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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

१०२ रसगङ्गाधरः
अथ तत्र कवीनां कर्तुम्, सहृदयानां च श्रोतुम्, कथं प्रवृत्तिः, अनिष्ट-
साधनत्वेन निवृत्तेरुचितत्वात् इति चेत् ? इष्टस्याधिक्यादनिष्टस्य च
करुणादौ दुःखाङ्गीकारे तत्प्रधानकाव्ये कथं सामाजिकानां कवीनां च प्रवृत्ति-
रित्याशङ्कते—अथेत्यादिना । श्रोतुमित्युपलक्षणम् द्रष्टुमित्यपि बोध्यम् ।
समाधत्ते—इष्टस्येत्यादिना । चरमफलज्ञानकाल एव प्रायेण दुःखम्, पूर्वमङ्गरसा-
द्यनुभवकाले च सुखमेव जायत इति भवतीष्टस्याधिक्यमनिष्ठस्य चाल्पीयस्त्वम् ।
तथा च बलवदनिष्टानुबन्धित्वाभावात् करुणादिप्रधानकाव्याद्यध्ययनादावपि
उत्पन्न शोकादि भी रत्यादि की तरह विलक्षण सुख को हीं उत्पन्न करते, दुःख को
नहीं । इसके विपरीत यदि द्वितीय पक्ष, अर्थात् करुण आदि रस दुःखात्मक हीं
होंते—यह पक्ष प्रामाणिक हो तब तो जैसे सुख के प्रसिद्ध कारण रत्यादि से सामा-
जिक को सुख होता वैसे हीं दुःख के कारण के रूप में प्रसिद्ध शोकादि से सामाजिक
को दुःख का हीं अनुभव होगा ।
इस प्रकार यदि करुण आदि रसों को दुःखस्वरूप मान लिया जाय तब करुणादि-
रसप्रधान काव्यों और नाट्यों की रचना में कवियों की और उस प्रकार के काव्यों
के अध्ययन तथा नाट्यों के दर्शन में सहृदयों की भूयो भूयः प्रवृत्ति की व्याख्या की
समस्या उठ खड़ी होती। कारण यह है कि कवियों की काव्य-नाट्य की रचना में
प्रवृत्ति का अन्यतम प्रयोजन है रसिकों को आनन्दित करना जो दुःखप्रद करुणादि-
प्रधान काव्यों-नाट्यों द्वारा सिद्ध हो नहीं सकेगा । इसी प्रकार, प्रवृत्ति के प्रति
इष्टसाधनताज्ञान के कारण होने से अनिष्टसाधनीभूत करुणादिप्रधान काव्यादि के
अध्ययनादि में यदि अज्ञानवश सहृदयों की एक बार प्रवृत्ति हो भी जाय तो भी दूसरी
बार तो उनकी प्रवृत्ति कथमपि नहीं होनी चाहिए थी, जब कि वस्तुस्थिति यह है कि
उक्तविध काव्यादि के अध्ययन-दर्शन में सहृदयों की बार-बार प्रवृत्ति होती हीं है ।
करुणादिरसप्रधान काव्यादि के दुःखप्रद होने पर यह कैसे सम्भव है ? इसका यही
समाधान है कि यदि किसी विषय में सुख अधिक और दुःख स्वल्प हो तो उसमें
प्रवृत्ति होती हीं है । जैसे चन्दन-घर्षणादि में स्वल्प दुःख होने पर भी उसकी
सुगन्धि और शीतलता आदि से होने वाले सुख की मात्रा की अधिकता होने से
उसमें प्रवृत्ति लोकसिद्ध है उसी प्रकार करुणादिप्रधान काव्यादि के अध्ययन-दर्शन में
अन्तिम फल के दुःखद होने पर भी आदि के कथांशों तथा अङ्गरसाभिव्यक्ति आदि
में भी यथासम्भव सुख होने से सुख का आधिक्य और दुःख का अल्पत्व स्पष्ट होने
के कारण वैसे काव्यादि के अध्ययननादि में सहृदयों की भूयो भूयः प्रवृत्ति होना
सम्भव है । वस्तुतः उक्तविध काव्यादि के अध्ययनादि में सहृदयों की भूयो भूयः