रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 356, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ | रंगनाथ रामायण
समुज्ज्वल मुँह पर अत्यधिक रोष दिखाई पड रहा है, वार-वार अपने अंकुश की प्रेरणा से
हाथी की चाल को तीव्र करने का प्रयत्न करते हुए बडे वेग से आ रहा है, वही उपाक्ष है।
भीषण घटा-रव करनेवाले रथ पर चढकर आनेवाला, महोदर है । उसने युद्ध में बहुत-से
लोगो का सहार किया था । रत्न-प्रभा-सपन्न अरुण कवच धारण किये, अश्व पर आरूढ
जो उद्धत होकर गरुड के समान वेग से आ रहा है, वह पिशाचो का नायक है । युद्ध
में इसका सामना करनेवाला कोई नही है । सिंह पर चढकर शूल हाथ में लिये जो
आ रहा है, वह युद्ध-प्रिय त्रिशिर है । विपुल घटारव करनेवाले तथा सर्प-ध्वजा से युक्त रथ
पर बैठकर धनुष का टकार करनेवाला, काले शरीर का वह राक्षस, कुभ है । स्वर्ण-
मणि-खचित ध्वजा से युक्त इस चित्ररथ पर बैठकर आनेवाला, वह विशालबाहु राक्षस,
निकुंभ कहलाता है । अग्निसम उज्ज्वल रथ पर आरूढ हो, बडे दर्प के साथ युद्ध करने
की तीव्र लालसा से विष-दृष्टियो से कपि-सेना की ओर देखते हुए, धनुष पर बाण चढाते
हुए आनेवाला नरातक नामक राक्षस है । जैसे भूत-गण कालनेत्र की (शिवजी) सेवा
में रहते है, वैसे ही गज-मुख, अश्व-मुख, सिंह-मुख, व्याघ्र-मुख, सर्प-मुख तथा उष्ट्र-मुख-
वाले भयंकर राक्षस जिसकी सेवा में लगे हुए हैं, और जो भयंकर गर्जन कर रहा है, वह
उभरी हुई आंखोवाला राक्षस देवातक है । हे देव, वहाँ जो स्वर्ण-रथ पर आरूढ है, जो
एक विशाल धनुष को एक तृण के सदृश सँभाले हुए भयंकर टकार कर रहा है, जो कभी
पराजय का नाम तक नही जानता, जो नरभोज का पुत्र है, जो अपने शरीर पर अरुण
चंदन का लेप किये हुए है, जो तीक्ष्ण तथा क्रुद्ध दृष्टियो से युक्त है, जिसका शरीर सांध्य-
मेघो के समान है, जो विंध्याचल के सदृश विशालकाय है, और जो करोडो छत्र-चामरो
से विलसित है, वही युद्ध का श्रेष्ठ शूर, अतिकाय है । वहाँ जो दम सहस्र श्वेत छत्रों तथा
स्वर्ण-चामरो से विलसित है, जो सिंह-ध्वज से युक्त तथा बलिष्ठ अश्व जुते हुए रथ परँ
आरूढ हो, विपुल शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित हो, धनुष का टकार करते हुए, हम पर दृष्टि
गडाये आ रहा है, वह इन्द्रजीत है । उसने ब्रह्मा के वर से अपार बाहुबल प्राप्त करके
अखिल देवताओ को युद्ध में जीत लिया था और इन्द्र को वदी बनाकर बडे गर्व से झूम-
रहा है । हे सूर्यकुलतिलक, अब मै उस प्रतापी लकानाथ को दिखाऊँगा, जो कनक-रत्न-प्रभा-
कलित दण्डो से युक्त चामरो से विलसित है, जिसके सिरो पर शोभायमान होनेवाले विचित्र
रत्नो की आभा से दीप्त दस किरीट ऐसे दीख रहे है, मानो (वे किरीट) बारहो सूर्य-
बिंबो को गलाकर बनाये गये हो, जिसके कर्णो को अलकृत करनेवाले महनीय मणिकुण्डलों
की प्रभा सभी दिशाओ में व्याप्त हो रही है, जो अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टियो से बहुत भयंकर
दीख रहा है, जिसने हर के निवास-स्थान कैलास पर्वत को उठाया था और देवागनाओ को वदी
बनाया था, जिसके वक्ष स्थल ने ऐरावत के दाँतो के प्रहारो को सहन किया था, जिसने
समस्त लोको पर विजय प्राप्त की थी और जिसने इन्द्र को भी युद्ध में परास्त किया था,
वही रावण वहीं सेना के मध्य में झूमता हुआ आ रहा है ।"
विभीषण के इस प्रकार सभी वीरो का परिचय देने के पश्चात्, राघव ने आश्चर्य
प्रकट करते हुए कहा-'हे विभीषण, यह बडी विचित्र बात है कि यह दानवेश्वर ऐसे महान्