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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

८८ रसगङ्गाधरः
विभावतावच्छेदककोटाववश्यं निवेश्यत्वात् । अन्यथा स्वस्रादेरपि कान्ता-
त्वादिना तत्त्वापत्तेः । एवमशोच्यत्वकापुरुषत्वादिज्ञानविरहस्य तथाविधस्य
ख्यविषयतासम्बन्धावच्छिन्नाऽप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारकज्ञानत्वाव -
च्छिन्नप्रतियोगिताकाभावविशिष्टं कान्तात्वम् । शकुन्तलायाः परनायिकात्वेन तत्रे-
यमगम्येत्याकारकमगम्यात्वप्रकारकं ज्ञानं प्रामाण्यनिश्चयालिङ्गितं सदप्रामाण्यनिश्च-
यानालिङ्गितमेवेति तद्विषयेऽप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारकज्ञानमेव न तु
तद्विरह इति विभावतावच्छेदकविशेषणीभूतस्य तादृशज्ञानविरहस्याऽसत्त्वाद्विशिष्टस्य
विभावतावच्छेदकस्याप्यसत्त्वमिति न शकुन्तलादौ परकीयानायिकायां सामाजिकान्
प्रति विभावत्वमिति । विषयतासम्बन्धस्य वृत्तिनियामकत्वमभिप्रेत्यायं निवेशो
विभावतावच्छेदककोटौ संगततः । तस्य वृत्त्यनियामकत्वे तु अप्रामाण्यज्ञानानास्क-
न्दितागम्यात्वप्रकारकज्ञानविशेष्यत्वाभावविशिष्टं कान्तात्वमेव तथेति बोध्यम् ।
एष चाऽभावस्तादात्म्येन कान्तायां वर्त्तमानः । तादृशविरहस्य विभावतावच्छेदककोटा-
वनिवेशेऽतिप्रसङ्गमाह—अन्यथेति । तत्त्वापत्तेः = विभावत्वापत्तेः ।
रसान्तरेऽपि विभावतावच्छेदकस्वरूपनिर्धारणमनयैव रीत्येत्याह—एवमि-
त्यादि । तथाविधस्य = विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाऽप्रामाण्यनिश्चयाना-
हो सकती ? शकुन्तला के समान हीं अपनी बहन तथा अन्य सपिण्ड-सगोत्र स्त्रियों
में भी उक्त ज्ञानाभावस्वरूप विशेषण के न रहने से विशेषणाभावप्रयुक्त विशि-
ष्टाभाव¹ स्वरूप विभावतावच्छेदकाभाव है ।
इस प्रसंग में यह भी ज्ञातव्य है कि पूर्वोक्त प्रमात्वादिनिश्चय यथार्थ भी हो
सकते हैं, अयथार्थ भी । अतः यदि किसी गम्या स्त्री के विषय में किसी को पहले
'इयमगम्या' यह बोध हो और सोचने पर उसे यह भ्रमात्मक प्रमात्वनिश्चय हो
जाय—'इदं ज्ञानं प्रमैव' तो उसमें रति नहीं हो सकती । इसके विपरीत, यदि
किसी अगम्या स्त्री के विषय में किसी को पहले 'इयमगम्या' ज्ञान हो और पीछे
१. विशेषणयुक्त विशेष्य का अभाव (=विशिष्टाभाव) केवल विशेषण के, केवल
विशेष्य के और दोनों के अभाव के आधार पर भी माना जाता है। प्रथम
को विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव, द्वितीय को विशेष्याभावप्रयुक्त
विशिष्टाभाव और तृतीय को उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव कहते । नील-
घटविशिष्ट भूतल में रक्त घट का अभाव, उसी भूतल में नील पट का अभाव
और उसी भूतल में रक्त पट का अभाव क्रमशः उक्त तीनों विशिष्टाभावों के
उदाहरण हैं ।