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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 414 में से

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पृष्ठ 131

प्रथमाननम् ९९
नन्वेवमपि रतेरस्तु नाम दुष्यन्त इव सहृदयेऽपि सुखविशेषजनकता,
करुणरसादिषु तु स्थायिनः शोकादेर्दुःखजनकतया प्रसिद्धस्य कथमिव सहृ-
दयाह्लादहेतुत्वम् । प्रत्युत नायक इव सहृदयेऽपि दुःखजननस्यैवौचित्यात् ?
न च सत्यस्य शोकादेर्दुःखजनकत्वं क्लृप्तं न कल्पितस्येति नायकानामेव
पद्यत इत्याशङ्कते—नन्वेवमपरीत्यारभ्य चेदित्यन्तेन ग्रन्थेन । कल्पितस्येत्यस्य
शोकादेरिति शेषः । कल्पितत्वं चात्र प्रातिभासिकत्वरूपं ग्राह्यम् । समाधत्ते—
सत्यमित्यादिना । सहृदयेत्यादि । तदुक्तं विश्वनाथेन—
करुणादावपि रसे जायते यत् परं सुखम् ।
सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम् ॥ इति ।
उसके साक्षिप्रत्यक्षात्मक आस्वाद तथा इससे होने वाले अलौकिक सुख में अव्यवधान
आदि के कारण भेद-बोध नहीं होता और इसी से प्रतिभासमान रत्यादि और
अलौकिक आह्लाद में भी भेद-बोध न होने से रत्यादिस्वरूप रस को सुखरूप कहा
जाता है। यह प्रातिभासिक रत्यादिस्वरूप रस स्वतः न तो व्यङ्ग्य है और न
वर्णनीय (= अनिर्वचनीयभिन्न) हीं फिर भी इससे पूर्व सामाजिक द्वारा अनुभूत
जो दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि हैं वे तो व्यङ्ग्य एवम् वर्णनीय हैं हीं । रसस्वरूप रत्यादि
का दुष्यन्तादिनिष्ठ रत्यादि से भेद-बोध न होने से अथवा दोनों के बीच सादृश्यमूलक
एकत्वभ्रम से रसस्वरूप रत्यादि को भी व्यङ्ग्य और वर्णनीय कह दिया गया है ।
पहले सामाजिक के स्वत्व को कल्पित दुष्यन्तत्वादि धर्मों से अवच्छादित और दुष्यन्त-
त्वादि धर्मों को स्वत्व का अवच्छादक कहा गया है। इसका अभिप्राय यहाँ है कि
सामाजिक को जो बोध होता—"दुष्यन्तोऽहं शकुन्तलाविषयकरतिमान्" उस बोध
में वही कल्पित दुष्यन्तत्व विशेष्यतावच्छेदक हो जाता है, क्योंकि उक्त बोध में
शकुन्तलाविषयकरत्यादिमत्त्व विशेषण है और दुष्यन्त विशेष्य है जिससे दुष्यन्तत्व
का दुष्यन्तनिष्ठविशेष्यता का अवच्छेदक होना स्पष्ट है ।
इससे भट्टनायक आदि का यह मत निरस्त हो जाता कि दुष्यन्तादिनिष्ठ
रत्यादि से सामाजिक के उदासीन होने से उस रत्यादि का सामाजिक को आस्वाद
हो नहीं सकता; सामाजिक में जो रत्यादि हैं उनका शकुन्तला आदि के साथ किसी
अपेक्षित सम्बन्ध के न होने से उसकी भी सामाजिक में अभिव्यक्ति नहीं हो सकती;
जहाँ तक दुष्यन्तादिनिष्ठ शकुन्तलादिनिषयक रत्यादि का सासाजिक द्वारा
आस्वाद का प्रश्न है वह तो उठता हीं नहीं, क्योंकि सामाजिक और दुष्यन्तादि में
इतना वैधर्म्य है कि दोनों में अभेदभ्रम हीं असम्भव है । जहाँ तक भट्टनायक द्वारा
भावकत्वव्यापार से और अभिनवगुप्त द्वारा भावनाविशेष से साधारणीकरण की बात
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