रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ३३७
कर लेना चाहिए । यदि शत्रु अपने से बलहीन है, तो उस पर सारी शक्ति से आक्रमण
कर देना चाहिए । अवसर देखकर शत्रु-सेना पर आक्रमण करके शत्रुओ को जीतने का
उपाय सोचना चाहिए । यदि शत्रु उद्दण्ड होकर आक्रमण करे, तो उनमें फूट डालने का
प्रयत्न करना चाहिए । यदि वह महान् शक्तिशाली होने के कारण अजेय हो, तो उसकी
शरण में जाना चाहिए । इन छहों नीतियो को जानकर जो राजा व्यवहार करता है, वह
अवश्य उन्नति करेगा । साम, दान, भेद तथा दंड के चारो उपायो को जो सतत काम में
लाता रहता है, उसके लिए अन्य नीति-शास्त्रो की आवश्यकता नही है । जो पर-धन, पर-
स्त्री में अपना चित्त लगाता है, वह अपने सारे वश का नाश करता है।"
कुंभकर्ण के इन वाक्यो को सुनकर रावण क्रोध-विवश हो कहने लगा- 'मैं अग्रज हूँ,
इसका विचार किये बिना तुम यहाँ आकर मुझे उपदेश दे रहे हो ? अव यह प्रलाप
क्यों ? चाहे कैसे भी हो, मैने यह कार्य किया है। अब इसे सँभालना तुम्हारा धर्म है न ?
कहो ।' तब कुंभकर्ण ने कहा-- "हे दानवेन्द्र, मै अवश्य युद्ध करने के लिए जाऊँगा ।
किन्तु एक और बात सुन लीजिए । एक दिन की बात है । मै निद्रा से जगने के पश्चात्
अत्यधिक प्राणियो को खाकर एकांत में बैठा हुआ था । उसी समय अनघ नारद वहाँ
आये । मैंने उनके निकट जाकर कहा- 'हे अनघ, आप इतनी शीघ्रता से कहाँ से आ रहे हैं
और कहाँ जा रहे है ? कृपया बतलायें।' तब उन्होने कहा- 'मैं कनकाद्रि से आ
रहा हूँ । में वहाँ की बातें तुम्हें सुनाऊँगा, सुनो । कनकाद्रि पर कमलासन (ब्रह्मा);
फाल-लोचन (शिव), पकजनाभ (विष्णु); पाकशासन, अनल, यम, वरुण, अनिल, यक्षराज
कुबेर, चंद्र, सूर्य आदि ग्रह; सिद्ध, मुनि, किन्नर, गधर्व, गीर्वाण, गरुड, पन्नग तथा गुह्य-प्रमुख
आदि लोगो की एक सभा एकत्रित हुई थी । उस सभा में सुर-गुरु वृहस्पति ने कहा-
'दशकंठ हमारी उपेक्षा करके अत्यधिक उद्दण्ड हो सारे ससार को त्रास दे रहा है । उसने
अपनी प्रचंड शक्ति से युद्ध में इन्द्र को परास्त किया है, यम को भगा दिया है, वरुण
को जीत लिया है, अपने बल का प्रदर्शन करके कुबेर को अपने अधीन कर लिया है,
उद्धत गर्व से कई धर्मात्माओ को वदी बनाकर पीड़ित किया है, रवि-चन्द्र का तेज मंद
करके उनको अपनी आज्ञा के अनुसार चलने के लिए वाध्य किया है, ग्रहो को पीड़ित किया है,
मत्र-पूत यज्ञो को नष्ट किया है, महान् उद्यान-वाटिकाओ को उजाड दिया है और
असह्य उत्तम स्त्रियो को कारागार में डाल दिया है। ऐसे भयकर कार्य करते हुए उसने
सभी भुवनो को त्रस्त कर दिया है। अत, आप उस दशानन का नाश करने का कोई
उपाय सोचें ।'
"बृहस्पति के वचनो को सुनकर ब्रह्मा ने सभी देवताओ से कहा- 'मैने पहले उसे
वर दिया था कि वह सुर, गरुड, उरग, अमुर तथा यक्षो के हाथो से नही मरेगा । अब
मैंने इसका प्रतीकार सोचा है, सुनो । उसने मुझसे मनुजो की चर्चा नही की थी और
वरदान के समय मैंने भी इसकी चर्चा नही की । अत, युद्ध-क्षेत्र में केवल मानव उसे परास्त
कर सकेंगे । इसलिए आप आदिविष्णु, कमलनाभ तथा लोकवद्य मुकुद से प्रार्थना कीजिए
कि वे मर्त्य-लोक में जन्म लें ।' इसके पश्चात् देवताओ तथा मुनियो ने वैसे ही किया ।
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