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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 414 में से

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पृष्ठ 128

९६ रसगङ्गाधरः
अयं च कार्यो दोषविशेषस्य। नाश्यश्च तन्नाशस्य। स्वोत्तरभाविना
इति भवति दुष्यन्तत्वं विशेष्यतावच्छेदकमत्र। इदमेव दुष्यन्तत्वस्य स्वात्मावच्छा-
दकत्वमत्राभिमतमिति वक्ष्यत्यनुपदमेव ग्रन्थकृत्।
अयम् = रत्यादिः। दोषविशेषस्य = सहृदयतोल्लासितभावनाविशेषस्य।
तन्नाशस्य = उक्तदोषविशेषनाशस्य। एतेन पूर्वोक्तमतसिद्धं नित्यत्वं निराकृतं
रसस्येति बोध्यम्। अनिर्वचनीयरत्यादे रसपदाभिलप्यस्य कथं सुखपदव्यपदेश
इत्यत्र हेतुमाह—स्वोत्तरभाविनेत्यादिना। अयमाशयः—रत्यादिसाक्षिप्रत्यक्षस्य
स्वरूपत आनन्दरूपत्वाऽभावेऽपि आस्वादात्मकस्यास्य प्रत्यक्षस्यालौकिककाव्यव्यापार-
भावनाजन्यरत्यादिविषयकत्याऽलौकिकाह्लादजनकत्वम्, आह्लादाच्चाऽव्यवहिताद् भेदे-
त्मक प्रतीति उन्हें (सामाजिक को) होती। इन विभाव आदि की सहायता से
व्यञ्जित दुष्यन्तादिनिष्ठ शकुन्तलादिविषयक रत्यादि का उन्हें बोध होता। उसके
पश्चात् विभावादिसम्बलित रत्यादि की जब वे अपनी सहृदयता से सम्बलित भावना,
अर्थात् पुनः पुनः अनुसन्धान करते तो इसी भावनास्वरूप दोष के प्रभाव से उनका
स्वत्व (दुष्यन्तादिभिन्नत्व) अज्ञानावृत हो जाता और उनमें कल्पित (अनिर्वचनीय)
दुष्यन्तत्वादि धर्म की उत्पत्ति हो जाती जिससे उनका व्यक्तित्व अवच्छादित हो
जाता। शब्दान्तर में, वे अपने को 'शकुन्तलादिविषयकरत्यादि के आश्रय
दुष्यन्तादि' समझने लग जाते—"शकुन्तलाविषयकरतिमान् दुष्यन्तोऽहम्"¹
इत्यादि बोध उन्हें होने लगता। ऐसी स्थिति में उनमें शकुन्तलादिविषयक रति की
उत्पत्ति भी हो हीं जाती है, अन्यथा उक्त बोध हो नहीं पाता। यह रति वास्तविक
(व्यावहारिक) तो हो नहीं सकती, क्योंकि वह है तो दुष्यन्त में हीं हो सकती है,
सामाजिक में नहीं। अतः यह प्रातिभासिक पदार्थ जिसकी स्थिति प्रतिभासकाल-
पर्यन्त होती, उससे पूर्व या पश्चात् नहीं। यह रति प्रतिभास जबतक होता तभी
तक होती, उससे पहले या पश्चात् नहीं। इस अनिर्वचनीय रति की उत्पत्ति
सामाजिक में उसी प्रकार होती जिस प्रकार अद्वैत-मत में अज्ञानावृत शुक्तिका में
काचादिदोष के प्रभाव से रजतत्व एवं तत्सहचरित बहुमूल्यत्व आदि धर्मों की प्रति-
भासकालमात्र में उत्पत्ति होती। प्रातिभासिक पदार्थ को अद्वैतमत में साक्षिभास्य
माना जाता। अतः सामाजिक में उत्पन्न रत्यादि को भी साक्षिभास्य मानना
चाहिए। यतः रसास्वादन सामाजिक को हीं होता अतः सामाजिक में रत्यादि-
स्वरूप रस का अस्तित्व अनिवार्य है। इसीलिए उनमें इस प्रातिभासिक रत्यादि
१. स्पष्टता के लिए केवल रति को लेकर उदाहरण दिया गया है। यही प्रक्रिया
रसान्तर के प्रसङ्ग में भी समझनी चाहिए।