रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
ताटस्थ्येनेति। तटस्थो नाट्ये नटः, श्रव्ये च दुष्यन्तादिः, तन्निष्ठत्वेन परगतत्वेनेत्यर्थः।
अनास्वाद्यत्वमित्यस्य सामाजिकानामिति शेष इति प्राचीना व्याख्या। वस्तुतस्तु
ताटस्थ्यं हेतुरत्रानास्वाद्यत्वस्य। यदि परगतत्वेन रत्यादिः प्रतीयेत तर्हि सामाजिकानां
तदास्वादो न स्यात्, तेषामपकृष्टत्वे 'परसम्पदुत्कर्षो हीनसम्पदं दुःखाकरोति' इति
स्वभावाद्रत्यादिविषये सामाजिकानां मात्सर्यम् शोकादिविषये त्वानन्दोऽनुभूयेतेति
अनुभवविपर्ययः स्यात्। अथ सामाजिकानामुत्कृष्टानामेव सहृदयत्वं तदाऽपि पर-
गतत्वेन रसप्रतीतौ 'दुष्यन्तः शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इति सामाजिकप्रतीत्या
रत्यादौ स्वगतत्वबाधात्तत औदासीन्यमापद्येत सामाजिकानामिति नात्र पक्षे रसस्य
सामाजिकास्वादविषयत्वमुपपद्यत इत्येवं योजनीनो ग्रन्थः। अत्र चात्मगतत्वेनेति पर-
कल्पानुरोधेन परगतत्वेनेति पूरणीयम्। ताटस्थ्यस्य परगतरत्यादिविषयकप्रतीत्यना-
श्रयत्वे सामाजिकानां हेतुत्वं भट्टनायकमतानुवादपरकेण लोचनग्रन्थेनाऽपि—'ननूक्तं
भट्टनायकेन—रसो यदा परगततया प्रतीयेत तर्हि ताटस्थ्यमेव स्याद्' इत्यादिना स्पष्टम्।
अत्र च रसशब्दः स्थाय्यर्थकः, आस्वाद्यत्वं रसत्वम्, अनास्वाद्यत्वम् रसत्वाभावः।
परगतत्वे रत्यादेः सामाजिकेभ्यो रसत्वं न स्यात्, तेषां तत्रोदासीन्यादिति भावोऽस्य
ग्रन्थस्य। पूर्वव्याख्यायान्तु ताटस्थ्यपदार्थस्वरसभङ्गोऽपि। अधिकं विज्ञैर्विवेचनीयम्।
विषय में यह मत है—"रस की प्रतीति होती है—यह कहना असंगत है, क्योंकि
इसके दो हीं अर्थ हो सकते हैं—(क) रस की प्रतीति दुष्यन्त आदि नायकों को
होती या (ख) सामाजिक को होती। किन्तु ये दोनों हीं अर्थ असंगत हैं। यदि
रस की प्रतीति सामाजिक को न होकर दुष्यन्त आदि को होती—यह माना जाय
तब तो सामाजिक में उससे उदासीनता (तटस्थता) आ जाएगी, फलतः वह रत्यादि
सामाजिकों का आस्वाद्य न हो सकेगा। ऐसी स्थिति में अनास्वाद्य रत्यादि को
सामाजिक के लिए रस कहना सम्भव न हो सकेगा, क्योंकि जो आस्वाद्य है वही तो
रस है। अतः रसप्रतीति सामाजिक से भिन्न व्यक्ति—दुष्यन्तादि को होती—
(परगत होती)—यह नहीं कहा जा सकता। अब रही बात सामाजिक द्वारा
रसप्रतीति की। किन्तु विचार करने पर इसमें भी संगति नहीं दीखती, क्योंकि
जब दुष्यन्त की पत्नी शकुन्तला सामाजिक के लिए विभाव का स्वरूप हीं प्राप्त नहीं
कर सकती तो फिर सामाजिक में शकुन्तलाविषयक रति कहां से हो सकती?
विना विभाव के तो रति हो नहीं सकतीं, अतः सामाजिक को रसास्वाद असम्भव
है। अब यह प्रश्न है—विभावतावच्छेदक से अवच्छिन्न पदार्थ हीं विभाव होता।
विभावतावच्छेदक है कान्तात्व, वह जब शकुन्तला में भी है हीं तो फिर वह सामा-
जिक के लिए विभाव क्यों न हो सकती? इसका उत्तर यही है कि केवल (सर्व-
कान्ता-साधारण) कान्तात्व विभावतावच्छेदक हो नहीं सकता, क्योंकि तब तो
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२. चतुर्विध काव्य-भेद (उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम एवं अधम काव्य लक्षण)
८४ रसगङ्गाधरः
त्वेन तु प्रत्ययो दुर्घटः, शकुन्तलादीनां सामाजिकान्प्रत्यविभावत्वात् ।
विना विभावमनालम्बनस्य रसादेरप्रतिपत्तेः । न च कान्तात्वं साधारणं
विभावतावच्छेदकमत्राप्यस्तीति वाच्यम् । अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गि-
ताऽगम्यात्वप्रकारकज्ञानविरहस्य विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकस्य
आत्मगतत्वेन रत्यादिप्रतीतिं निरस्यति—आत्मगतत्वेनेत्यादिना । साधारणं
सकलकान्तासाधारणम् । साधारणविभावतावच्छेदकमित्यमपपाठः, विभावतावच्छेद-
कस्य विभावमात्रसाधारण्येन व्यावत्र्याभावात्, विभावातिरिक्तेऽवर्त्तमानत्वेन च
साधारण्याभावात् साधारण्यस्य तद्विशेषणत्वानुपपत्तेः । अत एव लोचने ‘कान्तात्वं
साधारणं वासनाविकासहेतुभूतविभावतायां प्रयोजकम्’ इत्याद्युक्तम् । केवलस्य
कान्तात्वस्य विभावतावच्छेदकत्वे तदवच्छिन्ने विभावत्वमव्याहतमित्याशङ्कार्थः ।
अप्रामाण्येत्यादि । इयमगम्या इत्याकारकं ज्ञानमगम्यात्वप्रकारकं ज्ञानम् ।
तत्रेदमपदेनोपस्थिता कान्ता विशेष्यभूता । तथा च यस्या विषये इयमगम्येति ज्ञानं
भवति तस्या विशेष्यताख्यविषयतासम्बन्धेन इयमगम्येति ज्ञानं वर्त्तते, यस्यां पुनरि-
यमगम्येति ज्ञानं न भवति तस्यां विशेष्यताख्यविषयतासम्बन्धेनेयमगम्येत्या-
कारकागम्यात्वप्रकारकस्य ज्ञानस्य विरहो वर्त्तते । यस्य च विरहः=अभावः स
तस्याभावस्य प्रतियोगी । प्रकृते चेयमगम्येत्याकारकज्ञानस्याभावो विवक्षित इति
तादृशं ज्ञानं प्रतियोगि भवत्यस्याभावस्य । तादृशे ज्ञाने च प्रतियोगिता, तादृशं
ज्ञानत्वं च प्रतियोगिताऽवच्छेदको धर्मः । येन च सम्बन्धेन कश्चिदभावो ग्राह्यः
स सम्बन्धोऽभावीयप्रतियोगिताऽवच्छेदकः, सा च प्रतियोगिता तेन सम्बन्धेनाऽ-
वच्छिन्ना । येन च सम्बन्धेन प्रतियोगी क्वचित् सम्भवति, असति विशेषानुल्लेखे
तेनैव सम्बन्धेन तदभावोऽपि गृह्यते । यथा—भूतले घटः संयोगेन सम्भवतीति तत्र
घटाभावोऽपि संयोगेन विवक्षित इति घटनिष्ठाऽभावीयप्रतियोगितावच्छेदकः संयोगः,
घटनिष्ठा प्रतियोगिता च संयोगसम्बन्धावच्छिन्ना । प्रकृते च यदि कान्तायामयिम-
गम्येति ज्ञानं भवेत् तर्हि विशेष्यताख्यविषयतासम्बन्धेनैव नाऽन्येनेति तादृशज्ञानस्या-
भावोऽपि तस्यां तत्सदृश्यां वान्यस्यां कान्तायां विशेष्यताख्यविषयतासम्बन्धेनैव वर्त्त-
सामाजिक के लिए उस कान्तात्व से युक्त होने के कारण उनकी बहन एवं अन्य
कान्ताएँ भी विभाव हो जाएगीं। इससे महान् अनर्थ होगा । अतः ‘विशेष्यता-
सम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दितागम्यात्वप्रकारकज्ञानाभाव
से विशिष्ट कान्तात्व’ को हीं विभावतावच्छेदक मानना उचित है । इसका तात्पर्य
यही है कि जिस कान्ता के विषय में सामाजिक को ‘यह गमन करने योग्य नहीं
है’ इस प्रकार का प्रमात्मक बोध अथवा ‘यह गमन करने योग्य है या नहीं’ इस
प्रथमाननम् ८५
प्रकार का संशयात्मक बोध होता हो उससे अन्य कान्ता हीं विभाव हो सकती है ।
उक्त विभावतावच्छेदक का विश्लेषण इस प्रकार करना चाहिए—अगम्यात्व है
प्रकार (=विशेषण) जिस ज्ञान में उसे 'अगम्यात्वप्रकारक ज्ञान' कहा जाता ।
इसका स्वरूप है—'इयम् अगम्या' । किसी भी विषय के ज्ञान के विषय में तीन
कोटियाँ सम्भावित हैं—प्रमात्वनिश्चय—'इदं ज्ञानं प्रमैव', प्रमात्वसंशय—'इदं
ज्ञानं प्रमा न वा ?' (इसी को अप्रमात्वसंशय भी कह सकते, क्योंकि एक कोटि
तो प्रमात्वसंशय में अप्रमात्व हीं है) और अप्रमात्वनिश्चय—'इदं ज्ञानम् अप्रमैव' ।
अतः 'इयमगम्या' इस ज्ञान के विषय में भी उक्त तीन कोटियाँ हो सकती हैं—
(क) “इयमगम्या'—इति ज्ञानं प्रमैव', “इयमगम्या'—इति ज्ञानं प्रमा न वा ?'
और 'इयमगम्या'—इति ज्ञानमप्रमैव ।' इनमें प्रथम को प्रामाण्यनिश्चयालिङ्गिता-
गम्यात्वप्रकारक ज्ञान, द्वितीय को प्रामाण्यसंशयालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान अथवा
अप्रामाण्यसंशयालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान और तृतीय को अप्रामाण्यनिश्च-
यालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान कहा जाता । यह भी ज्ञातव्य है कि निश्चय यथार्थ
भी हो सकता है और अयथार्थ भी । अब यह स्पष्ट है कि उक्त तीनों ज्ञानों में
प्रथम और द्वितीय ज्ञान को 'अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान'
कहा जा सकता है । उक्त त्रिविध अगम्यात्वप्रकारकज्ञानविषयक प्रमात्वनिश्चय आदि
में से प्रथम या द्वितीय प्रकार के होने पर रति सम्भव या उचित नहीं है । अतः उक्त
दोनों हीं प्रकारों के ज्ञान का अभाव जिस कान्ता के विषय में होगा वहीं उक्त विभा-
तावच्छेदक धर्म रहेगा और वही कान्ता सामाजिक की रति का विभाव हो सकती
है, अन्य, अर्थात् जिसके बारे में प्रथम या द्वितीय प्रकार का अगम्यात्वप्रकारक ज्ञान
हो वह, विभाव नहीं हो सकती । इस प्रकार प्रथम और द्वितीय इन दोनों के
अभाव को स्वतन्त्ररूप में व्यक्त करने पर दो अभाव कहने पड़ते । इन दोनों का
समावेश करने के लिए 'अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारकज्ञानाभाव' कहा
गया है ।
अब यह विचारणीय है कि इस अभाव को विभावतावच्छेदक में विशेषणरूप
में कैसे रखा जाय, क्योंकि विभावतावच्छेदक ( चाहे उसका विशेषणांश हो या
विशेष्यांश) को विभावता के अधिकरण—विभाव में रहना हीं चाहिए। 'इयमगम्या'
यह ज्ञान समवाय सम्बन्ध से सामाजिक में आश्रित है, अतः यदि सामाजिक में यह
ज्ञान उत्पन्न नहीं होता तो इस ज्ञान के अभाव की ( इसी ज्ञान में रहने वाली )
प्रतियोगिता का अवच्छेदक सम्बन्ध समवाय होगा, क्योंकि जिस अधिकरण में
प्रतियोगी (=जिसका अभाव विवक्षित हो वह पदार्थ) जिस सम्बन्ध से रह सकता
उस अधिकरण में उसके अभाव को भी, यदि किसी विशेष सम्बन्ध का निर्देश न
८६ रसगङ्गाधरः
तेति भवति तादृशज्ञानविरहो विशेष्यताख्यविषयतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकः ।
यद्यपीयमगम्येत्याकारकज्ञानविरहः समवायेन नायकेऽपि वर्तते तथापि विभावभूतायां
कान्तायां विद्यमान एव तादृशज्ञानविरहो विभावतावच्छेदककोटौ निवेश्यः, न
त्वाद्यः, व्यधिकरणत्वात् । अतः 'विशेष्यतासम्बन्धः समवायः' इति नागेशोक्ति-
श्चिन्त्या । इयमगम्येतिज्ञानविषये इदं ज्ञानं प्रमेत्याकारकः प्रमात्व- (प्रामाण्य)-
निश्चयः, इदं ज्ञानं प्रमा न वेत्याकारकः प्रमात्वसंशयोऽप्रमात्वसंशयो वा, इदं ज्ञान-
मप्रमेत्याकारकोऽप्रमात्वनिश्चयश्चेति त्रिविधं ज्ञानं सम्भवति । तत्र प्रथमे इयम-
गम्यैवेति निश्चयः, द्वितीये इयं गम्याऽगम्या वेति संशयः, तृतीये इयं गम्यैवेति
निश्चयः प्रतिफलति । तत्र प्रथमे ज्ञाने कस्याश्चिदपि कान्ताया विषये जाते
न तत्र रत्युदयः । द्वितीयेऽपि अनर्थसंशयान्न रत्युदयः, तृतीये तु भवत्येव
रत्युदयः । यद्यपि इयमगम्या न वेति संशयसत्त्वेऽपि शकुन्तलादौ दुष्यन्तादे
रतिरुदिता तथाऽपि स रत्याभास एवेति न दोषः । यद्वा 'असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा'
किया हो तो, उसी सम्बन्ध से माना जाता है । दूसरे शब्दों में, अन्योन्याभाव
(भिन्नता) से अतिरिक्त अभाव को संसर्गाभाव कहा जाता । इसमें एक पदार्थ
(प्रतियोगी) के अधिकरण विशेष (अनुयोगी) में उस संसर्ग का प्रतिषेध किया जाता
जिस संसर्ग से प्रतियोगी का अनुयोगी में अस्तित्व सम्भावित हो । यही संसर्ग
अभावीयप्रतियोगितावच्छेदक संसर्ग कहलाता । इससे स्पष्ट है कि सामाजिक,
जिसमें 'इयमगम्या' यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता उसमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न-
प्रतियोगिताक अगम्यत्वप्रकारकज्ञानाभाव रहेगा । किन्तु यह अभाव विभावनिष्ठ
न होने से विभावतावच्छेदककोटि में विशेषणरूप से प्रविष्ट हो नहीं सकता । अतः
इस अभाव को उस रूप में व्यक्त करना है जिससे यह विभाव में आश्रित हो ।
इसीलिए ग्रन्थकार ने समवायसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक उक्त अभाव का निवेश
न कर विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अगम्यत्वाप्रकारकज्ञानाभाव का
निवेश किया है । इसका तात्पर्य यह है—'इयमगम्या' यह अगम्यत्वप्रकारक ज्ञान
समवाय सम्बन्ध से तो सामाजिक में अवश्य रहता, परन्तु जिस कान्ता के विषय में
यह ज्ञान होता उस कान्ता-स्वरूप विषय में भी यह ज्ञान विषयता सम्बन्ध से रहता
हीं है । विषय तीन प्रकार के होते हैं—विशेषण, विशेष्य और दोनों का संसर्ग ।
इसलिए विशेषण में विशेषणताख्य या प्रकारताख्य विषयता रहती, विशेष्य में
विशेष्यताख्य विषयता और संसर्ग में संसर्गताख्य विषयता। १ अत एव विषयतासम्बन्ध-
१. निर्विकल्पक ज्ञान में विशेषण आदि का भान न होने से उस ज्ञान की
विषयता स्वतन्त्र प्रकार की होती है ।
इत्यादिनाऽगम्यात्वप्रकारकज्ञानेऽप्रामाण्यनिश्चये जात एव रत्युदय इति मन्तव्यम् ।
एषु च ज्ञानेषु प्रतिफलितेषु प्रथमद्वितीये त्वप्रमाण्यनिश्चयानालिङ्गिते । अत एत-
योरन्यतरस्यापि सत्त्वे रत्युदयाभावाद् अनयोरभावः कान्ताविषये रत्युदयेऽपेक्षितः ।
अन्त्यस्तु निश्चयः स्वयमेव रत्युदयहेतुरिति तस्याभावो नाऽपेक्षितस्तत्रेति हेतोः
प्रथमद्वितीयज्ञानाभावयोर्लाघवेन संग्रहाय अप्रामाण्यनिश्चयाऽनालिङ्गितेति विशेषण-
मगम्यात्वप्रकारकज्ञानस्योपात्तम् । अप्रामाण्यनिश्चयश्च प्रमात्मको भ्रमात्मको वा
भवेदविशेषेण रत्युदयहेतुः । अत एव वस्तुतोऽगम्यायामपि इयमगम्येत्याकारकं
ज्ञानमप्रमेति भ्रमात्मकाप्रामाण्यनिश्चये रत्युदयो भवत्येव । अगम्यात्वप्रका-
रक ज्ञानं हि इयमगम्येत्येकम् इयमगम्या न वेति द्वितीयम् । आद्यं निश्चय-
८८ रसगङ्गाधरः
विभावतावच्छेदककोटाववश्यं निवेश्यत्वात् । अन्यथा स्वस्रादेरपि कान्ता-
त्वादिना तत्त्वापत्तेः । एवमशोच्यत्वकापुरुषत्वादिज्ञानविरहस्य तथाविधस्य
ख्यविषयतासम्बन्धावच्छिन्नाऽप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारकज्ञानत्वाव -
च्छिन्नप्रतियोगिताकाभावविशिष्टं कान्तात्वम् । शकुन्तलायाः परनायिकात्वेन तत्रे-
यमगम्येत्याकारकमगम्यात्वप्रकारकं ज्ञानं प्रामाण्यनिश्चयालिङ्गितं सदप्रामाण्यनिश्च-
यानालिङ्गितमेवेति तद्विषयेऽप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारकज्ञानमेव न तु
तद्विरह इति विभावतावच्छेदकविशेषणीभूतस्य तादृशज्ञानविरहस्याऽसत्त्वाद्विशिष्टस्य
विभावतावच्छेदकस्याप्यसत्त्वमिति न शकुन्तलादौ परकीयानायिकायां सामाजिकान्
प्रति विभावत्वमिति । विषयतासम्बन्धस्य वृत्तिनियामकत्वमभिप्रेत्यायं निवेशो
विभावतावच्छेदककोटौ संगततः । तस्य वृत्त्यनियामकत्वे तु अप्रामाण्यज्ञानानास्क-
न्दितागम्यात्वप्रकारकज्ञानविशेष्यत्वाभावविशिष्टं कान्तात्वमेव तथेति बोध्यम् ।
एष चाऽभावस्तादात्म्येन कान्तायां वर्त्तमानः । तादृशविरहस्य विभावतावच्छेदककोटा-
वनिवेशेऽतिप्रसङ्गमाह—अन्यथेति । तत्त्वापत्तेः = विभावत्वापत्तेः ।
रसान्तरेऽपि विभावतावच्छेदकस्वरूपनिर्धारणमनयैव रीत्येत्याह—एवमि-
त्यादि । तथाविधस्य = विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाऽप्रामाण्यनिश्चयाना-
हो सकती ? शकुन्तला के समान हीं अपनी बहन तथा अन्य सपिण्ड-सगोत्र स्त्रियों
में भी उक्त ज्ञानाभावस्वरूप विशेषण के न रहने से विशेषणाभावप्रयुक्त विशि-
ष्टाभाव¹ स्वरूप विभावतावच्छेदकाभाव है ।
इस प्रसंग में यह भी ज्ञातव्य है कि पूर्वोक्त प्रमात्वादिनिश्चय यथार्थ भी हो
सकते हैं, अयथार्थ भी । अतः यदि किसी गम्या स्त्री के विषय में किसी को पहले
'इयमगम्या' यह बोध हो और सोचने पर उसे यह भ्रमात्मक प्रमात्वनिश्चय हो
जाय—'इदं ज्ञानं प्रमैव' तो उसमें रति नहीं हो सकती । इसके विपरीत, यदि
किसी अगम्या स्त्री के विषय में किसी को पहले 'इयमगम्या' ज्ञान हो और पीछे
१. विशेषणयुक्त विशेष्य का अभाव (=विशिष्टाभाव) केवल विशेषण के, केवल
विशेष्य के और दोनों के अभाव के आधार पर भी माना जाता है। प्रथम
को विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव, द्वितीय को विशेष्याभावप्रयुक्त
विशिष्टाभाव और तृतीय को उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव कहते । नील-
घटविशिष्ट भूतल में रक्त घट का अभाव, उसी भूतल में नील पट का अभाव
और उसी भूतल में रक्त पट का अभाव क्रमशः उक्त तीनों विशिष्टाभावों के
उदाहरण हैं ।
प्रथमाननम् ८९
करुणरसादौ । तादृशज्ञानानुत्पादस्तु तत्प्रतिबन्धकान्तरनिर्वचनमन्तरेण
दुरुपपादः । स्वात्मनि दुष्यन्ताद्यभेदबुद्धिरेव तथेति चेत् ? न,
लिङ्गिताऽशोच्यत्वकापुरुषत्वप्रकारकज्ञानविरहविशिष्टपुरुषत्वादेः करुणरसादौ विभाव-
तावच्छेदकत्वं वाच्यमित्यर्थः । शकुन्तलादौ सामाजिकानाम् इयमगम्येत्याकारका-
प्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितज्ञानस्यानुत्पाद एव कथं न भवतीत्याशङ्कायामाह--
तादृशेति । निर्वचनमिति । एतेन योग्यस्य तादृशज्ञानोत्पादप्रतिबन्धकस्याभावः
सूच्यते । यस्य पुनरुन्मादादिना तथाविधज्ञानानुदयो दृष्टस्तस्य रतिरेव नोत्पद्यत
इति न तस्यापि विभावः शकुन्तलादिरिति बोध्यम् । तथा च योग्यप्रतिबन्धकाभावसह-
कृतोत्पादसामग्रीसत्त्वात् परकीयनायिकाविषये तथाविधं ज्ञानं जायत एव सभ्याना-
मिति न शकुन्तलादौ तेषां विभावत्वमिति निष्कर्षः । जगन्मातृत्वेनाभिमते सीतादौ
चलकर उसे यह भ्रमात्मक अप्रमात्वनिश्चय हो जाय—'इदं ज्ञानमप्रमैव' तो उसमें
रति हो ही सकती है।
इस सन्दर्भ में एक विषय पर ध्यान देना आवश्यक है—विषयतासम्बन्ध
वृत्तिनियामक (जिस सम्बन्ध से किसी पदार्थ का किसी अधिकरण में रहना प्रसिद्ध
हो वह सम्बन्ध) है या नहीं—यह विवादग्रस्त है । अतः विशेष्यताख्यविषयता-
सम्बन्ध की वृत्तिनियामता मानने पर तो उक्त वर्णन उचित है । किन्तु इसे वृत्ति-
नियामक न मानने पर विभावतावच्छेदक का स्वरूप होगा—अप्रामाण्यनिश्चयाना-
लिङ्गितागम्यत्वप्रकारकज्ञानविशेष्यत्वाभावविशिष्ट कान्तात्व । इस पक्ष में अभावीय
प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध होगा तादात्म्य । अतः निष्कर्ष यह है कि वही कान्ता
विभाव हो सकती है जो अगम्यत्वप्रकारक ज्ञान का विशेष्य न हो ।
शृङ्गार के समान ही करुण के प्रसङ्ग में अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गिताशोच्यत्व-
प्रकारकज्ञानाभावविशिष्ट पुरुषत्वादि को, वीररस के प्रसङ्ग में अप्रामाण्यनिश्च-
यानालिङ्गितकापुरुषत्वज्ञानाभावविशिष्ट पुरुषत्वादि को विभावतावच्छेदक समझना
चाहिए । प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध का स्वरूप पूर्ववत् है । अतः स्पष्ट है कि
शकुन्तलादि सामाजिक के लिए विभाव नहीं हो सकते; क्योंकि उनके विषय में उक्त
अगम्यत्वप्रकारकज्ञान ही उत्पन्न होता, उसका अभाव नहीं । हाँ, यदि कोई
योग्य प्रतिबन्धक होता तो शकुन्तलादि के विषय में उक्त ज्ञान उत्पन्न न होता और
वे विभाव हो जाते । किन्तु विचार करने पर कोई वैसा प्रतिबन्धक प्रस्तुत किया
नहीं जा सकता । यह तो सम्भव नहीं कि सामाजिक नाट्यादि देखते-पढ़ते समय
यह भूल जाते कि वे दुष्यन्त से भिन्न हैं, क्योंकि दुष्यन्त आदि के कुछ अलौकिक
गुणों—धीरोदात्तता, साम्राज्य-सम्पन्नता आदि आदि—के अपने में अभाव
नायके धराधौरेयत्वधीरत्वादेरात्मनि चाधुनिकत्वादेर्वैधर्म्यस्य स्फुटं प्रति-
पत्तेरभेदबोधस्यैव दुर्लभत्वात् ।
किं च केयं प्रतीतिः ? प्रमाणान्तरानुपस्थानाच्छाब्दीति चेत् ? न । व्याव-
हारिकशब्दान्तरजन्यनायकमिथुनवृत्तान्तवित्तीनामिवाश्या अप्यहृद्यत्वापत्तेः ।
सामाजिकान् प्रत्यविभावत्वन्तु इतोऽपि स्फुटतरम् । तथा=तादृशज्ञानोत्पादप्रति-
बन्धकः । वैधर्म्यस्येति । एतदुपलक्षणमलोकसामान्यस्य नायकादिगतधर्मवैध-
र्म्यस्य । तथा च यद्यपि धराधौरेयत्वादेर्नायकधर्मस्य क्वचित्सामाजिकेऽपि सम्भव
इति तत्राभेदप्रतीतिः शक्या स्वीकर्तुम् तथापि रामादेरलौकिकगुणसम्पन्नस्य साधर्म्यं न
लौकिकेषु पुरुषेषु सम्भवतीत्यभेदबुद्धिस्तत्र नायकसामाजिकयोरशक्यसम्पाद्यैवेति नाऽ-
भेदबुद्धिमादाय तादृशज्ञानोत्पादप्रतिबन्ध इत्याशयः ।
एतावता परगतत्वेन स्वगतत्वेन च रसप्रतीतेरशक्यत्वमुपपाद्य प्रतीतेरपि परा-
भिमताया अलौकिककाव्यव्यापारानपेक्षलौकिकप्रमाणवेद्यत्वे अहृद्यत्वापत्तिमुखेन अयु-
क्तत्वं प्रतिपादयन् 'प्रतीयते रसः' इति पक्षं निराकर्तुकाम आह—किञ्चेत्यादि ।
रसप्रतीतिरत्र प्रतीतिशब्देन विवक्षिता । प्रमाणान्तरं शब्दातिरिक्तं प्रत्यक्षादि,
तदभावात् काव्यात्मकशब्दप्रमाणजन्यैव रसप्रतीतिरित्यर्थः प्रतिप्रश्नस्य । व्याव-
हारिकशब्दान्तरेति । एतच्चोपलक्षणं लौकिकप्रमाणमात्रस्य प्रत्यक्षादेरपि ।
अहृद्यत्वापत्तेरिति । एतच्चाऽसहृदयत्वं भट्टनायकस्य ख्यापयति, यतो हि भङ्गि-
भेदेन शब्दप्रतीतेरपि हृद्यत्वस्य सर्वानुभवसिद्धत्वात् । अथवा यादृशं हृद्यत्वमलो-
होने से वे अपने को दुष्यन्त आदि से अभिन्न कैसे समझ सकते ? अतः नायक
से अपने को अभिन्न समझने के कारण भी शकुन्तला आदि को सामाजिक की
रति का विभाव मानना असम्भव है । अतः रस की स्वगत प्रतीति भी नहीं
हो सकती ।
उक्त रीति से प्रतीति के परगत या स्वगत न होने से उस पक्ष का निराकरण
कर अब भट्टनायक उपयुक्त प्रमाण न होने से भी रसप्रतीति-पक्ष का खण्डन कर रहे
हैं, क्योंकि परगत रत्यादि की सामाजिक को बाह्य प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता,
कारण आन्तरिक पदार्थ चाहे स्वगत हो या परगत वह बाह्येन्द्रिययोग्य होता ही
नहीं । यदि चेष्टा आदि से उसकी अनुमिति हो भी तो भी उसमें अलौकिकता
नहीं आ सकती । काव्यात्मक शब्द-प्रमाण से प्रतीति मानने पर भी अलौकिका-
स्वाद की समस्या पूर्ववत् बनी रहेगी, क्योंकि इतिहास-पुराणादि के वाक्यों से होने
वाली नायक-नायिका के प्रेमाख्यान की प्रतीति मे अलौकिक आनन्द किसी को नहीं
मिलता । उक्त रत्यादि की मानस-प्रतीति होती है (सामाजिक को)—यह कहना भी
प्रथमाननम् ९१
नापि मानसी, चिन्तोपनीतानां तेषामेव पदार्थानां मानस्याः प्रतीतेरस्या
वैलक्षण्योपलम्भात् । न च स्मृतिः, तथा प्रागननुभवात् ।
तस्मादभिधया निवेदिताः पदार्था भावकत्वव्यापारेणाऽगम्यत्वादिरस-
किकं रसप्रतीतावनुभवसिद्धं सहृदयानां तादृशं हृद्यत्वं शब्दात् तत्प्रतीतौ न स्यादि-
त्याशयेनेदम् । तादृशालौकिकं हृद्यत्वं मानस्यामपि तत्प्रतीतौ न स्यादित्याशयेनाह-
नाऽपीति । चिन्तेत्यादि । पुनः पुनरनुसन्धानं चिन्ता, तयोपनीतानां ज्ञान-
लक्षणसन्निकृष्टानां काव्यार्थानां शकुन्तलादीनां विभावत्वादिना मानस्यां प्रतीतौ यथा
नालौकिकं हृद्यत्वं तथैव रसस्यापि मानस्यां प्रतीतौ न स्यात्, इष्यते तु तत् । अतो
न रसप्रतीतिर्मानसी भवितुमर्हतीत्याशयः । अलौकिकगुणस्य नायकादेः स्मृतिरेव
रसप्रतीतिः सामाजिकानाम्, अलौकिकविषयकत्वादेव चेयं स्मृतिरपि रमणीया स्या-
दित्याशङ्कां निराकुरुते—न च स्मृतिरिति । अनुभवो हि पूर्वकालिकः स्वजन्य-
संस्कारद्वारा स्मृतिहेतुरिति प्रसिद्धम् । प्रकृते च तादृशगुणविशिष्टनायकादेः सामा-
जिकानुभवविषयत्वाभावेन न तद्विषयकः संस्कारः सामाजिकानां येन तद्विषया
स्मृतिः स्यादिति न स्मृतिरूपाऽपि रसप्रतीतिः शक्याऽभ्युपगन्तुम् इत्यर्थः । तदेवं
रसप्रतीतिपक्षे निराकृते रसोत्पत्त्यभिव्यक्तिपक्षावपि लोचनाद्युक्तभट्टनायकयुक्त्या
निराकरणीयौ पाठकैः । तथा हि लोचन उक्तम्—'उत्पत्तिपक्षे च करुणस्योत्पादाद्
दुःखित्वे करुणप्रेक्षासु पुनरप्रवृत्तिः स्यात् । तन्नोत्पत्तिरपि । नाप्यभिव्यक्तिः,
शक्तिरूपस्य हि शृङ्गारस्याभिव्यक्तौ विषयार्जनतारतम्यप्रवृत्तिः स्यात् । तत्रापि किं
स्वगतोऽभिव्यज्यते रसः परगतो वेति पूर्ववदेव दोषः । तेन न प्रतीयते, नोत्पद्यते,
नाभिव्यज्यते काव्येन रसः' इति ।
अधुना स्वमतमाह भट्टनायकः—तस्मादित्यादिना । अभिधयेत्युपलक्षणं
लक्षणाया अपि । यथावत्पदार्थप्रतिपादनमभिधाया लक्षणायाश्च कृत्यमत्र मते । तद-
सम्भव नहीं, क्योंकि एक तो दूसरे के रत्यादि आन्तरिक पदार्थों का सामाजिक को
मानस प्रत्यक्ष हो नहीं सकता और दूसरे, पुनः पुनः अनुसन्धान किये गये काव्यार्थ-
भूत शकुन्तलादि की विभावादिरूप में होने वाली मानस-प्रतीति में वह आनन्द
नहीं मिलता जो रसप्रतीति में अभीष्ट है । उन अलौकिकानन्दमय दुष्यन्तादिनिष्ठ
रत्यादि का सामाजिक को नाट्यदर्शनादि के पूर्व अनुभव न होने से उनकी स्मृति
भी असम्भव है । अतः रस-प्रतीति की मान्यता सर्वथा हेय है । इसी तरह,
रसोत्पत्ति-पक्ष भी असंगत है, क्योंकि तब तो नायक के शोक से सामाजिक में भी
शोक की उत्पत्ति माननी होगी जिसका अर्थ यही होगा कि एक बार करुण-रस-
प्रधान नाटक-काव्य देख-सुनकर शोकातुर सामाजिक पुनः कभी उन्हे देखने-सुनने में.
३२ रसगङ्गाधरः
विरोधिज्ञानप्रतिबन्धद्वारा कान्तात्वादिरसानुकूलधर्मपुरस्कारेणावस्थाप्यन्ते।
एवं साधारणीकृतेषु दुष्यन्तशकुन्तलादेशकालवयोऽवस्थादिषु, पङ्कौ पूर्व-
व्यापारमहिमनि, तृतीयस्य भोगकृत्वव्यापारस्य महिम्ना निगीर्णयो रजस्त-
मसोरुद्रिक्तसत्त्वजनितेन निजचित्स्वभावनिर्वृतिविश्रान्तिलक्षणेन साक्षा-
नन्तरं भावकत्वाख्यकाव्यव्यापारकृत्यं दर्शयति—भावकत्वेति। तथा च भाव-
कत्वव्यापारस्य साधारणीकरणं फलम्। तदाह—एवमिति। पूर्वव्यापारः =
भावकत्वव्यापारः। निगीर्णयोरित्यादिना भोजकत्वापरपर्यायभोगकृत्वाख्यतृतीय-
काव्यव्यापारस्य रजस्तमोवृत्तिनिरोधः फलम्। ततश्च सत्त्वोद्रेकाज्जायमानेन
मानसेन विलक्षणेन साक्षात्कारेण भोगापरपर्यायेण भुज्यते विषयीक्रियते रस इत्यय-
माशयो भट्टनायकस्य बोध्यः। निजचिदित्यादि। निजस्य = सामाजिकस्यात्मनः,
चित्स्वभावनिर्वृत्तिः = आवरणनाशादात्मस्वभावभूतचितः स्फुरणम्, चिदि-
त्युपलक्षणमानन्दरूपस्यापि, तस्या विश्रान्तिः = चिदानन्दात्मभिन्नवस्तुगोचरत्वम्,
तदेव लक्षणं सादृश्येन ज्ञापकं यस्य तेन साक्षात्कारेण परब्रह्मसाक्षात्कारसदृशेन
साक्षात्कारेणेति तात्पर्यम्। सत्त्वोद्रेकाच्च रससाक्षात्कारः सुखात्मकोऽत्र मते,
सत्त्वस्य सुखरूपेण परिणामात्। एतावत्तैव चास्य मतस्य सांख्यीयत्वप्रवादोऽपि।
साधारणात्मेत्यनेनेदं सूचितं यत्परगत एव रत्यादिः सामाजिकैर्भुज्यते, परन्तु भाव-
कत्वव्यापारेण साधारणीकरणात्मना परगतत्वं न गोचरीक्रियते इत्ययं विशेषः।
प्रवृत्त नहीं होंगे, जब कि वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। यदि यह रसोत्पत्ति नायकादि
में ही मान्य हो तो सामाजिक का इससे क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? रसाभिव्यक्ति-
पक्ष भी त्याज्य है, क्योंकि अभिव्यक्ति पूर्वसिद्ध पदार्थ की होती। अतः पूर्वसिद्ध
रत्यादि की हीं अभिव्यक्ति माननी होगी। यदि ये रत्यादि नायकनिष्ठ हैं तो
सामाजिक पुनः उनसे उदासीन हो जायेंगे। सामाजिक में उन रत्यादि की स्थिति
तो है नहीं। ऐसी स्थिति में किसकी सामाजिक में अभिव्यक्ति होगी ? साथ हीं,
अभिव्यञ्जक की स्थिति में तो तारतम्य के आधार पर रसाभिव्यक्ति में भी तारतम्य
मानना होगा। १ किन्तु रसस्वरूपभूत अखण्ड आनन्द की अभिव्यक्ति में तारतम्य
मानना असंगत है। अतः अभिव्यक्ति-पक्ष भी अनुचित है।
अतः रस की भुक्ति (भोग—साक्षात्कार) उचित है। इसकी व्याख्या इस
प्रकार करनी चाहिए—सर्वप्रथम तो अभिधावृत्ति द्वारा काव्यादि से वाच्यार्थ की
१. वस्तुतः यह कथन संगत नहीं है, क्योंकि अभिव्यञ्जकतारतम्यप्रयुक्त अभि-
व्यङ्ग्य की अखण्डता में अन्तर नहीं पड़ता। भट्टनायक के 'विषयार्जनतार-
तम्यप्रवृत्तिः' कथन का कोई दूसरा अभिप्राय हो, अथवा पाठ शुद्ध न हो !
प्रथमाननम् ९३
त्कारेण विषयीकृतो भावनोपनीतः साधारणात्मा रत्यादिः स्थायी रसः। तत्र
भुज्यमानो रत्यादिः, रत्यादिभोगो वेत्युभयमेव रसः। सोऽयं भोगो विषय-
संवलनाद्ब्रह्मास्वादसविधवर्तीत्युच्यते। एवं च त्रयोंऽशाः काव्यस्य-“अभिधा
अत्र पक्षे स्थायिनो भोगस्य च विशेषणविशेष्यभावे विनिगमकाभावाद् भुज्यमानः
स्थायी स्थायिविषयकभोगो वा रस इत्याह—तत्रेत्यादिना। पूर्वकल्पे साक्षात्कार-
स्यैव सत्त्वोद्रेकजनितस्य सुखमयत्वेन रसस्यापि सुखमयत्वं बोध्यम्। विषयसम्ब-
लनादित्यनेन विषयासम्बलितब्रह्मास्वादाद्भिन्नत्वं रसास्वादस्य दर्शितम्। सविधत्वं
च रसास्वादस्यानन्दप्रचुरत्वात्तत्प्राधान्याद्वा प्रतीत्यपेक्षात्। भट्टनायकमतं तदुक्त्यै-
वोपसंहरति—एवं चेत्यादिना। त्रयोंशाः = त्रयो व्यापाराः, अभिधा, भावना,
भोगीकृतिः (भोजकत्वं) चेति। तत्राभिधा वाच्यार्थविषयी=वाच्यार्थोपस्थापिका,
भावना = भावकत्वं साधारणीकरणद्वारा सामाजिकैः सह रत्यादेः सम्बन्धस्य प्रति-
पादिका, भोजकत्वं च सहृदयविषयम् = रसास्वादजनकम् इति। एतेन भट्टनायको
व्यञ्जनां नोरिकरोतीत्यपि सुव्यक्तमेव। अभिनवगुप्तभट्टनायकमतयोर्विशेषं निरू-
उपस्थिति होतो है। इस दशा में शकुन्तलादि से दुष्यन्तादि का सम्बन्ध बना
रहता है जिससे सामाजिक को रस-साक्षात्कार होने में बाधा पड़ती। इसलिए
काव्य में अभिधा से भिन्न एक ‘भावकत्व’ नामक व्यापार मानना चाहिए। इस
व्यापार के प्रभाव से ‘साधारणीकरण’ होता, अर्थात् रस-भोग में बाधकीभूत शकु-
न्तलादिविषयक परकीयत्व, अगम्यत्व, शकुन्तलात्व आदि धर्मों का प्रतिबन्ध और
कान्तात्व आदि रस-भोगानुकूल धर्मों का उद्भावन होता। इसी से शकुन्तलादि
के वय, अतीत काल आदि रस-प्रतिबन्धक तत्त्वों का भी विलोप हो जाता है।
अत एव दुष्यन्तादिनिष्ठ शकुन्तलादिविषयक रति भी केवल कान्ताविषयक रति रूप
में प्रस्फुटित होने लगती। इससे सामाजिक को उस रति के विषय में जो
परकीयत्व-बोध हो रहा था वह भी विलुप्त हो जाता। ‘भावकत्व’ व्यापार का
कृत्य यहीं समाप्त हो जाता है। किन्तु इतने से हीं, बिना भोग-साधन के, रस का
भोग हो नहीं सकता। भोग-साधन तो वह चित्त हो सकता हैं जिस में सत्त्वगुण
का अत्यन्त प्रकर्ष हो। यह कार्य चित्त के रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव को
सर्वथा समाप्त किए बिना असम्भव है। अतः ‘भोगकृत्त्व’ (=भोजकत्व) व्यापार
के प्रभाव से रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव सर्वथा क्षीण हो जाता जिसके फल-
स्वरूप सत्त्वगुण का चित्त में ‘उद्रेक’ हो जाता। इससे चित्त प्रकाशानन्दमय हो
जाता। इसके सम्पर्कं से रत्यादि में भी आनन्दमयतां प्रकट हो जाती है। इसी
‘चित्तसत्त्व’ (=सत्त्वातिशयविशिष्ट चित्त) से साधारणीकरणसाधनीभूत भावकत्व
९४ रसगङ्गाधरः
भावना चैव तद्भोगीकृतिरेव च” इत्याहुः । मतस्यैतस्य पूर्वस्मान्मताद्भाव-
कत्वव्यापारान्तरस्वीकार एव विशेषः । भोगस्तु व्यक्तिः । भोगकृत्त्वं तु
व्यञ्जनादविशिष्टम् । अन्या तु सैव सरणिः ॥
(३) नव्यास्तु काव्ये नाट्ये च कविना नटेन च प्रकाशितेषु विभावादिषु
पयति—मतस्यैतस्येत्यादिना । व्यक्तिः=भग्नावरणा चित्, तस्या एव साक्षात्का-
रात्मकत्वात्, ‘यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’ इत्यादिश्रुतेः । यद्यपि भट्टनायकमते
चित्तसत्त्ववृत्त्यात्मक एवानन्दः प्रतीयते तथापि ब्रह्मातिरिक्तस्यानन्दत्वात्तत्सम्पर्कं
विना कस्याप्यानन्दरूपत्वं न सम्भवतीत्यौपनिषदमताभिप्रायेणेयमुक्तिः पण्डितराज-
स्येति प्रतीयते । व्यञ्जनात्=व्यञ्जनव्यापारात् । तदुक्तं लोचने—‘भोगीकरण-
व्यापारश्च काव्यस्य रसविषयो ध्वननात्मैव, नान्यत् किञ्चिद्’ इति । अन्या=
आस्वाद्यमानः स्थाय्येव रसः, साधारणीकरणं चेत्याद्या पूर्ववर्णिता । अत्र
भट्टनायकमते भावकत्वाख्यकाव्यव्यापारेण साधारणीकरणम्, पूर्वमते च भावना-
विशेषेणेति विशेषः ॥
रसविषये तृतीयं मतमाह—नव्यास्त्वित्यादिना । प्रकाशितेषु = कविना
शब्देन नटेन चाभिनयाद्युपस्कृतेन शब्देन सहृदयहृदयं प्रापितेषु । विभावादिष्विति ।
व्यापार द्वारा पहले से हीं सहृदय के अन्तःकरण में उपस्थापित परकीयत्वसम्बन्ध-
रहित रत्यादि का सामाजिक को आनन्दमय तत्त्व के रूप में भोग (=साक्षात्कार)
होता । यह रसस्वरूप आनन्द उस ब्रह्मानन्द जैसा होता जिसमें आत्मा के चिदा-
नन्दस्वभाव की प्रकटता की पराकाष्ठा मानी जाती, क्योंकि सत्त्वोद्रेकमयचित्तगत
आनन्द अन्य चित्तगत आनन्दों में उत्तम होता । अन्तर दोनों में यह है कि ब्रह्मानन्द
वृत्तिभिन्न है जबकि रसानन्द रत्यादिविषयक चित्तवृत्ति है । अतः भोगविषयीकृत
रत्यादि या रत्यादिविषयक उक्त भोग (=साक्षात्कार) हीं रस है। इस प्रकार
काव्य के तीन व्यापार हुए, जैसा भट्टनायक ने स्वयं कहा है—‘‘अभिधा, भावना
(=भावकत्व) और रसभोगीकृति, अर्थात् भोजकत्व (ये तीन काव्यव्यापार हैं) ।’’
इसमें पूर्वमत (अभिनवगुप्त के मत) से यही अन्तर है कि इसमें एक ‘भावकत्व’
नामक अतिरिक्त काव्यव्यापार की कल्पना की गई है । भट्टनायक का ‘भोग’ तो
‘व्यक्ति’—भग्नावरणा चित् हीं हैं; केवल शब्दभेद है, अर्थभेद नहीं, क्योंकि साक्षा-
त्कार “यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार भग्नावरणचित्स्व-
रूप हीं है । इनका ‘भोजकत्व’ व्यापार भी व्यञ्जनाव्यापार से भिन्न नहीं है,
क्योंकि दोनों का कृत्य एक हीं है। अन्य प्रक्रिया दोनों की समान हैं ॥
कुछ नवीन आचार्य (जिनके नाम अज्ञात हैं) सामाजिक में उत्पन्न अनिर्वचनीय
प्रथमाननम् ९५
व्यञ्जनव्यापारेण दुष्यन्तादौ शकुन्तलादिरतौ गृहीतायामनन्तरं च सहृदय-
तोल्लासितस्य भावनाविशेषरूपस्य दोषस्य महिम्ना कल्पितदुष्यन्तत्वाव-
च्छादिते स्वात्मन्यज्ञानावच्छिन्ने शुक्तिकाशकल इव रजतखण्डः समुत्पद्य-
मानोऽनिर्वचनीयः साक्षिभास्यशकुन्तलादिविषयकरत्यादिरेव रसः ।
एतेन मतेऽस्मिन्नालम्बनकारणादीनां शकुन्तलादीनां विभावादिपदवीप्रापणाय न
भावनाविशेषस्य न वा भोजकत्वव्यापारस्य प्रयोजनमिति प्रतीयते, आलम्बनकारणा-
दीनामेव नामान्तराणि विभावादय इति ज्ञायते । सहृदयता = प्राक्तनी काव्यार्थ-
वासना, रत्यादिवासनेति यावत् । तया सहृदयतया उल्लासितस्य = सहकृतस्य,
शुक्तिरजतभ्रमोऽपि तस्यैव भवति यस्य रजतविषयकसंस्कारः पूर्वत एव वर्त्तते ।
अतोऽत्र रत्यादिभ्रमेऽपि वासनाख्यः कश्चन रत्यादिविषयकः संस्कारविशेषः सहृदये
नितरामपेक्षितः । तस्य चोद्वोधो दुष्यन्तादिस्थानीयनटकत्तृ करत्यनुकूलविलासादि-
ज्ञानेन काव्याध्ययनश्रवणजन्यतज्ज्ञानेन वा यथायथमवगन्तव्यः । सेयं वासना रत्या-
देर्भ्रमात्मकदुष्टफलजनकत्वादोष इत्युच्यते । स्वतस्तु वासनाया दोषत्वं दुर्घटम् ।
यद्वा भावनात्मकदोषसहकारितया रत्यादिवासनाया दोषत्वं निर्वाह्यम् । भावने-
त्यादि । काव्यार्थस्य पुनः पुनर्निरन्तर्येणानुसन्धानं भावना, सा चात्र सामाजिक-
गतस्वत्वस्य (= दुष्यन्तादिभिन्नत्वस्य) अपलापकत्वेन दोष इत्यभिहिता । अनेनैव
भावनाविशेषस्वरूपदोषेण स्वस्मिन् दुष्यन्तरूपेण प्रतीतिः । अयं च दुष्यन्तादि-
रनिर्वचनीयो यावत्प्रतिभासमवस्थानात् प्रातिभासिक इत्युच्यते वेदान्तनये ।
दुष्यन्तकल्पनायां च दुष्यन्तत्वमपि कल्पितं भवत्येवेति दुष्यन्तत्वमपि प्रातिभासिकं
सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं तत्रोत्पद्यत एव । इदमेव प्रातिभासिकत्वं सामाजके
दुष्यन्तत्वादेः कल्पितत्वमुक्तं ग्रन्थे । यदा च सामाजके दुष्यन्तादिः कल्प्यते तदा
दुष्यन्तत्वादिः तत्सहचरितो रत्यादिरपि शकुन्तलादिविषयकः कल्पित एव रङ्गे रजत-
स्य कल्पनायां रजतत्वबहुमूल्यत्वादिकल्पनवत् । कल्पितेत्यादि । अज्ञानावच्छिन्नेऽत
एव दुष्यन्तत्वाद्यवच्छादिते स्वात्मनीत्यन्वयः । यदा भावनास्वरूपदोषवशात्सामा-
जिकस्य स्वत्वं दुष्यन्तादिभिन्नत्वमवच्छाद्यते आव्रियते तदा भेदाग्रहात् सामाजिकः
स्वं दुष्यन्तमभिमन्यमानः 'दुष्यन्तोऽहं शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इति प्रत्येति ।
अस्यां प्रतीतो शकुन्तलाविषयिणी रतिविशेषणीभूता दुष्यन्तत्वविशिष्टश्च विशेष्य
(सदसद्विलक्षण-प्रातिभासिक) रत्यादि को हीं रस मानते । इस रस की उत्पत्ति
प्रक्रिया इस प्रकार है- सर्वप्रथम सामाजिक काव्य या नाट्य का अध्ययन या अव-
लोकन करते । इससे काव्य में कवि द्वारा वर्णित और नाट्य में नट द्वारा अभि-
नीत विभाव, अनुभाव एवं सञ्चारिभावों की यथासम्भव प्रत्यक्षात्मक या अनुमित्या-
९६ रसगङ्गाधरः
अयं च कार्यो दोषविशेषस्य। नाश्यश्च तन्नाशस्य। स्वोत्तरभाविना
इति भवति दुष्यन्तत्वं विशेष्यतावच्छेदकमत्र। इदमेव दुष्यन्तत्वस्य स्वात्मावच्छा-
दकत्वमत्राभिमतमिति वक्ष्यत्यनुपदमेव ग्रन्थकृत्।
अयम् = रत्यादिः। दोषविशेषस्य = सहृदयतोल्लासितभावनाविशेषस्य।
तन्नाशस्य = उक्तदोषविशेषनाशस्य। एतेन पूर्वोक्तमतसिद्धं नित्यत्वं निराकृतं
रसस्येति बोध्यम्। अनिर्वचनीयरत्यादे रसपदाभिलप्यस्य कथं सुखपदव्यपदेश
इत्यत्र हेतुमाह—स्वोत्तरभाविनेत्यादिना। अयमाशयः—रत्यादिसाक्षिप्रत्यक्षस्य
स्वरूपत आनन्दरूपत्वाऽभावेऽपि आस्वादात्मकस्यास्य प्रत्यक्षस्यालौकिककाव्यव्यापार-
भावनाजन्यरत्यादिविषयकत्याऽलौकिकाह्लादजनकत्वम्, आह्लादाच्चाऽव्यवहिताद् भेदे-
त्मक प्रतीति उन्हें (सामाजिक को) होती। इन विभाव आदि की सहायता से
व्यञ्जित दुष्यन्तादिनिष्ठ शकुन्तलादिविषयक रत्यादि का उन्हें बोध होता। उसके
पश्चात् विभावादिसम्बलित रत्यादि की जब वे अपनी सहृदयता से सम्बलित भावना,
अर्थात् पुनः पुनः अनुसन्धान करते तो इसी भावनास्वरूप दोष के प्रभाव से उनका
स्वत्व (दुष्यन्तादिभिन्नत्व) अज्ञानावृत हो जाता और उनमें कल्पित (अनिर्वचनीय)
दुष्यन्तत्वादि धर्म की उत्पत्ति हो जाती जिससे उनका व्यक्तित्व अवच्छादित हो
जाता। शब्दान्तर में, वे अपने को 'शकुन्तलादिविषयकरत्यादि के आश्रय
दुष्यन्तादि' समझने लग जाते—"शकुन्तलाविषयकरतिमान् दुष्यन्तोऽहम्"¹
इत्यादि बोध उन्हें होने लगता। ऐसी स्थिति में उनमें शकुन्तलादिविषयक रति की
उत्पत्ति भी हो हीं जाती है, अन्यथा उक्त बोध हो नहीं पाता। यह रति वास्तविक
(व्यावहारिक) तो हो नहीं सकती, क्योंकि वह है तो दुष्यन्त में हीं हो सकती है,
सामाजिक में नहीं। अतः यह प्रातिभासिक पदार्थ जिसकी स्थिति प्रतिभासकाल-
पर्यन्त होती, उससे पूर्व या पश्चात् नहीं। यह रति प्रतिभास जबतक होता तभी
तक होती, उससे पहले या पश्चात् नहीं। इस अनिर्वचनीय रति की उत्पत्ति
सामाजिक में उसी प्रकार होती जिस प्रकार अद्वैत-मत में अज्ञानावृत शुक्तिका में
काचादिदोष के प्रभाव से रजतत्व एवं तत्सहचरित बहुमूल्यत्व आदि धर्मों की प्रति-
भासकालमात्र में उत्पत्ति होती। प्रातिभासिक पदार्थ को अद्वैतमत में साक्षिभास्य
माना जाता। अतः सामाजिक में उत्पन्न रत्यादि को भी साक्षिभास्य मानना
चाहिए। यतः रसास्वादन सामाजिक को हीं होता अतः सामाजिक में रत्यादि-
स्वरूप रस का अस्तित्व अनिवार्य है। इसीलिए उनमें इस प्रातिभासिक रत्यादि
१. स्पष्टता के लिए केवल रति को लेकर उदाहरण दिया गया है। यही प्रक्रिया
रसान्तर के प्रसङ्ग में भी समझनी चाहिए।
प्रथमाननम् ९७
लोकोत्तराह्लादेन भेदाऽग्रहात्सुखपदव्यपदेश्यो भवति । स्वपूर्वोपस्थितेन
रत्यादिना तदग्रहात्तद्रतित्वेनैकत्वाध्यवसानाद्वा व्यङ्ग्यो वर्णनीयश्चोच्यते ।
नानध्यवसीयमानो रत्यादिः सुखपदव्यपदेश्योऽपि भवति । अस्मिंश्च पक्षे सुखमा-
ह्लादापरपर्यायं चित्तवृत्त्यात्मकमेव, आनन्दरूपावरणनिवृत्त्यभावेन आत्मानन्दाऽ-
स्फुरणात् । प्रातिभासिकपदार्थतत्प्रतिभासयोस्तुल्यकालत्वाद्रत्यादिप्रत्यक्षोत्तरजाय-
मानस्यान्याह्लादस्य रत्याद्युत्तरभावित्वमुक्तम् । यद्वाऽनिर्वचनीयरत्यादिविषयक-
साक्षिप्रत्यक्षरूपेण जायमानयाऽविद्यावृत्त्या स्वात्मानन्दावरणनिवृत्तिः, ततश्च स्वात्म-
भूतानन्देन सह पूर्ववद् गोचरीक्रियमाणत्वाद्रत्यादेः सुखपदव्यपदेशः । अस्य च सुख-
स्यात्मस्वरूपभूततया अलौकिककाव्यव्यापारप्रयोज्यतया चाऽलौकिकत्वम्, विशेषणी-
भूतस्य विशेष्यभूतस्य वा रत्यादेः काव्यार्थभावनाजन्यतया वा जन्यत्वमुपपाद्यम् ।
अथवा रत्यादेः सुखजनकत्वेन सुखत्वव्यपदेशः । सुखस्य नित्यत्वेऽपि रत्याद्युपहित-
सुखस्य जन्यत्वमुक्तम् । अस्मिंश्च पक्षे शोकादेरप्यनिर्वचनीयस्य सुखव्यपदेश
इष्टश्चेदात्मस्वरूपभूतानन्दसंस्पर्शादेव, ‘सरसिजमनुविद्धं शैवलेनाऽपि रम्यम्’ इति
वदिति वक्ष्यति । तदेवमस्मिन् मते सामाजिककर्तृकरसानुभवोपपादनाय सामा-
जिकेषु प्रतिभासिकरत्याद्युत्पत्तिसाधनमेव विशेष इति बोध्यम् । अस्य सामाजि-
निष्ठरत्यादेरनिर्वचनीयस्य भावनादोषजन्यतया साक्षिप्रत्यक्षविषयतया व्यङ्ग्यत्व-
व्यपदेशः अनिर्वचनीयत्वेन च वर्णनीयत्वव्यपदेशः कथमित्युपपादयति—स्वपूर्वेत्या-
दिना । उपस्थितेन = व्यङ्ग्येन वर्णनीयेन च । रत्यादिनेत्यस्य दुष्यन्तादौ
शकुन्तलादिविषयकेणेत्यादिः । तदग्रहात् = भेदाग्रहात् । ननु ब्रह्मजगदध्यासे
धर्मिणोः परस्पराध्यासाद्धर्मयोरपि परस्पराध्यासो यद्यपि प्रसिद्धस्तथापि लोके यस्मिन्
यद्भेदाग्रहस्तत्रानुयोगिनि प्रतियोगिधर्माध्यास एव प्रसिद्धः, यथा शुक्तौ रजतधर्मा-
ध्यासः, तथा चानिर्वचनीयसामाजिकनिष्ठरत्यादिधर्मस्य दुष्यन्तादिनिष्ठशकुन्तलादि-
विषयकरत्यादिधर्मिण्यध्यासासम्भवेऽपि तद्विपर्ययेणानिर्वचनीयरत्यादौ दुष्यन्तादिनिष्ठ-
रत्यादेः सामाजिकैर्व्यञ्जनया गृहीतस्य यो धर्मो व्यङ्ग्यत्वं तस्याध्यासोऽनुपपन्न
एवेत्यतः समाधानान्तरमाह—एकत्वाध्यवसानाद्वेति । इदन्त्वाद्यारोपादुत्तरान्तर-
मेव वा । अत्रैव हेतुः—रतित्वेनेति । रतित्वं ह्युभयसाधारणम्, यश्च पूर्वोपस्थिते
व्यङ्ग्ये रत्यादौ दुष्यन्तादिनिष्ठत्वं नाम भेदको धर्मस्तस्य च भावनास्वरूपदोष-
महिम्ना स्वात्मनि दुष्यन्ताद्यभेदबुद्ध्या प्रतीतिरेव नेति न तद्धर्मस्य तयोर्भेदकत्वमिति
सूपपादोऽनयोरेकत्वाध्यवसाय इत्याशयः । तथा च रसे व्यङ्ग्यत्वमुपचरितमेवेति
बोध्यम् ।
की उत्पत्ति माननी पड़ती है ।
यह अनिर्वचनीय रत्यादिस्वरूप रस भावनात्मक दोषविशेष से उत्पन्न होने
९८ रसगङ्गाधरः
अवच्छेदकं दुष्यन्तत्वमप्यनिर्वचनीयमेव । अवच्छेदकं च रत्यादि-
विशिष्टबोधे विशेष्यतावच्छेदकत्वम् । एतेन—“दुष्यन्तादिनिष्ठस्य रत्या-
देरनास्वाद्यत्वान्न रसत्वम् । स्वनिष्ठस्य तु तस्य शकुन्तलादिभिरतत्संब-
न्धिभिः कथमभिव्यक्तिः ? स्वस्मिन्दुष्यन्ताद्यभेदबुद्धिस्तु बाधबुद्धिपराहता”
इत्यादिकमपास्तम् । यदपि विभावादीनां साधारण्यं प्राचीनैरुक्तं तदपि
काव्येन शकुन्तलादिशब्दैः शकुन्तलात्वादिप्रकारकबोधजनकैः प्रतिपाद्यमानेषु
शकुन्तलादिषु दोषविशेषकल्पनं विना दुरुपपादम् । अतोऽवश्यकल्प्ये दोष-
विशेषे तेनैव स्वात्मनि दुष्यन्ताद्यभेदबुद्धिरपि सूपपादा ।
सम्प्रति नव्यमतानुसारेण भट्टनायकमतपूर्वपीठिकां निराकरोति—एतेनेत्या-
त्यादिना । अस्यापास्तमित्येनेनान्वयः । एतेनेत्यस्य च सामाजिके दुष्यन्ता-
भेदबुद्ध्याऽनिर्वचनीयरत्याद्युत्पत्तिसम्भवेनेत्यर्थः । अनास्वाद्यत्वादिति । अना-
स्वाद्यत्वं च सामाजिकस्य तादृशरत्यादि प्रति तटस्थ्येनोपपद्यते । बाधबुद्धिपरा-
हतेत्यादि भट्टनायकमतनिरूपणावसरे व्याख्यातम् । साधारण्यमित्यस्य भट्टनायक-
मते भावकत्वव्यापारेण काव्यनिष्ठेनेत्यादिः, अभिनवगुप्तादिमते च भावनाविशेषणे-
त्यादिः । विशेषप्रतिपादकशब्दस्य विशेषधर्मपुरस्कारेणैवार्थप्रतिपादकत्वमित्याह—
शकुन्तलादिशब्दैरित्यादिना । शकुन्तलादिष्विति । अत्र विषयत्वं सप्तम्यर्थः ।
तथा च शकुन्तलादिविषयको यो दोषविशेषो भावनाविशेषात्मकस्तस्य कल्पनं विने-
त्यर्थः । भावकत्वव्यापारोऽपि फलतो भावनाविशेषाऽव्यतिरिक्त एवेति हृदयम् ।
तेनैव =दोषविशेषेणैव ।
अत्र च पक्षे दुष्यन्तादिनिष्ठवास्तवरत्यादेरेव स्थायित्वम् ।
स्वोत्तरभाविना लोकोत्तराह्लादेन भेदाऽग्रहादेकत्वाध्यवसायाद्वा रसस्य सुखत्व-
व्यपदेशः पूर्वं समर्थितः । स च रतिविषये सम्भवति, तस्या इष्टत्वेन तद्बोधोत्तरं
सुखानुभवस्यानुभविकत्वात् । यत्र त्वनिर्वचनीयशोकाद्यप्रियभावोत्पत्तिः सामाजिके
तत्र तदुत्तरं सुखानुभवाऽभावात् कथं शोकाद्यात्मकस्य करुणादेः सुखत्वव्यपदेश उप-
के कारण तभी तक सामाजिक में रहता जब तक उक्त दोषविशेष बना रहता है ।
उसके नष्ट होते ही यह रस भी नष्ट हो जाता है । यद्यपि यह रस स्वरूपतः सुख-
स्वरूप नहीं है तथापि स्वोत्तरभावी लोकोत्तर आह्लाद से इसका भेद-ज्ञान न होने
से इसे सुखरूप भी कहा जाता है । तात्पर्य यह है कि स्वनिष्ठ अनिर्वचनीय रत्यादि
के अनुभव (=साक्षिप्रत्यक्ष ) के बाद काव्यव्यापार (=व्यञ्जना ) के प्रभाव से
उक्त अनुभव से सामाजिक को अलौकिक सुख होता । ( करुण आदि रस के सन्दर्भ
में प्रातिभासिक सामाजिकनिष्ठ शोकादि से अलौकिक सुख होता है या नहीं—यह
विचार बाद में स्वयं ग्रन्थकार करेंगे । ) दोनों—रत्यादि और तत्समकालिक
प्रथमाननम् ९९
नन्वेवमपि रतेरस्तु नाम दुष्यन्त इव सहृदयेऽपि सुखविशेषजनकता,
करुणरसादिषु तु स्थायिनः शोकादेर्दुःखजनकतया प्रसिद्धस्य कथमिव सहृ-
दयाह्लादहेतुत्वम् । प्रत्युत नायक इव सहृदयेऽपि दुःखजननस्यैवौचित्यात् ?
न च सत्यस्य शोकादेर्दुःखजनकत्वं क्लृप्तं न कल्पितस्येति नायकानामेव
पद्यत इत्याशङ्कते—नन्वेवमपरीत्यारभ्य चेदित्यन्तेन ग्रन्थेन । कल्पितस्येत्यस्य
शोकादेरिति शेषः । कल्पितत्वं चात्र प्रातिभासिकत्वरूपं ग्राह्यम् । समाधत्ते—
सत्यमित्यादिना । सहृदयेत्यादि । तदुक्तं विश्वनाथेन—
करुणादावपि रसे जायते यत् परं सुखम् ।
सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम् ॥ इति ।
उसके साक्षिप्रत्यक्षात्मक आस्वाद तथा इससे होने वाले अलौकिक सुख में अव्यवधान
आदि के कारण भेद-बोध नहीं होता और इसी से प्रतिभासमान रत्यादि और
अलौकिक आह्लाद में भी भेद-बोध न होने से रत्यादिस्वरूप रस को सुखरूप कहा
जाता है। यह प्रातिभासिक रत्यादिस्वरूप रस स्वतः न तो व्यङ्ग्य है और न
वर्णनीय (= अनिर्वचनीयभिन्न) हीं फिर भी इससे पूर्व सामाजिक द्वारा अनुभूत
जो दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि हैं वे तो व्यङ्ग्य एवम् वर्णनीय हैं हीं । रसस्वरूप रत्यादि
का दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि से भेद-बोध न होने से अथवा दोनों के बीच सादृश्यमूलक
एकत्वभ्रम से रसस्वरूप रत्यादि को भी व्यङ्ग्य और वर्णनीय कह दिया गया है ।
पहले सामाजिक के स्वत्व को कल्पित दुष्यन्तत्वादि धर्मों से अवच्छादित और दुष्यन्त-
त्वादि धर्मों को स्वत्व का अवच्छादक कहा गया है। इसका अभिप्राय यहाँ है कि
सामाजिक को जो बोध होता—"दुष्यन्तोऽहं शकुन्तलाविषयकरतिमान्" उस बोध
में वही कल्पित दुष्यन्तत्व विशेष्यतावच्छेदक हो जाता है, क्योंकि उक्त बोध में
शकुन्तलाविषयकरत्यादिमत्त्व विशेषण है और दुष्यन्त विशेष्य है जिससे दुष्यन्तत्व
का दुष्यन्तनिष्ठविशेष्यता का अवच्छेदक होना स्पष्ट है ।
इससे भट्टनायक आदि का यह मत निरस्त हो जाता कि दुष्यन्तादिनिष्ठ
रत्यादि से सामाजिक के उदासीन होने से उस रत्यादि का सामाजिक को आस्वाद
हो नहीं सकता; सामाजिक में जो रत्यादि हैं उनका शकुन्तला आदि के साथ किसी
अपेक्षित सम्बन्ध के न होने से उसकी भी सामाजिक में अभिव्यक्ति नहीं हो सकती;
जहाँ तक दुष्यन्तादिनिष्ठ शकुन्तलादिनिषयक रत्यादि का सासाजिक द्वारा
आस्वाद का प्रश्न है वह तो उठता हीं नहीं, क्योंकि सामाजिक और दुष्यन्तादि में
इतना वैधर्म्य है कि दोनों में अभेदभ्रम हीं असम्भव है । जहाँ तक भट्टनायक द्वारा
भावकत्वव्यापार से और अभिनवगुप्त द्वारा भावनाविशेष से साधारणीकरण की बात
१२०
१०० रसगङ्गाधरः
अत एव करुणप्रधानकाव्यनाट्याध्ययनदर्शनादौ भूयो भूयः प्रवृत्तिः सहृदयानां
संगच्छते । काव्यव्यापारस्य = व्यञ्जनायाः, यद्वा दोषत्वेनाभिमताया भावनायाः ।
विश्वनाथमते तु लौकिकशकुन्तलादिपदार्थानलौकिकविभावादिपदवीं नयन्तो विभाव-
नादिव्यापारा एवात्र विवक्षिताः । आह्लादप्रयोजकत्वम् = आनन्दजनकत्वप्रयोज-
कत्वम् । यद्यपि दुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादौ स्वरूपतोऽप्यानन्दजनकत्वमस्त्येव तथापि
प्रातिभासिके रत्यादौ सामाजिकनिष्ठे यदाह्लादजनकत्वं तद्दुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादि-
व्यञ्जनाजन्यभावनाप्रयोज्यमेव, तद्व्यञ्जनामन्तरेण तादृशभावनायास्तां च विना
सामाजके रत्यादेरनुत्पत्तेरिति हृदयम् । दुःखप्रतिबन्धकत्वम् = शोकादावनिर्वचनीये
दुःखजनकत्वप्रतिबन्धकत्वम् । अनुकूलपरिस्थितौ भावितः पूर्वशोकादिरपि सुखमेव
जनयतीति प्रसिद्धम् । तथा चोक्तम्—
है वह भी शकुन्तलादिविषयक दोषविशेष की कल्पना किये बिना असंगत है, क्योकि
काव्य द्वारा शकुन्तला आदि विशेषार्थक शब्दों से तो सामान्यतया शकुन्तलात्वादि-
प्रकारक अर्थों का हीं बोध सम्भव है, कान्तात्वादिसाधारणधर्मप्रकारक बोध
नहीं। यह दोष भावना हीं हो सकती या उसके स्थान में स्वीकृत भावकत्व
व्यापार, क्योंकि इससे अतिरिक्त किसी दोष की कल्पना असम्भव है। अतः जब
साधारणीकरण के उपपादनार्थ प्रचीनों को भी भावनास्वरूप अथवा उसके समानान्तर
भावकत्वव्यापाररूप दोषविशेष मानना हीं है तो उसी से सामाजिक को दुष्यन्तादि
से अभिन्न होने का भ्रम भी हो हीं सकता है। इसलिए अभेदभ्रम न होने की बात
असंगत है ।
अब प्रश्न यह है—रति तो प्रिय वस्तु है, इसलिए जैसे दुष्यन्तादि में वह प्रिय
सुख का उत्पादन करती वैसे ही सामाजिक में भी उत्पन्न प्रातिभासिक रति काव्य-
व्यापार की महिमा से उनमें अलौकिक सुख का उत्पादक हो सकती है। किन्तु
करुण आदि रसों के सन्दर्भ में तो सामाजिक में भी प्रातिभासिक शोकादि हीं उत्पन्न
होंगे। जैसे नायक में शोकादि दुःख को उत्पन्न करते वैसे हीं सामाजिक में भी उन
प्रातिभासिक शोकादि से दुःख हीं उत्पन्न होना चाहिए। ऐसी स्थिति में करुण
आदि रसों को सामाजिक में अलौकिकसुख का जनक कैसे माना जा सकेगा ?
नायकनिष्ठ शोकादि सत्य (व्यावहारिक) होने से दुःखजनक होते, किन्तु
सामाजिकनिष्ठ शोकादि प्रातिभासिक होने से दुःखजनक नहीं होते—यह
कहना भी सम्भव नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर रज्जुसर्पादि से जो द्रष्टा में भय,
कम्पन आदि की उत्पत्ति देखी जाती उसकी व्याख्या न की जा सकेगी। साथ हीं,
कल्पित शोकादि को दुःखजनक न मानने पर सामाजिक में कल्पित रति से सुख भी
न हो सकेगा। ऐसी स्थिति में सामाजिक में अनिर्वचनीय रत्यादि की उत्पत्ति
प्रथमाननम् १०१
दुःखम्, न सहृदयस्येति वाच्यम्। रज्जुसर्पदिर्भयकम्पाद्यनुत्पादकतायत्तैः।
सहृदये रतेरपि कल्पितत्वेन सुखकनकतानुपपत्तेश्चेति चेत् ? सत्यम् ।
शृंगारप्रधानकाव्येभ्य इव करुणप्रधानकाव्येभ्योऽपि यदि केवलाह्लाद एव
सहृदयहृदयप्रमाणकस्तदा कार्यानुरोधेन कारणस्य कल्पनीयत्वाल्लोकोत्तर-
काव्यव्यापारस्यैवाह्लादप्रयोजकत्वमिव दुःखप्रतिबन्धकत्वमपि कल्पनीयम् ।
अथ यद्याह्लाद इव दुःखमपि प्रमाणसिद्धं तदा प्रतिबन्धकत्वं न कल्पनीयम् ।
स्वस्वकारणवशाच्चोभयमपि भविष्यति ।
तयोर्यथाप्रार्थितमिन्द्रियार्थान्
आसेदुषोः सद्मसु चित्रवत्सु ।
प्राप्तानि दुःखान्यपि दण्डकेषु
सञ्चिन्त्यमानानि सुखान्यभूवन् ।। इति ।
एतेन व्यञ्जनाऽजन्यदुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादेर्न रसत्वमित्यपि सूचितं भवतीति
वेदितव्यम्, तस्य स्वोत्तरभाविनाऽलौकिकाह्लादेन भेदाऽग्रहाऽसम्भवात् । यस्तूत्तर-
कालिकस्तद्रत्यादिजन्माऽऽनन्दः स तु लौकिक एवेति विवेचनीयम् । उभयम् = रत्यादे-
राह्लादः शोकादेर्दुःखं च ।
मानकर भी करुण आदि रसों के सन्दर्भ में अलौकिक सुख का समर्थन कैसे सम्भव
है ? इसका समाधान निम्नलिखित है--करुण आदि रसों के सन्दर्भ में दो पक्ष हैं,
एक तो शृंगारादि की तरह वहां भी सुख माना जाय और दूसरे यह कि वहां
विलक्षण दुःख हीं, सुख नहीं, माना जाय । इनमें यदि प्रथम पक्ष सहृदयों के अनुभव
से समर्थित हो तब तो जिस प्रकार अलौकिक काव्यव्यापार ( व्यञ्जना )१ को
सामाजिकमें उत्पन्न प्रातिभासिक रत्यादि से विलक्षण सुखजनकता का प्रयोजक
माना जाता उसी प्रकार उसी काव्यव्यापार को (सामाजिकनिष्ठ शोकादि में भी
विलक्षण सुखजनकता का प्रयोजक मानने के साथ-साथ) उन (शोकादि) में
दुःखजनकता का प्रतिबन्धक भी मानना होगा, क्योंकि जैसा कार्य देखा जाता
तदनुरूप कारण की भी कल्पना करनी होती है । काव्यव्यापार की अलौकिकता का
यह भी एक लक्षण है कि वह व्यापार स्वविषयीभूत नायकनिष्ठ रत्यादि से जिस
सामाजिकनिष्ठ रत्यादि का एकत्वज्ञान होता उसमें सुखजनकता और शोकादि
में सुखजनकता के साथ-साथ दुःखजनकता के अभाव का भी प्रयोजक है । यह
स्थिति किसी अलौकिक पुरुष के व्यवहार से भी समर्थित है । अतः सामाजिक में
१. विश्वनाथ के अनुसार लौकिक पदार्थ को अलौकिक विभावादिरूप देने वाले
विभावन आदि व्यापार हीं प्रकृत व्यापार हैं ।
१०२ रसगङ्गाधरः
अथ तत्र कवीनां कर्तुम्, सहृदयानां च श्रोतुम्, कथं प्रवृत्तिः, अनिष्ट-
साधनत्वेन निवृत्तेरुचितत्वात् इति चेत् ? इष्टस्याधिक्यादनिष्टस्य च
करुणादौ दुःखाङ्गीकारे तत्प्रधानकाव्ये कथं सामाजिकानां कवीनां च प्रवृत्ति-
रित्याशङ्कते—अथेत्यादिना । श्रोतुमित्युपलक्षणम् द्रष्टुमित्यपि बोध्यम् ।
समाधत्ते—इष्टस्येत्यादिना । चरमफलज्ञानकाल एव प्रायेण दुःखम्, पूर्वमङ्गरसा-
द्यनुभवकाले च सुखमेव जायत इति भवतीष्टस्याधिक्यमनिष्ठस्य चाल्पीयस्त्वम् ।
तथा च बलवदनिष्टानुबन्धित्वाभावात् करुणादिप्रधानकाव्याद्यध्ययनादावपि
उत्पन्न शोकादि भी रत्यादि की तरह विलक्षण सुख को हीं उत्पन्न करते, दुःख को
नहीं । इसके विपरीत यदि द्वितीय पक्ष, अर्थात् करुण आदि रस दुःखात्मक हीं
होंते—यह पक्ष प्रामाणिक हो तब तो जैसे सुख के प्रसिद्ध कारण रत्यादि से सामा-
जिक को सुख होता वैसे हीं दुःख के कारण के रूप में प्रसिद्ध शोकादि से सामाजिक
को दुःख का हीं अनुभव होगा ।
इस प्रकार यदि करुण आदि रसों को दुःखस्वरूप मान लिया जाय तब करुणादि-
रसप्रधान काव्यों और नाट्यों की रचना में कवियों की और उस प्रकार के काव्यों
के अध्ययन तथा नाट्यों के दर्शन में सहृदयों की भूयो भूयः प्रवृत्ति की व्याख्या की
समस्या उठ खड़ी होती। कारण यह है कि कवियों की काव्य-नाट्य की रचना में
प्रवृत्ति का अन्यतम प्रयोजन है रसिकों को आनन्दित करना जो दुःखप्रद करुणादि-
प्रधान काव्यों-नाट्यों द्वारा सिद्ध हो नहीं सकेगा । इसी प्रकार, प्रवृत्ति के प्रति
इष्टसाधनताज्ञान के कारण होने से अनिष्टसाधनीभूत करुणादिप्रधान काव्यादि के
अध्ययनादि में यदि अज्ञानवश सहृदयों की एक बार प्रवृत्ति हो भी जाय तो भी दूसरी
बार तो उनकी प्रवृत्ति कथमपि नहीं होनी चाहिए थी, जब कि वस्तुस्थिति यह है कि
उक्तविध काव्यादि के अध्ययन-दर्शन में सहृदयों की बार-बार प्रवृत्ति होती हीं है ।
करुणादिरसप्रधान काव्यादि के दुःखप्रद होने पर यह कैसे सम्भव है ? इसका यही
समाधान है कि यदि किसी विषय में सुख अधिक और दुःख स्वल्प हो तो उसमें
प्रवृत्ति होती हीं है । जैसे चन्दन-घर्षणादि में स्वल्प दुःख होने पर भी उसकी
सुगन्धि और शीतलता आदि से होने वाले सुख की मात्रा की अधिकता होने से
उसमें प्रवृत्ति लोकसिद्ध है उसी प्रकार करुणादिप्रधान काव्यादि के अध्ययन-दर्शन में
अन्तिम फल के दुःखद होने पर भी आदि के कथांशों तथा अङ्गरसाभिव्यक्ति आदि
में भी यथासम्भव सुख होने से सुख का आधिक्य और दुःख का अल्पत्व स्पष्ट होने
के कारण वैसे काव्यादि के अध्ययननादि में सहृदयों की भूयो भूयः प्रवृत्ति होना
सम्भव है । वस्तुतः उक्तविध काव्यादि के अध्ययनादि में सहृदयों की भूयो भूयः