रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ रसगङ्गाधरः
विरोधिज्ञानप्रतिबन्धद्वारा कान्तात्वादिरसानुकूलधर्मपुरस्कारेणावस्थाप्यन्ते।
एवं साधारणीकृतेषु दुष्यन्तशकुन्तलादेशकालवयोऽवस्थादिषु, पङ्कौ पूर्व-
व्यापारमहिमनि, तृतीयस्य भोगकृत्वव्यापारस्य महिम्ना निगीर्णयो रजस्त-
मसोरुद्रिक्तसत्त्वजनितेन निजचित्स्वभावनिर्वृतिविश्रान्तिलक्षणेन साक्षा-
नन्तरं भावकत्वाख्यकाव्यव्यापारकृत्यं दर्शयति—भावकत्वेति। तथा च भाव-
कत्वव्यापारस्य साधारणीकरणं फलम्। तदाह—एवमिति। पूर्वव्यापारः =
भावकत्वव्यापारः। निगीर्णयोरित्यादिना भोजकत्वापरपर्यायभोगकृत्वाख्यतृतीय-
काव्यव्यापारस्य रजस्तमोवृत्तिनिरोधः फलम्। ततश्च सत्त्वोद्रेकाज्जायमानेन
मानसेन विलक्षणेन साक्षात्कारेण भोगापरपर्यायेण भुज्यते विषयीक्रियते रस इत्यय-
माशयो भट्टनायकस्य बोध्यः। निजचिदित्यादि। निजस्य = सामाजिकस्यात्मनः,
चित्स्वभावनिर्वृत्तिः = आवरणनाशादात्मस्वभावभूतचितः स्फुरणम्, चिदि-
त्युपलक्षणमानन्दरूपस्यापि, तस्या विश्रान्तिः = चिदानन्दात्मभिन्नवस्तुगोचरत्वम्,
तदेव लक्षणं सादृश्येन ज्ञापकं यस्य तेन साक्षात्कारेण परब्रह्मसाक्षात्कारसदृशेन
साक्षात्कारेणेति तात्पर्यम्। सत्त्वोद्रेकाच्च रससाक्षात्कारः सुखात्मकोऽत्र मते,
सत्त्वस्य सुखरूपेण परिणामात्। एतावत्तैव चास्य मतस्य सांख्यीयत्वप्रवादोऽपि।
साधारणात्मेत्यनेनेदं सूचितं यत्परगत एव रत्यादिः सामाजिकैर्भुज्यते, परन्तु भाव-
कत्वव्यापारेण साधारणीकरणात्मना परगतत्वं न गोचरीक्रियते इत्ययं विशेषः।
प्रवृत्त नहीं होंगे, जब कि वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। यदि यह रसोत्पत्ति नायकादि
में ही मान्य हो तो सामाजिक का इससे क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? रसाभिव्यक्ति-
पक्ष भी त्याज्य है, क्योंकि अभिव्यक्ति पूर्वसिद्ध पदार्थ की होती। अतः पूर्वसिद्ध
रत्यादि की हीं अभिव्यक्ति माननी होगी। यदि ये रत्यादि नायकनिष्ठ हैं तो
सामाजिक पुनः उनसे उदासीन हो जायेंगे। सामाजिक में उन रत्यादि की स्थिति
तो है नहीं। ऐसी स्थिति में किसकी सामाजिक में अभिव्यक्ति होगी ? साथ हीं,
अभिव्यञ्जक की स्थिति में तो तारतम्य के आधार पर रसाभिव्यक्ति में भी तारतम्य
मानना होगा। १ किन्तु रसस्वरूपभूत अखण्ड आनन्द की अभिव्यक्ति में तारतम्य
मानना असंगत है। अतः अभिव्यक्ति-पक्ष भी अनुचित है।
अतः रस की भुक्ति (भोग—साक्षात्कार) उचित है। इसकी व्याख्या इस
प्रकार करनी चाहिए—सर्वप्रथम तो अभिधावृत्ति द्वारा काव्यादि से वाच्यार्थ की
१. वस्तुतः यह कथन संगत नहीं है, क्योंकि अभिव्यञ्जकतारतम्यप्रयुक्त अभि-
व्यङ्ग्य की अखण्डता में अन्तर नहीं पड़ता। भट्टनायक के 'विषयार्जनतार-
तम्यप्रवृत्तिः' कथन का कोई दूसरा अभिप्राय हो, अथवा पाठ शुद्ध न हो !