रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० | रंगनाथ रामायण
वाले उस श्रेष्ठ वीर को जीतना, क्या, तुम्हारे लिए संभव है ? उद्दण्ड पराक्रमी तथा
महाबली राम पर तुम्हें अकेले आक्रमण करने की सलाह हम नहीं देते । तुम सेना के साथ
जाओ और महाबली राम पर विजय प्राप्त करो ।'
इसके पश्चात् उसने दशकंठ से कहा—'हमारे रहते आप चिंता क्यों करते हैं ?
क्या, हम आपका मनोरथ पूर्ण नहीं करेंगे ? जानकी को प्राप्त करने के लिए आप इतने
व्याकुल क्यों हैं ? मैं, संपाति, द्विजिव्ह, तथा गंभीर पराक्रम-संपन्न बाहुबली कुंभकर्ण,
सब एक साथ मिलकर जायँगे और राम पर विजय प्राप्त करेंगे । फिर तो, आपको वैदेही
प्राप्त होगी ही । ऐसा नहीं भी हो सकता और हम राम के उग्र वाणों के आघात से
क्षत-विक्षत हो जायेंगे, तो भी हम आपके पास लौटकर आयेंगे और आपके चरणों में
प्रणाम करके यों ही कहेंगे कि हे देव, हम भयंकर वानर-सेना के साथ राम लक्ष्मण का
वध करके उन्हें खा गये हैं । तब आप बड़े मोद से हमें हृदय से लगाकर हमारे प्रति
आदर दिखाते हुए, उस समाचार को सारे नगर में प्रकट करेंगे । उस वार्त्ता को सीता सत्य
मानेंगी और पति की आशा छोड़कर आपकी बात मान लेगी ।'
तब कुंभकर्ण ने क्रुद्ध होकर असुरेन्द्र को देखकर कहा—'इन सब झूठी बातों से
क्या प्रयोजन है ? मेरे बाहुबल को देखिए । मैं अवश्य ही राम को जीत लूँगा । आप
निश्चिन्त रहिए ।' रावण भी बड़े उत्साह से, अपने पुनर्जन्म की प्राप्ति को निकट देखकर
बड़े आनंद से बोला—'मुझे विश्वास है कि तुम युद्ध में राम-लक्ष्मण को अवश्य जीत
लोगे । अनुपम शक्ति तथा शौर्य में तुम्हारी समता कर सकनेवाला कोई वीर नहीं है ।
यह सत्य है । शूल आदि श्रेष्ठ आयुधों के साथ तुम युद्ध करो ।' इस प्रकार कहते हुए
बडी प्रीति से उसने कुंभकर्ण को अनुपम रत्नाभरण आदि भेंट किये ।
७३. कुंभकर्ण का युद्ध के लिए जाना
तब रावण का भाई उन आभूषणों को पहनकर उज्ज्वल आभा से दीप्त हो उठा ।
स्वर्ण-कवच धारण करके वह संध्या के मेघों से आवृत पर्वत की भाँति तथा बहु-रत्न-कलित
मेखला धारण करके वह वासुकि से आबद्ध मंदराचल के समान सुशोभित होने लगा । उस
राक्षसपुंगव ने रणोत्साह से भरे, अपने हाथ में तीनों लोकों में अपनी भयंकर दीप्ति व्याप्त
करनेवाला, विजय-प्रदायिनी शिव के शूल से भी सुंदर, अपनी नोक से निकलनेवाली
ज्वालाओं के द्वारा अग्निकण विखेरनेवाला, सदा पूजित, रत्न-प्रभा से भासमान तथा शत्रु-
वीरों के रक्त से रंजित अनुपम शूल धारण किया । उसके पश्चात् उसने अपने भाई को
प्रणाम किया और उसके आशीर्वाद प्राप्त करके, उस सभा-मंडप से अपने कार्य में तत्पर हो
अत्यंत वेग से यों चल पड़ा, मानो उसके प्राण उससे यह कह रहे हों कि हे कुंभकर्ण,
इस दुखद शरीर में हम रहना नहीं चाहते, शीघ्र इसे युद्ध-भूमि में त्याग दो, चलो, और
उसे जैसे खींचे लिये जा रहे हों । तब राक्षस-वीरों का समूह भी उसके पीछे-पीछे युद्ध के लिए
निकल पड़ा । वे सब घोड़ों पर, गजों पर, रथों पर, सिंहों पर चढ़कर काजल के पर्वतों
के समान सुशोभित होते हुए, अपने विशाल दंष्ट्रों की दीप्ति चारों ओर फैलाते हुए, इस
प्रकार जा रहे थे, मानो क्रूरता ने ही एक स्थान पर एकत्रित हो पिंड-रूप धारण कर लिया हो