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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

१०० रसगङ्गाधरः
अत एव करुणप्रधानकाव्यनाट्याध्ययनदर्शनादौ भूयो भूयः प्रवृत्तिः सहृदयानां
संगच्छते । काव्यव्यापारस्य = व्यञ्जनायाः, यद्वा दोषत्वेनाभिमताया भावनायाः ।
विश्वनाथमते तु लौकिकशकुन्तलादिपदार्थानलौकिकविभावादिपदवीं नयन्तो विभाव-
नादिव्यापारा एवात्र विवक्षिताः । आह्लादप्रयोजकत्वम् = आनन्दजनकत्वप्रयोज-
कत्वम् । यद्यपि दुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादौ स्वरूपतोऽप्यानन्दजनकत्वमस्त्येव तथापि
प्रातिभासिके रत्यादौ सामाजिकनिष्ठे यदाह्लादजनकत्वं तद्दुष्यन्तादिनिष्ठरत्यादि-
व्यञ्जनाजन्यभावनाप्रयोज्यमेव, तद्व्यञ्जनामन्तरेण तादृशभावनायास्तां च विना
सामाजके रत्यादेरनुत्पत्तेरिति हृदयम् । दुःखप्रतिबन्धकत्वम् = शोकादावनिर्वचनीये
दुःखजनकत्वप्रतिबन्धकत्वम् । अनुकूलपरिस्थितौ भावितः पूर्वशोकादिरपि सुखमेव
जनयतीति प्रसिद्धम् । तथा चोक्तम्—
है वह भी शकुन्तलादिविषयक दोषविशेष की कल्पना किये बिना असंगत है, क्योकि
काव्य द्वारा शकुन्तला आदि विशेषार्थक शब्दों से तो सामान्यतया शकुन्तलात्वादि-
प्रकारक अर्थों का हीं बोध सम्भव है, कान्तात्वादिसाधारणधर्मप्रकारक बोध
नहीं। यह दोष भावना हीं हो सकती या उसके स्थान में स्वीकृत भावकत्व
व्यापार, क्योंकि इससे अतिरिक्त किसी दोष की कल्पना असम्भव है। अतः जब
साधारणीकरण के उपपादनार्थ प्रचीनों को भी भावनास्वरूप अथवा उसके समानान्तर
भावकत्वव्यापाररूप दोषविशेष मानना हीं है तो उसी से सामाजिक को दुष्यन्तादि
से अभिन्न होने का भ्रम भी हो हीं सकता है। इसलिए अभेदभ्रम न होने की बात
असंगत है ।
अब प्रश्न यह है—रति तो प्रिय वस्तु है, इसलिए जैसे दुष्यन्तादि में वह प्रिय
सुख का उत्पादन करती वैसे ही सामाजिक में भी उत्पन्न प्रातिभासिक रति काव्य-
व्यापार की महिमा से उनमें अलौकिक सुख का उत्पादक हो सकती है। किन्तु
करुण आदि रसों के सन्दर्भ में तो सामाजिक में भी प्रातिभासिक शोकादि हीं उत्पन्न
होंगे। जैसे नायक में शोकादि दुःख को उत्पन्न करते वैसे हीं सामाजिक में भी उन
प्रातिभासिक शोकादि से दुःख हीं उत्पन्न होना चाहिए। ऐसी स्थिति में करुण
आदि रसों को सामाजिक में अलौकिकसुख का जनक कैसे माना जा सकेगा ?
नायकनिष्ठ शोकादि सत्य (व्यावहारिक) होने से दुःखजनक होते, किन्तु
सामाजिकनिष्ठ शोकादि प्रातिभासिक होने से दुःखजनक नहीं होते—यह
कहना भी सम्भव नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर रज्जुसर्पादि से जो द्रष्टा में भय,
कम्पन आदि की उत्पत्ति देखी जाती उसकी व्याख्या न की जा सकेगी। साथ हीं,
कल्पित शोकादि को दुःखजनक न मानने पर सामाजिक में कल्पित रति से सुख भी
न हो सकेगा। ऐसी स्थिति में सामाजिक में अनिर्वचनीय रत्यादि की उत्पत्ति