रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ८५
प्रकार का संशयात्मक बोध होता हो उससे अन्य कान्ता हीं विभाव हो सकती है ।
उक्त विभावतावच्छेदक का विश्लेषण इस प्रकार करना चाहिए—अगम्यात्व है
प्रकार (=विशेषण) जिस ज्ञान में उसे 'अगम्यात्वप्रकारक ज्ञान' कहा जाता ।
इसका स्वरूप है—'इयम् अगम्या' । किसी भी विषय के ज्ञान के विषय में तीन
कोटियाँ सम्भावित हैं—प्रमात्वनिश्चय—'इदं ज्ञानं प्रमैव', प्रमात्वसंशय—'इदं
ज्ञानं प्रमा न वा ?' (इसी को अप्रमात्वसंशय भी कह सकते, क्योंकि एक कोटि
तो प्रमात्वसंशय में अप्रमात्व हीं है) और अप्रमात्वनिश्चय—'इदं ज्ञानम् अप्रमैव' ।
अतः 'इयमगम्या' इस ज्ञान के विषय में भी उक्त तीन कोटियाँ हो सकती हैं—
(क) “इयमगम्या'—इति ज्ञानं प्रमैव', “इयमगम्या'—इति ज्ञानं प्रमा न वा ?'
और 'इयमगम्या'—इति ज्ञानमप्रमैव ।' इनमें प्रथम को प्रामाण्यनिश्चयालिङ्गिता-
गम्यात्वप्रकारक ज्ञान, द्वितीय को प्रामाण्यसंशयालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान अथवा
अप्रामाण्यसंशयालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान और तृतीय को अप्रामाण्यनिश्च-
यालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान कहा जाता । यह भी ज्ञातव्य है कि निश्चय यथार्थ
भी हो सकता है और अयथार्थ भी । अब यह स्पष्ट है कि उक्त तीनों ज्ञानों में
प्रथम और द्वितीय ज्ञान को 'अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारक ज्ञान'
कहा जा सकता है । उक्त त्रिविध अगम्यात्वप्रकारकज्ञानविषयक प्रमात्वनिश्चय आदि
में से प्रथम या द्वितीय प्रकार के होने पर रति सम्भव या उचित नहीं है । अतः उक्त
दोनों हीं प्रकारों के ज्ञान का अभाव जिस कान्ता के विषय में होगा वहीं उक्त विभा-
तावच्छेदक धर्म रहेगा और वही कान्ता सामाजिक की रति का विभाव हो सकती
है, अन्य, अर्थात् जिसके बारे में प्रथम या द्वितीय प्रकार का अगम्यात्वप्रकारक ज्ञान
हो वह, विभाव नहीं हो सकती । इस प्रकार प्रथम और द्वितीय इन दोनों के
अभाव को स्वतन्त्ररूप में व्यक्त करने पर दो अभाव कहने पड़ते । इन दोनों का
समावेश करने के लिए 'अप्रामाण्यनिश्चयानालिङ्गितागम्यात्वप्रकारकज्ञानाभाव' कहा
गया है ।
अब यह विचारणीय है कि इस अभाव को विभावतावच्छेदक में विशेषणरूप
में कैसे रखा जाय, क्योंकि विभावतावच्छेदक ( चाहे उसका विशेषणांश हो या
विशेष्यांश) को विभावता के अधिकरण—विभाव में रहना हीं चाहिए। 'इयमगम्या'
यह ज्ञान समवाय सम्बन्ध से सामाजिक में आश्रित है, अतः यदि सामाजिक में यह
ज्ञान उत्पन्न नहीं होता तो इस ज्ञान के अभाव की ( इसी ज्ञान में रहने वाली )
प्रतियोगिता का अवच्छेदक सम्बन्ध समवाय होगा, क्योंकि जिस अधिकरण में
प्रतियोगी (=जिसका अभाव विवक्षित हो वह पदार्थ) जिस सम्बन्ध से रह सकता
उस अधिकरण में उसके अभाव को भी, यदि किसी विशेष सम्बन्ध का निर्देश न