रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ९३
त्कारेण विषयीकृतो भावनोपनीतः साधारणात्मा रत्यादिः स्थायी रसः। तत्र
भुज्यमानो रत्यादिः, रत्यादिभोगो वेत्युभयमेव रसः। सोऽयं भोगो विषय-
संवलनाद्ब्रह्मास्वादसविधवर्तीत्युच्यते। एवं च त्रयोंऽशाः काव्यस्य-“अभिधा
अत्र पक्षे स्थायिनो भोगस्य च विशेषणविशेष्यभावे विनिगमकाभावाद् भुज्यमानः
स्थायी स्थायिविषयकभोगो वा रस इत्याह—तत्रेत्यादिना। पूर्वकल्पे साक्षात्कार-
स्यैव सत्त्वोद्रेकजनितस्य सुखमयत्वेन रसस्यापि सुखमयत्वं बोध्यम्। विषयसम्ब-
लनादित्यनेन विषयासम्बलितब्रह्मास्वादाद्भिन्नत्वं रसास्वादस्य दर्शितम्। सविधत्वं
च रसास्वादस्यानन्दप्रचुरत्वात्तत्प्राधान्याद्वा प्रतीत्यपेक्षात्। भट्टनायकमतं तदुक्त्यै-
वोपसंहरति—एवं चेत्यादिना। त्रयोंशाः = त्रयो व्यापाराः, अभिधा, भावना,
भोगीकृतिः (भोजकत्वं) चेति। तत्राभिधा वाच्यार्थविषयी=वाच्यार्थोपस्थापिका,
भावना = भावकत्वं साधारणीकरणद्वारा सामाजिकैः सह रत्यादेः सम्बन्धस्य प्रति-
पादिका, भोजकत्वं च सहृदयविषयम् = रसास्वादजनकम् इति। एतेन भट्टनायको
व्यञ्जनां नोरिकरोतीत्यपि सुव्यक्तमेव। अभिनवगुप्तभट्टनायकमतयोर्विशेषं निरू-
उपस्थिति होतो है। इस दशा में शकुन्तलादि से दुष्यन्तादि का सम्बन्ध बना
रहता है जिससे सामाजिक को रस-साक्षात्कार होने में बाधा पड़ती। इसलिए
काव्य में अभिधा से भिन्न एक ‘भावकत्व’ नामक व्यापार मानना चाहिए। इस
व्यापार के प्रभाव से ‘साधारणीकरण’ होता, अर्थात् रस-भोग में बाधकीभूत शकु-
न्तलादिविषयक परकीयत्व, अगम्यत्व, शकुन्तलात्व आदि धर्मों का प्रतिबन्ध और
कान्तात्व आदि रस-भोगानुकूल धर्मों का उद्भावन होता। इसी से शकुन्तलादि
के वय, अतीत काल आदि रस-प्रतिबन्धक तत्त्वों का भी विलोप हो जाता है।
अत एव दुष्यन्तादिनिष्ठ शकुन्तलादिविषयक रति भी केवल कान्ताविषयक रति रूप
में प्रस्फुटित होने लगती। इससे सामाजिक को उस रति के विषय में जो
परकीयत्व-बोध हो रहा था वह भी विलुप्त हो जाता। ‘भावकत्व’ व्यापार का
कृत्य यहीं समाप्त हो जाता है। किन्तु इतने से हीं, बिना भोग-साधन के, रस का
भोग हो नहीं सकता। भोग-साधन तो वह चित्त हो सकता हैं जिस में सत्त्वगुण
का अत्यन्त प्रकर्ष हो। यह कार्य चित्त के रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव को
सर्वथा समाप्त किए बिना असम्भव है। अतः ‘भोगकृत्त्व’ (=भोजकत्व) व्यापार
के प्रभाव से रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव सर्वथा क्षीण हो जाता जिसके फल-
स्वरूप सत्त्वगुण का चित्त में ‘उद्रेक’ हो जाता। इससे चित्त प्रकाशानन्दमय हो
जाता। इसके सम्पर्कं से रत्यादि में भी आनन्दमयतां प्रकट हो जाती है। इसी
‘चित्तसत्त्व’ (=सत्त्वातिशयविशिष्ट चित्त) से साधारणीकरणसाधनीभूत भावकत्व