रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
लोकों में यह प्रख्यात है । यह अत्यधिक बलवान् है तथा रावण का मामा लगता है ।
यह महान् पराक्रमी है और इसका नाम प्रहस्त है । (रावण के द्वारा) चन्द्रशेखर के मित्र
(कुवेर) के सामत को पराजित होते समय इसने मणिभद्र को परास्त किया था। हे रवि-
कुलोत्तम, इसके साथ वानर-नायको को घोर युद्ध करना होगा ।'
इस प्रकार विभीषण के कहते समय ही वानर-वीर पर्वतो तथा वृक्षो को उठाये
सिंहनाद करते हुए दानवो का सामना करने लगे । असुर-सेना ने भी भयकर गर्जन करते
हुए वानरो पर आक्रमण किया । प्रलय-काल की अग्नि तथा वडवानल आपस में कभी
सघर्ष नही करते, पृथ्वी और आकाश का एक दूसरे से टकराकर चूर-चूर होना सभव
नही, भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डो का आपस में टकराना सभव नही । यदि ऐसा कभी हुआ
होता, तो इन राक्षस तथा वानर-सेनाओ के युद्ध की उपमा उनसे दी जा सकती थी ।
राक्षस अग्नि-सम बाण-समूह को वानरो पर चलाते थे । कुछ राक्षस खड्ग, गदा, भाले,
मूसल तथा भयकर चक्र आदि शस्त्रो को भी चलाते थे । तब वानर-सेना राक्षसो
पर बडे वेग से वृक्षो तथा पर्वतो को फेंकती थी । इस घोर युद्ध में पृथ्वी पर लुढकने-
वाले सिर, विदीर्ण होनेवाले वक्ष, चूर-चूर होनेवाले कधे, बाहर निकल पडनेवाली आँतें,
फूटनेवाले सिर, टूटनेवाली पसलियाँ, उमडनेवाला रक्त, छितरानेवाला भेजा, छिन्न-भिन्न
होनेवाले पैर, उछलकर गिरनेवाले हाथ, पिडाकृति धारण कर सडनेवाले शव, आधा
कटकर गिरे हुए शरीर, घूम जानेवाली पुतलियाँ, ये सब अत्यत भयकर दीखने लगे ।
युद्ध-भूमि में राक्षस और वानर निर्भय होकर बडे उत्साह से लडते थे । सहसा कपि-
वीरो ने राक्षसो पर बडा भयकर धावा बोल दिया । द्विविद ने नरातक पर एक पर्वत-
शिखर उठाकर फेंका । तार ने एक वट-वृक्ष को वेग से चलाकर कुभ हनु को गिरा दिया।
जाबवान् ने महानद पर एक विशाल पर्वत को गिरा दिया । दुर्मुख ने समुन्नत को एक
विशाल वृक्ष से मार गिराया ।
इस प्रकार, राक्षसो को वानरो के प्रहारो से बुरी तरह मरते हुए देखकर प्रहस्त ने
अपने प्रमुख साथियो की मृत्यु निश्चित जान और अत्यत क्रुद्ध होकर अपने रथ को विचित्र
वेग से चलाकर एक-एक प्रहार से एक साथ दस, बीस, तीस तथा चालीस वानरो का सहार
किया । तब वानर भी पर्वतो तथा वृक्षो को गिराकर प्रहस्त की सेना का नाश करने लगे।
रक्त की नदियाँ उमड-उडकर आकाश का स्पर्श करती हुई-सी बहने लगी, रक्त की उस
धारा में ही जहाँ-तहाँ वानर तथा असुर घोर गर्जन करते हुए युद्ध करते थे । उनके
पराक्रम को देखकर देवता भी उनकी प्रशसा करने लगे ।
तब प्रहस्त कालातक के समान अपने अद्वितीय प्रताप का प्रदर्शन करते हुए वानरो
के करो तथा चरणो को काटते हुए, उनके वक्ष स्थलो को विदीर्ण करते हुए, सिर तथा
बाहुओ को पृथ्वी पर गिराते हुए, हड्डियो तथा दांतो को चूर-चूर करते हुए, चक्रो से खड-
खड करके, अकुशो से चीरकर, भालो से चुभोकर, विशाल पाशो से बाँधकर, परशु से
काटकर, शूलो को भोककर बरछियो से उछालकर तथा शक्तियो से पीटकर वानरो के मास
तथा भेजा के ढेर-सा लगा दिया और अपनी शर-वृष्टि से वानरो को मारकर सभी भृतों
४१
३२२ रंगनाथ रामायण
को बलि चढ़ाई । इस प्रकार, प्रहस्त ने अपने दुर्वार विक्रम से वानरों का संहार करने में
सफल होकर सभी दिशाओं को विदीर्ण करते हुए भयंकर गर्जन किया ।
५७. नील के द्वारा प्रहस्त का वध
वानर-सेना को इस प्रकार नष्ट होते हुए देखकर, उद्भट-रण-कुशल नील भयंकर
हुंकार करते हुए प्रहस्त पर आक्रमण करने के लिए ऐसी अद्भुत गति से चला कि सारी
पृथ्वी काँप गई । उसने एक विशाल वृक्ष को उखाड़ लिया और सहज ही उस राक्षस
के रथ पर जा चढ़ा । उसने सारथी को मार डाला, अश्वों का नाश कर दिया, और
देखते-देखते प्रहस्त के धनुष को खंडित कर दिया । तब भयंकर गर्जन करते हुए प्रहस्त एक
मूसल लेकर रथ से उतर पड़ा और नील के सामने डट गया । नील ने निर्भीक होकर
उसका सामना किया, मानो वह अपनी विजय में पूरा विश्वास रखता हो । फिर, दोनों
युद्ध करते हुए एक दूसरे को परास्त करने का प्रयत्न करने लगे, जैसे वृत्रासुर तथा कौशिक ने
(पहले) किया था । प्रहस्त ने अच्छी तरह लक्ष्य करके मूसल से नील के ललाट पर
ऐसा तुला हुआ प्रहार किया कि उसका ललाट फूट गया । उससे छूटनेवाली रक्त-धारा
को पोंछते हुए नील ने अत्यधिक क्रोध से उस प्रहस्त पर वृक्षों से प्रबल प्रहार किया ।
किन्तु, उस राक्षस ने फिर से उसी मूसल से नील पर प्रहार किया । इस आघात से नील
लड़खड़ाने लगा, फिर भी उसने वृक्ष को छोड़कर उसी समय भयंकर गर्जन करके एक
विशाल पहाड़ उठाकर लक्ष्य करके उस राक्षस के सिर पर फेंका । नील के उस प्रहार से
प्रहस्त का शरीर, सिर तथा आभूषण छिन्न-भिन्न हो गये और इन्द्र के प्रहार से सिकुड़कर
गिरनेवाले पर्वत के समान वह राक्षस पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसके गिरते ही सभी कपियों ने
विजय-घोष किया और राक्षस-सेना लंका की ओर भागने लगी ।
उस समय सारी युद्ध-भूमि, अमृत-सागर-सुता (लक्ष्मी) के समान हरि* (विष्णु अथवा अश्व)
युत अंगों से, दानशील के निवास के समान मार्गणों * (याचक अथवा बाण) के
समूह से, जम्बूद्वीप के समान नवखंडों * (द्वीप अथवा खंड) से, प्रेमी पति के निकट वनिता
की भाँति राग-रस* (प्रेम रस अथवा रक्त) से, दुर्गम वन के सदृश पुंडरीकों * (व्याघ्र अथवा
गज) से, सुंदर मधु-मास की भाँति आरक्त, फुल्ल, पलाशों * (पलाश वृक्ष अथवा राक्षस) से,
शिव के निवास की नाईं भूत-गण * (शिव के सेवक अथवा प्रेत) से, सूर्य-प्रकाश से विलसित
गगन के समान अस्त-व्यस्त तारकों* (नक्षत्र अथवा आँख के तारे) से, तीव्र निदाघ के समान
अंबर-मणियों * (सूर्य अथवा वस्त्राभरण) से, अर्द्ध-नारीश्वर के समान अर्द्ध-शरीरों से युवत
हो, अनेक प्रकार से आश्चर्य उत्पन्न करती थी ।
तब नील शीघ्र ही राघवाधीश के समक्ष गया और उनके चरणों को प्रणाम किया।
वानरों ने बार-बार नील की प्रशंसा की । हतशेष राक्षस भयभीत हो भागकर रावण के
निकट पहुँचे और उसे सारा वृत्तांत कह सुनाया । तब रावण ने शोक-विह्वल हो अपने
मंत्रियों से कहा—'युद्ध करने गये हुए सभी वीर लौटने का नाम तक नहीं ले रहे हैं और
वानरों के हाथों मर रहे हैं। अब वैरियोँ का गर्व चूर करने के लिए मैं स्वयं ही जाऊँगा ।'
*इस प्रसंग में हरि, मार्गण, नवखंड आदि शब्दों में श्लेष है ।—ले०
युद्धकांड ३२३
५८ मंदोदरी के हित-वचन.
रावण की सभी बातें सुनकर, मंदोदरी शीघ्र माल्यवान् के पीछे, दैत्य-स्त्रियो के
साथ रावण की सभा की ओर चली। उसके पीछे-पीछे अतिकाय तथा प्रतीहारी चलने लगे ।
आयुधो से अलंकृत अन्य सैनिक भी उनका अनुसरण करने लगे । चामरिक-समूह
चामर डुला रहे थे और सभी मंत्री भी उसके साथ चल रहे थे । अपने समस्त आभूषणो
की शोभा को चारो ओर विकीर्ण करती हुई उसने रावण की सभा में ऐसे प्रवेश किया,
मानो नील-मेघो के मध्य विलसित होनेवाली बिजली हो ।
रावण ने मंदोदरी को अपने सिंहासन के अर्द्ध भाग पर आसीन कराया और प्रिय
वचन कहते हुए बुद्धिमान् मन्त्रियो को उचित आसनों पर बिठाया । प्रणाम करनेवाले
अतिकाय को प्रसन्नता से अपने निकट ही एक आसन पर बिठाया ? उसके पश्चात् दानवेश्वर ने
अपनी स्त्री से कहा--'हे कुवलयनेत्री, तुम तो इस प्रकार कभी सभा में नही
आती । आज तुमको कंपित शरीर से इस प्रकार सभा में आते देखकर मुझे आश्चर्य
हो रहा है ! तुम्हारे आगमन का क्या कारण है ?'
तब मंदोदरी ने अपने पति को देखकर कहा- "हे दनुजेश, आज मुझे यहाँ आने
की आवश्यकता पड़ी, इसलिए मैं आई हूँ । आप मेरे आगमन को बुरा न मानिए ।
हे देव, आपने देखा कि धूम्राक्ष आदि हमारे सेनापति युद्ध में कैसे मारे गये ? राम ने जन्म-स्थान
में चौदह सहस्र राक्षसो का सहार किया था और खर तथा त्रिशिर का वध किया था ।
मैं कहती हूँ कि ऐसा वीर एक साधारण मनुष्य नही हो सकता । इतना ही नही, राम ने
दण्डक-वन में महान् बलशाली कबंध का सहार किया । मारीच की मायाओ की उपेक्षा
करके उन्होने उसका वध किया । एक भयंकर अस्त्र से वालि का सहार किया । राघव ने
देवताओ के हित के लिए इस ससार में जन्म लिया है । वे स्वयं आदिनारायण है अन्यथा
इस पृथ्वी पर ऐसा पराक्रमी नर कहाँ मिलेगा ? उन्होने ही तो नीलकंठ के धनुष को भग्न
किया था ? अपने पिता की आज्ञा से जिस समय वे वन में तपस्वी का जीवन व्यतीत
करते थे, उसी समय आप सीता को हर लाये । रामचन्द्र ने आपका क्या अहित किया था।
राम-लक्ष्मण से युद्ध करने की क्षमता तीनो लोको में कौन रखता है ? यदि साम, दान
तथा भेद से शत्रु वश में आ जाय, तो दण्ड का उपाय अपनाना उचित नही । यदि आप
दण्ड देना भी चाहें, तो क्या राम-लक्ष्मण आपसे दण्ड भोगेंगे ? हे देव, राम परमात्मा हैं,
अत आप उनके समक्ष नतमस्तक हो, तो इसमें कोई दोष नही । यदि आप उनसे शरण
मांगें, तो वे आपको अवश्य अपनायेंगे । शरण माँगने से आपका शुभ ही होगा, हानि नही ।
काकुत्स्थवंशी राम के गुण, रूप, कृपा आदि गुण-गण का वर्णन करना कैसे संभव है ?
यदि वे क्रोध में आ जायें, तो इन्द्रादि देवता भी ठहर नही सकते, तब आपके लिए (उनका
सामना करना) कैसे संभव है ? अब आप इस प्रयत्न को छोड़ दीजिए । व्यर्थ ही दर्प की
अग्नि में नाश मत होइए । हठ छोड़िए और संताप त्यागकर सीता को लौटा दीजिए ।
इसी में आपका हित होगा । हे लंकेश, आप अपने कुल तथा लंका की रक्षा कीजिए ।
ऊँचे वाहनो तथा मणि-भूषणो के साथ आप जानकी को लौटा दीजिए और उपाक्ष, अतिकाय
३२४ रंगनाथ रामायण
तथा माल्यवान् के द्वारा संधि का प्रस्ताव भेजिए। बहुत क्यो ? क्या, आपने कार्त्तवीर्य के
साथ संधि नहीं की थी ? तब उस कार्त्तवीर्य को जीतनेवाले भार्गव राम को परास्त करने-
वाले यशस्वी राम क्या संधि करने के योग्य नही है।"
५९. मंदोदरी की मंत्रणा की उपेक्षा करना
मंदोदरी के इन दीन वचनों को सुनकर रावण क्रोध से दीर्घ श्वास लेने लगा ।
उसकी लाल आँखों से क्रोधाग्नि की चिनगारियाँ छूटने लगीं । उसने मदोदरी को देखकर
कहा—'हे नारी, हित-बुद्धि से तुमने मुझे उपदेश दिया है; किन्तु तुम्हारी बातो में एक
भी मुझे अच्छी नहीं लगतीं। दानव, यक्ष, गंधर्व देव आदि की सेवाएँ प्राप्त करने-
वाले मुझे तुम वानरों के आश्रय में जीनेवाले नर को प्रणाम करने का उपदेश देती हो ।
ऐसी बात तुम इस सभा में कैसे कह सकी ? क्या, तुम्हारे लिए यह उचित है ? उस
इक्ष्वाकुवंशी ने जान-बूझकर पहले हमारा अहित किया था; तभी तो मैं उसकी स्त्री को
ले आया । खर-दूषण आदि के संहार तथा तुम्हारी ननद के अपमान को भुलाकर मूर्ख के
समान मैं कैसे राम से संधि कर लूं ? यह असंभव है । अपने भयंकर बाणो से विभीषण,
सुग्रीव तथा राम-लक्ष्मण के साथ सभी वानरो को मारकर मैं विजय पाऊँगा । यदि विजय नहीं
प्राप्त करूँगा, तो युद्ध-भूमि में ही अपने प्राण दे दूँगा; किन्तु उस राम के साथ न संधि करूँगा,
न जानकी को ही लौटाऊँगा । यही मेरा दृढ़ निश्चय है । तुम्हारे ज्येष्ठ पुत्र, उदात्त
पराक्रमी, इन्द्रजीत के रहते तुम्हें किस बात का भय है ? मेरे पुत्र भयंकर आकारवाले
तथा दुर्वार पराक्रमी हैं; मेरा सामना कौन कर सकता है ?'
इन बातो को सुनकर मंदोदरी चिंताक्रांत मन से सिर झुकाकर सभा से ऐसे चली गई,
मानो रावण की लक्ष्मी ही यों सोचती हुई रावण से अलग हो रही हो कि यह नीच
तथा निकृष्ट नीति का अनुसरण करते हुए अपना बुरा-भला आप ही नही पहचान पा रहा है।
६०. रावण का प्रथम युद्ध
तब रावण ने अपने गुप्तचरों से कहा—'चिर काल से मेरे मन में जो क्रोध था,
उसका आज परिहार करूँगा । मैं उस (राम) के लिए कालरुद्र हूँ और वह मेरे लिए
अंधकासुर है । मेरे तूणीरों से निकलनेवाले अस्त्र, केंचुलों से मुक्त होनेवाले क्रूर सर्पों के
समान राघव को लगेंगे । राम मृत्यु से प्रेरित होकर, कपि-सेना का विश्वास करके यहाँ
आया है । तुम शीघ्र मेरे युद्ध करने के लिए दिव्य शस्त्रास्त्रों से सज्जित करके रथ ले
आओ ।'
उसके आदेशानुसार वे गुप्तचर सूर्य-प्रभा के समान दीप्तिमान् श्रेष्ठ रथ ले आये । फिर,
अपने नीच मनोरथ पर आरूढ होने की भाँति रावण उस रथ पर आरूढ हुआ । अपने
दीप्तिमान् आभूषणों से अलंकृत रावण के उस रथ पर बैठते ही, उसके आभूषणों की प्रभा
दिशाओं तथा आकाश में आश्चर्यजनक ढंग से व्याप्त हो गई, मानो युद्ध में राम के बाणों
की अग्नि-ज्वालाओं में रथ-समेत स्वयं रावण दग्ध हो रहा हो । निशानों का विपुल निनाद,
पटह, भेरी तथा शंख का भयंकर घोष, हाथियों की चिंघाड़, अश्वों की हिनहिनाहट, बन्दी
मागधो के स्तुति-गान की गंभीर ध्वनि, रथो के चलने की ध्वनि, सैनिको के हुकार, तथा
पृथ्वी को विदीर्ण करनेवाले उनके पदाघात की सम्मिलित ध्वनि भयंकर गति से समस्त
ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो लका के समुद्र के सभी जलचर एक साथ आर्त-ध्वनि कर
रहे हो कि रामचन्द्र जैसे पहले समुद्र पर क्रुद्ध हुए थे, वैसे ही वे आज क्रुद्ध हो गये हैं ।
(राक्षसो के) वृहदाकार रथ, रामचन्द्र के मनोरथो के समान ऐसे चलने लगे, मानो कह
रहे हो कि हे राम, हम दैत्य-समूह को ले आये है, आप इन्हें ग्रहण कीजिए । असख्य
गज-समूह पृथ्वी को कँपाते हुए चलने लगे । उनके कर (सूँड) रामचन्द्र के करो (हाथ)
के लिए दुर्जय न होने पर भी भयंकर दीख रहे थे और उन सूँडो के चारो ओर शिली-
मुख (भ्रमर) ऐसे झकार कर रहे थे, मानो कह रहे हो कि इनमें रामचन्द्र के शिलीमुख
(वाण)-समूह लगकर इनका (गजो का) मद गिराने के पहले हम अब इनकी मद-धाराओ
का पान कर लें । घोडे ऐसे झूमते हुए चल रहे थे,
३२६ | रंगनाथ रामायण
समुज्ज्वल मुँह पर अत्यधिक रोष दिखाई पड रहा है, वार-वार अपने अंकुश की प्रेरणा से
हाथी की चाल को तीव्र करने का प्रयत्न करते हुए बडे वेग से आ रहा है, वही उपाक्ष है।
भीषण घटा-रव करनेवाले रथ पर चढकर आनेवाला, महोदर है । उसने युद्ध में बहुत-से
लोगो का सहार किया था । रत्न-प्रभा-सपन्न अरुण कवच धारण किये, अश्व पर आरूढ
जो उद्धत होकर गरुड के समान वेग से आ रहा है, वह पिशाचो का नायक है । युद्ध
में इसका सामना करनेवाला कोई नही है । सिंह पर चढकर शूल हाथ में लिये जो
आ रहा है, वह युद्ध-प्रिय त्रिशिर है । विपुल घटारव करनेवाले तथा सर्प-ध्वजा से युक्त रथ
पर बैठकर धनुष का टकार करनेवाला, काले शरीर का वह राक्षस, कुभ है । स्वर्ण-
मणि-खचित ध्वजा से युक्त इस चित्ररथ पर बैठकर आनेवाला, वह विशालबाहु राक्षस,
निकुंभ कहलाता है । अग्निसम उज्ज्वल रथ पर आरूढ हो, बडे दर्प के साथ युद्ध करने
की तीव्र लालसा से विष-दृष्टियो से कपि-सेना की ओर देखते हुए, धनुष पर बाण चढाते
हुए आनेवाला नरातक नामक राक्षस है । जैसे भूत-गण कालनेत्र की (शिवजी) सेवा
में रहते है, वैसे ही गज-मुख, अश्व-मुख, सिंह-मुख, व्याघ्र-मुख, सर्प-मुख तथा उष्ट्र-मुख-
वाले भयंकर राक्षस जिसकी सेवा में लगे हुए हैं, और जो भयंकर गर्जन कर रहा है, वह
उभरी हुई आंखोवाला राक्षस देवातक है । हे देव, वहाँ जो स्वर्ण-रथ पर आरूढ है, जो
एक विशाल धनुष को एक तृण के सदृश सँभाले हुए भयंकर टकार कर रहा है, जो कभी
पराजय का नाम तक नही जानता, जो नरभोज का पुत्र है, जो अपने शरीर पर अरुण
चंदन का लेप किये हुए है, जो तीक्ष्ण तथा क्रुद्ध दृष्टियो से युक्त है, जिसका शरीर सांध्य-
मेघो के समान है, जो विंध्याचल के सदृश विशालकाय है, और जो करोडो छत्र-चामरो
से विलसित है, वही युद्ध का श्रेष्ठ शूर, अतिकाय है । वहाँ जो दम सहस्र श्वेत छत्रों तथा
स्वर्ण-चामरो से विलसित है, जो सिंह-ध्वज से युक्त तथा बलिष्ठ अश्व जुते हुए रथ परँ
आरूढ हो, विपुल शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित हो, धनुष का टकार करते हुए, हम पर दृष्टि
गडाये आ रहा है, वह इन्द्रजीत है । उसने ब्रह्मा के वर से अपार बाहुबल प्राप्त करके
अखिल देवताओ को युद्ध में जीत लिया था और इन्द्र को वदी बनाकर बडे गर्व से झूम-
रहा है । हे सूर्यकुलतिलक, अब मै उस प्रतापी लकानाथ को दिखाऊँगा, जो कनक-रत्न-प्रभा-
कलित दण्डो से युक्त चामरो से विलसित है, जिसके सिरो पर शोभायमान होनेवाले विचित्र
रत्नो की आभा से दीप्त दस किरीट ऐसे दीख रहे है, मानो (वे किरीट) बारहो सूर्य-
बिंबो को गलाकर बनाये गये हो, जिसके कर्णो को अलकृत करनेवाले महनीय मणिकुण्डलों
की प्रभा सभी दिशाओ में व्याप्त हो रही है, जो अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टियो से बहुत भयंकर
दीख रहा है, जिसने हर के निवास-स्थान कैलास पर्वत को उठाया था और देवागनाओ को वदी
बनाया था, जिसके वक्ष स्थल ने ऐरावत के दाँतो के प्रहारो को सहन किया था, जिसने
समस्त लोको पर विजय प्राप्त की थी और जिसने इन्द्र को भी युद्ध में परास्त किया था,
वही रावण वहीं सेना के मध्य में झूमता हुआ आ रहा है ।"
विभीषण के इस प्रकार सभी वीरो का परिचय देने के पश्चात्, राघव ने आश्चर्य
प्रकट करते हुए कहा-'हे विभीषण, यह बडी विचित्र बात है कि यह दानवेश्वर ऐसे महान्
युद्धकांड ३८७
तेज तथा सुदर आकार से विलसित है । भला, राक्षसो में ऐसा तेजस्वी कौन है ? यदि
यह क्रूरकर्मी नही होता, तो वह समस्त ससार के लिए पूज्य होता । इसके सभी राक्षस-
वीर सैनिक, पर्वताकारवाले, अपार शक्तिशाली, योद्धा, क्रूर-चरित्र तथा भयकर है। इसके
पश्चात् उग्रलोचन (शिव) के पिनाक को वश में लाने में निपुण राम तथा लक्ष्मण ने
धनुष तथा वाण धारण किये मानो (ससार को) बता रहे हो कि क्रुद्ध होने पर भी धर्म-
मार्ग का ही अनुसरण करनेवाले इन राजकुमारो की समता कौन कर सकता है ।'
तब रावण ने अपने सभी राक्षस-वीरो को देखकर कहा--'नगर के द्वारो पर तथा
बड़े-बड़े आँगनो में असख्य सैनिक लका के रक्षणार्थ रहें । जब हम और तुम युद्ध के लिए
चले जायेंगे, उस समय यदि वानर लका में प्रवेश करें, तो हमारी शक्ति किस काम की
होगी ? इसलिए इसका ध्यान रहे।' तब असख्य राक्षस इस रक्षण-कार्य के लिए चले गये ।
इसके पश्चात् रावण ने धनुष तथा बाण धारण किये हुए बड़े वेग से वानरो की
सेना पर ऐसे आक्रमण किया, जैसे दावाग्नि वनो को घेर लेती हो और पृथ्वी आकाश से
भिड जाती हो । उसने अत्यत तीक्ष्ण वाणो की ऐसी तीव्र वर्षा की कि यह विदित नही
होता था कि यह आकाश है, यह पृथ्वी है और ये दिशाएँ है । अपने उद्दण्ड बल को
प्रकट करते हुए उस राक्षस ने झुंड-के-झुंड वानरो को सहज ही खडित करके चूर-चूर
कर दिया, अस्थि, मज्जा, मास तथा रक्त से सारी युद्ध-भूमि को भर दिया और अपने धनुष
के टकारो से दिशाओ को प्रतिध्वनित करने लगा । गिरनेवाले, भ्रमित होनेवाले, मरनेवाले,
चकरानेवाले, भयभीत होनेवाले, आर्त्तनाद करनेवाले तथा विकृताग होनेवाले वानरो से रण-
भूमि को पूर्ण देखकर देवता सभ्रमित तथा व्याकुल हो गये ।
उस समय क्रूर कालानल की दुर्वार लीला के समान भयकर दशानन को अत्यत
भयानक रूप धारण करके गरजते हुए देखकर सुग्रीव ने उसका सामना किया और एक
पर्वत उठाकर उस पर फेंका, किन्तु रावण ने उसे बीच में ही अपने विपुल अस्त्रो से
चूर-चूर कर दिया और अपनी दीप्ति-ज्वालाओ को आकाश में फैलाते हुए, जलनेवाले एक
तीक्ष्ण शर को सुग्रीव के वक्ष पर चलाया, तो वह शर उसके शरीर के आर-पार निकल-
कर पृथ्वी में गड गया । तुरत सुग्रीव लडखडाते हुए पृथ्वी पर गिर पडा । यह देखकर
दानव हर्षध्वनि करने लगे और वानर अश्रु-धाराएँ बहाने लगे । इस पर महान् बाहुबली
ऋषभ, सुदंष्ट्र, गज, गवाक्ष, गवय, नल तथा ज्योतिर्मुख नामक वानरो ने क्रोधोन्मत्त होकर
रावण पर पर्वतो तथा वृक्षो से अविरत प्रहार किया । किन्तु, रावण ने उन सब को
बीच में ही खडित कर दिया और उन सातो वानरो को एक ही बाण से मृत-सा
कर दिया ।
६२. हनुमान् का रावण से युद्ध करके मूर्च्छित होना
अपनी सेना के नायको को इस प्रकार गिरते देखकर हनुमान् अत्यधिक क्रुद्ध हुआ
और बड़े दर्प मे रावण के रथ पर कूदकर उससे कहने लगा--'हे रावण, कदाचित् तुम
गर्व से फूलते रहे हो कि मैंने देवेन्द्र आदि देवताओ तथा राक्षसो पर विजय प्राप्त की है,
किन्तु मेरे सामने तुम्हारी दाल नही गल सकती, मैं तुम्हारा तेल निकाल दूँ गा । चिरकाल
३२८ रंगनाथ रामायण
से इस पृथ्वी पर उन्नत दशा में जीवित रहनेवाले तुम पर प्रहार करने के लिए मेरी
दक्षिण बाहु अपने-आप आगे बढ़ रही है । अभी मैं तुम्हारा वध करके तुम्हें यमपुर भेज
दूँगा । इसे निश्चय जानो ।'
हनुमान् के ये वचन सुनकर रावण का मुख क्रोध से विकृत हो उठा । उसने कहा-
'यदि तुममें शक्ति तथा सामर्थ्य हो, तुम अपनी समस्त शक्ति लगाकर मुझे एक घूसा
मारो । उसके पश्चात् तुम्हारे शौर्य तथा शक्ति को देखकर मैं भी घूसा मारूँगा ।' तब
हनुमान् ने अपना अद्भुत शौर्य दिखाते हुए दशकंठ से कहा—'देवाधिदेव, राम के भेजने
पर तुम्हारे नगर में आकर मैंने सीता का अन्वेषण किया और अंत में सीता को देखकर
उनसे रामचंद्रजी का संदेश सुनाया और लौटते समय अपना पराक्रम दिखाकर तुम्हारे वन
का सर्वनाश किया, तुम्हारी लका को जलाकर तुम्हारे पुत्र का वध किया और दैत्यों के
संभ्रमित होकर देखते-देखते मैं लौट पड़ा । आज तुम दर्प से फूलकर मेरी शक्ति देखने की
बात कह रहे हो । हे रावण, उस दिन तुम कहाँ छिप गये थे ?'
इस पर क्रुद्ध होकर असुरेश्वर ने हनुमान् के वक्ष पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया।
हनुमान् इस प्रहार से सिकुड़-सा गया; किन्तु फिर भी उसने अपनी समस्त शक्ति से रावण
पर एक घूसा चलाया । झंझावात से कंपित होनेवाले विशाल वृक्ष की भाँति, रावण काँप
गया । पीड़ित होनेवाले असुरेश्वर को देखकर इन्द्र आदि देवता हर्षित हुए; पर अल्प-
काल में ही रावण सँभल गया और हनुमान् को देखकर कहने लगा—'तुम्हारी शक्ति
प्रशंसनीय है । तुम्हारी मुष्टि के प्रभाव से मैं प्रेत-लोक का दर्शन कर आया ।' हनुमान् ने
कहा—'हे रावण, तुम अभी जीवित हो, फिर भी तुम मेरी प्रशंसा क्यो करते हो ?
(तुम्हारी बातें सुनकर) मुझे लज्जा हो रही है । तुम्हें तो मुझ पर प्रहार करना चाहिए।'
'तब लो, यह घूसा' कहते हुए रावण अपनी वज्र-सम मुष्टि से हनुमान् के वक्ष पर घोर
प्रहार किया । तुरंत हनुमान् मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ।
६३. नील का रावण से युद्ध करना
हनुमान् के गिर जाने के पश्चात् रावण नील से भिड़ गया । इतने में हनुमान् सचेत
हुआ और रावण को नील पर आक्रमण करते देखा; किन्तु वहाँ जाना अनुचित समझकर
वह वही रह गया । अपने ऊपर उद्धत गति से आक्रमण करनेवाले रावण को देखकर नील ने
बड़े क्रोध से मलय-शृंग को उठाकर फेंका । देवताओ के शत्रु ने सात बाणो से उसे बीच
में ही खंडित कर दिया । उसके पश्चात् भी नील रावण के विशाल वक्ष को लक्ष्य करके
पर्वतो तथा वृक्षो को चलाता रहा; किन्तु रावण ने अपने पैने बाण-समूह से उन सबको
चूर-चूर कर दिया और नील के शरीर पर कई पैने शर चलाये, जिसके कारण उसके
शरीर से रक्त की धाराएँ बहने लगीं । इस पर भी नील विचलित नही हुआ । सभी
राक्षसो को भयभीत करते हुए, लघुत्व धारण करके वह दानवराज के रथ पर कूद पड़ा
और अपनी अद्भुत शक्ति का परिचय देते हुए, उस रथ की ध्वजा पर उछलकर उसको
तोड़ दिया; फिर धनुष के अग्र-भाग पर कूदकर, रावण के लक्ष्य को भंग कर दिया ।
फिर, उसने अपने बाहुबल से सुर-सिद्ध-साध्यो को आश्चर्यचकित करते हुए रावण के
मुकुटों को पैरों से कुचलने लगा । उसने एक मुकुट को दूसरे मुकुट पर फेंका, एक मुकुट
पर से दूसरे मुकुट को गिराया, एक मुकुट से दूसरे मुकुट पर पद-प्रहार करके सभी मुकुटों
को मिट्टी में मिला दिया । इससे संतुष्ट न होकर, वह सूक्ष्म रूप में रहनेवाले अपने को
पकड़ने में रावण को असफल होते देखकर, हँसने लगा । फिर उसने रावण के छत्र फाटकर
फेंक दिये, उसके चामरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया, रथ पर प्रहार करके उसको खंड-खंड
कर दिया, क्रूरता के साथ दानवेश्वर की मुष्टि पर पद-प्रहार किया, उसके हारों को खींच-
कर फेंक दिया और उसके विशाल वक्ष पर प्रहार करने लगा । इस प्रकार, बड़े उत्साह
से युद्ध करनेवाले उस नील को देखकर राक्षस तथा वानर-सेनाएँ आश्चर्यचकित हो गईं ।
राम तथा लक्ष्मण भी विस्मित हुए । तब रावण अत्यन्त क्रोध से महान् अग्नि-बाण को
अपने धनुष पर चढ़ाकर उस अग्नि-पुत्र (नील) से कहा—'बलिहारी है तुम्हारे लाघव की।
मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ । तुम अपनी लघुता ही मुझे दिखाते रहो । अब यह लो,
अग्नि-बाण अपनी ज्वालाओं का प्रकाश फैलाता हुआ चला । इससे बचने का उपाय करो।'
यों कहते हुए उसने बाण चलाया । अग्नि-बाण के प्रभाव से नील का सारा शरीर जलने
लगा और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । अग्नि-पुत्र होने के कारण उसकी
३३० | रंगनाथ रामायण
अधिक ताप से युक्त थी । यह देखकर सभी देवता चकित-से रह गये । प्रलय-काल के
समान भयंकर गति से तथा अशनि से भी अधिक तेज से उस शक्ति को अपनी ओर
आते देखकर, लक्ष्मण ने उसका निवारण करने के लिए घोर शर-वृष्टि कर दी; किन्तु
उन बाणों की उपेक्षा करते हुए वह शक्ति लक्ष्मण के निकट आई और उनकी भुजाओं
के मध्य में लग गई । तुरन्त लक्ष्मण पृथ्वी पर गिर पड़े ।
तब दशानन ने लक्ष्मण को अपने बीस हाथों से उठाने का प्रयत्न किया, किन्तु
विष्णु का अंश होने के कारण वह उन्हें उठाने में असमर्थ हुआ । वह आश्चर्यचकित
होकर सोचने लगा कि मैं तो कैलास पर्वत को भी उखाड़कर उठा सका था, और मेरु
तथा मंदर पर्वतों को उठाने की शक्ति भी रखता हूँ । कैसा आश्चर्य है कि यह लक्ष्मण इतना
भारी हैं । ऐसा सोचते हुए, अपने बीस हाथों का सारा बल लगाकर रावण ने फिर एक
बार लक्ष्मण को उठाने का प्रयत्न किया । इतने में हनुमान् अत्यन्त क्रोध से उसके निकट
पहुँचा और सिंह-गर्जन करके उस क्रूर राक्षस के वक्ष पर वज्रसम अपनी मुष्टि से घोर
प्रहार किया । उस प्रहार से रावण मूर्च्छित होकर घुटनों के बल गिर पड़ा । रावण की
उस दशा को देखकर देवताओं ने हर्ष-ध्वनि की; कपियों ने सिंहनाद किया और राक्षस
त्रस्त हो उठे । विष्णुभक्त होने के कारण हनुमान् ने, रावण के लिए दुर्वह लक्ष्मण को
अपनी श्रेष्ठ शक्ति से सहज ही उठा लिया और शीघ्र ले जाकर उन्हें रामचंद्र के समक्ष
लिटा दिया । लक्ष्मण को लगी हुई शक्ति राम के तेज से निस्तेज हो उनसे छूटकर फिर
रावण के रथ की ओर लौट गई । थोड़ी देर में लक्ष्मण सचेत हो गये ।
६५. राम-रावण का प्रथम युद्ध
वहाँ रावण भी मूर्च्छा से मुक्त हो अपने चंचल धनुष को लेकर युद्ध के लिए सन्नद्ध
हुआ । लक्ष्मण के मूर्च्छित होने से सभी वानर भयभीत होकर भाग आये थे । रावण को
उद्धत गति से आक्रमण करने के लिए आते देखकर राम स्वयं क्रुद्ध होकर उस देव-वैरी का
सामना करने के लिए अपने धनुष का भयंकर टंकार करते हुए आगे बढ़े । तब पवन-
पुत्र ने राम से कहा—'हे सूर्यकुल-तिलक, जब यह रावण रथ पर बैठकर आप से युद्ध
करेगा, तब आप पैदल ही उसका सामना करें, यह कैसे उचित होगा ?' तब ऐरावत पर
आरूढ़ होनेवाले इंद्र की भाँति, राम हनुमान् के कंधों पर बैठे और बड़े रोष से धनुष
का भयंकर टंकार करने लगे । रावण ने क्रोधोन्मत्त होकर राम को देखा और उन पर
अग्नि-शिखाओं के सदृश बाणों की वर्षा आरंभ की । राघव ने भी उस पर श्रेष्ठ बाण
चलाये; किन्तु इन्द्र के शत्रु ने उन्हें बीच में ही काट डाला । तब राम ने उद्धत गति से
अर्द्धचन्द्र बाण चलाकर राक्षसेंद्रवर का धनुष काट डाला और पाँच तेज बाण चलाकर उसे
व्यथित कर दिया । तब रावण ने हुंकार करके एक तीक्ष्ण बाण हनुमान् के ललाट पर
चलाया । उस भयंकर बाण को हनुमान् के ललाट पर लगते देखकर राम ने बड़े क्रोध से
अपना भाला संभाला और उससे प्रहार करके रावण के सारथी को, अश्वों को, रथ को,
ध्वजा को, छत्र को और चामरों को क्षणमात्र में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और फिर सुमंत्रक
नामक शर रावण के वक्ष पर चलाया । उस शर के प्रहार से रावण अत्यन्त पीड़ित हुआ
और थर-थर काँपते हुए निश्चेष्ट हो गया। फिर, राम ने उद्दीप्त क्रोध से अर्द्ध-चन्द्र वाण
का प्रयोग ,करके उसके दसो मुकुटो को नीचे ऐसे गिराया, मानो दसो दिशाओ में व्याप्त
उस राक्षस के प्रताप को ही झटका देकर गिरा दिया हो । अपने उज्ज्वल मुकुटो की प्रभा
से रहित हो रावण मन-ही-मन अत्यधिक दुखी हुआ और सुध-बुध खोकर खडा रहा । तब
राघव ने रावण से कहा--'वानरो के साथ भयंकर युद्ध करने के कारण तुम थके हुए हो।
अत., में तुम्हारा वध किये विना तुम्हें छोड़ देता हूँ । तुम शीघ्र लका को लौट जाओ ।'
६६. रावण का खिन्न होकर लंका लौट जाना
तब रावण विरथ हो दुखी मन, अकेले ही पैदल, लका की ओर चल पडा । वह
उत्तप्त निःश्वास छोड़ रहा था और उसका उद्दीप्त क्रोध बुझ गया था। उसका अत्यधिक
गर्व चूर हो चुका था। उसकी शक्ति नष्ट-सी हो गई थी और उसका दर्प दलित-सा
हो गया था । उसका मुख पीला पड़ गया था और वह बार-बार अपने सूखे हुए ओठो
को आर्द्र करता हुआ जा रहा था और भय के कारण उसका कठ सूख रहा था । इस
प्रकार जानेवाले रावण को देखकर सभी भूत तालियाँ पीटते हुए ठहाका मारकर हँसने लगे ।
सभी वानर जहाँ-तहाँ दौड़ते हुए, उछल-कूद करते हुए रावण का उपहास करने लगे ।
निदान रावण लका में पहुँच गया और अत्यधिक चिंता में डूबकर छटपटाने लगा । सिंह के
हाथो में फँसकर भी, बचकर निकल आये हुए गज की भाँति, गरुड की पकड से छूटकर
गिरे हुए त्रस्त सर्प की भाँति, रावण भयभीत हुआ। विद्युत् की-सी प्रभा से समन्वित,
भयंकर ज्वालाओ से युक्त तथा ब्रह्मास्त्र से भी अधिक शक्तिशाली राम के वाणो से अपने
सहार की चिंता करते हुए वह बार-बार लू की-सी गरम साँसें छोड़ने लगा । लज्जित
होने के कारण उसका माहस जाता रहा । वह सभा में स्थित दैत्यों को देखकर बोला--
'हे दानववीरो, आज मेरा शौर्य और मेरी शक्ति मिट्टी में मिल गई । स्वाभाविक पराक्रम
से सपन्न एक व्यक्ति राम-भूपाल, इस ससार में जन्मे है । मै ने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया था
कि युद्ध में सुर, सिद्ध, साध्य, गरुड, गधर्व, राक्षस, पक्षी, यक्ष, किन्नर, उरग आदि
किसी से भी मै पराजित नही होऊँगा । तब मैंने नर तथा वानरो की उपेक्षा कर दी थी ।
मेरे दुष्कर्म ही मेरी विपत्ति का कारण बन गये हैं । मैं अपनी दुर्दशा का कैसे वर्णन करूँ?
अब तुम लोग सावधानी से दुर्ग की रक्षा करो । द्वारो पर अधिक सख्या में रक्षको को
नियुक्त करो । प्रहस्त आदि महान् वीर युद्ध करते हुए अपने प्राण खो चुके है । अब कौन
ऐसा वीर है, जो राम-लक्ष्मण को जीतने की क्षमता रखता है ? विविध युद्धो को करने
में प्रवीण, सहज पराक्रमी राम-भूपाल पर आक्रमण कर सकने की क्षमता अब केवल मेरे
अनुज कुभकर्ण के सिवा और किसमें है ?'
६७. राक्षसों का कुंभकर्ण को जगाना
इसके पश्चात् दशकंठ ने सबको देखकर कहा--'मेरा भाई छह मास तक लगातार
सोने के पश्चात् जगा, सभा में आकर मेरे साथ मत्रणा की और फिर आज नौ दिन से
सो रहा है । वह अवश्य शत्रुओ का सहार कर सकता है । उस अनुपम वीर को जगाकर
किसी प्रकार यहाँ ले आओ ।'
रावण के आदेशानुसार राक्षसों ने कई प्रकार के गंध-पुष्प और विविध मिष्टान्न
आदि खाद्य पदार्थ लेकर कुंभकर्ण की उस गुफा में प्रवेश किया, जो तीन योजन लंबा था
तथा सब प्रकार के सुख-सुविधाओं से पूर्ण होने के कारण भोगों का निवास, पाताल के
समान महनीय, वज्रायुध की महिमा से समन्वित, इंद्रलोक के समान संसार के श्रेष्ठ तेज से
विलसित, अग्नि के निवास के समान, अत्यधिक भयंकर यमलोक के समान, विविध मेदा,
मांस आदि से युक्त होने के कारण (नैऋत) राक्षस के भवन के आँगन के समान, निरुपम
वारुणी से युक्त होने से वरुणालय के समान, सुगंधित वायु से युक्त पवन के निवास के समान,
श्रेष्ठ निधियों से युक्त कुबेर के भवन के समान, श्रेष्ठ विभूति का आगार शिव के निवास
के समान, तथा श्रेष्ठ पद्म-राग की प्रभा से समन्वित ब्रह्म-लोक के समान, सुशोभित थी ।
सोनेवाले कुंभकर्ण के दीर्घ निःश्वासों से राक्षस कंपित हो उठे, किन्तु जैसे-तैसे उसके
निकट पहुँचे और निर्मल तथा विशाल स्वर्ण-पर्यंक पर, हंस-तूलिका-तल्प पर शयन करने-
वाले कुंभकर्ण को देखा । वह अपने कंधे पर कपोल टिकाये, सतत दीर्घ निःश्वास छोड़ते
हुए सो रहा था । उसके मुख पर श्रम-जल की बूँदें थीं और उसके नेत्र किंचित् खुलें
हुए-से थे । उसके शरीर पर कर्पूर तथा चंदन का लेप था और उसके वक्ष पर उज्ज्वल
मणिमय हारों का समूह था । वह आनंद में अपने आपको भूलकर निद्रा तथा कामिनियों
के साथ रति-क्रीड़ा में सतत तल्लीन रहनेवाले के समान दीख रहा था और कदाचित्
देवताओं पर कई बार विजय प्राप्त करने के संबंध में स्वप्न देख रहा था । ऐसे कुंभकर्ण
को देखकर आगंतुक राक्षस दुःखी होने लगे कि हाय, ब्रह्मा ने ऐसे महान् वीर को ऐसी
निद्रा क्यों दी ? उसके पश्चात् उन्होंने उसके आगे भात की राशियाँ तथा महिष एंव वराह
का पकाया मांस आदि सजाये, चंदन तथा पुष्पों से उसकी पूजा की, धूप जलाया, दीपों
से आरती उतारी और हाथ जोड़कर उसकी स्तुति के पाठ किये । फिर, उन्होंने अशनि-
घोष से भी अधिक भयंकर ध्वनि की, निसानों का विपुल निनाद किया, भीषण भेरी-ध्वनि की,
और सिंह के समान गर्जन किया । वह महाध्वनि पाताल-लोक में, नक्षत्र-पथ में
सभी दिशाओं में तथा स्वर्ग में भी व्याप्त हो गई । इस पर भी कुंभकर्ण नहीं जगा,
इसके विपरीत वह और अधिक गंभीर निद्रा में डूब गया । तब सभी राक्षसों ने गदा,
मूसल, मुद् गर आदि से उसपर प्रहार किया । दस हजार भाले उसकी पसलियों में चुभोये ।
उस पर लगातार पहाड़ गिराये और उसकी छाती पर चढ़कर, हाथों तथा पैरों से ताड़न
किया । फिर भी कुंभकर्ण नहीं जगा । तब उन्होंने भीषण सिंहनाद करते हुए, शंख बजाते
हुए असंख्य कुंभ, पटह, भेरी, तुरही आदि का घोर निनाद किया । दस हजार भयंकर
राक्षस लगातार निसानों को बजाते ही रहे । इतनी ध्वनि होने पर भी कुंभकर्ण नीलाद्रि
के समान बिना हिले-डुले ही पड़ा रहा । तब राक्षसों ने उसे हाथी, घोड़े, ऊँट, जंगली
भैंसे आदि जानवरों से रौंदवाया और बड़े लट्ठों से उसका सारा शरीर चूर-चूर कर दिया
और एक साथ सभी वाद्य बजाये । सारी लंका इस ध्वनि से काँप उठी और वानर-सेना
भी शंकित होने लगी । इतना सब करने पर भी कुंभकर्ण ऐसा सो रहा था, मानो उसके
कान पर जूँ तक न रेंगी हो । तब कुछ राक्षस दिशाओं को कंपायमान करते हुए भेरीनिनाद
युद्धकांड ३३३
करने लगे, कुछ पर्वत गुफाओ को प्रतिध्वनित करते हुए सिंह-सम गर्जन करने लगे,
कुछ अपने हाथो में उसके केश लपेटकर नोचने लगे, कुछ उसके कर्ण-पुटो में प्रवेश करके
उसके परदो को दाँतो मे काटने लगे और कुछ अविराम गति से गदा, मुद्गर, खड्ग,
मूसल आदि से उसके मुख तथा वक्ष पर प्रहार करने लगे । तब उस राक्षस की नीद
थोडी उचटी । उसने एक जँभाई ली और फिर सोने लगा । तब राक्षसो ने उसे बडे-बडे
रस्सो से बाँध दिया और एक सहस्र घट उबलता हुआ तेल उसके कानो में उडेल दिया,
नथुनो में जलती हुई शलाकाएँ रखी, एक साथ भयकर गति से वे भेरियो का निनाद
करने लगे और लगातार हाथी तथा घोडो से उसका वक्ष रौंदवाने लगे । तब कुभकर्ण
किंचित् शकित-सा हुआ और सर्प के समान भयकर हाथो को फैलाया, थोडा-सा जगा,
हुंकार भरकर अँगडाई ली और अपने विशाल मुख को विकृत करते हुए जँभाई ली और
आँखें खोलकर भयकर रूप धारण किये ऐसे बैठ गया, मानो उसने यह सोच लिया हो कि
जब राम मुझे महान् सायुज्य पद ही देनेवाले है, तब मुझे इस निद्रा की क्या आवश्यकता है
और अपनी निद्रा त्याग दी । उसका मुँह प्रलयकाल के सूर्य-बिंब के समान लाल था,
और विंध्याचल की गुफाओ से निकलनेवाले पवन के समान उसकी उसासे चल रही थी
और उसकी आँखें प्रलय-काल के अर्क-बिंब के समान लाल दीख रही थी ।
इस प्रकार, उसके जगकर बैठने के पश्चात् सभी राक्षस दानवेश्वर के पास जाकर
बोले- 'हे देव, कई प्रकार से पीडा पहुँचाने के पश्चात् आपके अनुज जगे हैं, हम उनसे
युद्ध में जाने की प्रार्थना करें या आपके सम्मुख उन्हें लिवा लायें ? आप जो आज्ञा दें ।'
तब रावण ने बड़ी प्रीति से कहा- 'उसको यही लिवा लाओ ।'
६८. राघवों की युद्ध-यात्रा पर कुंभकर्ण का क्रुद्ध होना
रावण की आज्ञा के अनुसार राक्षस कुभकर्ण के पास गये । अपने समक्ष अडे हुए
राक्षस-समूह को देखकर उसने कहा- 'तुम लोगो ने मुझे क्यो जगाया ? अब रावण के
लिए कौन-सा कार्य आ पडा है ? कहो, बात क्या है ?' तब उन्होने कहा- 'आप स्वय
प्रभु रावण से ही सारी बातें जान लें ? आपको लिवा लाने के लिए उन्होने हमें भेजा है।
इससे अधिक हम और कुछ नही जानते ।'
तब कुभकर्ण उठा, जी भरकर स्नान किया, सुदर वस्त्राभूषण पहने और प्रकाशमान
किरीट धारण किया । उसके पश्चात् बडे मोद से राक्षसो ने कई प्रकार के मिष्टान्न,
पकवान, मधु, महिष तथा सूकर का मास, भेजा तथा घी के बरतन लाकर उसके सामने रखे ।
कुभकर्ण ने पहले बडी प्रीति के साथ मेदा तथा मास खाया, छककर रक्त तथा
मधु पिया और अत्यधिक सतुष्ट हुआ । तब सभी राक्षस प्रणाम करके उसके समक्ष खडे
हुए । तब कुभकर्ण ने उन्हें देखकर कहा- 'दानवेश्वर अपने पुत्र तथा वधुजनो के साथ
कुशल है ? लका पर कोई विपत्ति तो नही आई ? यदि उस पर कोई विपत्ति आ पडी है,
तो मैं उस भय को दूर कर दूँगा । अमरेन्द्र से भी भिडकर उसे स्वर्ग मे भगा दूँगा,
प्रलय-काल की अग्नि को भी बुझा दूँगा, शत्रुओ के तीव्र दर्प को भग कर दूँगा ।'
तब उपाक्ष ने हाथ जोड़कर कुभकर्ण से कहा- 'हे राक्षसवीर, सुनिए, हमें देवता,
३३४ रंगनाथ रामायण
राक्षस तथा गंधवों की ओर से कोई भय कभी नहीं हुआ । अभी मानवों ने हम में भय
उत्पन्न किया है । देव-शत्रु रावण के जानकी को ले आने से क्रुद्ध होकर रविकुलोत्तम राम
अत्यन्त पराक्रमी वानरों के साथ लंका पर चढ़ आये हैं । इसके पहले अकेले एक वानर ने
अक्षयकुमार का वध करने के पश्चात् लंका को भस्म करके अपनी शक्ति को प्रकट किया था।
अब इन महान् कपियों को जीतनेवाला कौन है ? राम देवों तथा असुरों से भी
अधिक पराक्रमी है और रावण भी उनके साथ युद्ध करके हार गये हैं और त्रस्त होकर
लंका में लौट आये हैं ।'
इन वचनों को सुनकर उस निशाचर की आँखो से अग्नि-कण निकलने लगे । उसने
भीषण क्रोध से उद्दीप्त होकर दाँत पीसते हुए कहा--'युद्ध में सभी वानरों तथा अत्यन्त
पराक्रमी दाशरथियों को वध किये बिना, वानरों के रक्त-मासो से राक्षस-समूह को तृप्त
किये बिना तथा स्वयं राम-लक्ष्मण के रक्त का पान किये बिना मैं कौन-सा मुँह लेकर
रावण के सम्मुख आऊँ ? मैं वैसा करने के पश्चात् ही वहाँ आऊँगा ।'
इस पर महोदर ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा--'हे वीर, दशकंठ से
मिलने के पश्चात्, आप ऐसा ही कीजिए । उनका आदेश लेकर आप शत्रुओं पर विजय
प्राप्त कीजिए ।' तब उसने कहा-'ऐसा ही हो' और राक्षसों की ओर देखने लगा । तब
उन राक्षसों ने इक्कीस मनुष्यों के मांस का ढेर उसके सामने लगा दिया । फिर वे अस्सी
महिष, सात सौ बकरियाँ, एक सहस्र सूकर, चार सहस्र मोटे मोटे खरगोश तथा छह सौ
मृग ले आये और उनका वध करके अलग-अलग पकाया और उस मांस को उसके सामने
लाकर रखा । कुंभकर्ण सारे मांस को खाकर तृप्त हुआ । उसके पश्चात् उसने दो सहस्र
घट मद्य पीकर ऐसी डकार ली कि सभी दिशाएँ विदीर्ण-सी हो गईं । फिर अपनी मूँछों
पर ताव देते हुए, आँखो को घुमाते हुए अपनी गति से सारी पृथ्वी को कँपाते हुए, अपनी
गुफा से यो निकल पड़ा, मानो राहु के मुँह-गह्वर से मुक्त प्रलय-काल का सूर्य हो, या बलि-
महाराज को दंड देकर, सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होनेवाले त्रिविक्रम हो ।
उस प्रकार दीर्घ तथा भीषण आकारवाले राक्षसवीर को आते देखकर किले के
बाहर रहनेवाले सभी वानर त्रस्त हो उठे । कुछ वानर विस्मित हुए, कुछ जहाँ-तहाँ
छिपने लगे, तो कुछ वानरों के पैर लड़खड़ाने लगे, कुछ भयभीत हो उठे, तो कुछ मूर्च्छित
होकर गिर पड़े, कुछ समुद्र में कूद पड़े, तो कुछ दाँतो-तले उँगली दबाये खड़े रहे और
कुछ राम की आड़ में जा खड़े हुए । तब राम ने उन्हें देखकर लक्ष्मण को धनुष-बाण
लाने की आज्ञा दी । तत्पश्चात् उन्होंने विभीषण को देखकर कहा--'हे विभीषण, पृथ्वी
तथा आकाश का स्पर्श करनेवाले विशाल शरीर से मपन्न प्रलय-काल के मेघों के बीच
चमकनेवाली बिजलियों के समान आभूषणों की कांति से दीप्त तथा तीनों लोकों को एक
साथ निगलने योग्य मुँह से युक्त यह कौन है, जो वहाँ नगर के मार्ग से जा रहा है ?
क्या, वह यमराज है, या प्रलय-काल का अनिल है, या प्रलय-काल का रुद्र है, या प्रलय-
मारुत है, या प्रलय-काल का सूर्य है, या प्रलय-काल का शेष-नाग है, या प्रलय-मृत्यु है, या
प्रलय-काल का वरुण है, या प्रलय-काल का यम है या प्रलय-काल का भैरव है या प्रलय-काल
युद्धकांड
३३५
के रुद्र के लिए प्रलय-रुद्र है ? ऐसा भीम-रूप हमने अबतक न कभी देखा, न उसके बारे
में कभी सुना ही है । यह तो बताओ कि वह कौन है ? क्या वह दानव है या दैत्य है ?
यह किस कुल का है ? वह कहाँ का रहनेवाला है ? इसका नाम क्या है ? इसे देखकर
सभी वानर त्रस्त है, इसका आकार-प्रकार देखकर आश्चर्य हो रहा है ।'
६१. कुंभकर्ण का शाप-वृत्तांत
तब विभीषण ने राम को देखकर कहा--"हे देव, इस दैत्य का वृत्तांत सुनिए ।
यह विश्रवसु का पुत्र है और इसका नाम कुंभकर्ण है । रावण का भाई तथा महान् क्रूर है।
देवताओ तथा दिक्पालो को पराजित करके उन्हें युद्धभूमि से भगा देनेवाला महान् बाहु
बली है । दीर्घशूल विविध आयुधो से युक्त तथा उद्धत शक्ति से संपन्न है । यह
समस्त ब्रह्माण्ड को भी विदीर्ण करने की क्षमता रखता है । शक्ति में ब्रह्मा से कम नही है ।
जन्म के समय से ही यह अपने कुरूप मुँह से जीवधारियो को निगलने लग गया था ।
इस प्रकार, जीव-धारियो को निगलते देखकर इन्द्र ने अपना वज्रायुध इस पर चलाया,
तब इसने क्रोध में आकर ऐरावत का दाँत उखाड लिया और उससे इन्द्र पर प्रहार किया।
उस प्रहार से इन्द्र मूर्च्छित हो गया । उसके पश्चात् वह सभी देवताओ को साथ लेकर
ब्रह्मा की सेवा में पहुँचा और उन्हें प्रणाम करके निवेदन किया--'हे देव, कुभकर्ण नामक
राक्षस पृथ्वी के जीवो का नाश कर रहा है और सुरो को पीडित कर रहा है । वह पर-
स्त्रियो पर बलात्कार कर रहा है और हठ करके समस्त ससार का नाश कर रहा है ।
यदि वह ऐसे ही अत्याचार करता रहा, तो विश्व का सर्वनाश निश्चित है ।'
"उनकी बातें सुनकर कमलासन मन-ही-मन बहुत ही क्रुद्ध हुए और सभी राक्षसो
को अपने समक्ष बुलाकर उनमें कुभकर्ण का भयकर रूप देखा । उसका रूप देखकर स्वय
ब्रह्मा को भी आश्चर्य हुआ । उन्होने कहा--'ऐसा लगता है कि यह समस्त ब्रह्माण्ड को
निगल जायगा । इसका आकार-प्रकार देखकर स्वय मुझे भी भय लग रहा है । जब इसका
रूप इतना भयकर है, तो क्या, यह त्रिनयन शिवजी को भी युद्ध में हरा नही देगा ?'
उसके पश्चात् ब्रह्मा ने ससार के प्राणियो का वध करने से उसे रोकने का विचार करके
कहा-'क्या, तुम्हारा जन्म पुलस्त्य के उत्तम वंश में इसलिए हुआ कि तुम अपना शौर्य
दिखाकर सभी लोको को त्रस्त करो 'और सभी प्राणियो का नाश करो ?' फिर, उन्होने
मृत्यु के समान शाप देते हुए कहा--'तुम निरंतर सोते रहो । बर्फ के वज्र के-से इस शाप
के लगते ही कुभकर्ण खडा रह नही सका और तुरत निद्रा के वशीभूत हो गया ।'
"तब रावण ने ब्रह्मा को प्रणाम करके कहा--'हे देव, आप इस पर कृपा-दृष्टि
कीजिए । स्वयं पौधा लगाकर फिर स्वय उसको कही काटते । यदि अपने आकार के कारण
यह दूसरो को कष्ट पहुँचाता है, तो उचित यही है कि उसे अच्छा उपदेश दिया जाय ।
ऐसे शाप से उसे दग्ध करना न्यायोचित नहीं है । इसके शाप का अत कैसे होगा, इसकी
भी व्यवस्था दीजिए ।' तब ब्रह्मा ने रावण से कहा-'यह लगातार छह मास तक सोता
रहेगा (प्रत्येक छह मास के वाद) सिर्फ एक दिन यह जगा हुआ रहेगा ।' हे देव, उसी
समय से वह निश्चित होकर सोता और जागता रहता है । आपके दिव्य वाणी की भयकर
३३६ रंगनाथ रामायण
अग्नि-ज्वालाओ के समक्ष न टिक सकने के कारण असमय 'ही रावण न इसे जगाने के
लिए राक्षसो को भेजा । इसलिए यह युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर राजा के अत पुर में जा
रहा है । बहुत शीघ्र यह रावण की आज्ञा लेकर हम पर आक्रमण करने के लिए आयगा।
उसके आने के पहले आप सारी कपि-सेना में यह घोषित करवाइए कि कोई इसके
आकार को देखकर युद्ध-क्षेत्र से भाग न जाय, यह दनुज नही है, यह यत्र की सहायता
मे बना हुआ भयकर रूपवाला काठ का एक पुतला है । इस प्रकार घोषित कराकर आप
वानरो का भय दूर कर दीजिए और उन्हें युद्ध के लिए सन्नद्ध कीजिए ।” तब राम ने
नील को ऐसी घोषणा करने की आज्ञा देकर भेजा ।
कुभकर्ण को आते देखकर नगर की स्त्रियाँ उस पर फूलो की वर्षा करने लगी ।
निदान, कुभकर्ण चद्रिका के निवास-सदृश सुशोभित होनेवाले उस सभा-मंडप में ऐसे पहुँचा, जैसे
उज्ज्वल किरणो से सुशोभित होनेवाला सूर्य धवल मेघ-समूह में प्रवेश करता हो । वहाँ
पहुँचकर उसने अपने अग्रज को प्रणाम किया, तो रावण ने उसे बड़े प्रेम से अपने हृदय से
लगा लिया और उसे एक स्वर्णासन पर बिठाया । उसके पश्चात् कुभकर्ण ने अपने अग्रज
को देखकर कहा—'हे असुरनाथ, आपका मुझे जगाने का क्या कारण है ? किसने आपका
अपकार किया ? मै किसे मार डालू ? क्या आज्ञा है ?'
तब रावण ने कुभकर्ण से कहा—'अपनी निद्रा की अधिकता के कारण यहाँ के
कार्यों की गति-विधि से तुम अनभिज्ञ हो । इसलिए मै तुम्हें सभी बातें समझाता हूँ, सुनो।
दशरथ-नन्दन (राम) सुग्रीव को मित्र बनाकर समुद्र पर सेतु बाँधकर मुझ पर चढाई करने
के लिए आया है और अपनी सेना के साथ लका को घेरे हुए पडा है । उससे युद्ध करने
गये हुए प्रहस्त आदि वीर राक्षसो का उसने सहार किया है, किन्तु उस युद्ध में एक भी
वानर-वीर मरा नही है । इसलिए तुम उन राम-लक्ष्मण को जीतकर वालि-पुत्र तथा सूर्य-
नदन का वध करो और लका के यश की रक्षा करो ।'
७०. कुंभकर्ण का हितोपदेश
रावण के ऐसे दीन वचनो को सुनकर कुंभकर्ण ने रावण से कहा--“उस दिन एकात
में सभी मंत्रियो ने जिस विपत्ति की संभावना की थी, वही आज अचूक रूप से प्रत्यक्ष
हुई है । यह किसी भी प्रकार टलनेवाली नही है । जो मदाध होकर, आगे-पीछे का
विचार किये बिना कार्य करता है, वह सब प्रकार से हानि उठाता ही है, ऐसा व्यक्ति आपके
सिवा और कौन हो सकता है ? जो राजा अपने बुद्धिमान् मत्रियो की मंत्रणा के अनुसार
कार्य करता है, उसे अपने तथा मत्री दोनो के उत्साह तथा शक्ति से अगणित फल प्राप्त
होगा । राजा को चाहिए कि वह देश और काल का विचार करे, जन तथा धन को समृद्ध
रखे, किसी कार्य के प्रारंभ करने के पूर्व उसके सबंध में सोच-विचार कर ले, उसमें पडने-
वाले विघ्नो का निवारण करे और कार्य में कृत-कृत्य होकर सतत राज्य-सुख का आनंद
प्राप्त करते हुए पृथ्वी का पालन करे । उसे शत्रु के बल तथा शक्ति का मूल्यांकन करके,
यदि शत्रु अपने से बलवान् हो, तो उससे सधि का प्रस्ताव करना चाहिए। यदि शत्रु अपने
समान बलशाली हो, तो उसके विरुद्ध अपना बल तथा पराक्रम प्रकट करके, उसे अपने वश में
युद्धकांड ३३७
कर लेना चाहिए । यदि शत्रु अपने से बलहीन है, तो उस पर सारी शक्ति से आक्रमण
कर देना चाहिए । अवसर देखकर शत्रु-सेना पर आक्रमण करके शत्रुओ को जीतने का
उपाय सोचना चाहिए । यदि शत्रु उद्दण्ड होकर आक्रमण करे, तो उनमें फूट डालने का
प्रयत्न करना चाहिए । यदि वह महान् शक्तिशाली होने के कारण अजेय हो, तो उसकी
शरण में जाना चाहिए । इन छहों नीतियो को जानकर जो राजा व्यवहार करता है, वह
अवश्य उन्नति करेगा । साम, दान, भेद तथा दंड के चारो उपायो को जो सतत काम में
लाता रहता है, उसके लिए अन्य नीति-शास्त्रो की आवश्यकता नही है । जो पर-धन, पर-
स्त्री में अपना चित्त लगाता है, वह अपने सारे वश का नाश करता है।"
कुंभकर्ण के इन वाक्यो को सुनकर रावण क्रोध-विवश हो कहने लगा- 'मैं अग्रज हूँ,
इसका विचार किये बिना तुम यहाँ आकर मुझे उपदेश दे रहे हो ? अव यह प्रलाप
क्यों ? चाहे कैसे भी हो, मैने यह कार्य किया है। अब इसे सँभालना तुम्हारा धर्म है न ?
कहो ।' तब कुंभकर्ण ने कहा-- "हे दानवेन्द्र, मै अवश्य युद्ध करने के लिए जाऊँगा ।
किन्तु एक और बात सुन लीजिए । एक दिन की बात है । मै निद्रा से जगने के पश्चात्
अत्यधिक प्राणियो को खाकर एकांत में बैठा हुआ था । उसी समय अनघ नारद वहाँ
आये । मैंने उनके निकट जाकर कहा- 'हे अनघ, आप इतनी शीघ्रता से कहाँ से आ रहे हैं
और कहाँ जा रहे है ? कृपया बतलायें।' तब उन्होने कहा- 'मैं कनकाद्रि से आ
रहा हूँ । में वहाँ की बातें तुम्हें सुनाऊँगा, सुनो । कनकाद्रि पर कमलासन (ब्रह्मा);
फाल-लोचन (शिव), पकजनाभ (विष्णु); पाकशासन, अनल, यम, वरुण, अनिल, यक्षराज
कुबेर, चंद्र, सूर्य आदि ग्रह; सिद्ध, मुनि, किन्नर, गधर्व, गीर्वाण, गरुड, पन्नग तथा गुह्य-प्रमुख
आदि लोगो की एक सभा एकत्रित हुई थी । उस सभा में सुर-गुरु वृहस्पति ने कहा-
'दशकंठ हमारी उपेक्षा करके अत्यधिक उद्दण्ड हो सारे ससार को त्रास दे रहा है । उसने
अपनी प्रचंड शक्ति से युद्ध में इन्द्र को परास्त किया है, यम को भगा दिया है, वरुण
को जीत लिया है, अपने बल का प्रदर्शन करके कुबेर को अपने अधीन कर लिया है,
उद्धत गर्व से कई धर्मात्माओ को वदी बनाकर पीड़ित किया है, रवि-चन्द्र का तेज मंद
करके उनको अपनी आज्ञा के अनुसार चलने के लिए वाध्य किया है, ग्रहो को पीड़ित किया है,
मत्र-पूत यज्ञो को नष्ट किया है, महान् उद्यान-वाटिकाओ को उजाड दिया है और
असह्य उत्तम स्त्रियो को कारागार में डाल दिया है। ऐसे भयकर कार्य करते हुए उसने
सभी भुवनो को त्रस्त कर दिया है। अत, आप उस दशानन का नाश करने का कोई
उपाय सोचें ।'
"बृहस्पति के वचनो को सुनकर ब्रह्मा ने सभी देवताओ से कहा- 'मैने पहले उसे
वर दिया था कि वह सुर, गरुड, उरग, अमुर तथा यक्षो के हाथो से नही मरेगा । अब
मैंने इसका प्रतीकार सोचा है, सुनो । उसने मुझसे मनुजो की चर्चा नही की थी और
वरदान के समय मैंने भी इसकी चर्चा नही की । अत, युद्ध-क्षेत्र में केवल मानव उसे परास्त
कर सकेंगे । इसलिए आप आदिविष्णु, कमलनाभ तथा लोकवद्य मुकुद से प्रार्थना कीजिए
कि वे मर्त्य-लोक में जन्म लें ।' इसके पश्चात् देवताओ तथा मुनियो ने वैसे ही किया ।
४३
३६८ रंगनाथ-रामायण
हरि-ने भी मर्त्यलोक में जन्म लिया है।' इतना कहकर नारद चले गये। हे दैत्य-राज,
सूर्य-वंश-तिलक आदि देव ही हैं, वे मनुज नही हैं। अत, सीता को उन्हें सौंप दीजिए। उनकी
शरण लीजिए और सभी वानरो को देवता जानिए। हे दानवेन्द्र, मेरी बात सत्य मानिए।"
७१. रावण का कुंभकर्ण के उपदेश का तिरस्कार करना
कुंभकर्ण के इन वचनो को सुनकर दशानन मन-ही-मन संताप की अग्नि में जल
गया और थोडी देर तक मौन बैठा रहा। फिर, दीर्घ निःश्वास छोडकर अत्यन्त चिंताक्रान्त
हुआ और साथ-ही-साथ भयभीत भी, किन्तु अपने भय को प्रकट किये बिना उसने
क्रुद्ध होकर अपने अनुज को देखकर कहा--“बार-बार 'विष्णु', 'विष्णु', कहकर क्या प्रलाप
कर रहे हो ? इतना भय तुम्हें कैसे होने लगा। स्वयं विष्णु से भी मै नही डरता, तब
मानव-वेशधारी विष्णु से मैं क्यो भयभीत होऊँगा ? मुझे बार-बार ऐसा भय क्यो दिखाते हो ?
भले ही तुम भयभीत हो जाओ । चाहे राघव विष्णु ही क्यो न हो, उसका अनुज
इन्द्र ही क्यो न हो, सुग्रीव हर ही क्यो न हो, उन्हें मुझसे युद्ध करना ही पडेगा ।
समस्त नीतिशास्त्रो के ज्ञाता होते हुए भी तुम चाहते हों कि जिस राम से मैने विरोध
ठान लिया है, उसके साथ हीन मित्रता कर लूँ ? नीति-शास्त्र का तुम्हारा सारा ज्ञान
आज निष्फल हुआ । युद्ध-भूमि में हमारा सहार करके, मुनियो तथा सुरो की रक्षा करने
का विचार करके, जगदेकरक्षक तथा कमलनाभ ने अपने देवत्व को त्यागकर, धोखे से
मानवत्व को धारण कर लिया है और इस जगत् पर राम होकर जन्म लिया है, भला,
उससे हमारी संधि कैसे संभव है ? मै अपने गर्व को छोड़कर वानरो के आश्रय में रहने-
वाले उस राम के पास कैसे जाऊँ ? यही कमलनाभ वामन का रूप धरकर बलि के यज्ञ
में गया, तीन चरण पृथ्वी दान में ली और फिर उसे बंदी बनाया। इसने तुरन्त उपकार
करनेवाले का अपकार कर दिया। ऐसी दशा में हम विरोधियो का सहार किये बिना
वह रहेगा क्यों ? हमारे और राम के मध्य संधि हो कैसे सकती है ? जब हम दोनों ने
इन्द्र-लोक पर चढ़ाई की थी और अपने बाहुबल का प्रदर्शन करते हुए महान् पराक्रमी
इन्द्र आदि देवताओ को परास्त किया था, तब यह विष्णु कहाँ था ? क्या, तुमको इसलिए
मैंने जगाया कि मैं तुमसे उपदेश सुनूँ ? भला, तुम्हें यह भय क्यो हुआ ? प्राणों के
भय से इतनी बातें क्यों करते हो ? यदि तुम्हें प्राण प्रिय है, तो तुम कुशलतापूर्वक रहो ।
मैंने तो दीर्घ आयु पाई है; तीनों लोको को जीता है, कई प्रकार के राज-सुखों का
अनुभव किया है और अपना अनुपम तेज समस्त ससार में व्याप्त किया है। मै और लोगो
के समान हीन पराक्रमी राम को प्रणाम नही करूँगा । मैने तुम्हें युद्ध में जाने का आदेश
दिया, तो जाने की इच्छा नही रखते हुए ऐसे वचन तुम क्यो कहते हों ? अब तुम जाकर
सुख से सो जाओ । शत्रु सोनेवाले को नही मारते । मैं स्वयं राम-लक्ष्मण का, सुग्रीव का
तथा अन्य भयंकर-पराक्रमी वानरो का सहार करूँगा । सभी देवताओ का वध मै स्वयं
करूँगा । विष्णु को भी मैं ही मार डालूँगा । उस विष्णु के अनुचर-शूरो को युद्ध में
जहाँ भी मिलेंगे, मैं अपनी शक्ति दिखाते हुए मारूँगा। तुम कायर की भाँति चिरंकाल तक
जीवित रहो ।”
युद्धकांड ३३६
इतना कहने के पश्चात् रावण ने फिर कुम्भकर्ण से कहा- 'मैं जानता हूँ कि लक्ष्मी
स्वयं सीता होकर इस पृथ्वी पर जन्मी हैं। मैं जानता हूँ कि विष्णु स्वयं रघुराम होकर
जन्मे हैं । मैं यह भी जानता हूँ कि युद्ध में राम के हाथों मेरी मृत्यु अवश्य होगी । अब
तुमसे मैं क्यों छिपाऊँ ? मैं काम-वश हो सीता को नहीं लाया, क्रोधाभिभूत होकर
बलात् मैं सीता को नहीं लाया; युद्ध में रघुराम के हाथो मरकर वंदनीय विष्णु का परम-
धाम प्राप्त करने के निमित्त ही मैं सीता को लाया हूँ ।'
इस प्रकार के वचन कहनेवाले रावण को देखकर कुंभकर्ण ने कहा- 'हे दानवनाथ,
जब मैं आपकी सेवा करने के लिए प्रस्तुत हूँ, तब आप व्याकुल क्यों होते हैं ? आप
आनन्द से रहिए । मैं शत्रु का नाश करूँगा ।' इसके पश्चात् उसने सारी सभा की ओर
एक बार ध्यान से देखा और कहा- 'हे इन्द्र के शत्रु, इस सभा में निर्मल चरित्रवान्,
विभीषण नहीं दीख रहा है । वह कहाँ है ?' तब रावण ने कहा- "राम-लक्ष्मण के लंका
पर आक्रमण करने का समाचार सुनकर उस संबंध में परामर्श करने के लिए सभी लोग
एकत्र हुए थे । निद्रा के वशीभूत होकर तुम तो शीघ्र यहाँ से चले गये । तब विभीषण ने
राम के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करके उसकी प्रशंसा में ऐसे हृदय-विदारक शब्द मुझसे
कहे कि क्रोध में आकर मैंने दृढ़ता के साथ कहा- 'यदि तुम यहाँ रहो तो मैं तुम्हारे
प्राण ले लूँगा । तब वह मुझे छोड़कर राम की शरण में चला गया और अब वही है ।"
७२ कुंभकर्ण की गर्वोक्तियाँ
तब कुंभकर्ण ने सोचा कि अब परिस्थिति बड़ी विकट हो गई है, मुझे अवश्य युद्ध
में जाना ही चाहिए । अब मैं (अपनी गुफा में) लौट नहीं सकता । इस प्रकार, निश्चय
करके उसने रावण के सामने दृढ़ता से यह प्रतिज्ञा की-' 'मैं यमराज से भी भिड़कर
उसका नाश करूँगा, ब्रह्मा को भी पकड़कर उसका मर्दन करूँगा, आदिशेष को भी पकड़कर
उसे चारो ओर आकाश में घुमाऊँगा, विहगेन्द्र (गरुड) को भी त्रस्त करूँगा, प्रलयाग्नि
को भी निगल जाऊँगा । समुद्र का सारा जल पी जाऊँगा, विष्णु को भी युद्ध में परास्त
कर दूँगा । रुद्र को भी नामावशिष्ट करूँगा, नैऋत को भी पकड़कर खड-खड कर दूँगा,
मृत्यु का भी गला घोट दूँगा, वरुण का भी तेज नष्ट करूँगा, कुबेर का भी पेट चीर
डालूँगा, सूर्यबिंब को भी अपनी मुष्टि में कस लूँगा और ब्रह्माण्ड को भी ठुकरा दूँगा ।
ऐसी दशा में मेरे उद्धत रण-कौशल के समक्ष, इन वानरों को निगल जाना कौन बड़ा
काम है ? हे असुरेन्द्र, मैं अवश्य इन कपियों को पहाड़ो पर भगाकर, उन मानवो का
वध कर दूँगा, आप निश्चिन्त रहिए । जब राम मेरे हाथ से मारे जायँगे, तब सीता
अनाथा बन जायगी और आपकी कामना पूरी होगी ।'
इन बातों को सुनकर महोदर ने बाहुबली कुभकर्ण से कहा-'हे वीर, तुमने श्रेष्ठ
कुल में जन्म लिया हूँ और तुम्हारा यह उत्कट गर्व उचित ही है; किन्तु नीति तथा
अनीति का विचार किये बिना क्या कोई वीर ऐसे शत्रु-वध की प्रतिज्ञा करता है ? भयंकर
सिंह की भाँति क्रोधोन्मत्त होकर प्रखर तेज से विलसित होनेवाला राम, केवल मानव नहीं है,
स्वयं विष्णु इस रूप में आया हुआ है । एक ही बाण से वालि का संहार करने-
३४० | रंगनाथ रामायण
वाले उस श्रेष्ठ वीर को जीतना, क्या, तुम्हारे लिए संभव है ? उद्दण्ड पराक्रमी तथा
महाबली राम पर तुम्हें अकेले आक्रमण करने की सलाह हम नहीं देते । तुम सेना के साथ
जाओ और महाबली राम पर विजय प्राप्त करो ।'
इसके पश्चात् उसने दशकंठ से कहा—'हमारे रहते आप चिंता क्यों करते हैं ?
क्या, हम आपका मनोरथ पूर्ण नहीं करेंगे ? जानकी को प्राप्त करने के लिए आप इतने
व्याकुल क्यों हैं ? मैं, संपाति, द्विजिव्ह, तथा गंभीर पराक्रम-संपन्न बाहुबली कुंभकर्ण,
सब एक साथ मिलकर जायँगे और राम पर विजय प्राप्त करेंगे । फिर तो, आपको वैदेही
प्राप्त होगी ही । ऐसा नहीं भी हो सकता और हम राम के उग्र वाणों के आघात से
क्षत-विक्षत हो जायेंगे, तो भी हम आपके पास लौटकर आयेंगे और आपके चरणों में
प्रणाम करके यों ही कहेंगे कि हे देव, हम भयंकर वानर-सेना के साथ राम लक्ष्मण का
वध करके उन्हें खा गये हैं । तब आप बड़े मोद से हमें हृदय से लगाकर हमारे प्रति
आदर दिखाते हुए, उस समाचार को सारे नगर में प्रकट करेंगे । उस वार्त्ता को सीता सत्य
मानेंगी और पति की आशा छोड़कर आपकी बात मान लेगी ।'
तब कुंभकर्ण ने क्रुद्ध होकर असुरेन्द्र को देखकर कहा—'इन सब झूठी बातों से
क्या प्रयोजन है ? मेरे बाहुबल को देखिए । मैं अवश्य ही राम को जीत लूँगा । आप
निश्चिन्त रहिए ।' रावण भी बड़े उत्साह से, अपने पुनर्जन्म की प्राप्ति को निकट देखकर
बड़े आनंद से बोला—'मुझे विश्वास है कि तुम युद्ध में राम-लक्ष्मण को अवश्य जीत
लोगे । अनुपम शक्ति तथा शौर्य में तुम्हारी समता कर सकनेवाला कोई वीर नहीं है ।
यह सत्य है । शूल आदि श्रेष्ठ आयुधों के साथ तुम युद्ध करो ।' इस प्रकार कहते हुए
बडी प्रीति से उसने कुंभकर्ण को अनुपम रत्नाभरण आदि भेंट किये ।
७३. कुंभकर्ण का युद्ध के लिए जाना
तब रावण का भाई उन आभूषणों को पहनकर उज्ज्वल आभा से दीप्त हो उठा ।
स्वर्ण-कवच धारण करके वह संध्या के मेघों से आवृत पर्वत की भाँति तथा बहु-रत्न-कलित
मेखला धारण करके वह वासुकि से आबद्ध मंदराचल के समान सुशोभित होने लगा । उस
राक्षसपुंगव ने रणोत्साह से भरे, अपने हाथ में तीनों लोकों में अपनी भयंकर दीप्ति व्याप्त
करनेवाला, विजय-प्रदायिनी शिव के शूल से भी सुंदर, अपनी नोक से निकलनेवाली
ज्वालाओं के द्वारा अग्निकण विखेरनेवाला, सदा पूजित, रत्न-प्रभा से भासमान तथा शत्रु-
वीरों के रक्त से रंजित अनुपम शूल धारण किया । उसके पश्चात् उसने अपने भाई को
प्रणाम किया और उसके आशीर्वाद प्राप्त करके, उस सभा-मंडप से अपने कार्य में तत्पर हो
अत्यंत वेग से यों चल पड़ा, मानो उसके प्राण उससे यह कह रहे हों कि हे कुंभकर्ण,
इस दुखद शरीर में हम रहना नहीं चाहते, शीघ्र इसे युद्ध-भूमि में त्याग दो, चलो, और
उसे जैसे खींचे लिये जा रहे हों । तब राक्षस-वीरों का समूह भी उसके पीछे-पीछे युद्ध के लिए
निकल पड़ा । वे सब घोड़ों पर, गजों पर, रथों पर, सिंहों पर चढ़कर काजल के पर्वतों
के समान सुशोभित होते हुए, अपने विशाल दंष्ट्रों की दीप्ति चारों ओर फैलाते हुए, इस
प्रकार जा रहे थे, मानो क्रूरता ने ही एक स्थान पर एकत्रित हो पिंड-रूप धारण कर लिया हो