रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ रसिकप्रिया
कान्ह निबेरहू न्याउ नयो इन आलिन कौ लगि हौं बहराऊँ ।
ए सब मो सँग सोवन आवैं कि मैं इनके सँग सोवन जाऊँ ।१५।
शब्दार्थ—धाई = ( धातृ ) अपना दूध पिलाकर बच्चों को पालनेवाली ।
दाई = परिचारिका । आई = ( आर्या ) अइया । खिलाई = खिलाई हुई,
खाने मात्र पर सेवा करनेवाली । बहाऊँ = आँसू बहानेवाली । पौरियै = द्वार-
पाल को । निबेरहु = निपटा दो ।
भावार्थ—घर में धाय नहीं है । दाई ज्वर में पड़ी है । आई की आँखें
आँसू बहाती रहती हैं ( वह भी देखने में अशक्त है ) द्वारपाल को रतौंधी
आती है ( रात में सूझता ही नहीं ) । ( यही क्यों ) इतने पर भी वह ऊँचा
सुनता है ( बहरा है ), इसलिए बड़ा दुख पा रही हूँ । हे कान्ह, मेरे इस
नए ( विलक्षण ) न्याय का निबटारा करते जाइए । मैं इन सखियों से आखिर
कब तक अपने मन को बहलाती रहूँ । ( दिन में तो किसी प्रकार समय कट
भी जाता है पर रात कैसे कटे ) इसलिए या तो ये सब मेरे साथ सोने के
लिए ( मेरे घर पर ) आया करती हैं या मैं ही इनके यहाँ सोने चली जाया
करती हूँ ( मुझे अकेले बड़ा भय लगता है ) ।
सूचना—'आई' का अर्थ 'आर्या' करके 'बुड्डी' करने के बदले 'आँख
आई' अन्वय भी कर सकते हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—( कबित्त )
(१५५) आपनेहीं भाइ के ए सोहत सरीक से वे,
केसौदास दास ज्यों चलत चित लीने हैं।
आपुहीं अठाउ कै ये लेत नाउँ मेरो वे तौ,
बापुरे मिलाप कै संलाप करि हीने हैं।
राधिकै सुनाइ कै कहत ऐसें घनश्याम,
सुबल को लै लै नाम कामभयभीने हैं।
साथ लै सखानि अब जैबो बन छाड्यो हम,
खेलिबे को संग सखा साखामृग कीने हैं । १६।
शब्दार्थ—ये = गोपसखा । सरीक = साथ । वे = वानर सखा । चित
लीने = चित्त मिलाकर, उनकी मरजी का ध्यान रखकर । अठाउ = शरारत ।
बापुरे = बेचारे । मिलाप = मेल । संलाप = बातचीत । सुबल = ( स्वबल )
अपनी सेना या अपना बल । साखामृग = बंदर ।
१५—जुर-जुरि । आई-आई । कौ-कि । बहाऊं-महाऊँ । पौरिये-पीरि
पै । रतौंधी-रत्योंधु । बहराऊं-समभाऊँ । मैं इनके ०-हौं इनके सब । १६—
आपनेहीं-आपनेई । भाइ के-भाउ को । चित-चित्तु । आपुहीं-आपुए । कै ये-
कै तो । मेरो-मेरे । संलाप-संताप । राधिकै-प्रिया को । भय-रस ।