रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ रसगङ्गाधरः
तेति भवति तादृशज्ञानविरहो विशेष्यताख्यविषयतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकः ।
यद्यपीयमगम्येत्याकारकज्ञानविरहः समवायेन नायकेऽपि वर्तते तथापि विभावभूतायां
कान्तायां विद्यमान एव तादृशज्ञानविरहो विभावतावच्छेदककोटौ निवेश्यः, न
त्वाद्यः, व्यधिकरणत्वात् । अतः 'विशेष्यतासम्बन्धः समवायः' इति नागेशोक्ति-
श्चिन्त्या । इयमगम्येतिज्ञानविषये इदं ज्ञानं प्रमेत्याकारकः प्रमात्व- (प्रामाण्य)-
निश्चयः, इदं ज्ञानं प्रमा न वेत्याकारकः प्रमात्वसंशयोऽप्रमात्वसंशयो वा, इदं ज्ञान-
मप्रमेत्याकारकोऽप्रमात्वनिश्चयश्चेति त्रिविधं ज्ञानं सम्भवति । तत्र प्रथमे इयम-
गम्यैवेति निश्चयः, द्वितीये इयं गम्याऽगम्या वेति संशयः, तृतीये इयं गम्यैवेति
निश्चयः प्रतिफलति । तत्र प्रथमे ज्ञाने कस्याश्चिदपि कान्ताया विषये जाते
न तत्र रत्युदयः । द्वितीयेऽपि अनर्थसंशयान्न रत्युदयः, तृतीये तु भवत्येव
रत्युदयः । यद्यपि इयमगम्या न वेति संशयसत्त्वेऽपि शकुन्तलादौ दुष्यन्तादे
रतिरुदिता तथाऽपि स रत्याभास एवेति न दोषः । यद्वा 'असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा'
किया हो तो, उसी सम्बन्ध से माना जाता है । दूसरे शब्दों में, अन्योन्याभाव
(भिन्नता) से अतिरिक्त अभाव को संसर्गाभाव कहा जाता । इसमें एक पदार्थ
(प्रतियोगी) के अधिकरण विशेष (अनुयोगी) में उस संसर्ग का प्रतिषेध किया जाता
जिस संसर्ग से प्रतियोगी का अनुयोगी में अस्तित्व सम्भावित हो । यही संसर्ग
अभावीयप्रतियोगितावच्छेदक संसर्ग कहलाता । इससे स्पष्ट है कि सामाजिक,
जिसमें 'इयमगम्या' यह ज्ञान उत्पन्न नहीं होता उसमें समवायसम्बन्धावच्छिन्न-
प्रतियोगिताक अगम्यत्वप्रकारकज्ञानाभाव रहेगा । किन्तु यह अभाव विभावनिष्ठ
न होने से विभावतावच्छेदककोटि में विशेषणरूप से प्रविष्ट हो नहीं सकता । अतः
इस अभाव को उस रूप में व्यक्त करना है जिससे यह विभाव में आश्रित हो ।
इसीलिए ग्रन्थकार ने समवायसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक उक्त अभाव का निवेश
न कर विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अगम्यत्वाप्रकारकज्ञानाभाव का
निवेश किया है । इसका तात्पर्य यह है—'इयमगम्या' यह अगम्यत्वप्रकारक ज्ञान
समवाय सम्बन्ध से तो सामाजिक में अवश्य रहता, परन्तु जिस कान्ता के विषय में
यह ज्ञान होता उस कान्ता-स्वरूप विषय में भी यह ज्ञान विषयता सम्बन्ध से रहता
हीं है । विषय तीन प्रकार के होते हैं—विशेषण, विशेष्य और दोनों का संसर्ग ।
इसलिए विशेषण में विशेषणताख्य या प्रकारताख्य विषयता रहती, विशेष्य में
विशेष्यताख्य विषयता और संसर्ग में संसर्गताख्य विषयता। १ अत एव विषयतासम्बन्ध-
१. निर्विकल्पक ज्ञान में विशेषण आदि का भान न होने से उस ज्ञान की
विषयता स्वतन्त्र प्रकार की होती है ।