रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 362, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंरावण के आदेशानुसार राक्षसों ने कई प्रकार के गंध-पुष्प और विविध मिष्टान्न
आदि खाद्य पदार्थ लेकर कुंभकर्ण की उस गुफा में प्रवेश किया, जो तीन योजन लंबा था
तथा सब प्रकार के सुख-सुविधाओं से पूर्ण होने के कारण भोगों का निवास, पाताल के
समान महनीय, वज्रायुध की महिमा से समन्वित, इंद्रलोक के समान संसार के श्रेष्ठ तेज से
विलसित, अग्नि के निवास के समान, अत्यधिक भयंकर यमलोक के समान, विविध मेदा,
मांस आदि से युक्त होने के कारण (नैऋत) राक्षस के भवन के आँगन के समान, निरुपम
वारुणी से युक्त होने से वरुणालय के समान, सुगंधित वायु से युक्त पवन के निवास के समान,
श्रेष्ठ निधियों से युक्त कुबेर के भवन के समान, श्रेष्ठ विभूति का आगार शिव के निवास
के समान, तथा श्रेष्ठ पद्म-राग की प्रभा से समन्वित ब्रह्म-लोक के समान, सुशोभित थी ।
सोनेवाले कुंभकर्ण के दीर्घ निःश्वासों से राक्षस कंपित हो उठे, किन्तु जैसे-तैसे उसके
निकट पहुँचे और निर्मल तथा विशाल स्वर्ण-पर्यंक पर, हंस-तूलिका-तल्प पर शयन करने-
वाले कुंभकर्ण को देखा । वह अपने कंधे पर कपोल टिकाये, सतत दीर्घ निःश्वास छोड़ते
हुए सो रहा था । उसके मुख पर श्रम-जल की बूँदें थीं और उसके नेत्र किंचित् खुलें
हुए-से थे । उसके शरीर पर कर्पूर तथा चंदन का लेप था और उसके वक्ष पर उज्ज्वल
मणिमय हारों का समूह था । वह आनंद में अपने आपको भूलकर निद्रा तथा कामिनियों
के साथ रति-क्रीड़ा में सतत तल्लीन रहनेवाले के समान दीख रहा था और कदाचित्
देवताओं पर कई बार विजय प्राप्त करने के संबंध में स्वप्न देख रहा था । ऐसे कुंभकर्ण
को देखकर आगंतुक राक्षस दुःखी होने लगे कि हाय, ब्रह्मा ने ऐसे महान् वीर को ऐसी
निद्रा क्यों दी ? उसके पश्चात् उन्होंने उसके आगे भात की राशियाँ तथा महिष एंव वराह
का पकाया मांस आदि सजाये, चंदन तथा पुष्पों से उसकी पूजा की, धूप जलाया, दीपों
से आरती उतारी और हाथ जोड़कर उसकी स्तुति के पाठ किये । फिर, उन्होंने अशनि-
घोष से भी अधिक भयंकर ध्वनि की, निसानों का विपुल निनाद किया, भीषण भेरी-ध्वनि की,
और सिंह के समान गर्जन किया । वह महाध्वनि पाताल-लोक में, नक्षत्र-पथ में
सभी दिशाओं में तथा स्वर्ग में भी व्याप्त हो गई । इस पर भी कुंभकर्ण नहीं जगा,
इसके विपरीत वह और अधिक गंभीर निद्रा में डूब गया । तब सभी राक्षसों ने गदा,
मूसल, मुद् गर आदि से उसपर प्रहार किया । दस हजार भाले उसकी पसलियों में चुभोये ।
उस पर लगातार पहाड़ गिराये और उसकी छाती पर चढ़कर, हाथों तथा पैरों से ताड़न
किया । फिर भी कुंभकर्ण नहीं जगा । तब उन्होंने भीषण सिंहनाद करते हुए, शंख बजाते
हुए असंख्य कुंभ, पटह, भेरी, तुरही आदि का घोर निनाद किया । दस हजार भयंकर
राक्षस लगातार निसानों को बजाते ही रहे । इतनी ध्वनि होने पर भी कुंभकर्ण नीलाद्रि
के समान बिना हिले-डुले ही पड़ा रहा । तब राक्षसों ने उसे हाथी, घोड़े, ऊँट, जंगली
भैंसे आदि जानवरों से रौंदवाया और बड़े लट्ठों से उसका सारा शरीर चूर-चूर कर दिया
और एक साथ सभी वाद्य बजाये । सारी लंका इस ध्वनि से काँप उठी और वानर-सेना
भी शंकित होने लगी । इतना सब करने पर भी कुंभकर्ण ऐसा सो रहा था, मानो उसके
कान पर जूँ तक न रेंगी हो । तब कुछ राक्षस दिशाओं को कंपायमान करते हुए भेरीनिनाद