रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ रंगनाथ रामायण
युक्त लंकेश्वर तब ऐसा दीखने लगा, मानो रामचंद्र के शर-रूपी वसंत के आगमन के
प्रभाव से विकसित तरुण, अरुण अशोक वृक्ष हो । तब राक्षसपति ने रोष से राम के
विशाल वक्ष पर एक सहस्र वाण चलाये । वे वाण काकुत्स्थ-वंशज के शरीर में प्रवेश
करके आश्चर्यजनक रीति से उनके शरीर के पार निकल गये और पृथ्वी में धँसकर पाताल
में प्रवेश कर गये, मानो वे बता रहे हों कि अधम राक्षस के द्वारा प्रयुक्त हो, देवताओ के
दुर्भाग्य से विचलित न होकर अपनी विषम शक्ति को प्रकट करते हुए, निर्मल गुणो से रहित हो,
धर्म-मार्ग को तजकर, अपने औद्धत्य से राघव को दुःख देनेवाले वाण अधोगति के
'सिवा सद्गति कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? क्षतो से बहनेवाले रक्त से राघव लथपथ हो
गये और प्रलय-काल की भीषण अग्नि-ज्वालाओ की भाँति जलते हुए, आँखो से निकलनेवाले
अग्नि-कणो को आकाश-भर में व्याप्त करते हुए प्रलय के समय जहाँ-तहाँ विचरनेवाले यम
के समान भयंकर तेज से युक्त हो, प्रचंड मार्त्तण्ड-मण्डल की किरणो के समान तेजस्वी शर-
समूह को चलाकर रावण के गर्व, मद तथा शक्ति का नाश करते हुए उसका सारा शरीर
ऐसा जर्जर कर दिया कि वह निश्चेष्ट-सा रह गया । रघुराम के वाणो के वेग को
देखकर रावण निर्वेद से अभिभूत होकर खडा रह गया ।
१४३. राम-रावण का परस्पर दोषारोपण
तब प्रताप-भास्कर राघव ने दशकंठ को देखकर कहा—"क्यो रे रावण, निर्वेद से
चेष्टाहोन होकर तू ऐसे क्यो खडा है ? तू तो कहता था कि मै कभी हारूँगा नही । वे
दर्प-पूर्ण वचन अब कहाँ गये ? रे दशकंठ ! अपने भाई कुवेर का अपमान करके, एक
पराये व्यक्ति की तरह उसका पुष्पक विमान ले आना और वन में हमें धोखा देकर सीता
को चुराकर ले आना, क्या ये सब वीरोचित कार्य हैं ? क्या, इन्ही कार्यों पर तू गर्व
करता था ? अपने पूर्व जन्म के पापो के कारण तू मेरे दृष्टिपथ में पड गया है । अब मै
तेरा सहार किये बिना कैसे छोड दूँ ? मै न तुझे छोडूंगा और न तेरी लका को छोडूंगा,
चाहे हरिहर और ब्रह्मा ही तेरी सहायता करने के लिए क्यो न आवें, फिर भी में युद्ध में
तेरा वध अवश्य करूँगा, तुझे कदापि छोडूंगा नही । रे रावण, आज मैं तेरा रक्त-
मास समस्त भूतो को खिलाऊँगा । तू क्रूर है, अति कामातुर है, दुष्ट-बुद्धि है, और देवताओ
का द्रोही है, इसलिए तू युद्ध-भूमि से भाग भी जायगा, तो भी तेरा पीछा करके तेरा सहार
करना मेरे लिए महान् पुण्य का कार्य होगा । तेरी मृत्यु अब तेरे निकट आ पहुँची है,
इसलिए तुझे ऐसी बातें कहने से कोई प्रयोजन नही है । आज में तेरे पराक्रम, बाहुबल
तथा वैभव को समाप्त करूँगा । क्या, तू नही जानता कि मैने तेरे भाई भुवन-भयंकर खर
नामक दैत्य का सहार किया है । और एक बात मै तुझसे कहूँ, तू यदि आज भी जानकी
'को मुझे लौटाकर मेरी शरण माँगो, तो में तेरी रक्षा करूँगा । इसमें सदेह मत कर ।
यदि युद्ध करेगा, तो तेरी विजय असंभव है और पराजय निश्चित है । (ब्रह्मा के) वर के
प्रताप से तूने दीर्घ आयु पाई है, कई प्रकार की मायाओ को जानता है । भयंकर युद्ध के
'शस्त्रास्त्र रखता है और इंद्रादि समस्त दिक्पालो तथा तीनो भुवनो को तूने जीत लिया है ।
ऐसे वीर का वध आज में अवश्य करूँगा ।"