रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ रसगङ्गाधरः
भावना चैव तद्भोगीकृतिरेव च” इत्याहुः । मतस्यैतस्य पूर्वस्मान्मताद्भाव-
कत्वव्यापारान्तरस्वीकार एव विशेषः । भोगस्तु व्यक्तिः । भोगकृत्त्वं तु
व्यञ्जनादविशिष्टम् । अन्या तु सैव सरणिः ॥
(३) नव्यास्तु काव्ये नाट्ये च कविना नटेन च प्रकाशितेषु विभावादिषु
पयति—मतस्यैतस्येत्यादिना । व्यक्तिः=भग्नावरणा चित्, तस्या एव साक्षात्का-
रात्मकत्वात्, ‘यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’ इत्यादिश्रुतेः । यद्यपि भट्टनायकमते
चित्तसत्त्ववृत्त्यात्मक एवानन्दः प्रतीयते तथापि ब्रह्मातिरिक्तस्यानन्दत्वात्तत्सम्पर्कं
विना कस्याप्यानन्दरूपत्वं न सम्भवतीत्यौपनिषदमताभिप्रायेणेयमुक्तिः पण्डितराज-
स्येति प्रतीयते । व्यञ्जनात्=व्यञ्जनव्यापारात् । तदुक्तं लोचने—‘भोगीकरण-
व्यापारश्च काव्यस्य रसविषयो ध्वननात्मैव, नान्यत् किञ्चिद्’ इति । अन्या=
आस्वाद्यमानः स्थाय्येव रसः, साधारणीकरणं चेत्याद्या पूर्ववर्णिता । अत्र
भट्टनायकमते भावकत्वाख्यकाव्यव्यापारेण साधारणीकरणम्, पूर्वमते च भावना-
विशेषेणेति विशेषः ॥
रसविषये तृतीयं मतमाह—नव्यास्त्वित्यादिना । प्रकाशितेषु = कविना
शब्देन नटेन चाभिनयाद्युपस्कृतेन शब्देन सहृदयहृदयं प्रापितेषु । विभावादिष्विति ।
व्यापार द्वारा पहले से हीं सहृदय के अन्तःकरण में उपस्थापित परकीयत्वसम्बन्ध-
रहित रत्यादि का सामाजिक को आनन्दमय तत्त्व के रूप में भोग (=साक्षात्कार)
होता । यह रसस्वरूप आनन्द उस ब्रह्मानन्द जैसा होता जिसमें आत्मा के चिदा-
नन्दस्वभाव की प्रकटता की पराकाष्ठा मानी जाती, क्योंकि सत्त्वोद्रेकमयचित्तगत
आनन्द अन्य चित्तगत आनन्दों में उत्तम होता । अन्तर दोनों में यह है कि ब्रह्मानन्द
वृत्तिभिन्न है जबकि रसानन्द रत्यादिविषयक चित्तवृत्ति है । अतः भोगविषयीकृत
रत्यादि या रत्यादिविषयक उक्त भोग (=साक्षात्कार) हीं रस है। इस प्रकार
काव्य के तीन व्यापार हुए, जैसा भट्टनायक ने स्वयं कहा है—‘‘अभिधा, भावना
(=भावकत्व) और रसभोगीकृति, अर्थात् भोजकत्व (ये तीन काव्यव्यापार हैं) ।’’
इसमें पूर्वमत (अभिनवगुप्त के मत) से यही अन्तर है कि इसमें एक ‘भावकत्व’
नामक अतिरिक्त काव्यव्यापार की कल्पना की गई है । भट्टनायक का ‘भोग’ तो
‘व्यक्ति’—भग्नावरणा चित् हीं हैं; केवल शब्दभेद है, अर्थभेद नहीं, क्योंकि साक्षा-
त्कार “यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार भग्नावरणचित्स्व-
रूप हीं है । इनका ‘भोजकत्व’ व्यापार भी व्यञ्जनाव्यापार से भिन्न नहीं है,
क्योंकि दोनों का कृत्य एक हीं है। अन्य प्रक्रिया दोनों की समान हैं ॥
कुछ नवीन आचार्य (जिनके नाम अज्ञात हैं) सामाजिक में उत्पन्न अनिर्वचनीय