रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२४ रंगनाथ रामायण
तथा माल्यवान् के द्वारा संधि का प्रस्ताव भेजिए। बहुत क्यो ? क्या, आपने कार्त्तवीर्य के
साथ संधि नहीं की थी ? तब उस कार्त्तवीर्य को जीतनेवाले भार्गव राम को परास्त करने-
वाले यशस्वी राम क्या संधि करने के योग्य नही है।"
५९. मंदोदरी की मंत्रणा की उपेक्षा करना
मंदोदरी के इन दीन वचनों को सुनकर रावण क्रोध से दीर्घ श्वास लेने लगा ।
उसकी लाल आँखों से क्रोधाग्नि की चिनगारियाँ छूटने लगीं । उसने मदोदरी को देखकर
कहा—'हे नारी, हित-बुद्धि से तुमने मुझे उपदेश दिया है; किन्तु तुम्हारी बातो में एक
भी मुझे अच्छी नहीं लगतीं। दानव, यक्ष, गंधर्व देव आदि की सेवाएँ प्राप्त करने-
वाले मुझे तुम वानरों के आश्रय में जीनेवाले नर को प्रणाम करने का उपदेश देती हो ।
ऐसी बात तुम इस सभा में कैसे कह सकी ? क्या, तुम्हारे लिए यह उचित है ? उस
इक्ष्वाकुवंशी ने जान-बूझकर पहले हमारा अहित किया था; तभी तो मैं उसकी स्त्री को
ले आया । खर-दूषण आदि के संहार तथा तुम्हारी ननद के अपमान को भुलाकर मूर्ख के
समान मैं कैसे राम से संधि कर लूं ? यह असंभव है । अपने भयंकर बाणो से विभीषण,
सुग्रीव तथा राम-लक्ष्मण के साथ सभी वानरो को मारकर मैं विजय पाऊँगा । यदि विजय नहीं
प्राप्त करूँगा, तो युद्ध-भूमि में ही अपने प्राण दे दूँगा; किन्तु उस राम के साथ न संधि करूँगा,
न जानकी को ही लौटाऊँगा । यही मेरा दृढ़ निश्चय है । तुम्हारे ज्येष्ठ पुत्र, उदात्त
पराक्रमी, इन्द्रजीत के रहते तुम्हें किस बात का भय है ? मेरे पुत्र भयंकर आकारवाले
तथा दुर्वार पराक्रमी हैं; मेरा सामना कौन कर सकता है ?'
इन बातो को सुनकर मंदोदरी चिंताक्रांत मन से सिर झुकाकर सभा से ऐसे चली गई,
मानो रावण की लक्ष्मी ही यों सोचती हुई रावण से अलग हो रही हो कि यह नीच
तथा निकृष्ट नीति का अनुसरण करते हुए अपना बुरा-भला आप ही नही पहचान पा रहा है।
६०. रावण का प्रथम युद्ध
तब रावण ने अपने गुप्तचरों से कहा—'चिर काल से मेरे मन में जो क्रोध था,
उसका आज परिहार करूँगा । मैं उस (राम) के लिए कालरुद्र हूँ और वह मेरे लिए
अंधकासुर है । मेरे तूणीरों से निकलनेवाले अस्त्र, केंचुलों से मुक्त होनेवाले क्रूर सर्पों के
समान राघव को लगेंगे । राम मृत्यु से प्रेरित होकर, कपि-सेना का विश्वास करके यहाँ
आया है । तुम शीघ्र मेरे युद्ध करने के लिए दिव्य शस्त्रास्त्रों से सज्जित करके रथ ले
आओ ।'
उसके आदेशानुसार वे गुप्तचर सूर्य-प्रभा के समान दीप्तिमान् श्रेष्ठ रथ ले आये । फिर,
अपने नीच मनोरथ पर आरूढ होने की भाँति रावण उस रथ पर आरूढ हुआ । अपने
दीप्तिमान् आभूषणों से अलंकृत रावण के उस रथ पर बैठते ही, उसके आभूषणों की प्रभा
दिशाओं तथा आकाश में आश्चर्यजनक ढंग से व्याप्त हो गई, मानो युद्ध में राम के बाणों
की अग्नि-ज्वालाओं में रथ-समेत स्वयं रावण दग्ध हो रहा हो । निशानों का विपुल निनाद,
पटह, भेरी तथा शंख का भयंकर घोष, हाथियों की चिंघाड़, अश्वों की हिनहिनाहट, बन्दी