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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 286 में से

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पृष्ठ 108

पंचम प्रभाव १०६
चितवन में बीसो बिस्वा ( पूर्ण रीति से, निश्चय ही ) विष भरा हुआ है
( नहीं तो ऐसा क्यों होता ) ।
सूचना—विष खानेवाले का शरीर कभी ठंडा पड़ता है, कभी गरम हो
जाया करता है, कभी जान निकल गई सी जान पड़ती है, इसलिए यहाँ पर
विष के प्रभाव और चितवन के प्रभाव का साम्य दिखलाकर चितवन का विष-
होना कहा गया है ।
अलंकार—रूपक, काव्यलिंग ।
श्रीकृष्णजू को वचन राधिका की सखी प्रति—( कबित्त )
(१४२) प्यास ह्वै रही उदास, भागी भूख गहि त्रास,
केसौदास नींदहू की निंदा नित ठानी है।
मति को मतौ न लेय बिद्या की बिदाई देय,
सोभा सुकी सेय सेय सब सुख सानी है।
बिष से लगत गीत, केलि की न परतीत,
प्रीत डर पाहुनी सी पचि पहिचानी है।
तो बिन कहै को गाथ धीरता न ताके साथ,
मोहिं को मिलावै हाथ लाज के बिकानी है ।३।
शब्दार्थ—नींदहूँ ..ठानी है = अर्थात् निद्रा भी नहीं आती । मतौ =
राय, संमति ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति सखी से ) उस ( नायिका ) की प्यास
उदास हो गई है, भूख भयभीत होकर भाग गई है, निद्रा की भी नित्य निंदा
करती है ( अर्थात् प्यास-भूख और नींद नहीं हैं ) । बुद्धि की सलाह नहीं
लेती, विद्या को भी बिदाई दे दी है ( न बुद्धि ठिकाने है और न विद्या से ही
काम ले रही है ) । सोभारूपी सुग्गी को सेने में ध्यान लगाकर सुख का
अनुभव कर लेती है ( अन्यथा दुख ही दुख है) । गीत (गान) तो उसे विष से
जान पड़ते हैं, केलि ( क्रीड़ा ) का भी विश्वास जाता रहा । प्रीति बड़ी कठि-
नाई से नई आई पाहुनी की तरह उसके द्वारा पहचानी गई है । तेरे बिना
समाचार कौन कह सकता है ? उसके पास धीरता नहीं है । मुझे उससे
कौन मिला सकता है ? वह तो इस समय लज्जा के हाथ बिक गई है ।
अथ चेष्टा-लक्षण—( दोहा )
(१४३) पिय सों प्रगटन प्रीति कहँ, जितने करौ उपाय ।
ते सब केसवदास अब बरनों सबनि सुनाय ।४।
३—गहि त्रास--गई बास । नित-दिन । सोभा०- सेज सूनी । सुख--दुख ।
धीरता०--धीरता लै के साथ । ४—करौ-करहि, करत । बरनों--बरनंत ।