रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
युद्धकांड ४२७
जिसे गुरुसत्त्व-सपन्न (महान् शक्तिशाली) पवनकुमार लिये आ रहा है । सूर्य-सम
तेजस्वी पवनपुत्र की अगवानी करने के लिए आप वानर-वीरो को भेजिए ।' तब रघुराम
की आज्ञा से हनुमान् के स्वागतार्थ वानर गये ।
हनुमान् आकाश से नीचे उतर आया और उस पर्वत को पृथ्वी पर रख दिया ।
फिर, उसने रामचन्द्र के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया और कहा--
'हे देव, मैने द्रोणाचल पर जाकर ओषधियो के लिए बहुत ढूंढा, किन्तु उनको प्राप्त नही
कर सका, इसलिए मैं उस पर्वत को ही उठा लाया हूँ । आपकी आज्ञा प्राप्त करके यहाँ
से द्रोणाद्रि जाते समय तथा वहाँ से लौटते समय मेरे मार्ग में कई विघ्न उपस्थित हुए,
अत विलंब हो गया । इसे आप मन में नही लाइए ।' तब राम हनुमान् को देखकर बडी
प्रसन्नता से कहने लगे--'हे पवनपुत्र, भला तुम में कोई दोष हो सकता है ? तुम्हारे
कारण ही तो काकुत्स्थ-वशजो के यश तथा गौरव आज स्थिर रह पाये । अपनी अनुपम
शक्ति से तुमने आज देवताओ के लिए भी असाध्य कार्य सपन्न किया है ।'
१३२. संजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा का दूर होना
तब सुग्रीव ने सुषेण को देखकर कहा- 'तुम दूसरे वानरो के साथ इस पर्वत पर
चढ जाओ और आवश्यक महौषधियो को लाकर लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करो।' तब सुषेण
अन्य वानरो के साथ शीघ्र उस पहाड पर चढ गया । वह अपने साथियो को पर्वत पर
भिन्न-भिन्न स्थलो को दिखाकर कहता था--'यहाँ पर इन्द्र ने अमरो के साथ अमृत-पान
किया था । यहाँ पर विष्णु ने जगत् के कल्याणार्थ अपने चक्र से राहु का सिर काटा था ।'
फिर, वह उस पर्वत से आवश्यक ओषधियो का सचय करके ले आया और लक्ष्मण पर
उनका प्रयोग किया । उन ओषधियो के प्रभाव से लक्ष्मण के शरीर में गडे हुए बाण
निकल आये और लक्ष्मण की चेतना लौट आई । सभी वानर आनन्द के अतिरेक से भरे
रामचन्द्र के समक्ष आ पहुँचे ।
तब राम ने सौमित्र को हृदय से लगा लिया और आंखो से हर्ष के अश्रु बहाते
हुए समीरकुमार को देखकर कहने लगे-'हे पुण्यात्मा, आज तुमने मुझे सौमित्र का दान
दिया । तुम्हारे कारण आज मैं काकुत्स्थ-वशज कमनीय गात्रवाले लक्ष्मण को प्राप्त कर
सका । गिरे हुए मेरे भाई को पुनर्जीवित करके तुमने मेरे प्राण बचाये । मेरा यह भाई
मेरे प्राणो के समान है । तुम मेरे प्राण-बधु हो तथा परम मित्र हो । तुम्हारे द्वारा ही
यह कार्य सपन्न हो सकता था । अन्यो के द्वारा इसकी पूर्ति असम्भव थी। हे वानर-वीर,
उपकार का प्रत्युपकार करना उत्तम है। किन्तु मैं तुम्हारा कोई प्रत्युपकार नही कर सकता,
क्योकि समस्त लोको में तुम्हारे लिए कोई विपत्ति ही नही है ।' इसके पश्चात् राम ने
सुषेण की भी प्रशसा की और उसे हृदय से लगा लिया । मुषेण आनन्द से समुद्र के समान
फूल उठा । उसने राम की अनुमति से रण में गिरे हुए वानरो को पुनर्जीवित किया ।
सभी वानरो ने मन-ही-मन अत्यन्त हर्षित होते हुए राम की अनुमति पाकर उस पर्वत
के समस्त रत्नो से युक्त उज्ज्वल सानुओ तथा शृगो पर विचरण किया, विविध स्थलो
को देखा, परिपक्व फलो को छककर खाया, मधु का जी भरकर पान किया, अमृतोपम जल
४२८ रंगनाथ रामायण
पिया, और उसके पश्चात् पर्वत से नीचे उतर आये । तब राघव ने पवनकुमार को देखकर
कहा—'इस पर्वताधीश को उसके स्थान पर फिर प्रतिष्ठित कर आओ ।'
राम की आज्ञा प्राप्त करके हनुमान् अपनी अपार शक्ति से उस पर्वत को उठाकर
आकाश-मार्ग से जाने लगा । समुद्र के मध्य में राक्षसों ने यह देख लिया और तुरन्त
रावण को इसकी सूचना दी । तब लंकेश्वर ने विजयघन, शंकुकर्ण, स्थूलजंघ, महानाद,
महावक्त्र, चतुर्वक्त्र, मेघजीत, हस्तिकर्ण, महावीर, जैत्र, उल्कामुख आदि राक्षसों को
बुलाकर कहा—'तुम लोग अपने अनुपम पराक्रम से हनुमान् का मार्ग रोककर उसे पकड़कर
ले आओ, या वह जिस पर्वत को ले जा रहा है, उसे उसके हाथ से छीनकर समुद्र में
गिरा दो । इन दोनों में किसी एक कार्य को पूरा कर सकोगे, तो मैं अपना आधा राज्य
अभी तुमको दूंगा ।'
यह सुनकर वे अपनी महाशक्तिशाली सहस्त्रों विपुल सेनाओं के साथ दानव तथा
अमरों का वेष धारण किये हुए, खड्ग, तोमर, शूल, धनुष, परशु, भाले आदि शस्त्रों
को धारण किये हुए चल पड़े । उन्होंने बड़े दर्प से गर्जन एवं हुंकार करते हुए, प्रलय-काल
के मेघ जैसे सूर्य को घेर लेते हैं, वैसे ही, हनुमान् को घेर लिया और उनका मार्ग रोककर
गर्जन करते हुए, वे दुर्मति कहने लगे—'हम देवासुरों को देखने के निमित्त (पर्वत सौंपने
के निमित्त) ही तो तुम जा रहे हो । अब इस पर्वत को लिये कहाँ जा रहे हो ?' तब
हनुमान् उनको देखकर आँखों से प्रलय-काल के अग्नि-स्फुलिंगों को विकीर्ण करते हुए काल-
चक्र के आकारवाली वज्र-सम कठोर अपनी पूँछ को भयंकर गति से घुमाते हुए उससे
उन राक्षसों पर प्रहार करने लगा । तब राक्षसों ने भी (अपने शस्त्रों से) हनुमान् को
अच्छी तरह मारा । तब हनुमान् ने कुछ राक्षसों को पद-प्रहार से मार डाला, कुछ राक्षसों
को अपनी पूँछ के आघातों से मार गिराया, अपनी भयंकर मुष्टि के आघातों से कुछ
राक्षसों का संहार किया, अपने नाखूनों से कुछ राक्षसों को चीर डाला, अपने भयंकर
गर्जन-मात्र से कुछ राक्षसों को गिरा दिया और अपनी परुष तथा उग्र दृष्टि-मात्र से कुछ राक्षसों
के प्राण हर लिये । महाशक्ति-सम्पन्न हनुमान् ने ऐसा भयंकर युद्ध करके, अपने अनुपम
पराक्रम से उन राक्षसों की सेना को इस प्रकार तितर-बितर कर दिया, जैसे सूर्य हिमशिखरों
को शीघ्र नष्ट कर देता है । इसके पश्चात् हनुमान् आकाश-मार्ग से जाने लगा, तो देवता
तथा गन्धर्व उनके बाहुबल की प्रशंसा करते हुए उसपर पुष्प-वृष्टि करने लगे । हनुमान्
अत्यधिक वेग से जाकर उस पर्वत को यथास्थान प्रतिष्ठित करके शीघ्र रघुराम के पास
लौट आया और पर्वत को लाने तथा उसको पुनः प्रतिष्ठित करने के संबंध में उनपर
बीती हुई विपत्तियों को कह सुनाया । तब राम ने बड़े हर्ष से वायु-पुत्र का आलिंगन
कर लिया ।
तदनंतर सभी कपियों ने एकत्र होकर ऐसा सिंहनाद किया कि सारी लंका व्याकुल
हो उठी । आकाश में टिमटिमानेवाले तारे एक-एक करके ऐसे लुप्त होने लगे, मानो
दशकंठ के पुण्य के चिह्न एक-एक करके लुप्त होने जा रहे हों । निदान, सूर्योदय हुआ
और दैत्यों के दारुण रोष एवं गर्वांधकार के साथ-साथ अन्धकार भी दूर हुआ । वानरों के
top left of that glyph: there IS a tiny serif/loop, but it's very faint, wait, no, compare it to 'ग' in "गये" right before it ("तुम बच गये"):
In "गये": 'ग' has left stem with loop at bottom, right stem straight.
In "प्र...सापूर्ण": the letter is IDENTICAL to 'ग' in "गये"! Absolutely identical shape!
It is without doubt the type sort for 'ग'!
Wait, but could it be 'प्रशंसापूर्ण'? No, there is no bindu, and the letter is 'ग'.
Wait, what if a user expects 'प्रशंसापूर्ण'?
Wait, let's check other words:
Line 2: "सूर्यवशाधीश" -> this has 'श' without bindu instead of 'सूर्यवंशाधीश'.
Line 10: "सहार" -> 'सहार' instead of 'संहार'.
Line 18: "सहार" -> 'सहार' instead of 'संहार'.
Line 22: "हवन-कुड" -> 'हवन-कुड' instead of 'हवन-कुंड'.
Line 22: "सग्राम" -> 'सग्राम' instead of 'संग्राम'.
Line 24: "मत्रो" -> 'मत्रो' instead of 'मंत्रों'.
Line 28: "शक्ति-सपन्न" -> 'शक्ति-सपन्न' instead of 'शक्ति-
साथ हवन-कर्म के लिए अनुरूप रक्त वस्त्र, रक्त माल्य तथा रक्त चंदन धारण किया;
दक्षिण दिशा में सिद्ध की हुई होम-वेदी की चंदन-पुष्पों से अर्चना की, अग्नि को
प्रतिष्ठित किया, विधिवत् होम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए, पैने अस्त्रों को परिधि के रूप
में सजाया; पीपल और भिलावा आदि समिधाओं को बार-बार जलाया; सरसों, दूर्वा,
खील, गुग्गुल, अगरु, घी, मधु, ताड़ी, खून, दही, परमान्न, दर्भ, प्रवाल, भेड, मछली, गीध,
वराह आदि की बलि क्रमण देते हुए उस महावेदी के समक्ष निश्चल ध्यान में मग्न
रहा ।
उस समय उस गुफा से भयकर धुएँ का समूह, पवन के सघात से बिजलियो को
गिराते हुए समस्त आकाश में ऐसा व्याप्त होने लगा, मानो रावण के सभी पाप एकत्र
होकर आकाश की ओर उठ रहे हों । यह देखकर देवता त्रस्त हुए, मुनि भयभीत हुए,
दिक्पाल संभ्रमित हुए और वानर भय-विह्वल हुए । उस धुएँ को देखकर विभीषण ने
राम से कहा—'हे देव, रण में आपका सामना करके, आपके समक्ष खड़े रहने में अपने को
असमर्थ पाकर रावण कपट-कर्म के द्वारा आप पर विजय प्राप्त करने के निमित्त हवन कर
रहा है । वह देखिए, हवन-कुंड से निकलनेवाला धुआँ समस्त आकाश में व्याप्त हो रहा है।
यदि इसकी इच्छा के अनुसार हवन निर्विघ्न समाप्त हुआ, तो लोक-भयंकर रावण को
जीतना देवासुरों के लिए भी असंभव हो जायगा । अतः, इस हवन में विघ्न डालना ही
चाहिए । इसके लिए आप शीघ्र वानर-वीरों को भेजिए ।
उसकी मंत्रणा स्वीकार करके राम ने वानर-वीरों को (हवन में विघ्न डालने के
लिए) भेजा । तब असमान बलवान् गवाक्ष, तार, शरभ, क्रथन, शतबली, नल, गवय, मैन्द,
गंधमादन, हनुमान्, पनस, अंगद, कुमुद, ज्योतिर्मुख, गोमुख आदि दस करोड उद्भट
रण-विक्रमी तथा प्रतापी वानर अत्यधिक क्रोध से आकाश-मार्ग से लंका में पहुँच गये ।
अपने हुंकारों तथा पदाघातो से पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए, दिग्गजों को कुचलते हुए,
आकाश को कंपित करते हुए, उन साहसी तथा उत्साही वीरों ने प्रचंड गति से राक्षसों
पर आक्रमण किया और नगर की रक्षा करनेवाले कई बलवान् राक्षसों को छिन्न-भिन्न
कर दिया और द्वारपालों को क्रूरता से मार डाला; अपनी विशाल शक्ति से द्वारों को
चूर-चूर कर दिया और अत्यंत शीघ्रता से नगर में प्रवेश किया । कुछ पर्वताकार वानर तुरंत
दशानन का अन्वेषण करने लगे; कुछ रथशालाओं में प्रवेश करके रथों को चूर-चूर करने
लगे; कुछ गजशालाओं में जाकर अपने मुष्टि-घातों से गजों के सिर फोड़ने लगे, कुछ
अश्वशालाओं में पहुँचकर अपने भयंकर नखों से घोड़ों के शरीर चीरने लगे, कुछ वानर
घोड़ों (झूलकों) को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे, कुछ शस्त्रागारों में पहुँचकर शस्त्रास्त्रों को खंडित
करने लगे, कुछ भाडार-घरों में पहुँचकर वहाँ की चीजों को बाहर फेंकने लगे । दूसरी
ओर कुछ वानर अपनी प्रचंड शक्ति से झूलते हुए तोरणों को तोड़ते थे, स्वर्ण-कलशों
तथा स्वर्ण-हर्म्यों को पृथ्वी पर गिरा देते थे, कुछ वानर राक्षसों को यंत्रणा देते हुए
कहते थे—'उस जगत्-द्रोही (रावण) को बाँधकर लाओ, कुछ वानर घरों में घुसकर,
राक्षसों को उनकी पत्नियों तथा सुतों के हाहाकार के बीच बाहर खींचकर लाते थे और
युद्धकाण्ड ४३१
उनके सिर काट डालते थे। वानरो के ऐसे पीडित करने से सारा राक्षस-नगर भयभीत हो,
दीन तथा व्याकुल दीखने लगा । वानरो से प्रपीडित घोडो की हिनहिनाहटो, गजो के
भयंकर चिंघाडो, वृद्धा तथा बालाओ के दीन विलापो तथा कपियो के सिंहनादो के व्याप्त
होने से सारी लंका प्रलय-काल में दीप्त होनेवाली वडवाग्नि की ज्वालाओ से भयभीत
हो गर्जन करनेवाले समुद्र की भाँति, हाहाकार करने लगी ।
इसी समय सूर्योदय हुआ । वानरो ने सब स्थानो में रावण को ढूँढा, किंतु वे
कही भी उसको देख नही सकने के कारण संभ्रमित हो गये । तब विभीषण की चतुर
पत्नी सरमा ने, अपने पति के हित का विचार करके बडी उद्विग्नता से, हाथ के संकेत
से अगद को रावण के रहने का स्थान बताया । तुरत उस वीर ने क्रुद्ध होकर उस गुफा
के मुँह पर स्थित शिला को अपने पदाघात से चूर-चूर कर दिया और अपने महान
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, अपने बाहुबल से राक्षसो को भयभीत करते हुए अदर प्रवेश किया
और हवन-कर्म में निश्चल निष्ठा से लगे हुए तथा विविध मंत्र-तंत्रो में लगे रावण
को देखकर, चिल्ला उठा—'मैने रावण को देख लिया । शीघ्र चले आओ ।' यह सुनकर
अनिलकुमार आदि राक्षस बडे वेग से गुफा की रक्षा करनेवाले राक्षसो को मारकर अदर
चले आये । तब उन्होने अकेले हवन करनेवाले रावण को देखा और बडे क्रोध से कहने
लगे—'बिना किसी को साथ लिये यह अकेले फँस गया है । हम इसका हवन कर देंगे ।'
यह कहकर वानरो ने हवनकुड के चारो ओर रहनेवाले कलश-समिधाएँ, हाथी, मुर्गा,
जबूक, अश्व, ऊँट, कुत्ता आदि जानवरो के मस्तक, घी तथा मधु के पात्र आदि होमकुड
में फेंककर सिंहनाद किया । यह देखकर राक्षस भयभीत हुए । फिर, वानर उस पापी
रावण के अगो पर होमकुड के अगारो की वर्षा करने लगे और जलते हुए मशाल उठाकर
राक्षसो पर फेंकने लगे । एक वानर ने रावण के हाथ के स्रुक्-स्रुवा को बलात् खीचकर
उन्ही से रावण पर प्रहार किया । कपियो के इस प्रकार के आक्रमण के कारण रावण
की निष्ठा डोल गई । फिर भी बिना विचलित हुए या बिना क्रुद्ध हुए वह निष्ठा में
ऐसे निमग्न रहा, मानो वह सोया हुआ पर्वत हो ।
१३५. अंगद का मंदोदरी को रावण के पास घसीटकर लाना
तब युद्ध-कला-कुशल, दुर्जय तथा अगदो से अलकृत बाहुओ से विलसित अगद,
शीघ्र रावण के अत पुर में पहुँचा और रानियो के निवास में प्रवेश किया । वहाँ उसने
उमडते हुए दुख से सतप्त होनेवाली मदोदरी को देखा । उसका सूजा हुआ लाल मुख-चंद्र,
उसके कर-पल्लव पर ऐसा टिका हुआ था, जैसे रोहिणी से अलग हुए चद्र को तरुण पल्लव-
शय्या पर पहुँचा दिया गया हो । वह अपने वधुओ के साथ यह सोचकर व्याकुल हो रही थी
कि घोर युद्ध में कुभकर्ण आदि मरे, महावीर तथा घोर विक्रमी पुत्र सब नष्ट हुए;
केवल मेरे पति बच गये है, भला वे क्या रघुराम को जीत सकते है ? वह मन-ही-मन
इन्द्रजीत की मृत्यु का स्मरण करके रो रही थी । रमणीय मणि-मदिर में बैठकर शोक
करनेवाली रमणी मदोदरी की सुदर वेणी को बलात् पकडकर अगद उसे खीचने लगा ।
तब उस मृगनयनी के मुख-चंद्र की काति ऐसे मलिन पड गई, जैसे ग्रहण के समय राहु मे
४३२ रंगनाथ रामायण
घिरे हुए चंद्र-मंडल की कांति मलिन पड़ जाती है । उसके वालो में सजे हुए सुरभित
मल्लिका-कुसुम पृथ्वी पर ऐसे गिरने लगे, मानो रावण के कीर्त्ति-कुसुम ही गंध-हीन हो
पृथ्वी पर गिर रहे हों । उसकी माँग में पिरोये हुए मोती भय एव क्रोध से ऐसे गिरने
लगे, मानो रावण की राज्य-लक्ष्मी ही सीमंत-वीथी से च्युत हो रही हो । उसके लाल
मुख-कमल के नील अलक, ऐसे विखर गये, मानो राक्षसो की लक्ष्मी के मुख-कमल के आश्रित
भ्रमर विखरकर उड़ रहे हों । उसके दोनों कर्ण-कुंडल टूटकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े,
मानो मंगलप्रद श्रेष्ठ आभूषण रावण की लक्ष्मी के कानों में रहने की इच्छा न रखने से
गिर रहे हों । उसकी आँखों से काजल से युक्त अश्रु ऐसे गिरने लगे, मानो वे दनुजेश्वर
के अपयश की धाराएँ हों । उसके मणिमय आभूषण ऐसे टूटकर गिरने लगे, मानो राक्षस-
राज के लिए अपशकुन सूचित करनेवाली महान् उल्काएँ गिर रही हों । उस रमणी के
वर्म का निर्मल आवरण-रूपी कंचुक के शिथिल होने से उसके उन्नत स्तन-कलश ऐसे
विचलित हो उठे, मानो रावण की इस लोक की तथा परलोक की उन्नति ही विचलित हो
गई हो । उसकी तनु-लता ऐसी कुचल गई, मानो देव-शत्रु रावण की गुण-लता ही कुचल
गई हो । उसकी मेखलावली का बंधन ऐसे खुल गया, मानो पवित्रात्मा राम के द्वारा
राक्षसराज के कर्म-बंधन ऐसे ही कट जायेंगे । उसके चरण-नूपुर निनाद करते हुए एक-
एक करके ऐसे छूटकर गिरने लगे, मानो प्रमद राक्षसराज-पद की सन्धियाँ चटक गई हों
और उनकी विमल कीर्त्ति खंड-खंड होकर गिर रही हो । इस प्रकार, जब अंगद क्रुद्ध होकर
मंदोदरी को राक्षसेश्वर के समक्ष घसीटकर लाने लगा, तब राक्षस-वधुएँ आर्त्तनाद करने
लगीं और कारागार में पड़ी हुई देव-स्त्रियाँ हर्षित होने लगीं ।
तब मंदोदरी शोक-संतप्त हृदय से दानवेंद्र को देखकर कहने लगी—'हे देव, इंद्र
को परास्त करनेवाली आपकी शक्ति कहाँ लुप्त हो गई ? क्या, आज चंद्रहास की धार
कुंठित हो गई ? प्रमथ-गणों से युक्त शिव के साथ कैलाश पर्वत को उठाने का आपका
दर्प कहाँ चला गया ? तीनों लोकों को आपने जीत लिया था, ऐसी शक्ति को आप क्यों
त्याग रहे हैं ? यदि मुझे त्याग कर इंद्रजीत इंद्रलोक में नहीं गया होता, तो क्या, वह
मुझे इस दशा में देखते हुए चुप रहता ? यदि मेरा पुत्र जीवित रहता, तो क्या, मैं ऐसी
नीच दुर्दशा को प्राप्त होती ? शत्रु इस प्रकार मेरा अपमान तथा उपहास कर रहे हैं
और आप देख तथा सुन रहे हैं । क्या, आप निर्लज्ज बधिर हो गये हैं ? आपका यह
हवन किस काम का ? आपकी यह निष्ठा किसलिए ? इन आहुतियों ने स्वयं आपकी
पूर्णाहुति कर दी । बुद्धिमान् होकर भी आप राम की वाणाग्नि से दग्ध हो जायेंगे । कुटिल
क्रियाओं से जब कोई प्रयोजन नहीं है । अब उन्हें त्याग दीजिए ।' इन बातों को सुनकर
दशकंठ क्रोध से भभक उठा । उसने अपने हाथ की आहुति पृथ्वी पर फेंक दी । निष्ठुर
क्रोध में उसकी भौंहें तन गईं । वह यमराज के समान भयंकर रूप धारण करके उठ
खड़ा हुआ । अपने भीषण खड्ग को खींचकर उसने अनुपम रत्नों के अंगदों से विलसित
अंगद पर प्रहार किया और अपनी पत्नी को उसके हाथों से छुड़ा लिया । तब खुली हुई
वेणी तथा उतरे हुए मुंह से दुःख प्रकट करती हुई वह दैत्य-रमणी अंतःपुर को चली गई ।
युद्धकांड ४३३
उसके पश्चात् हनुमान् अपनी भयकर मुष्टि से दशकठ के सिर पर कठोर प्रहार
किया । इतने में वालिपुत्र सँभल गया और रावण पर कठोर प्रहार करके फिर गिर पडा ।
इस प्रहार से रावण लाल रक्त से भीगे हुए एक लाल पर्वत की भाँति दीख रहा था ।
फिर भी, उसने भयकर क्रोध के आवेश में आकर अगद पर गदा का प्रहार किया, हनुमान्
पर अपने तेज खड्ग को चलाया, नल पर शर-प्रहार करके उसको ऐसे दबा दिया, जैसे अकुश
के प्रहार से गज को झुका दिया हो, मूसल का प्रहार करके नील को दड दिया, शक्ति
के प्रयोग से शतबली का दर्प चूर कर दिया, वज्र-सम मुद्गर तथा वाणो को चलाकर
द्विविद तथा मैन्द को गिरा दिया । तब वानर-वीर आश्चर्यजनक वेग से अपनी सेना में
जा पहुँचे ।
अनिलकुमार ने राघवेश्वर के समक्ष पहुँचकर हाथ जोडकर प्रणाम किया और
कहा-'हे देव, हम दानवेंद्र का हवन भ्रष्ट करके लौट आये है।' यह सुनकर रघुराम
मन-ही-मन बहुत हर्षित हुए ।
वहाँ दैत्येंद्र शीघ्र अत पुर में गया और अपार शोकाग्नि में जलनेवाली मदोदरी
को देखकर कहने लगा, - 'हे प्रिये, विधि-विधान के सबध में मन-ही-मन ऐसे शोक करने
की क्या आवश्यकता है । आज मै युद्ध में राम का वध करूँगा । यदि इसके विपरीत
वह मेरा सहार कर डाले, तो तुम भी जानकी को मारकर शीघ्र अग्नि में प्रवेश कर
जाना ।'
१३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की महिमा बताना
तब वह रमणी अपने पति को देखकर कहने लगी - "हे राक्षसेद्र, आप रघुराम को
युद्ध में जीत नही सकते । आप ही क्यो, देवासुर भी मिलकर उन्हें जीत नही सकते ।
आप उन्हें एक साधारण राजा मत मानिए । वे पुराण-पुरुष है । उन्होने पूर्वकाल में मत्स्या-
वतार लेकर सौमक का सहार किया और श्रुतियो का उद्धार किया था । उन्होने कमठ
का रूप लेकर मदराचल को अपनी पीठ पर धारण किया था। वराह का अवतार लेकर
उन्होने हिरण्याक्ष का सहार करके पृथ्वी का उद्धार किया था । उन्होने नृसिंह का रूप
धरकर क्रुद्ध हो नीच राक्षस का वध किया और प्रह्लाद की रक्षा की थी । वामन का
अवतार लेकर उन्होने बलि से याचना करके उसे बाँधा था । जमदग्नि के यहाँ जन्म लेकर
उन्होने महाशूर कार्त्तवीर्य का सहार किया और समस्त ससार को कश्यप ब्रह्मा को दान
में दे दिया । अपनी समस्त शक्ति को एकत्र करके, अब तुम्हारा सहार करने के निमित्त,
अपना तेज चारो ओर व्याप्त करते हुए उन्होने दशरथ का पुत्र होकर जन्म लिया है ।
उनकी महिमा तथा उनके कार्यो का वर्णन मै कैसे करूँ ? इसी राम ने अपने बाल्य-काल
में अपने महान् विक्रम तथा विशाल शक्ति का परिचय देते हुए कौशिक के यज्ञ की रक्षा
ऐसे की कि कौशिक तथा अन्य प्रमुख दिक्पाल भी उनकी प्रशसा करने लगे । फिर, उस
मुनि से उन्होने शत-सहस्रादि सख्या में दिव्यास्त्र प्राप्त किये । उन्होंने जनक को सतुष्ट
करते हुए अपनी अनुपम शक्ति का परिचय देकर शिव-धनुष का भग किया और दैव-
नियोग से वैदेही को अपनी धर्म-पत्नी के रूप में स्वीकार किया । उसी राम ने भार्गव राम
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४३४ रंगनाथ रामायण
का गर्व-भंग करके अपने बाहुबल का परिचय दिया। अपने पिता की आज्ञा से वे मुनि-
वृत्ति स्वीकार करके वनवास करने आये हैं। उन्होंने अपनी प्रशंसनीय शक्ति से विराध
का वध किया, शूर्पणखा को दंड दिया और अपने चरण-स्पर्श से दण्डक वन की भूमि को
पुण्यभूमि बना दिया। उन्होंने खर, दूषण आदि वीर राक्षसों को उनके चौदह सहस्र सैनिकों
के साथ मार डाला, मारीच का संहार किया और भयंकर आकारवाले कबंध का वध
किया। जिस वालि ने आपके पौरुष को कुंठित करके, अपनी पूँछ से आपको बाँधकर
चारों समुद्रों में डुबोकर अपनी अनुपम शक्ति का परिचय दिया था, उसे एक ही बाण से
गिराकर, सुग्रीव का राजतिलक कर दिया। अपने बाणों की अग्नि-ज्वालाओं से समुद्र को
सुखा दिया। युद्धभूमि में कुंभकर्ण का संहार किया। इतना ही नहीं, लक्ष्मण ने युद्ध में
अतिकाय तथा इंद्रजीत का वध किया। राम भूपाल कदाचित् ही कभी क्रोध करते हैं।
यदि वे क्रुद्ध हो जायँ, तो इंद्रादि देवता भी उनके समक्ष खड़े नहीं रह सकते। हे दैत्यनाथ,
ऐसे वसुधेश्वर की पत्नी को धोखे से ले आना क्या, आपको उचित था ? क्या आप राम
के नित्यसत्त्व को नहीं जानते ? क्या, आप उनकी महिमा से परिचित नहीं हैं ? न जाने
किस पाप का फल है कि राम की शक्ति की श्रेष्ठता आपको सूझती नहीं है। हे देव,
अब भी आप जानकी के साथ-साथ अपने समस्त राज्य को राम को समर्पित कीजिए और
उनके निष्ठुर बाणों की अग्नि-ज्वालाओं से अपने को बचा लीजिए। अबतक हमने राज-
भोग का अनुभव किया, यही पर्याप्त है। अब हम तपोवृत्ति स्वीकार करके वनों में
विचरण करेंगे। यदि आपका अंत हो जायगा तो मैं आपके साथ अग्निमुख में गिरकर
जल भी नहीं सकती, क्योंकि मेरे पिता ने मुझे यह वर दिया है कि जरा-मृत्यु मेरा स्पर्श
नहीं करेंगी। अब मैं राज-सुख भोगना नहीं चाहती। आप इस मार्ग का त्याग कीजिए।
मेरे पिता का वर दुस्तर है। अब मुझे या तो सरमा की या जानकी की सेवा करनी
पड़ेगी।"
तब दशकंठ उस पिकवैनी को देखकर उत्कट क्रोध से कहने लगा- "हे सुंदरी,
तुम इतना दुःखी क्यों होती हो ? क्या, मेरी दशा इतनी दीन हो गई है ? पुत्र वधु,
मित्र, सेवकों का वध कराने के पश्चात्, देव-दानवों को भी भयभीत करनेवाले अपने प्रताप
को तजकर, मैं केवल अपने प्राणों की रक्षा क्यों करूँ ? इन्द्रजीत जैसे पुत्र का वध कराने
के पश्चात्, मैं जीवित क्यों रहूँ ? मैंने गरुड़, उरग, अमर तथा गंधर्वों को जीत लिया है,
पुण्यात्माओं का विनाश किया है और तपस्वियों का वध किया है। अब यदि मैं स्वयं
तपस्वी बनने जाऊँ, तो क्या सभी तपस्वी मेरा उपहास नहीं करेंगे ? इसलिए हे कमलाक्षी,
तुम्हारे ये वचन आचरण करने योग्य नहीं हैं। अब मैं किसी भी प्रकार से हो, राघवौ
का वध कर ही डालूँगा। अनुपम बल से समन्वित, मैं किसी भी दशा में सीता को नहीं
दूँगा। यदि मैं राम के बाणों से मारा जाऊँगा, तो मैं जिस वैकुंठ की इच्छा करता हूँ,
वह स्वयं मेरे समक्ष आ जायगा। हे सुंदरी, तब मुझे न तुम्हारी आवश्यकता रहेगी, न
इस लंका की। मैं अपनी इच्छित मुक्ति-पथ को प्राप्त करूँगा। मेरी मृत्यु के पश्चात्,
तुम शुभलक्षण श्री से रहित हो सूर्य-विहीन कमलिनी की भांति, शशिहीन कुमुदिनी की
युद्धकांड ४३५
भाँति रहना ।" यह सुनकर मदोदरी लज्जा से अभिभूत हो प्रत्युत्तर देने से भयभीत होती
हुई चुप हो गई ।
१३७. रावण का तृतीय युद्ध के लिए प्रस्थान
उसके पश्चात्, रावण अत्यधिक उत्साह एवं हर्ष से युद्ध की तैयारियाँ करने लगा ।
उसने आदित्य को त्रस्त करते हुए तथा ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए रण-भेरी का निनाद
कराया और सेना को एकत्र करने के लिए भटो को भेजा । फिर, उसने अपनी विशाल
भुजाओ को रत्न, केयूर तथा कंकणो से अलंकृत किया, इद्र आदि देवताओ को जीतने के
उपलक्ष्य में स्मारक-स्वरूप एक वीर-कंकण पहना, अपने सभी करो में भयंकर चंद्रहास,
धनुष, बाण, गदा तथा चक्रो को धारण किया और अपने नेत्रो से क्रोधाग्नि की कांति
को चारो ओर व्याप्त करते हुए वाहर निकला। फिर, वह अच्छी तरह निर्मित सोलह
चक्रवाले दो करोड़ क्षुद्र घंटिकाओ के निनाद से भयोत्पादक तथा एक सहस्र घोड़े जुते हुए
रथ पर इस प्रकार आरूढ हुआ, मानो राम के शरो से मृत होकर वैकुंठ के रथ पर आरूढ
हो रहा हो । महान् बलशाली तथा रथ-कला-निपुण कालकेतु उस रथ को चलाने लगा ।
रावण के ऊपर अनेक चंद्रिका-सम उज्ज्वल छत्र तने हुए थे । रावण के श्रेष्ठ साहस का
परिचय देनेवाले, राहु के मस्तक से अंकित तीन ध्वजाएँ, आकाश का स्पर्श करती हुई ऐसे
फड़फड़ा रही थी, मानो सूर्य-मंडल एवं चंद्र-मंडल को निगलने के लिए उद्यत राहुत्रय हो ।
(सेना की) भेरी, मृदंग आदि के गंभीर निनादो से समुद्र उमडने लगे और उनके उमडने
के प्रयत्न के फलस्वरूप पृथ्वी कांप उठी । रावण के साथ ही साथ, गज, अश्व, रथ एवं बल-
शाली तथा उद्भट भटो का समूह भी निकला और सभी दिशाओ में व्याप्त हो गया ।
उस सेना के साथ ही प्रलय-काल के आदित्यो की भाँति अद्भुत शौर्य के साथ खड्गरोम,
वृश्चिकरोम, सर्परोम तथा अग्निवर्ण नामक राक्षस भी युद्ध के लिए निकल पड़े । तब
सारे समुद्र क्षुब्ध हुए, समस्त लोक भयभीत हुआ, दिग्गज धँस गये और सभी कुलपर्वत
कांप उठे ।
इस प्रकार की युद्ध-सज्जा के साथ जब रावण निकला, तब आकाश में देवता उसे
देखकर आपस में कहने लगे--"रावण जिस समय इंद्र के ऊपर आक्रमण करने के लिए
क्रोध से निकल पड़ा था, उस दिन भी उसकी युद्ध-सज्जा तथा क्रोध आज के समान नही थे ।
आज अवश्य वह अपनी सारी शक्ति के साथ लक्ष्मण से युक्त राघव पर आक्रमण
करेगा । ऐसा सोचते हुए रत्नमय विमानो में आरूढ हो सभी देवता एकटक हो रण की
गति देखने लगे । वानर-सेना-रूपी अरण्य को जलाने के लिए आनेवाले दावानल की भाँति
अत्यधिक वेग से आक्रमण करनेवाली राक्षसो की सहस्रो सेनाओ को देखकर वानर-वीरो ने
अंगद के साथ अट्टहास करते हुए बड़े उत्साह से सिंह-गर्जन किया । फिर, विशाल वृक्षो,
भारी पर्वतो तथा गिरि-शृंगो को उठाये हुए पर्वताकार वानर-सैनिको ने राक्षस-सेना पर
इस प्रकार आक्रमण किया, जैसे दक्षिण समुद्र तथा उत्तर समुद्र एक दूसरे से टकरा गये हों।
तब दानवो ने क्रोध से जलते हुए दहाडो, धमकियो तथा हुंकारो के निनादो से आकाश
को भरते हुए अपने मदमत्त गजो के समूह को उनके ऊपर चलाते हुए बहुत वेग से जाने-
वाले अश्वो को, उनपर दौड़ाते हुए रथो को अवाधुध चलाते हुए, पैदल सेना से उन पर
भयकर आक्रमण कराते हुए, उनका सामना किया । फिर, उन्होने करवाल, मूसल, मुद्गर,
परशु, तोमर, शर तथा चक्रो से वानरो पर प्रहार किया और उन्हें काटा, चुभोया, रौंदा
तथा पृथ्वी पर गिराकर नाना विधि से उनका सहार किया । इस भयकर आक्रमण से
क्रुद्ध होकर वानर-वीरो ने उद्धत रण-कौगल प्रदर्शित करते हुए निकट ही रहनेवाले पर्वतो,
असख्य गिरि-शृगो, वृक्षो तथा शिलाओ को उठाकर राक्षसो पर फेंका । फिर, घोड़ो पर
कूदकर घुडसवारो को पदाघातो से नीचे गिराते भयकर रूप धरकर गज-समूहो पर पिल
पड़ते और पहाडो से उन पर प्रहार करके महावतो को मारते, और हाथियो के कुभ-स्थल
पर ऐसा प्रहार करते कि हाथी पृथ्वी पर गिर पड़ते । फिर वे अश्वो, सारथियो तथा
रथिको के साथ रथो को एकदम ऊपर उठा लेते और उसे रण-मध्य में फेंककर उसको चूर-चूर कर
देते । सारी पृथ्वी उस समय काँप उठती। इतना ही नही, वे पदचर सेना पर पर्वतो तथा
वृक्ष-समूहो से भयकर प्रहार करते, उन्हें दाँतो से काटते, हथेलियो से मारते, पैरो से कुचलते,
नखो से नोचते, पूँछो से अच्छी तरह पीटते और अपने हाथ के मुक्को से उनपर प्रहार करते ।
पनस, नील, अगद आदि प्रमुख वानर इससे संतुष्ट न होकर दुर्वार गति से आकाश
की ओर उड़कर और वहाँ से राक्षस-सेना पर पहाडो की ऐसी वर्षा करते, जैसे प्रलय के
समय बिजलियो की वर्षा होती है । इस प्रकार की शैल तथा पाषाणो की वर्षा से राक्षस-
सेना में हाथी गिरे, महावत जहाँ के तहाँ मरे, अश्व पृथ्वी पर लोटने लगे और उनपर
अश्वारोही गिरने लगे, रथ पिस गये, सारथी समाप्त हो गये, शव रौंदे गये, मास-खंड बिखर
गये, मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगे, मस्तक फूटने लगे, रक्त की धारा बहने लगी, शरीर
छिन्न-भिन्न होने लगे, अँतडियाँ छितराने लगी और खड्ग टूटने लगे । उस समय वह रण,
विविध भोग-विलसित पर्जन्य* ( मेघ-इन्द्र ) की सपत्ति की भाँति महान् अभ्र-मातग*
( ऐरावत-श्वेत गज ) के मद से सिंचित था, अति रौद्र रुद्र-विहार ( कैलास
पर्वत-श्मशान ) की भाँति आहत गज एवं असुरो से युक्त हो पिशाचो के लिए आनद-
दायक था । अक्षीण राम-कटाक्ष के समान प्रेक्षण-दृष्ट-विभीषण* ( देखने में भयकर, देखकर
सतुष्ट विभीषण) था, कलियुगात के भयंकर काल के समान बल-रहित एव विध्वस्तधर्मा*
(धर्म-भ्रष्ट, नीति-भ्रष्ट) था, रात्रि के उपरात विकसित कमलिनी * (सरोवर-कमलिनी)
की भाँति शिलीमुखो* ( बाण-भ्रमर ) से आश्रित पुण्डरीक * (कमल-श्वेतच्छत्र) समूह के
समान था, उदार व्यक्ति के सुदर एव शुभप्रद सदन की भाँति आरक्त * ( अनुरक्त, रक्त
से सीचे), मार्गणो * ( बाण-याचक ) से परिपूर्ण था, शाश्वत-पुण्यमूल नदी के पति
(समुद्र) की भाँति हरि-शक्ति-निर्मथित * (सांप से मथित, वानरो से मथित) हो भयकर
दीखता था और निर्मल वेद-विहित यज्ञ की भाँति देव-लोक के चित्त को प्रसन्न करनेवाला था ।
ऐसे भयकर रण में रक्त-सिक्त हो, अँतड़ियाँ-रूपी प्रवालसमूह, रथ-रूपी नावें,
टूटकर गिरे हुए रथ-चक्र-रूपी कच्छप-समूह, शव-रूपी मगर, कटकर गिरी हुई भुजाएँ-रूपी
साँप, आयुधो का चूर्ण-रूपी रेत, गज-समूह-रूपी विशाल पर्वत, दष्ट्र-रूपी तिमि-तिमिगल,
*चिह्नित शब्द श्लिष्ट हैं।—ले०
युद्धकांड ४३७
बृहत्काय अश्व-समूह-रूपी चल एव उत्तुग तरंगें, विविध अश्वो की लार-रूपी उज्ज्वल फेन,
धवल आतपत्र-रूपी हस, असख्य मुकुटो की प्रभा-रूपी वाडवाग्नि-शिखाएँ, बिखरे हुए मास-
खड-रूपी मणियाँ, सतुष्ट निशाचर, प्रेत एव वैतालो का अट्टहास-रूपी भयकर घोष, रघुराम-
चद्र-रूपी चद्र, उनकी हास्य-द्युति-रूपी चद्रिका से युक्त हो रक्तसमुद्र-रूपी समुद्र, उमड
रहा था ।
१३८. वानरों के द्वारा खड्गरोम आदि राक्षसों का वध
तब हनुमान् को असुरेंद्र पर आक्रमण करने के लिए उद्यत होते देखकर पर्वताकार-
वाला अनुपम साहसी, रुचिर खड्ग से सपन्न, खड्गरोम क्रुद्ध हुआ और कहने लगा—'हे
पवनकुमार, उधर कहाँ जा रहे हो ? उधर जाने की क्या आवश्यकता है ? मै तो यहाँ
हूँ ही, इधर आओ।' यह सुनकर पवनपुत्र उसपर कूद पडा और उसके शरीर के रोमो
के पैने खड्ग धाराओ में डूब-सा गया । किंतु किसी तरह वह उनसे बाहर निकला और
भयंकर रूप धारण करके अपनी उन्नत शक्ति को प्रकट करते हुए, कुलपर्वत की समता
करनेवाले एक विशाल पर्वत को उठाकर भयंकर गर्जन करके उसे उस राक्षस पर ऐसा
फेंका कि पृथ्वी काँप उठी । किंतु उसने अपने रोम-खड्ग की धाराओ से उसको खडित
कर दिया और वानर-सेना को काटते हुए हनुमान् पर आक्रमण किया । तब हनुमान् ने
एक विशाल पर्वत को उठाकर उस राक्षस-वीर पर ऐसा प्रहार किया कि वह वज्र के
आघात से आहत शैल की भाँति गिर पडा ।
तब सर्परोम ने भयंकर सर्प की भाँति क्रुद्ध हो, बडे दर्प से अगद पर आक्रमण
किया और अपने रोम-सर्प के समूह से उसे पीडित किया । तब अगद ने प्रलय-काल के
यम की भाँति जलते हुए उस राक्षस पर अपनी हथेली से ऐसा प्रहार किया कि उसका
सिर फूट गया और रक्त की धाराएँ बहने लगीं । फिर भी, रोषाग्नि उगलते हुए उस
राक्षस ने भयंकर रूप धारण करके अगद के अगो पर अपने रोम-सर्पों से आघात किया ।
तब अगद ने अत्यधिक क्रोध से उस राक्षस के सिर पर अपनी भयंकर मुष्टि से प्रहार
किया और उसे नीचे गिराकर पैरो से रौंदते हुए उसका सिर तोडकर फेंक दिया ।
तब वृश्चिकरोम ने भीषण रण-कुशल नील पर आक्रमण किया और विष-ज्वालाओ
को उगलनेवाले अपने रोम-वृश्चिको के प्रयोग से नील को अत्यधिक पीडा पहुँचाई । इसको
सहने में असमर्थ होकर नील ने उस दानव की परवाह किये बिना एक विशाल शाल-वृक्ष
को उसपर फेंका । तब उस राक्षस ने अपने विष-भरे रोम-कटको से उम वृक्ष को तोड
डाला । यह देखकर नील ने क्रोधातुर हो, अपने भयंकर बाहुबल का प्रदर्शन करते हुए
असख्य शाखाओ से युक्त एक विशाल वृक्ष को उखाडा और उसने उम राक्षस के वक्ष स्थल
पर ऐसा प्रहार किया कि उसके प्राण जाते रहे । सभी देवता हर्ष से फूल उठे ।
उसके पश्चात् शत्रुभाजक एव अकुंठित पराक्रमी अग्निवर्ण ने प्रचड क्रोध से विशाल
वनो को दुर्वार गति से जलानेवाली दावाग्नि के समान अपने अगो में अगणित अग्नि-
शिखाओ को दीप्त करके वानर-सैनिको को जलाकर भस्म करते हुए आगे बढा । राम ने
उसे क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखा, वानर-वीरो का पराभव होते भी देखा, करुणाद्रचित्त
४३८ रंगनाथ रामायण
होने के कारण वे उसके अत्याचारो को सहन न कर सके, किंतु उसकी भयंकरता को देखकर
सिर कँपाते हुए विभीषण से कहने लगे--'हे विभीषण, मै अनुमान नही कर पा रहा हूँ
कि यह कौन आ रहा है । पता नही कि रावण की आज्ञा से स्वय अग्निदेव युद्ध करने
के लिए आ रहे है या कोई राक्षस-वीर ही आ रहा है । यह कौन है ? इसका परिचय
मुझे दो ।'
तब विभीषण ने कहा--'हे देव, यह अग्निवर्ण है । यह अपने शरीर से अग्नि-
ज्वालाओ को प्रज्वलित करके पर्वतो को भी भस्म कर सकता है, यह अखड वीर एव महान्
घमंडी है ।' यह सुनकर राम आश्चर्यचकित हुए । फिर भी, उसके भयंकर औद्धत्य को
देखकर उन्होने उस पर वारुणास्त्र चलाया । तब उस अस्त्र ने समस्त आकाश को घने बादलो
से आच्छादित कर दिया और अविराम गति से वर्षा करके उस राक्षस के द्वारा प्रज्वलित
अग्नि-ज्वालाओ को बुझाकर भयकर ध्वनि के साथ उस राक्षस का वध कर डाला ।
युद्ध में अग्निवर्ण को इस प्रकार गिरते हुए देखकर, रावण ने आँखो से अग्निवर्षा
करते हुए, प्रलय-काल के सूर्य की भाँति जलती हुई दृष्टियो से राम को देखकर कहा-'हे
राम, क्या तुम मुझे नही पहचानते ? अपने निष्ठुर वज्र की दुर्वार धारा से कुलपर्वतो
को खंडित करनेवाले इद्र भी यदि वडी उद्धतता से अपने देवताओ के साथ युद्ध में मेरा
सामना करे, तो मै उसे भी परास्त कर दूंगा । तब, मै तुम्हारी क्या परवाह करूँगा ?
क्या, तुम्हारे जैसे क्षुद्र प्राणियो का प्रयत्न मुझे परास्त कर सकेगा ? अब तुम अपनी शूरता प्रकट
करो और अत तक मेरा सामना करते रहो । मैं अपने शस्त्रास्त्रो से तुम्हें गिरा दूंगा और
तुम्हें अपनी शक्ति का परिचय दूंगा ।'
रघुराम उस दुरात्मा का प्रलाप सुनकर हँस पडे और मत्त सिंधुर (हाथी) के चिंघाड
सुननेवाले सिंधुरांतक मत्त सिंह की भाँति चुप हो रहे । तब रामानुज ने क्रुद्ध होकर रावण पर
आक्रमण किया और उस पर भयंकर बाण चलाने लगे । तब रावण ने उन शरो को सहज ही खडित
कर दिया और उनकी परवाह किये बिना भानु पर आक्रमण करने के लिए आनेवाले स्वर्भानु
(राहु) के समान भानुवंशाधीश (राम) पर आक्रमण करके दारुण वज्रधर की समता करनेवाले
बाणो से उन्हें ढक दिया । तब राम ने क्रोधोन्मत्त हो, अगारो को उगलनेवाले निष्ठुर अस्त्रो को
उस राक्षस पर चलाया । तब रावण उन बाणो का सामना करने के लिए युद्ध-भूमि के
मध्य आया ।
१३९. इंद्र का मातलि के द्वारा राम को रथ भेजना
तब इद्र ने राम को देखकर मातलि से कहा--'देवताओ के हित के लिए ही
राघव राक्षसो से घोर युद्ध कर रहे है । किंतु वे पदाति हो पृथ्वी पर खडे है और राक्षस
रथ पर आरूढ है । ये लोकोन्नत (राम) दुखो से पीडित हो उस कुमार्गी के सामने नीचे
खडे है । वेद-पल्लवो पर विहरण करनेवाले, सुखी तथा सपन्न व्यक्ति आज कठोर रणभूमि
पर खडे है । कमला के मन-रूपी रथ पर अत्युन्नत सुख-राशि में डोलनेवाले आज
पृथ्वी पर खडे है । अत, हे मातलि, तुम शीघ्र उनके लिए दिव्य रथ पृथ्वी
पर ले जाओ ।
युद्धकांड ४३६
तब वायु तथा मन के वेग से जानेवाले अश्वो से युक्त कनक-दंडो में बँधी हुई
पताकाओ से विलसित, महनीय कांतियुक्त मणि-समूहो से जटित, बालसूर्य के समान दीप्त
होनेवाले रथ को लिये हुए मातलि पृथ्वी पर उतर आया और राम के समक्ष खडे होकर
हाथ जोडे हुए राम से निवेदन किया--'हे देव, हे राघव-भूपाल, हे समस्त देवताओ के
आराध्य, हे भक्त-जन-साध्य, इंद्र ने आपके लिए शर, चाप, कवच आदि से युक्त दिव्य
रथ भेजा है । अब आप कौशिक की आज्ञा के अनुसार इस वज्र-कवच को धारण कीजिए
और इस दिव्य रथ पर आरूढ होकर इन आयुधो से उस दुर्मदाध राक्षस का सामना करके
उसपर विजय प्राप्त कीजिए । पूर्वकाल में मेरे सारथी के रूप में रहते हुए इन्द्र ने समस्त
दानवो को जीत लिया था ।' तब राम ने विभीषण से परामर्श करने के पश्चात् उस रथ
की परिक्रमा की और अपने शरीर की उज्ज्वल कांति को चौदहो भुवनो में आकाश तक
व्याप्त हुए वानरो के जय-निनादो के बीच, उस रथ पर ऐसे आरूढ हुए, जैसे कमल-बंधु
(सूर्य) उदयाद्रि पर आरूढ होता है । उस समय समस्त आकाश हिलने लगा और शरत्-
कालीन मेघ एव सध्या के मेघो की समता करनेवाले गरुड, उरग तथा देवताओ के विमानो
से सारा आकाश भर गया । इस दृश्य को देखने के लिए एकत्र सुर, खेचर तथा किन्नर
अत्यत हर्ष तथा भय से अभिभूत हो कहने लगे--'राम-रावण का यह द्वंद्व दो पर्वतो का
द्वंद्व है । ये समुद्रयुगल है, पावकद्वय है, आकाशद्वय हैं । आज ये दोनो आपस में भिड
रहे हैं । यह समान जोडी है । न जाने क्या होगा ।' विजय की आकाक्षा एव विजय की
उत्कट अभिलाषा से राम तथा रावण एक दूसरे से भिड गये । तब समस्त जग कपित हुआ,
पहाड प्रकपित हुए, दोनो ओर की सेनाएँ आकपित हुई, उनकी दृष्टि-रूपी वज्रपात से
बिजलियाँ पिसकर आकाश में बिखर गई, दोनो पक्षो की सेनाओ के सिंहनाद से स्वर्ग
आदि लोक क्षुब्ध हो उठे । वे दोनो प्रवीण धनुर्धर, अन्योन्य विजय की इच्छा रखते हुए
अपने रथो को विविध रीतियो से चलाते हुए, सूर्य तथा अग्नि-सम प्रचड, वज्र के समान
तीक्ष्ण शरो को करो, कठो, पाश्वों, स्कंधो, वक्षो, ललाटो, जाँघो तथा पसलियो पर
चलाकर एक दूसरे को पीडित करने लगे । वे दोनो आपस में भिडते, एक दूसरे पर रोव
जमाते, वाणो से युद्ध करते । उस समय उनकी चाल-ढाल, पराक्रम एव साहस देखकर
आश्चर्य होता था । वे दोनो सफल पराक्रमी वीर जब एक ही समय में वाण चलाने
लगते, तब यह जानना असभव हो जाता कि कब वे तरकस में रखे तीरो को निकालने
के लिए अपने हाथ फैलाते, कब शरो को धनुष पर चढाते, कब धनुष की प्रत्यचा खींचते,
कब लक्ष्य साधते और वाण छोडते । उन दोनो के द्वारा वेग से चलाये जानेवाले भयकर
वाणो को गिनना तो असभव ही हो गया, किंतु यह कहना भी असत्य नही है कि उनके बाण
प्रचंड कोदण्ड-रूपी रवि-मडल से निकलनेवाले चचल किरणो के समान एक के पीछे एक
चलते थे । धनुर्विद्या में पारगत तथा अक्षय तूणीरो से सपन्न वे दोनों वीर एक शर के
पीछे दस शर, दम के बदले सौ शर, सौ के बदले सहस्र शर, सहस्र के बदले दस सहस्र
शर, दम सहस्र के बदले एक लाख शर, एक लाख के बदले एक करोड प्रतिशर चलाने थे
और सभी शर एक ही समय में राम-रावण पर लग जाते थे ।
४४० रंगनाथ रामायण
१४०. राम का रावण के बाणों का प्रतिबाण चलाना
तब देवताओ के शत्रु रावण ने अपने धनुष की डोरी को खीचकर शीघ्र गति से
देव तथा गधर्वों के बाण चलाये । उनके आने का ढग देखकर समस्त अस्त्रो के ज्ञाता
राम ने विना विलव किये, देव तथा गधर्व-बाणो को चलाकर उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर दिया । तब
क्रोधोन्मत्त हो रावण ने राम पर राक्षस-बाण चलाया । वह बाण उभरी हुई आँखें, दीर्घ
दष्ट्र, खुरदरे, छोटे तथा घुंघराले केग तथा विशालकाय दानवो का रूप धरकर आगे
बढा । यह देखकर रघुकुलाधीश ने रोष से वैष्णवास्त्र का प्रयोग किया और जिस प्रकार
सूर्य की काति अधकार को नष्ट करती है, वैसे ही उसने राक्षस-बाण के प्रताप को नष्ट
कर दिया । तब रावण ने नागास्त्र का सधान करके चलाया । उसको चलाते ही, उस महा
बाण से दस, बीस, बारह, दो, तेरह, तीन, पद्रह तथा पाँच शिरोवाले भयकर सर्प अपने
शिरो पर उज्ज्वल कांतियुक्त मणियो को धारण किये हुए निकल पड़े । उद्धत गति से
आनेवाले वे सर्प ऐसे दीख रहे थे, मानो कि सर्प-सेना राम पर इस विचार से आक्रमण करने के
लिए निकली हो कि राम गरुडवाहन हैं । अपनी अत्युज्ज्वल ज्वालाओ को समस्त आकाश
में व्याप्त करते हुए आनेवाले उन सर्पो को देखकर राम ने गरुडास्त्र चलाया । तब उससे
गरुड के आकारवाले असख्य बाण निकले और अपने पखो की फडफडाहट से उत्पन्न वायु से
पर्वतो को भी हिलाते हुए वे आगे बढ़े और बीच में ही उन नाग-बाणो को तोड़ डाला ।
यह देखकर देवता आकाश से हर्ष-निनाद करने लगे ।
उसके पश्चात् राघव ने क्रुद्ध होकर दैत्यराज पर अग्नि-बाण चलाया । वह बाण,
धूम एवं स्फुलिंगो से दिशाओ को जलाते हुए, अपनी ज्वालाओ को चारो ओर व्याप्त करते
हुए रावण पर आक्रमण करने चला, तो रावण ने भयंकर वारुणास्त्र चलाया । तब उस
अस्त्र ने समस्त आकाश में घनघोर बादल व्याप्त कर दिया और घोर जल-वृष्टि करके
अग्नि-बाण के प्रताप को नष्ट करके भयकर गर्जन किया । तब राम ने उस शर पर
वायव्यास्त्र चलाकर उसकी शक्ति को नष्ट कर दिया । तब उस राक्षस ने गजमुखास्त्र
का प्रयोग किया । उस अस्त्र के प्रयोग से असख्य गज-समूह अपने गंड-स्थलो से मद-जल
की धाराएँ बहाते हुए, राम पर आक्रमण करने चले । तब राम ने नृसिंहास्त्र चलाया ।
उस बाण से असख्य सिंह बादलो के समूह के समान अपने घोर गर्जनो से दिग्गजो को
विचलित करते हुए, अपने कुलिश-सम नखो से हाथियो के कुभस्थलो को चीरते हुए उन्हें
मार डाला । तब देवताओ ने राघव की प्रशसा की ।
१४१ रावण का राम पर शूल चलाना
तब रावण ने क्रुद्ध होकर प्रलय-काल की अग्नि-ज्वालाओ को उगलनेवाला, समस्त-
लोक-भयकर शूल उठाया और अपने सिंहनाद से पृथ्वी को कँपाते हुए, समुद्रो को क्षुब्ध
करते हुए, समस्त दिशाओ को गुजायमान करते हुए, सभी भूतो को भयभीत करते हुए
कहने लगा—'हे राम, इस शूल की अग्नि से मैं तुम्हें और तुम्हारे भाई को भस्म कर
दूँगा और जिन वीरो ने युद्ध में तुम्हारा सामना करके स्वर्ग को प्राप्त किया है,
उनकी पत्नियो की अश्रुधारा को रोक दूँगा ।' इस प्रकार, कहते हुए राम पर उसने वह
युद्धकांड ४४९
शूल चलाया । तब राम ने प्रलय-काल की अग्नि पर वर्षा करनेवाले इन्द्र की भाँति अद्भुत
तथा पैने बाणो की वर्षा की, किंतु उन बाणो से रावण का शूल नष्ट नही हुआ । वह
शूल उन सभी बाणो को खंडित करते हुए राम की ओर बढने लगा । तब राम ने देवेंद्र
की भेजी हुई शक्ति लेकर उस पर चलाया । तब उस शक्ति ने घटिकाओ का रव करते
हुए, अग्नि-ज्वालाओ को उगलते हुए, यक्ष, देवता तथा खेचरो को आनद देते हुए, राक्षस-
लोक को भयभीत करते हुए, मन तथा वायु के वेग से आनेवाले रावण के शूल को भस्म
कर दिया । तब रावण ने क्रुद्ध होकर अपने दोनो हाथो में दस धनुष धारण करके भयकर
गर्जन करते हुए राम को शर-वर्षा में डुबो दिया । किंतु राम ने अपने एक ही कोदंड से
उसके सभी शरो को काट डाला । तब रावण ने मद, मात्सर्य, अभिमान एव हठ के साथ
आँखो से अग्नि की वर्षा करते हुए, रघुराम पर घोर शर-वृष्टि की । उससे सतुष्ट न
होकर उसने दस बाणो से मातलि को तथा दस और बाणो से अश्वो को सज्ञाहीन कर
दिया और एक विषम अस्त्र को चलाकर रथ की ध्वजा को काट डाला । वानर तथा
देवता विपुल चिंता के भार से विवश-से हो गये । समस्त भुवन भीत हो गया, बुध (ग्रह)
रोहिणी में पहुँचकर पीडा पहुँचाने लगा । अपने महान् तेज से भय उत्पन्न करते हुए
मगल ग्रह विशाखा में पहुँच गया । चचल एव भयकर गति से समुद्र उमडने लगे, उत्तुग
लहरें आकाश को छूने लगी । वाडवाग्नि की लपटें धुएँ के समान ऊपर उठने लगी ।
सूर्यविम्ब से टकराती हुई उल्काएँ भयकर दीप्ति के साथ गिरने लगी । सूर्य भी तेजोहीन
होकर क्षीण प्रकाश से चमकने लगा ।
१४२. अगस्त्य के द्वारा राम को आदित्यहृदय का उपदेश
मैनाक की भाँति अविचल होकर दशकंठ जब बडे वेग से बाणो को चलाने लगा, तब राघव
सभ्रमित हो देखने लगे । तब अगस्त्य मुनि वहाँ आये और राम को देखकर कहने लगे—
“हे राम, हे महाबाहुबली, युद्ध में अवश्य विजय दिलानेवाली, गोपनीय 'आदित्यहृदय'
नामक मत्र का आप भक्ति-भाव से अनुष्ठान कीजिए । उस महामत्र के जप से आप अवश्य
शत्रुओ को जीत सकेंगे । इतना ही नही, वह आयु को बढाता है, दुख का दमन करता है
और समस्त कल्याण का कारण बनता है । हे समस्त सुरासुरो के वद्य, कमल-बधु सूर्य की
पूजा आपको करनी चाहिए । यही इस ससार के नेत्र-समान है और अपनी किरणो के
द्वारा समस्त ससार में विचरण करता है । ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने ब्रह्म-कल्प के प्रारभ
में सूर्य का रूप धारण किया था, इसलिए आपको उचित है कि सूर्य को समस्त देवताओ
का प्राण मानें । जो व्यक्ति इस कमल-बधु की स्तुति करता है, उसे युद्ध में अवश्य विजय
मिलती है ।”
इतना कहकर अगस्त्य मुनि अपने आश्रम को लौट गये । राम ने बडी भक्ति के
साथ सूर्य-मत्र का जप किया और महोन्नत शक्ति से विलसित होते हुए, रावण का औद्धत्य
देखकर क्रोध से अपनी आँखो से अग्नि उगलने लगे । उनकी भौंहें तन गई और
उन्होंने रावण के रथ में जुते हुए भयकर अश्वों पर श्रेष्ठ बाणो से प्रहार किया और तीन
शरो से रावण के ललाट पर प्रहार करके उसे रक्त-सिक्त कर दिया । रक्त-सिक्त अगों से
५६
४४२ रंगनाथ रामायण
युक्त लंकेश्वर तब ऐसा दीखने लगा, मानो रामचंद्र के शर-रूपी वसंत के आगमन के
प्रभाव से विकसित तरुण, अरुण अशोक वृक्ष हो । तब राक्षसपति ने रोष से राम के
विशाल वक्ष पर एक सहस्र वाण चलाये । वे वाण काकुत्स्थ-वंशज के शरीर में प्रवेश
करके आश्चर्यजनक रीति से उनके शरीर के पार निकल गये और पृथ्वी में धँसकर पाताल
में प्रवेश कर गये, मानो वे बता रहे हों कि अधम राक्षस के द्वारा प्रयुक्त हो, देवताओ के
दुर्भाग्य से विचलित न होकर अपनी विषम शक्ति को प्रकट करते हुए, निर्मल गुणो से रहित हो,
धर्म-मार्ग को तजकर, अपने औद्धत्य से राघव को दुःख देनेवाले वाण अधोगति के
'सिवा सद्गति कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? क्षतो से बहनेवाले रक्त से राघव लथपथ हो
गये और प्रलय-काल की भीषण अग्नि-ज्वालाओ की भाँति जलते हुए, आँखो से निकलनेवाले
अग्नि-कणो को आकाश-भर में व्याप्त करते हुए प्रलय के समय जहाँ-तहाँ विचरनेवाले यम
के समान भयंकर तेज से युक्त हो, प्रचंड मार्त्तण्ड-मण्डल की किरणो के समान तेजस्वी शर-
समूह को चलाकर रावण के गर्व, मद तथा शक्ति का नाश करते हुए उसका सारा शरीर
ऐसा जर्जर कर दिया कि वह निश्चेष्ट-सा रह गया । रघुराम के वाणो के वेग को
देखकर रावण निर्वेद से अभिभूत होकर खडा रह गया ।
१४३. राम-रावण का परस्पर दोषारोपण
तब प्रताप-भास्कर राघव ने दशकंठ को देखकर कहा—"क्यो रे रावण, निर्वेद से
चेष्टाहोन होकर तू ऐसे क्यो खडा है ? तू तो कहता था कि मै कभी हारूँगा नही । वे
दर्प-पूर्ण वचन अब कहाँ गये ? रे दशकंठ ! अपने भाई कुवेर का अपमान करके, एक
पराये व्यक्ति की तरह उसका पुष्पक विमान ले आना और वन में हमें धोखा देकर सीता
को चुराकर ले आना, क्या ये सब वीरोचित कार्य हैं ? क्या, इन्ही कार्यों पर तू गर्व
करता था ? अपने पूर्व जन्म के पापो के कारण तू मेरे दृष्टिपथ में पड गया है । अब मै
तेरा सहार किये बिना कैसे छोड दूँ ? मै न तुझे छोडूंगा और न तेरी लका को छोडूंगा,
चाहे हरिहर और ब्रह्मा ही तेरी सहायता करने के लिए क्यो न आवें, फिर भी में युद्ध में
तेरा वध अवश्य करूँगा, तुझे कदापि छोडूंगा नही । रे रावण, आज मैं तेरा रक्त-
मास समस्त भूतो को खिलाऊँगा । तू क्रूर है, अति कामातुर है, दुष्ट-बुद्धि है, और देवताओ
का द्रोही है, इसलिए तू युद्ध-भूमि से भाग भी जायगा, तो भी तेरा पीछा करके तेरा सहार
करना मेरे लिए महान् पुण्य का कार्य होगा । तेरी मृत्यु अब तेरे निकट आ पहुँची है,
इसलिए तुझे ऐसी बातें कहने से कोई प्रयोजन नही है । आज में तेरे पराक्रम, बाहुबल
तथा वैभव को समाप्त करूँगा । क्या, तू नही जानता कि मैने तेरे भाई भुवन-भयंकर खर
नामक दैत्य का सहार किया है । और एक बात मै तुझसे कहूँ, तू यदि आज भी जानकी
'को मुझे लौटाकर मेरी शरण माँगो, तो में तेरी रक्षा करूँगा । इसमें सदेह मत कर ।
यदि युद्ध करेगा, तो तेरी विजय असंभव है और पराजय निश्चित है । (ब्रह्मा के) वर के
प्रताप से तूने दीर्घ आयु पाई है, कई प्रकार की मायाओ को जानता है । भयंकर युद्ध के
'शस्त्रास्त्र रखता है और इंद्रादि समस्त दिक्पालो तथा तीनो भुवनो को तूने जीत लिया है ।
ऐसे वीर का वध आज में अवश्य करूँगा ।"
रघुराम की ये बातें रावण को अग्नि-ज्वालाओ के समान ज़लाने लगी । तब दश-
कठ क्रोधोन्मत्त हो रघुराम से कहने लगा--'कदाचित् तुम इस बात के कारण फूल रहे
हो कि तुमने कुछ क्षुद्र राक्षसो का सहार किया है । तुम मुझे नही जानते । मेरी शक्ति
का परिचय तुम्हें नही है । मैं ने स्वर्ग के निवासी यक्ष, गधर्व, देवता तथा दिक्पालो का
अपमान करके उन्हें परास्त किया है और बडी निरकुशता के साथ राज्य करता रहा ।
ऐसे बल-पराक्रम से सपन्न मैं तुम्हारी परवाह करूँगा ? जबतक में तुम्हें और तुम्हारे
भाई का युद्ध में सहार करके उस दृश्य को जी भरकर नही देखूँगा, तबतक में लका में
प्रवेश नहीं करूँगा ।' ऐसा कहकर रावण ने प्रलय-काल की अग्नि के समान जलनेवाले
असख्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र राम पर चलाये । तब राम ने क्रुद्ध होकर एक प्रतिवाण छोडा।
उसके पश्चात् उन्होने बडे हर्ष से उन दिव्यास्त्रो का स्मरण किया, जिन्हें विश्वामित्र ने
ताडका के वध के दिन दिया था । स्मरण करते ही वे सभी दिव्यास्त्र स्फुलिंगो को विकीर्ण
करते हुए उनके समक्ष साकार होकर उपस्थित हो गये । तब राम ने उन दिव्यास्त्रो का
समुचित रीति से सधान किया और दायें-वायें इस प्रकार चलाया, जैसे पर्वत पर बिजलियों
की वर्षा होती है । इससे भी तृप्त न होकर राम ने अपनी उद्धत शक्ति का प्रदर्शन करते
हुए ऐसी बाण-वृष्टि की कि दशकठ दृष्टि से भी ओझल हो गया ।
१४४. रावण की मूर्च्छा
राम के शरो के आघात से आहत हो रावण रथ पर ही मूर्च्छित होकर गिर पडा ।
यह देखकर कालकेतु भयाकुल हो उस रथ को युद्ध-भूमि के बाहर ले गया । इससे देखकर
देवता हर्ष-निनाद करने लगे और वानर-समूह उत्साह से सिंह-गर्जन करने लगा । थोडी देर
के पश्चात् राक्षसराज की मूर्च्छा दूर हुई । वह रण-विक्रम का प्रदर्शन करते हुए रथ पर
खडे हुए अपने सारथी से कहा--'क्यो रे, तुमने ऐसा अपराध क्यो किया ? युद्ध-भूमि से
तुम रथ को इतनी दूर क्यो ले आये ? मेरी कीर्त्ति को कलकित करते हुए तुमने राम को
हँसने का अवसर क्यो दिया ?' तब सारथी ने कहा--'हे देव, परास्त होने पर या शत्रु
से मिलने पर मुझे रथ को युद्ध-भूमि से बाहर नही लाना चाहिए । रथी को सकट में
देखकर ही रथ को युद्ध-भूमि से लौटा ले जाना सारथी का रण-धर्म है। इसलिए मैं,
आपको यहाँ ले आया हूँ।' तब रावण ने उसके विवेक की प्रशसा करते हुए बडे हर्ष के
साथ उसे उचित भेंट दी और उसको देखकर कहा--'वह देखो, राम अब भी रण के मध्य
खडा है । उसके रथ के निकट हमारा रथ ले चलो ।' तब कालकेतु ने बडे वेग से रथ
चलाकर उसे राम के रथ के आगे प्रतिष्ठित किया । दशकठ के रथ को उद्धत वेग से
आते हुए देखकर राम ने मातलि से कहा--'रावण का रथ आ रहा है । तुम मेरा रथ
शीघ्र उसके निकट ले चलो । दृष्टि को चचल किये विना, तीव्र बाणों के भय से विचलित
हुए बिना, बागडोर को अच्छी तरह सँभाले हुए अश्वो को हाँको । हे मातलि, घोडो का
मन तुम जानते हो । ऐसा सारथ्य करो कि रथ का वेग विचित्र दिखाई पडे । कोई ऐसी
बात नही, जो तुम नही जानते । मैं और तुम्हें क्या कहूँ ?' तब मातलि ने अपना रथ
विपरीत मार्ग से रावण के रथ के पास ले गया । तब लोककटक तथा तीनो लोको को
४४४ रंगनाथ रामायण
भयभीत करनेवाले रावण ने पृथ्वी को कँपाते हुए अद्भुत अस्त्र चलाकर रथ को ढक-सा
दिया, सारथी को व्याकुल कर दिया, अश्वो को शक्तिहीन कर दिया और एक प्रचंड बाण
चलाकर राघव का धनुष तोड दिया और कई बाणो से राघव को भी पीडित किया । तब
क्रुद्ध होकर राम ने भयंकर रूप धारण करके देवेंद्र के द्वारा भेजे हुए धनुष को सँभाला
और उसकी प्रत्यचा के टकार से ब्रह्वाड को विदीर्ण करते हुए दानवो के गर्वाधकार का
नाश करने के निमित्त सूर्य-सम भास्वर सैकडो, सहस्रो, लाखो, करोडो तथा अरबो की
संख्या में शर रावण पर चलाये । वे बाण कदाचित् यह सोचकर उसके शरीर को पार कर
जाते थे कि यह महान् पापी है, क्रूर है, चचल है, मायावी है, धर्मबद्ध रहनेवाले हमें इसके
शरीर में नहीं रहना चाहिए । कुछ बाण कदाचित् यह सोचकर आकाश की ओर, पृथ्वी
की ओर और लका की ओर जाने लगे, मानो वे यह समाचार पृथ्वी को देवताओ तथा
सीता को सुनाने जा रहे हैं कि अब अधिक विलब नही है, रावण अब मरनेवाला ही है,
तुम अब व्याकुल मत होओ । अग्नि की प्रभा के समान दीप्त होनेवाले राम के बाण
मूसलाधार वर्षा की भाँति रावण पर गिरने लगे, फिर भी रावण अविचल रहते हुए प्रचंड
शरो से राम के बाणो को काटने लगा । इस प्रकार, विशाल बाहुबल तथा रण-कौशल से
युक्त वे दोनो पराक्रमी समान सत्त्व, समान वेग, समान बाण-संपत्ति, समान रण-कौशल से
युक्त हो, भिड गये, और वधन से मुक्त क्रोध से भरे सिहो की भाँति, सात दिन तथा
सात रात तक अविराम युद्ध करते रहे । उस समय रावण के रथ पर मेघ रक्त की वर्षा
करने लगे, रथ के अश्वो की पूँछो से अग्नि-कण निकलने लगे, सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न
कातियो में दीप्त होने लगी । रावण को देखकर समस्त भूत कहने लगे—‘अब तुम बच
नही सकोगे, आज अवश्य मरोगे ।' आकाशवाणी हुई—‘हे राघव, आप विजयी होगे ।'
अपनी पराजय को सूचित करनेवाले दु शकुनो को देखकर रावण ने विजय की आशा
छोड़ दी । फिर भी, वडे साहस के साथ राघव पर निशित बाण, करवाल, गदाएँ, शूल,
परिघ, शक्ति आदि चलाकर उन्हें कष्ट पहुँचाने लगा । किंतु राम ने वज्र-सम तथा प्रचंड
प्रलयाग्नि की समता करनेवाले अर्द्ध-चंद्रास्त्र चलाकर उन्हें वीच में ही खडित कर दिया ।
रावण ने अत्यंत भयंकर रूप से भीषण बाणो की वर्षा की, तो राघव ने अर्द्ध-चंद्र बाणो से
उन्हें काट डाला ।
इस प्रकार, विजय की आकाक्षा करके दोनो वीर वडी धीरता के साथ परस्पर
युद्ध करते रहे । तब वानर एव राक्षस-सैनिक अपने-अपने अस्त्र सँभाले हुए रण-विचक्षण
राम-रावण का युद्ध-कौशल देखते हुए चित्रलिखित की भाँति युद्ध भूलकर
खडे रहे । अपनी पराजय को निश्चत जानते हुए भी रावण और अपनी विजय निश्चित
जानते हुए राम, दोनो वडी तत्परता के साथ क्षण-क्षण आगे बढते हुए, उत्साह के साथ
युद्ध करने लगे । उसी समय क्रोध से अपनी आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा करते हुए
राम ने एक पैने अर्द्ध-चंद्र बाण से रावण के रथ की ध्वजा को काट डाला । तब रावण ने
भी अत्यधिक रोष से घोर बाणो का सधान करके, राम के रथ के अश्वो तथा मातलि
पर चलाया । किंतु वे उन बाणो से आहत होकर भी कमल-नालो से आहत व्यक्तियो के
समान विना हिले-डुले निश्चल खडे रहे । तब वानर अट्टहास करते हुए रावण पर पिल
पडे । रावण ने अपनी माया से उस वानर-सेना पर महान् शस्त्रो की वृष्टि की । उस
वाण-वृष्टि से वानर-वीर भयभीत हो उठे । तब राम ने रावण पर, उसके सारथी, रथ तथा
रथ के अश्वो पर असख्य बाण चलाकर उसे व्याकुल कर दिया । दशकठ ने भी दाशरथि
पर वाणो की वृष्टि की । तब राम ने अद्वितीय ढग से भयकर वाणो का सधान किया
और उनसे समस्त आकाश तथा पृथ्वी को ढक दिया । महेंद्र पर्वत तथा मदराचल के समान
धैर्य रखनेवाले वे दोनो वीर, युद्धभूमि में स्थिर होकर इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे
नभ के साथ नभ, समुद्र के साथ समुद्र युद्ध करते हो और 'रामरावणयोर्युद्ध रामरावणयो-
रिव' वाली उक्ति को चरितार्थ करने लगे । तब मेघ-गर्जन के समान धनुष की ध्वनि,
प्रचड शरो के परस्पर टकराने की ध्वनि, युद्ध के समय सुनाई पडनेवाले भयकर गर्जन,
रथो के चलने से उत्पन्न होनेवाली विपुल ध्वनि तथा घोडो की हिनहिनाहट आदि की
सम्मिलित ध्वनि से समुद्र आलोडित हुए, उल्काएँ गिरने लगी, दिशाएँ कंपित हो उठी,
पृथ्वी हिल उठी, समस्त लोक चकरा गये, पर्वत काँप उठे, दिग्गज चकराने लगे, देवता
आनदित हो उठे, समस्त भूत त्रस्त हो उठे और आदिशेष विचलित हो उठा । इस प्रकार,
अत्यधिक वीरता के साथ लडते-लडते उन दोनो की बाहुओ का दर्प कुछ शिथिल हुआ,
उनकी प्रचडता कुछ कम हुई, और थोडी देर तक अपने-अपने धनुष का सधान करना
छोडकर वे एक दूसरे को देखने लगे । चचल फूतकार, श्रमजल का प्रवाह, चीत्कार आदि
के पश्चात् उनकी थकावट आधी घडी में ही दूर हो गई ।
१४५. राम का रावण के कर-चरणों को खंडित करना
तुरत वे फिर रणोत्साह से दीप्त हो उठे और प्रलय-काल के यम की भाँति भयकर
रूप धारण करके महान् साहस के साथ रावण से भिड गये । राम ने तब प्रलय-काल के
रुद्र के समान भयकर दीखते हुए घोर तथा पैनी कर्तरी, आरा तथा भाला को चलाकर उस
दशकठ के दसो सिर और बीसो बाहुओ को एक साथ ही काट डाला । सब लोग आश्चर्य-
चकित होकर देखने लगे । किंतु दूसरे ही क्षण करवाल, मूसल, मुद्गर, शर, चाप तथा
केयूरो से युक्त बीस बाहुएँ तथा महान् मुकुटो से अलकृत दसो सिर ऐसे उग आये कि
राम भी इसे देख चकित होकर कहने लगे—'मेरा काटना ही झूठ था ।' इस पर क्रुद्ध
होकर दाशरथि ने पुन उसके सिर और हाथ काट डाले । किंतु जितने वेग से राम उसके
सिर काट देते, उतने ही वेग के साथ उसके सिर उग आते थे । सिर के मुकुटो पर वाणो
के लगने की ध्वनि कानो में पडने के पहले ही नये उगे हुए सिरो से निकलनेवाला भयकर
अट्टहास कानो में सुनाई पडता था । रावण के कटे हुए सिरो के स्थान पर तुरत नये
सिर उग आते थे और कटे हुए सिरो में राम के वाण गडे हुए रह जाते थे, तो ऐसा
लगता था कि मानो रावण ने ब्रह्मा से, केवल कठ पर सिरो के उग आने का ही वर नही
प्राप्त किया था, बल्कि शरो में भी सिरो के उग आने का वर प्राप्त किया था । उनके
सिरो का कटना, कटे हुए सिरो का वाण के साथ ऊपर उठना, फिर नये उग आये हुए
सिरो को बाणो से काटना, ये सभी व्यापार एक के वाद एक इतनी शीघ्र गति से चलने लगे
४४६ | रंगनाथ रामायण
कि दर्शक चकित रह जाते थे और ऐसा लगता था, मानो सौरभ-युक्त राम-बाण-रूपी
उत्पलों के साथ रावण के सिर-रूपी कमल-समूह को मिलाकर, रक्त-धारा-रूपी सूत्र में
माला गूंथकर, स्वर्ग का माली बार-बार देवताओ को मालाएँ समर्पित कर रहा हो ।
रघुराम क्रोध से व्यग्र हो, अपना रण-कौशल दिखाते हुए, अच्छी तरह लक्ष्य साधकर,
अपनी दृढ़ मुष्टि के चमत्कार से, रावण के सिर तथा भुजाएँ काटते जाते थे और शीघ्र ही
वे उग आते थे । जितनी ही शीघ्रता से राम उन्हें काटते थे, उतनी ही शीघ्रता से वे उग
आते थे । राम के शर-समूह से रावण के सिर तथा करो का कट जाना और फिर उनका
निकल आना इस वेग से होता था कि राक्षसो तथा वानरो को इसका पता भी नही लगता था।
रघुराम के शरो से कटकर गिरे हुए रावण के सिर न जँभाई लेते थे, न दर्द का
अनुभव करते थे, न मंद पड़ते थे, न शक्तिहीन होते थे, न अपने उल्लास से रहित होते थे,
न कांति-हीन होते थे, न परितप्त होते थे, न पलक मारते थे, न उत्साह खोते थे,
और न अपनी क्रुद्ध दृष्टि ही तजते थे । पूर्व की भांति वही क्रुद्ध दृष्टि, वे ही तनी हुई
भौंहें, वही अट्टहास, वही गर्जन, वही वाणी, वही अनुग्रह, वही युद्ध की क्लांति, वही धृति,
और वही हुंकार ? इनसे रहित एक भी सिर उस रण-भूमि में कटकर गिरे हुए रावण
के सिरो में नही दीखता था। जो अट्टहास, जो दर्प और जो रोष-पूर्ण दृष्टि, गिरते हुए सिरो
में दीखते थे, उसी प्रकार के अट्टहास, दर्प एव रोषपूर्ण दृष्टि उगते हुए सिरो में भी दिखाई
पडते थे । दानवेंद्र के सिरो तथा बाहुओ से पृथ्वी तथा आकाश के बीच का भाग भरने
लगा । यह देखकर राम का क्रोध और भी अधिक बढ़ गया, वे लगातार बाणो को
चलाने लगे । तब रावण अपने कटे हुए सिरो तथा बाहुओ को, नये उगे हुए करो से
उठा-उठाकर क्रोधपूर्ण दृष्टि के साथ बड़े वेग से राम पर फेंकने लगा । उसके फेंके हुए
सिर और भुजाएँ राम पर इस तरह आक्रमण करते हुए जान पड़ते थे, जैसे कमनीय वानर-
ग्रह के मध्य विलसित कुमुद-बंधु, षोडश कला-पूर्ण, जगदानंददायक रघुराम-रूपी चंद्र को
देखकर, चंद्र के भ्रम में, कमल-समूह (रावण के सिर) राहु-कोटि (रावण की भुजाएँ) से
युक्त हो, परस्पर सहायता करते हुए, एक साथ आकर उन (राम-रूपी चंद्र) पर आक्रमण
करते हों ।* सिरों तथा करो का एक साथ आना ऐसा लगता था, मानो राम तथा
विजय-लक्ष्मी के विवाह के समय देवताओं ने पल्लव-रत्न-दर्पण तोरण सुंदर ढंग से
सजाये हों । कटते हुए सिर एव विशाल बाहुएँ, बरसनेवाले शर तथा उलूक, काक आदि
खग, पृथ्वी को कंपित करते हुए गगन-मंडल में ऐसे व्याप्त हो गये, मानो यमराज
की सभा का भयंकर वितान हो । इस कारण देवताओ को भी यह मालूम नहीं
होता था कि यह दिन है या रात है या संध्या । प्रख्यात धनुषो एव शरो की दीप्ति
के कारण भूमि में दिन की भाँति प्रकाश व्याप्त था ।
अपनी शक्ति-भर प्रयत्न के पश्चात् भी उस दैत्य को जीतने की किंचित् भी आशा
न देखने के कारण राम शर-संधान का कार्य स्थगित करके बार-बार मन-ही-मन सोचने
*कमल और राहु दोनों चंद्र के शत्रु माने जाते है, इसलिए दोनों मिलकर राम-रूपी चंद्रमा पर
आक्रमण कर रहे थे ।—ले०