रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १०१
दुःखम्, न सहृदयस्येति वाच्यम्। रज्जुसर्पदिर्भयकम्पाद्यनुत्पादकतायत्तैः।
सहृदये रतेरपि कल्पितत्वेन सुखकनकतानुपपत्तेश्चेति चेत् ? सत्यम् ।
शृंगारप्रधानकाव्येभ्य इव करुणप्रधानकाव्येभ्योऽपि यदि केवलाह्लाद एव
सहृदयहृदयप्रमाणकस्तदा कार्यानुरोधेन कारणस्य कल्पनीयत्वाल्लोकोत्तर-
काव्यव्यापारस्यैवाह्लादप्रयोजकत्वमिव दुःखप्रतिबन्धकत्वमपि कल्पनीयम् ।
अथ यद्याह्लाद इव दुःखमपि प्रमाणसिद्धं तदा प्रतिबन्धकत्वं न कल्पनीयम् ।
स्वस्वकारणवशाच्चोभयमपि भविष्यति ।
तयोर्यथाप्रार्थितमिन्द्रियार्थान्
आसेदुषोः सद्मसु चित्रवत्सु ।
प्राप्तानि दुःखान्यपि दण्डकेषु
सञ्चिन्त्यमानानि सुखान्यभूवन् ।। इति ।
एतेन व्यञ्जनाऽजन्यदुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादेर्न रसत्वमित्यपि सूचितं भवतीति
वेदितव्यम्, तस्य स्वोत्तरभाविनाऽलौकिकाह्लादेन भेदाऽग्रहाऽसम्भवात् । यस्तूत्तर-
कालिकस्तद्रत्यादिजन्माऽऽनन्दः स तु लौकिक एवेति विवेचनीयम् । उभयम् = रत्यादे-
राह्लादः शोकादेर्दुःखं च ।
मानकर भी करुण आदि रसों के सन्दर्भ में अलौकिक सुख का समर्थन कैसे सम्भव
है ? इसका समाधान निम्नलिखित है--करुण आदि रसों के सन्दर्भ में दो पक्ष हैं,
एक तो शृंगारादि की तरह वहां भी सुख माना जाय और दूसरे यह कि वहां
विलक्षण दुःख हीं, सुख नहीं, माना जाय । इनमें यदि प्रथम पक्ष सहृदयों के अनुभव
से समर्थित हो तब तो जिस प्रकार अलौकिक काव्यव्यापार ( व्यञ्जना )१ को
सामाजिकमें उत्पन्न प्रातिभासिक रत्यादि से विलक्षण सुखजनकता का प्रयोजक
माना जाता उसी प्रकार उसी काव्यव्यापार को (सामाजिकनिष्ठ शोकादि में भी
विलक्षण सुखजनकता का प्रयोजक मानने के साथ-साथ) उन (शोकादि) में
दुःखजनकता का प्रतिबन्धक भी मानना होगा, क्योंकि जैसा कार्य देखा जाता
तदनुरूप कारण की भी कल्पना करनी होती है । काव्यव्यापार की अलौकिकता का
यह भी एक लक्षण है कि वह व्यापार स्वविषयीभूत नायकनिष्ठ रत्यादि से जिस
सामाजिकनिष्ठ रत्यादि का एकत्वज्ञान होता उसमें सुखजनकता और शोकादि
में सुखजनकता के साथ-साथ दुःखजनकता के अभाव का भी प्रयोजक है । यह
स्थिति किसी अलौकिक पुरुष के व्यवहार से भी समर्थित है । अतः सामाजिक में
१. विश्वनाथ के अनुसार लौकिक पदार्थ को अलौकिक विभावादिरूप देने वाले
विभावन आदि व्यापार हीं प्रकृत व्यापार हैं ।