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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 508 में से

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पृष्ठ 361

और थर-थर काँपते हुए निश्चेष्ट हो गया। फिर, राम ने उद्दीप्त क्रोध से अर्द्ध-चन्द्र वाण
का प्रयोग ,करके उसके दसो मुकुटो को नीचे ऐसे गिराया, मानो दसो दिशाओ में व्याप्त
उस राक्षस के प्रताप को ही झटका देकर गिरा दिया हो । अपने उज्ज्वल मुकुटो की प्रभा
से रहित हो रावण मन-ही-मन अत्यधिक दुखी हुआ और सुध-बुध खोकर खडा रहा । तब
राघव ने रावण से कहा--'वानरो के साथ भयंकर युद्ध करने के कारण तुम थके हुए हो।
अत., में तुम्हारा वध किये विना तुम्हें छोड़ देता हूँ । तुम शीघ्र लका को लौट जाओ ।'
६६. रावण का खिन्न होकर लंका लौट जाना
तब रावण विरथ हो दुखी मन, अकेले ही पैदल, लका की ओर चल पडा । वह
उत्तप्त निःश्वास छोड़ रहा था और उसका उद्दीप्त क्रोध बुझ गया था। उसका अत्यधिक
गर्व चूर हो चुका था। उसकी शक्ति नष्ट-सी हो गई थी और उसका दर्प दलित-सा
हो गया था । उसका मुख पीला पड़ गया था और वह बार-बार अपने सूखे हुए ओठो
को आर्द्र करता हुआ जा रहा था और भय के कारण उसका कठ सूख रहा था । इस
प्रकार जानेवाले रावण को देखकर सभी भूत तालियाँ पीटते हुए ठहाका मारकर हँसने लगे ।
सभी वानर जहाँ-तहाँ दौड़ते हुए, उछल-कूद करते हुए रावण का उपहास करने लगे ।
निदान रावण लका में पहुँच गया और अत्यधिक चिंता में डूबकर छटपटाने लगा । सिंह के
हाथो में फँसकर भी, बचकर निकल आये हुए गज की भाँति, गरुड की पकड से छूटकर
गिरे हुए त्रस्त सर्प की भाँति, रावण भयभीत हुआ। विद्युत् की-सी प्रभा से समन्वित,
भयंकर ज्वालाओ से युक्त तथा ब्रह्मास्त्र से भी अधिक शक्तिशाली राम के वाणो से अपने
सहार की चिंता करते हुए वह बार-बार लू की-सी गरम साँसें छोड़ने लगा । लज्जित
होने के कारण उसका माहस जाता रहा । वह सभा में स्थित दैत्यों को देखकर बोला--
'हे दानववीरो, आज मेरा शौर्य और मेरी शक्ति मिट्टी में मिल गई । स्वाभाविक पराक्रम
से सपन्न एक व्यक्ति राम-भूपाल, इस ससार में जन्मे है । मै ने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया था
कि युद्ध में सुर, सिद्ध, साध्य, गरुड, गधर्व, राक्षस, पक्षी, यक्ष, किन्नर, उरग आदि
किसी से भी मै पराजित नही होऊँगा । तब मैंने नर तथा वानरो की उपेक्षा कर दी थी ।
मेरे दुष्कर्म ही मेरी विपत्ति का कारण बन गये हैं । मैं अपनी दुर्दशा का कैसे वर्णन करूँ?
अब तुम लोग सावधानी से दुर्ग की रक्षा करो । द्वारो पर अधिक सख्या में रक्षको को
नियुक्त करो । प्रहस्त आदि महान् वीर युद्ध करते हुए अपने प्राण खो चुके है । अब कौन
ऐसा वीर है, जो राम-लक्ष्मण को जीतने की क्षमता रखता है ? विविध युद्धो को करने
में प्रवीण, सहज पराक्रमी राम-भूपाल पर आक्रमण कर सकने की क्षमता अब केवल मेरे
अनुज कुभकर्ण के सिवा और किसमें है ?'
६७. राक्षसों का कुंभकर्ण को जगाना
इसके पश्चात् दशकंठ ने सबको देखकर कहा--'मेरा भाई छह मास तक लगातार
सोने के पश्चात् जगा, सभा में आकर मेरे साथ मत्रणा की और फिर आज नौ दिन से
सो रहा है । वह अवश्य शत्रुओ का सहार कर सकता है । उस अनुपम वीर को जगाकर
किसी प्रकार यहाँ ले आओ ।'