रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ पंचम प्रभाव ११३
अथ स्वयंदूतत्व-लक्षण-(दोहा)
(१५२) जौ क्योंहूँ न मिलै कहूँ, केसव दोऊ ईठ।
तौ तब अपने आप ही, बुधिबल होत बसीठ ।१३।
शब्दार्थ—ईठ = (इष्ट) मित्र। अपने आप ही = स्वयम् ही। बसीठ =
(अवसृष्ट विसृष्ट) दूत।
(१५३) श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
दूरि तें देखिबे कौं ह्वै दीन मनाई हुती लिखि ही लिखि चीठी।
देखें मिल्यो मनु हौं हू मिली मिलि खेलिबे हूँ कों मिली मति मीठी।
ऐसे में और चलाइहौ केसव कैसहूँ कान्ह कुमार द्वै ढीठी।
लागै न बार मृनाल के तार ज्यों टूटैगी लाल हमैं तुम्हें ईठी ।१४।
शब्दार्थ—हुती = थी। मीठी = अच्छी। ढीठी = धृष्टता। बार = देर।
ईठी = मित्रता।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक प्रति) अत्यंत दीन हो होकर दूर
से ही देख लेने के लिए चिट्ठियां लिख लिखकर आपने मनाया। देखने पर
मन मिल गया। मैं भी आपसे मिली। मिलकर खेलने के लिए मधुर मति
भी मिल गई (खेल खेलने की सुहावनी बुद्धि भी जगी)। ऐसे अवसर पर हे
कान्ह कुमार, यदि धृष्टतापूर्वक और कोई चर्चा चलाएँगे (जाने की बात
करेंगे) तो हे लाल, हमारी आपकी मित्रता टूट जायगी, मृणाल तार की
भाँति उसके टूटने में कुछ भी देर न लगेगी (यह आपने चलने का क्या
झगड़ा छोड़ दिया)।
अलंकार—दृष्टांत।
सूचना—प्रमुद्रित प्रतियों में इसके बाद एक सवैया और मिलता है जो
पू० यां हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
पुनः प्रिया को स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
छुवौ जनि हाथ सों हाथ किये पल ही पल बाढ़त प्रेमकला।
न जानियै जी मैं कहा बसि जाइ चलै पुनि केसव कौन चला।
भले ही भले निबहै जो भली यह देखिबे ही की हला हू भला।
मिलौ मन तौ मिलिबौई कहूँ मिलिबौ न अलौकिक नंदलला।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश स्वयंदूतत्व, यथा—(सवैया)
(१५४) धाई नहीं घर दाई परी जुर, आई खिलाई की आँखि बहाऊँ।
पौरिये आवै रतौंधी इते पर ऊँचो सुनै सु महा दुख पाऊँ।
१३—लक्षण-वर्णन। होत-होइ, करत। १४—मनाई-पठाई। ढीठी—
डीठी। लागै०—ह्वै है न, तो ह्वै है। मृनाल—मुराति, मुरारि।