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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 414 में से

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पृष्ठ 122

नायके धराधौरेयत्वधीरत्वादेरात्मनि चाधुनिकत्वादेर्वैधर्म्यस्य स्फुटं प्रति-
पत्तेरभेदबोधस्यैव दुर्लभत्वात् ।
किं च केयं प्रतीतिः ? प्रमाणान्तरानुपस्थानाच्छाब्दीति चेत् ? न । व्याव-
हारिकशब्दान्तरजन्यनायकमिथुनवृत्तान्तवित्तीनामिवाश्या अप्यहृद्यत्वापत्तेः ।


सामाजिकान् प्रत्यविभावत्वन्तु इतोऽपि स्फुटतरम् । तथा=तादृशज्ञानोत्पादप्रति-
बन्धकः । वैधर्म्यस्येति । एतदुपलक्षणमलोकसामान्यस्य नायकादिगतधर्मवैध-
र्म्यस्य । तथा च यद्यपि धराधौरेयत्वादेर्नायकधर्मस्य क्वचित्सामाजिकेऽपि सम्भव
इति तत्राभेदप्रतीतिः शक्या स्वीकर्तुम् तथापि रामादेरलौकिकगुणसम्पन्नस्य साधर्म्यं न
लौकिकेषु पुरुषेषु सम्भवतीत्यभेदबुद्धिस्तत्र नायकसामाजिकयोरशक्यसम्पाद्यैवेति नाऽ-
भेदबुद्धिमादाय तादृशज्ञानोत्पादप्रतिबन्ध इत्याशयः ।
एतावता परगतत्वेन स्वगतत्वेन च रसप्रतीतेरशक्यत्वमुपपाद्य प्रतीतेरपि परा-
भिमताया अलौकिककाव्यव्यापारानपेक्षलौकिकप्रमाणवेद्यत्वे अहृद्यत्वापत्तिमुखेन अयु-
क्तत्वं प्रतिपादयन् 'प्रतीयते रसः' इति पक्षं निराकर्तुकाम आह—किञ्चेत्यादि ।
रसप्रतीतिरत्र प्रतीतिशब्देन विवक्षिता । प्रमाणान्तरं शब्दातिरिक्तं प्रत्यक्षादि,
तदभावात् काव्यात्मकशब्दप्रमाणजन्यैव रसप्रतीतिरित्यर्थः प्रतिप्रश्नस्य । व्याव-
हारिकशब्दान्तरेति । एतच्चोपलक्षणं लौकिकप्रमाणमात्रस्य प्रत्यक्षादेरपि ।
अहृद्यत्वापत्तेरिति । एतच्चाऽसहृदयत्वं भट्टनायकस्य ख्यापयति, यतो हि भङ्गि-
भेदेन शब्दप्रतीतेरपि हृद्यत्वस्य सर्वानुभवसिद्धत्वात् । अथवा यादृशं हृद्यत्वमलो-


होने से वे अपने को दुष्यन्त आदि से अभिन्न कैसे समझ सकते ? अतः नायक
से अपने को अभिन्न समझने के कारण भी शकुन्तला आदि को सामाजिक की
रति का विभाव मानना असम्भव है । अतः रस की स्वगत प्रतीति भी नहीं
हो सकती ।
उक्त रीति से प्रतीति के परगत या स्वगत न होने से उस पक्ष का निराकरण
कर अब भट्टनायक उपयुक्त प्रमाण न होने से भी रसप्रतीति-पक्ष का खण्डन कर रहे
हैं, क्योंकि परगत रत्यादि की सामाजिक को बाह्य प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता,
कारण आन्तरिक पदार्थ चाहे स्वगत हो या परगत वह बाह्येन्द्रिययोग्य होता ही
नहीं । यदि चेष्टा आदि से उसकी अनुमिति हो भी तो भी उसमें अलौकिकता
नहीं आ सकती । काव्यात्मक शब्द-प्रमाण से प्रतीति मानने पर भी अलौकिका-
स्वाद की समस्या पूर्ववत् बनी रहेगी, क्योंकि इतिहास-पुराणादि के वाक्यों से होने
वाली नायक-नायिका के प्रेमाख्यान की प्रतीति मे अलौकिक आनन्द किसी को नहीं
मिलता । उक्त रत्यादि की मानस-प्रतीति होती है (सामाजिक को)—यह कहना भी