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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 286 में से

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पृष्ठ 107

१०८ रसिकप्रिया
वर्षण करनेवाला, कृष्ण को आकृष्ट करनेवाला है, इसे सब जग (लोग) जान
गया है। यह पृथ्वी में मोहनी (विद्या) के लिए भूषण (अनुकूल) है या
व्रजबालाओं के लिए दूषण (विपरीत) है ? इसके सुनते ही घर छूट गया है
और श्याम वन वन घूम रहे हैं यह तेरा नाम है या उच्चाटन मंत्र ?
सूचना—राधिका के नाम और उच्चाटन मंत्र दोनो पर विशेषण
घटित होंगे।
( दोहा )
(१३६) दरस रमन रमनीनि के, कहे परम रमनीय ।
प्रगटन प्रेम प्रभाव अब, कहौं कछू कमनीय । १६ ।
इति श्रीमन्मन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां चतुर्विध-
दर्शनप्रच्छन्नप्रकाशवर्णनं नाम चतुर्थः प्रभावः ।।४।।
पंचम प्रभाव
अथ दंपति-चेष्टा-वर्णन - ( दोहा )
(१४०) तिनके चित की जानि सखि, पिय सों कहै सुनाय ।
कहै रूखी सों प्रीतमै, आपुन तें अकुलाइ । १ ।
श्रीराधिकाजू की सखी को वचन कृष्ण प्रति - ( सवैया )
(१४१) काल्हि की ग्वालि तो आजहू लौं न सँभारति केसव कैसेहूँ देहै ।
सीरी ह्वै जाति, उठै कबहुँ जरि जीव रह्यौ कै रही रुचि-रेहै।
कोरि बिचार बिचारति है उपचारनि के बरसें सखि मेहै।
कान्ह बुरौ जिन मानी तिहारी बिलोकनि में बिस बीस बिसै है । २ ।
शब्दार्थ—ग्वालि = गोपिका । देहै = शरीर को । रुचि = चमक, कांति ।
रेहै = रेखा ही । रही रुचि-रेहै = कांति की रेखामात्र रह गई । कोरि =
करोड़ । मेहै= मेघ ही । बिस = विष ।
भावार्थ- हे कृष्ण, आपने जिस गोपिका को कल देखा था वह आज
तक भी किसी प्रकार अपने शरीर को सँभाल नहीं पा रही है। कभी वह ठंडी
पड़ जात है और कभी जल उठती है। पता नहीं चलता कि उसके शरीर में
प्राण हैं या वह कांति की रेखा मात्र ही रह गई है (प्राण उड़ गए हैं) ।
सखियां उसको होश में लाने के लिए करोड़ों उपाय सोचती हैं, वे उपचार
की वर्षा कर रही हैं (अत्यधिक उपचार कर रही हैं) फिर भी वह होश में
नहीं आ रही है। बुरा मत मानिएगा (मुझे ऐसा जान पड़ता है कि) आपकी
१६—दरस०-दर्सनरस रमनीन के । १- तिन-तिय । २- रह्यो-ह्वो है कै ।