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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 121

प्रथमाननम् ८९
करुणरसादौ । तादृशज्ञानानुत्पादस्तु तत्प्रतिबन्धकान्तरनिर्वचनमन्तरेण
दुरुपपादः । स्वात्मनि दुष्यन्ताद्यभेदबुद्धिरेव तथेति चेत् ? न,
लिङ्गिताऽशोच्यत्वकापुरुषत्वप्रकारकज्ञानविरहविशिष्टपुरुषत्वादेः करुणरसादौ विभाव-
तावच्छेदकत्वं वाच्यमित्यर्थः । शकुन्तलादौ सामाजिकानाम् इयमगम्येत्याकारका-
प्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितज्ञानस्यानुत्पाद एव कथं न भवतीत्याशङ्कायामाह--
तादृशेति । निर्वचनमिति । एतेन योग्यस्य तादृशज्ञानोत्पादप्रतिबन्धकस्याभावः
सूच्यते । यस्य पुनरुन्मादादिना तथाविधज्ञानानुदयो दृष्टस्तस्य रतिरेव नोत्पद्यत
इति न तस्यापि विभावः शकुन्तलादिरिति बोध्यम् । तथा च योग्यप्रतिबन्धकाभावसह-
कृतोत्पादसामग्रीसत्त्वात् परकीयनायिकाविषये तथाविधं ज्ञानं जायत एव सभ्याना-
मिति न शकुन्तलादौ तेषां विभावत्वमिति निष्कर्षः । जगन्मातृत्वेनाभिमते सीतादौ
चलकर उसे यह भ्रमात्मक अप्रमात्वनिश्चय हो जाय—'इदं ज्ञानमप्रमैव' तो उसमें
रति हो ही सकती है।
इस सन्दर्भ में एक विषय पर ध्यान देना आवश्यक है—विषयतासम्बन्ध
वृत्तिनियामक (जिस सम्बन्ध से किसी पदार्थ का किसी अधिकरण में रहना प्रसिद्ध
हो वह सम्बन्ध) है या नहीं—यह विवादग्रस्त है । अतः विशेष्यताख्यविषयता-
सम्बन्ध की वृत्तिनियामता मानने पर तो उक्त वर्णन उचित है । किन्तु इसे वृत्ति-
नियामक न मानने पर विभावतावच्छेदक का स्वरूप होगा—अप्रामाण्यनिश्चयाना-
लिङ्गितागम्यत्वप्रकारकज्ञानविशेष्यत्वाभावविशिष्ट कान्तात्व । इस पक्ष में अभावीय
प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध होगा तादात्म्य । अतः निष्कर्ष यह है कि वही कान्ता
विभाव हो सकती है जो अगम्यत्वप्रकारक ज्ञान का विशेष्य न हो ।
शृङ्गार के समान ही करुण के प्रसङ्ग में अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गिताशोच्यत्व-
प्रकारकज्ञानाभावविशिष्ट पुरुषत्वादि को, वीररस के प्रसङ्ग में अप्रामाण्यनिश्च-
यानालिङ्गितकापुरुषत्वज्ञानाभावविशिष्ट पुरुषत्वादि को विभावतावच्छेदक समझना
चाहिए । प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध का स्वरूप पूर्ववत् है । अतः स्पष्ट है कि
शकुन्तलादि सामाजिक के लिए विभाव नहीं हो सकते; क्योंकि उनके विषय में उक्त
अगम्यत्वप्रकारकज्ञान ही उत्पन्न होता, उसका अभाव नहीं । हाँ, यदि कोई
योग्य प्रतिबन्धक होता तो शकुन्तलादि के विषय में उक्त ज्ञान उत्पन्न न होता और
वे विभाव हो जाते । किन्तु विचार करने पर कोई वैसा प्रतिबन्धक प्रस्तुत किया
नहीं जा सकता । यह तो सम्भव नहीं कि सामाजिक नाट्यादि देखते-पढ़ते समय
यह भूल जाते कि वे दुष्यन्त से भिन्न हैं, क्योंकि दुष्यन्त आदि के कुछ अलौकिक
गुणों—धीरोदात्तता, साम्राज्य-सम्पन्नता आदि आदि—के अपने में अभाव