान से रस
(प्रियगुणश्रवण) का पान करती रहेगी, क्या इसी से रूपदर्शन की प्यास बुझ
जाएगी ? यदि नेत्र भर पिया न गया तो पीने ही से क्या ? तेरी शपथ मेरी
प्यारी, क्या तू छोटी है (जो इस तरह की बातें कह रही है ) ? मैं आकर
तुझ पर निछावर हो रही हूँ, जरा हँस तो दे मैं तेरी बला लेती हूँ। हाँ तो
कर दे । कोई वर्ष भर में यह अवस्था निकल जायगी तब सखियों को क्या
सुख दे सकेगी ? इसलिए ऐ अलबेली, अभी यह सुख क्यों नहीं देती ? (प्रिय
से मिल, जिससे सखियों को पुरस्कार आदि की प्राप्ति हो ) हे प्रेमपगली
अहीरी, तेरे बारे में यह बात ( शिक्षा ) मन में आती है कि तू प्रिय से प्रेम
कर, 'नहीं' से प्रेम मत कर ।
अलंकार - विरोधाभास ( अंत में ) ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(१३७) लंघतु है लोक, लोकलीक न उल्लंघी जात,
सबही तूँ समझावै तोहि समझावै को ।
१६- कैंसैं-कैसो । न नयन-जो न नैन, नयननि । पीजिये-पीजई,
लीनजई आदि । है-हौ । वारौं-वारी । किन हसहि-हँसि कहिहौ, हँसि हाँ
करि । माँहि-मांझ । बूझै-बूझौं ।
चतुर्थ प्रभाव १०७
छोड़न. कहत तनु तनक न छूटै लाज,
धन मीत राखि दोऊ. कोबिद कहावै को ।
सोच को सँकोचहू को पूरब-पश्चिम पंथ,
केसौदास एक काल एक 'जन धावै को ।
दुख-सुख दूरीदुरा दूरीहूँ तें मेरे मन,
जैसी सुनी तैसी तोहि आँखिन दिखावै को । १७।
शब्दार्थ - कोबिद = पंडित । दूरीदुरा = दूर करके, हटाकर ।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति मन से) हे मन, तू लोकों तक का उलं-
घन तो कर जाता है, पर लोकमर्यादा का उल्लंघन किया ही नहीं जा
सकता । तू तो सबको समझाता है, तब तुझे कौन समझाए ? तू शरीर छोड़ने
को कहता है पर लज्जा तो थोड़ी भी तुझसे छूटती नहीं (शरीर क्या छोड़ा
जाएगा ?) । धन को भी और मित्र (की मित्रता) को भी दोनो को बनाए
रखकर कौन पंडित कहला सकता है ? सोच और संकोच का पूर्व और पश्चिम
(विपरीत) मार्ग है। इन दोनो मार्गों पर एक ही समय में एक ही व्यक्ति
कैसे दौड़ सकता है ? इसलिए दुख सुख को दूर करके ऐ मेरे मन, जैसी छवि
उनकी सुन रखी है वैसी दूर से ही सही तुम्हें आँखों से कौन दिखा सकता
है ? (उनके श्रवणदर्शन हो रहे हैं, पर प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते) ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त)
(१३८) निपट कपट हर प्रेम को प्रकट कर,
बीस बिसे बसीकर कैसैं उर आनियै ।
काम को प्रहरषन कामना को बरषन,
कान्ह को सँकरषन सब जग जानियै ।
किधौं केसौदास महि मोहनी को भूषन है,
किधौं ब्रजबालनि को दूषन बखानियै ।
सुनतहीं छूट्यो धाम बन बन डोलैं स्याम,
राधे तेरो नाम कै उचाटमंत्र मानियै ।१८।
शब्दार्थ - बीस बिसे = पूर्ण रूप से । संकरषन = खींचनेवाला ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायिका से) यह अत्यंत कपट को हरनेवाला,
प्रेम को प्रकट करनेवाला और पूर्णरूप से वश में करनेवाला है, हृदय में कैसे
धारण किया जा सकता है ? काम को प्रहर्षित करनेवाला, कामनाओं का
१८-महि--मन ।
१०८ रसिकप्रिया
वर्षण करनेवाला, कृष्ण को आकृष्ट करनेवाला है, इसे सब जग (लोग) जान
गया है। यह पृथ्वी में मोहनी (विद्या) के लिए भूषण (अनुकूल) है या
व्रजबालाओं के लिए दूषण (विपरीत) है ? इसके सुनते ही घर छूट गया है
और श्याम वन वन घूम रहे हैं यह तेरा नाम है या उच्चाटन मंत्र ?
सूचना—राधिका के नाम और उच्चाटन मंत्र दोनो पर विशेषण
घटित होंगे।
( दोहा )
(१३६) दरस रमन रमनीनि के, कहे परम रमनीय ।
प्रगटन प्रेम प्रभाव अब, कहौं कछू कमनीय । १६ ।
इति श्रीमन्मन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां चतुर्विध-
दर्शनप्रच्छन्नप्रकाशवर्णनं नाम चतुर्थः प्रभावः ।।४।।
पंचम प्रभाव
अथ दंपति-चेष्टा-वर्णन - ( दोहा )
(१४०) तिनके चित की जानि सखि, पिय सों कहै सुनाय ।
कहै रूखी सों प्रीतमै, आपुन तें अकुलाइ । १ ।
श्रीराधिकाजू की सखी को वचन कृष्ण प्रति - ( सवैया )
(१४१) काल्हि की ग्वालि तो आजहू लौं न सँभारति केसव कैसेहूँ देहै ।
सीरी ह्वै जाति, उठै कबहुँ जरि जीव रह्यौ कै रही रुचि-रेहै।
कोरि बिचार बिचारति है उपचारनि के बरसें सखि मेहै।
कान्ह बुरौ जिन मानी तिहारी बिलोकनि में बिस बीस बिसै है । २ ।
शब्दार्थ—ग्वालि = गोपिका । देहै = शरीर को । रुचि = चमक, कांति ।
रेहै = रेखा ही । रही रुचि-रेहै = कांति की रेखामात्र रह गई । कोरि =
करोड़ । मेहै= मेघ ही । बिस = विष ।
भावार्थ- हे कृष्ण, आपने जिस गोपिका को कल देखा था वह आज
तक भी किसी प्रकार अपने शरीर को सँभाल नहीं पा रही है। कभी वह ठंडी
पड़ जात है और कभी जल उठती है। पता नहीं चलता कि उसके शरीर में
प्राण हैं या वह कांति की रेखा मात्र ही रह गई है (प्राण उड़ गए हैं) ।
सखियां उसको होश में लाने के लिए करोड़ों उपाय सोचती हैं, वे उपचार
की वर्षा कर रही हैं (अत्यधिक उपचार कर रही हैं) फिर भी वह होश में
नहीं आ रही है। बुरा मत मानिएगा (मुझे ऐसा जान पड़ता है कि) आपकी
१६—दरस०-दर्सनरस रमनीन के । १- तिन-तिय । २- रह्यो-ह्वो है कै ।
पंचम प्रभाव १०६
चितवन में बीसो बिस्वा ( पूर्ण रीति से, निश्चय ही ) विष भरा हुआ है
( नहीं तो ऐसा क्यों होता ) ।
सूचना—विष खानेवाले का शरीर कभी ठंडा पड़ता है, कभी गरम हो
जाया करता है, कभी जान निकल गई सी जान पड़ती है, इसलिए यहाँ पर
विष के प्रभाव और चितवन के प्रभाव का साम्य दिखलाकर चितवन का विष-
होना कहा गया है ।
अलंकार—रूपक, काव्यलिंग ।
श्रीकृष्णजू को वचन राधिका की सखी प्रति—( कबित्त )
(१४२) प्यास ह्वै रही उदास, भागी भूख गहि त्रास,
केसौदास नींदहू की निंदा नित ठानी है।
मति को मतौ न लेय बिद्या की बिदाई देय,
सोभा सुकी सेय सेय सब सुख सानी है।
बिष से लगत गीत, केलि की न परतीत,
प्रीत डर पाहुनी सी पचि पहिचानी है।
तो बिन कहै को गाथ धीरता न ताके साथ,
मोहिं को मिलावै हाथ लाज के बिकानी है ।३।
शब्दार्थ—नींदहूँ ..ठानी है = अर्थात् निद्रा भी नहीं आती । मतौ =
राय, संमति ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति सखी से ) उस ( नायिका ) की प्यास
उदास हो गई है, भूख भयभीत होकर भाग गई है, निद्रा की भी नित्य निंदा
करती है ( अर्थात् प्यास-भूख और नींद नहीं हैं ) । बुद्धि की सलाह नहीं
लेती, विद्या को भी बिदाई दे दी है ( न बुद्धि ठिकाने है और न विद्या से ही
काम ले रही है ) । सोभारूपी सुग्गी को सेने में ध्यान लगाकर सुख का
अनुभव कर लेती है ( अन्यथा दुख ही दुख है) । गीत (गान) तो उसे विष से
जान पड़ते हैं, केलि ( क्रीड़ा ) का भी विश्वास जाता रहा । प्रीति बड़ी कठि-
नाई से नई आई पाहुनी की तरह उसके द्वारा पहचानी गई है । तेरे बिना
समाचार कौन कह सकता है ? उसके पास धीरता नहीं है । मुझे उससे
कौन मिला सकता है ? वह तो इस समय लज्जा के हाथ बिक गई है ।
अथ चेष्टा-लक्षण—( दोहा )
(१४३) पिय सों प्रगटन प्रीति कहँ, जितने करौ उपाय ।
ते सब केसवदास अब बरनों सबनि सुनाय ।४।
३—गहि त्रास--गई बास । नित-दिन । सोभा०- सेज सूनी । सुख--दुख ।
धीरता०--धीरता लै के साथ । ४—करौ-करहि, करत । बरनों--बरनंत ।
११० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—पिय = प्रिय, नायक । प्रगटन प्रीति कहूँ = प्रेम को प्रकट
करने के लिए । करौ = किए जाते हैं ।
(१४४) जब चितवै पिय अनत ही, तब चितवै निहसंक ।
जानि बिलोकत आपु त्यों, अलिहि लगावै अंक ।५।
शब्दार्थ—अनत = अन्यत्र । निहसंक = निःशंक, शंकारहित । आपु त्यों
= अपनी ओर । अलिहि=सखी को । अंक=अँकवार छाती ( से ) ।
(१४५) कबहुँ श्रुति-कंडू करै, आरस सों ऐंड़ाइ ।
केसवदास बिलास सों, बार बार जमुहाइ ।६।
शब्दार्थ—श्रुति-कंडू=कान खुजलाना । आरस = आलस्य । ऐंड़ाइ =
देह तोड़ती है । बिलास = भावभंगिमा, आकर्षक चेष्टा । जमुहाइ = जँभाई
लेती है ।
((१४६) झूठहीं हँसि हँसि उठै, कहै सखी सों बात ।
ऐसें मिसहीं मिस प्रिया, पियहि दिखावै गात ।७।
शब्दार्थ—मिस = बहाना । प्रिया = नायिका ।
(१४७) यों हीं पीय पियानि प्रति, प्रगटत अपनी प्रीति ।
सो प्रच्छन्न प्रकास करि, बुधिबल करत समीति ।८।
शब्दार्थ—पीय = नायक । करि = भेद करके । समीति करत = एकत्र
करते हैं ।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न चेष्टा, यथा—(कबित्त)
(१४८) चोरि चोरि चित चितवति मुँह मोरि मोरि,
काहैं तें हँसति हियें हरष बढ़ायो है ।
केसौदास की सौं तूँ जँभाति कहा बार बार,
बीरी खाइ मेरी बीर आरस जौ आयो है ।
ऐंड़ सों ऐंड़ाति अति अंचल उड़ात, उर
उघरि उघरि जात गात छबि छायो है ।
फूलि फूलि भेंटति रहति उर भूलि भूलि,
भूलि भूलि कहति कछू तैं आज खायो है ।९।
शब्दार्थ—चोरि चोरि = चुरा चुराकर । ऐंड = गर्व की मुद्रा । उर =
वक्षःस्थल । फूलि फूलि = प्रसन्न हो होकर । उर = हृदय में । भूलि भूलि =
झूम झूमकर ।
५—निहसंक-निरंसक । ७—प्रिया--तिया । ८—यों-त्यों । प्रगटत-- प्रगटै।
करत--कहत । ९—केसौदास-केसोराइ । जो -त्यौं । बीरी०-बिस लाइ मेरी बीर
ओर जोर प्रायो है । उड़ात-उठात । उघरि०-उरज उघरि जात । छायो-पाय ।
११२ रसिकप्रिया
अलंकार—पिहित ।
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न चेष्टा, यथा—( कबित्त )
(१५०) छोरि छोरि बाँधौ पाग आरस सों आरसी लै,
अनत ही आन भाँति देखत अनैसे हौ ।
तोरि तोरि डारत तिनूका कहौ कौन पर,
कौन के परत पाइ बावरे ज्यौं ऐसे हौ ।
कबहुँ चुटकि देति चटकि खुजावौ कान,
मटकि ऐँडाउ जुरी ज्यौं जँभात तैसे हौ ।
बार बार कौन पर देत मनिमाला मोहि
गावत कछू के कछू आज कान्ह कैसे हौ ।११.
शब्दार्थ—पाग = पगड़ी । आरसी = (आदर्श) दर्पण । अनत = अन्यत्र ।
आन भाँति = दूसरे ढंग से । अनैसे = (अनिष्ट) बेढंगे । तिनूका = तिनका ।
चुटकि = देत = चुटकी बजाते हो । चटकि = जल्दी से । जुरी = ज्वरी, ज्वरग्रस्त ।
जुरी० = ज्वर से पीड़ित व्यक्ति की भाँति जँभाते हो । कौन पर = किसके लिए ।
(१५१) श्रीकृष्णजू की प्रकाश चेष्टा, यथा—( सवैया )
जा लगि लाँच लुगाइनि दै दिन नाच नचावत साँझ पहाऊँ ।
केसव मंत्र करौ बसकारक हारक जंत्र कहाँ लौं गनाऊँ ।
हारि रहे हरि क्योंहूँ मिली न मिलाऊँ जौ ताहि तौ माँगौं सो पाऊँ ।
ठाढ़ी वै जाइ मिलौ मिलिबे कहँ और कछू कनियाँ करि लाऊँ ।१२।
शब्दार्थ—लांच = घूस, रिश्वत । दिन = नित्य, प्रतिदिन । पहाऊँ =
प्रभात, सबेरे । हारक = थका देनेवाले ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायक प्रति ) जिसको आपने वश में करने
के लिए नित्य दूतियों को घूस देकर साँझ-सबेरे नाच नचाया (परेशान किया),
फिर आपने अनेक वशीकरण मंत्रों का प्रयोग किया तथा थका देने वाले जंत्रों
का भी प्रयोग किया, मैं कहाँ तक उनकी गिनती करूँ । आप अब हार मान
बैठे, वह किसी प्रकार मिली नहीं । ऐसी नायिका को यदि मैं आपसे ला
मिलाऊँ तो अवश्य ही जो माँगूँ वह मिलेगा (मुझे इसका पूरा विश्वास है) ।
अच्छा जाइए, वे मिलने को खड़ी हैं, क्या उन्हें गोद में लाना पडेगा ?
११—बांधो-बांधै । कहौ-तुम । ऐँडाउ-पोंडाउ, ऐँड़ात । तैसे-वैसे, जैसे ।
के-को । १२—लांच-लोच । पहाऊं-महांऊं । हारक-हारे के । क्यों हूँ-केहूं ।
सो-सु । जाइ-जाहु । कछू-कहा । लाऊं-ल्याऊं ।
पञ्चम एवं षष्ठ प्रभाव: नायिका-भेद (पद्मिनी, चित्रिणी आदि एवं षोडश हाव-भाव)
८ पंचम प्रभाव ११३
अथ स्वयंदूतत्व-लक्षण-(दोहा)
(१५२) जौ क्योंहूँ न मिलै कहूँ, केसव दोऊ ईठ।
तौ तब अपने आप ही, बुधिबल होत बसीठ ।१३।
शब्दार्थ—ईठ = (इष्ट) मित्र। अपने आप ही = स्वयम् ही। बसीठ =
(अवसृष्ट विसृष्ट) दूत।
(१५३) श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
दूरि तें देखिबे कौं ह्वै दीन मनाई हुती लिखि ही लिखि चीठी।
देखें मिल्यो मनु हौं हू मिली मिलि खेलिबे हूँ कों मिली मति मीठी।
ऐसे में और चलाइहौ केसव कैसहूँ कान्ह कुमार द्वै ढीठी।
लागै न बार मृनाल के तार ज्यों टूटैगी लाल हमैं तुम्हें ईठी ।१४।
शब्दार्थ—हुती = थी। मीठी = अच्छी। ढीठी = धृष्टता। बार = देर।
ईठी = मित्रता।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक प्रति) अत्यंत दीन हो होकर दूर
से ही देख लेने के लिए चिट्ठियां लिख लिखकर आपने मनाया। देखने पर
मन मिल गया। मैं भी आपसे मिली। मिलकर खेलने के लिए मधुर मति
भी मिल गई (खेल खेलने की सुहावनी बुद्धि भी जगी)। ऐसे अवसर पर हे
कान्ह कुमार, यदि धृष्टतापूर्वक और कोई चर्चा चलाएँगे (जाने की बात
करेंगे) तो हे लाल, हमारी आपकी मित्रता टूट जायगी, मृणाल तार की
भाँति उसके टूटने में कुछ भी देर न लगेगी (यह आपने चलने का क्या
झगड़ा छोड़ दिया)।
अलंकार—दृष्टांत।
सूचना—प्रमुद्रित प्रतियों में इसके बाद एक सवैया और मिलता है जो
पू० यां हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
पुनः प्रिया को स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
छुवौ जनि हाथ सों हाथ किये पल ही पल बाढ़त प्रेमकला।
न जानियै जी मैं कहा बसि जाइ चलै पुनि केसव कौन चला।
भले ही भले निबहै जो भली यह देखिबे ही की हला हू भला।
मिलौ मन तौ मिलिबौई कहूँ मिलिबौ न अलौकिक नंदलला।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
(१५४) धाई नहीं घर दाई परी जुर, आई खिलाई की आँखि बहाऊँ।
पौरिये आवै रतौंधी इते पर ऊँचो सुनै सु महा दुख पाऊँ।
१३—लक्षण-वर्णन। होत-होइ, करत। १४—मनाई-पठाई। ढीठी—
डीठी। लागै०—ह्वै है न, तो ह्वै है। मृनाल—मुराति, मुरारि।
११४ रसिकप्रिया
कान्ह निबेरहू न्याउ नयो इन आलिन कौ लगि हौं बहराऊँ ।
ए सब मो सँग सोवन आवैं कि मैं इनके सँग सोवन जाऊँ ।१५।
शब्दार्थ—धाई = ( धातृ ) अपना दूध पिलाकर बच्चों को पालनेवाली ।
दाई = परिचारिका । आई = ( आर्या ) अइया । खिलाई = खिलाई हुई,
खाने मात्र पर सेवा करनेवाली । बहाऊँ = आँसू बहानेवाली । पौरियै = द्वार-
पाल को । निबेरहु = निपटा दो ।
भावार्थ—घर में धाय नहीं है । दाई ज्वर में पड़ी है । आई की आँखें
आँसू बहाती रहती हैं ( वह भी देखने में अशक्त है ) द्वारपाल को रतौंधी
आती है ( रात में सूझता ही नहीं ) । ( यही क्यों ) इतने पर भी वह ऊँचा
सुनता है ( बहरा है ), इसलिए बड़ा दुख पा रही हूँ । हे कान्ह, मेरे इस
नए ( विलक्षण ) न्याय का निबटारा करते जाइए । मैं इन सखियों से आखिर
कब तक अपने मन को बहलाती रहूँ । ( दिन में तो किसी प्रकार समय कट
भी जाता है पर रात कैसे कटे ) इसलिए या तो ये सब मेरे साथ सोने के
लिए ( मेरे घर पर ) आया करती हैं या मैं ही इनके यहाँ सोने चली जाया
करती हूँ ( मुझे अकेले बड़ा भय लगता है ) ।
सूचना—'आई' का अर्थ 'आर्या' करके 'बुड्डी' करने के बदले 'आँख
आई' अन्वय भी कर सकते हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—( कबित्त )
(१५५) आपनेहीं भाइ के ए सोहत सरीक से वे,
केसौदास दास ज्यों चलत चित लीने हैं।
आपुहीं अठाउ कै ये लेत नाउँ मेरो वे तौ,
बापुरे मिलाप कै संलाप करि हीने हैं।
राधिकै सुनाइ कै कहत ऐसें घनश्याम,
सुबल को लै लै नाम कामभयभीने हैं।
साथ लै सखानि अब जैबो बन छाड्यो हम,
खेलिबे को संग सखा साखामृग कीने हैं । १६।
शब्दार्थ—ये = गोपसखा । सरीक = साथ । वे = वानर सखा । चित
लीने = चित्त मिलाकर, उनकी मरजी का ध्यान रखकर । अठाउ = शरारत ।
बापुरे = बेचारे । मिलाप = मेल । संलाप = बातचीत । सुबल = ( स्वबल )
अपनी सेना या अपना बल । साखामृग = बंदर ।
१५—जुर-जुरि । आई-आई । कौ-कि । बहाऊं-महाऊँ । पौरिये-पीरि
पै । रतौंधी-रत्योंधु । बहराऊं-समभाऊँ । मैं इनके ०-हौं इनके सब । १६—
आपनेहीं-आपनेई । भाइ के-भाउ को । चित-चित्तु । आपुहीं-आपुए । कै ये-
कै तो । मेरो-मेरे । संलाप-संताप । राधिकै-प्रिया को । भय-रस ।