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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 286 में से

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पृष्ठ 106

चतुर्थ प्रभाव १०७
छोड़न. कहत तनु तनक न छूटै लाज,
धन मीत राखि दोऊ. कोबिद कहावै को ।
सोच को सँकोचहू को पूरब-पश्चिम पंथ,
केसौदास एक काल एक 'जन धावै को ।
दुख-सुख दूरीदुरा दूरीहूँ तें मेरे मन,
जैसी सुनी तैसी तोहि आँखिन दिखावै को । १७।
शब्दार्थ - कोबिद = पंडित । दूरीदुरा = दूर करके, हटाकर ।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति मन से) हे मन, तू लोकों तक का उलं-
घन तो कर जाता है, पर लोकमर्यादा का उल्लंघन किया ही नहीं जा
सकता । तू तो सबको समझाता है, तब तुझे कौन समझाए ? तू शरीर छोड़ने
को कहता है पर लज्जा तो थोड़ी भी तुझसे छूटती नहीं (शरीर क्या छोड़ा
जाएगा ?) । धन को भी और मित्र (की मित्रता) को भी दोनो को बनाए
रखकर कौन पंडित कहला सकता है ? सोच और संकोच का पूर्व और पश्चिम
(विपरीत) मार्ग है। इन दोनो मार्गों पर एक ही समय में एक ही व्यक्ति
कैसे दौड़ सकता है ? इसलिए दुख सुख को दूर करके ऐ मेरे मन, जैसी छवि
उनकी सुन रखी है वैसी दूर से ही सही तुम्हें आँखों से कौन दिखा सकता
है ? (उनके श्रवणदर्शन हो रहे हैं, पर प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते) ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त)
(१३८) निपट कपट हर प्रेम को प्रकट कर,
बीस बिसे बसीकर कैसैं उर आनियै ।
काम को प्रहरषन कामना को बरषन,
कान्ह को सँकरषन सब जग जानियै ।
किधौं केसौदास महि मोहनी को भूषन है,
किधौं ब्रजबालनि को दूषन बखानियै ।
सुनतहीं छूट्यो धाम बन बन डोलैं स्याम,
राधे तेरो नाम कै उचाटमंत्र मानियै ।१८।
शब्दार्थ - बीस बिसे = पूर्ण रूप से । संकरषन = खींचनेवाला ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति नायिका से) यह अत्यंत कपट को हरनेवाला,
प्रेम को प्रकट करनेवाला और पूर्णरूप से वश में करनेवाला है, हृदय में कैसे
धारण किया जा सकता है ? काम को प्रहर्षित करनेवाला, कामनाओं का


१८-महि--मन ।