रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 473, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंरघुराम की ये बातें रावण को अग्नि-ज्वालाओ के समान ज़लाने लगी । तब दश-
कठ क्रोधोन्मत्त हो रघुराम से कहने लगा--'कदाचित् तुम इस बात के कारण फूल रहे
हो कि तुमने कुछ क्षुद्र राक्षसो का सहार किया है । तुम मुझे नही जानते । मेरी शक्ति
का परिचय तुम्हें नही है । मैं ने स्वर्ग के निवासी यक्ष, गधर्व, देवता तथा दिक्पालो का
अपमान करके उन्हें परास्त किया है और बडी निरकुशता के साथ राज्य करता रहा ।
ऐसे बल-पराक्रम से सपन्न मैं तुम्हारी परवाह करूँगा ? जबतक में तुम्हें और तुम्हारे
भाई का युद्ध में सहार करके उस दृश्य को जी भरकर नही देखूँगा, तबतक में लका में
प्रवेश नहीं करूँगा ।' ऐसा कहकर रावण ने प्रलय-काल की अग्नि के समान जलनेवाले
असख्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र राम पर चलाये । तब राम ने क्रुद्ध होकर एक प्रतिवाण छोडा।
उसके पश्चात् उन्होने बडे हर्ष से उन दिव्यास्त्रो का स्मरण किया, जिन्हें विश्वामित्र ने
ताडका के वध के दिन दिया था । स्मरण करते ही वे सभी दिव्यास्त्र स्फुलिंगो को विकीर्ण
करते हुए उनके समक्ष साकार होकर उपस्थित हो गये । तब राम ने उन दिव्यास्त्रो का
समुचित रीति से सधान किया और दायें-वायें इस प्रकार चलाया, जैसे पर्वत पर बिजलियों
की वर्षा होती है । इससे भी तृप्त न होकर राम ने अपनी उद्धत शक्ति का प्रदर्शन करते
हुए ऐसी बाण-वृष्टि की कि दशकठ दृष्टि से भी ओझल हो गया ।
१४४. रावण की मूर्च्छा
राम के शरो के आघात से आहत हो रावण रथ पर ही मूर्च्छित होकर गिर पडा ।
यह देखकर कालकेतु भयाकुल हो उस रथ को युद्ध-भूमि के बाहर ले गया । इससे देखकर
देवता हर्ष-निनाद करने लगे और वानर-समूह उत्साह से सिंह-गर्जन करने लगा । थोडी देर
के पश्चात् राक्षसराज की मूर्च्छा दूर हुई । वह रण-विक्रम का प्रदर्शन करते हुए रथ पर
खडे हुए अपने सारथी से कहा--'क्यो रे, तुमने ऐसा अपराध क्यो किया ? युद्ध-भूमि से
तुम रथ को इतनी दूर क्यो ले आये ? मेरी कीर्त्ति को कलकित करते हुए तुमने राम को
हँसने का अवसर क्यो दिया ?' तब सारथी ने कहा--'हे देव, परास्त होने पर या शत्रु
से मिलने पर मुझे रथ को युद्ध-भूमि से बाहर नही लाना चाहिए । रथी को सकट में
देखकर ही रथ को युद्ध-भूमि से लौटा ले जाना सारथी का रण-धर्म है। इसलिए मैं,
आपको यहाँ ले आया हूँ।' तब रावण ने उसके विवेक की प्रशसा करते हुए बडे हर्ष के
साथ उसे उचित भेंट दी और उसको देखकर कहा--'वह देखो, राम अब भी रण के मध्य
खडा है । उसके रथ के निकट हमारा रथ ले चलो ।' तब कालकेतु ने बडे वेग से रथ
चलाकर उसे राम के रथ के आगे प्रतिष्ठित किया । दशकठ के रथ को उद्धत वेग से
आते हुए देखकर राम ने मातलि से कहा--'रावण का रथ आ रहा है । तुम मेरा रथ
शीघ्र उसके निकट ले चलो । दृष्टि को चचल किये विना, तीव्र बाणों के भय से विचलित
हुए बिना, बागडोर को अच्छी तरह सँभाले हुए अश्वो को हाँको । हे मातलि, घोडो का
मन तुम जानते हो । ऐसा सारथ्य करो कि रथ का वेग विचित्र दिखाई पडे । कोई ऐसी
बात नही, जो तुम नही जानते । मैं और तुम्हें क्या कहूँ ?' तब मातलि ने अपना रथ
विपरीत मार्ग से रावण के रथ के पास ले गया । तब लोककटक तथा तीनो लोको को