रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंताटस्थ्येनेति। तटस्थो नाट्ये नटः, श्रव्ये च दुष्यन्तादिः, तन्निष्ठत्वेन परगतत्वेनेत्यर्थः।
अनास्वाद्यत्वमित्यस्य सामाजिकानामिति शेष इति प्राचीना व्याख्या। वस्तुतस्तु
ताटस्थ्यं हेतुरत्रानास्वाद्यत्वस्य। यदि परगतत्वेन रत्यादिः प्रतीयेत तर्हि सामाजिकानां
तदास्वादो न स्यात्, तेषामपकृष्टत्वे 'परसम्पदुत्कर्षो हीनसम्पदं दुःखाकरोति' इति
स्वभावाद्रत्यादिविषये सामाजिकानां मात्सर्यम् शोकादिविषये त्वानन्दोऽनुभूयेतेति
अनुभवविपर्ययः स्यात्। अथ सामाजिकानामुत्कृष्टानामेव सहृदयत्वं तदाऽपि पर-
गतत्वेन रसप्रतीतौ 'दुष्यन्तः शकुन्तलाविषयकरतिमान्' इति सामाजिकप्रतीत्या
रत्यादौ स्वगतत्वबाधात्तत औदासीन्यमापद्येत सामाजिकानामिति नात्र पक्षे रसस्य
सामाजिकास्वादविषयत्वमुपपद्यत इत्येवं योजनीनो ग्रन्थः। अत्र चात्मगतत्वेनेति पर-
कल्पानुरोधेन परगतत्वेनेति पूरणीयम्। ताटस्थ्यस्य परगतरत्यादिविषयकप्रतीत्यना-
श्रयत्वे सामाजिकानां हेतुत्वं भट्टनायकमतानुवादपरकेण लोचनग्रन्थेनाऽपि—'ननूक्तं
भट्टनायकेन—रसो यदा परगततया प्रतीयेत तर्हि ताटस्थ्यमेव स्याद्' इत्यादिना स्पष्टम्।
अत्र च रसशब्दः स्थाय्यर्थकः, आस्वाद्यत्वं रसत्वम्, अनास्वाद्यत्वम् रसत्वाभावः।
परगतत्वे रत्यादेः सामाजिकेभ्यो रसत्वं न स्यात्, तेषां तत्रोदासीन्यादिति भावोऽस्य
ग्रन्थस्य। पूर्वव्याख्यायान्तु ताटस्थ्यपदार्थस्वरसभङ्गोऽपि। अधिकं विज्ञैर्विवेचनीयम्।
विषय में यह मत है—"रस की प्रतीति होती है—यह कहना असंगत है, क्योंकि
इसके दो हीं अर्थ हो सकते हैं—(क) रस की प्रतीति दुष्यन्त आदि नायकों को
होती या (ख) सामाजिक को होती। किन्तु ये दोनों हीं अर्थ असंगत हैं। यदि
रस की प्रतीति सामाजिक को न होकर दुष्यन्त आदि को होती—यह माना जाय
तब तो सामाजिक में उससे उदासीनता (तटस्थता) आ जाएगी, फलतः वह रत्यादि
सामाजिकों का आस्वाद्य न हो सकेगा। ऐसी स्थिति में अनास्वाद्य रत्यादि को
सामाजिक के लिए रस कहना सम्भव न हो सकेगा, क्योंकि जो आस्वाद्य है वही तो
रस है। अतः रसप्रतीति सामाजिक से भिन्न व्यक्ति—दुष्यन्तादि को होती—
(परगत होती)—यह नहीं कहा जा सकता। अब रही बात सामाजिक द्वारा
रसप्रतीति की। किन्तु विचार करने पर इसमें भी संगति नहीं दीखती, क्योंकि
जब दुष्यन्त की पत्नी शकुन्तला सामाजिक के लिए विभाव का स्वरूप हीं प्राप्त नहीं
कर सकती तो फिर सामाजिक में शकुन्तलाविषयक रति कहां से हो सकती?
विना विभाव के तो रति हो नहीं सकतीं, अतः सामाजिक को रसास्वाद असम्भव
है। अब यह प्रश्न है—विभावतावच्छेदक से अवच्छिन्न पदार्थ हीं विभाव होता।
विभावतावच्छेदक है कान्तात्व, वह जब शकुन्तला में भी है हीं तो फिर वह सामा-
जिक के लिए विभाव क्यों न हो सकती? इसका उत्तर यही है कि केवल (सर्व-
कान्ता-साधारण) कान्तात्व विभावतावच्छेदक हो नहीं सकता, क्योंकि तब तो
८ २०