रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ३३६
इतना कहने के पश्चात् रावण ने फिर कुम्भकर्ण से कहा- 'मैं जानता हूँ कि लक्ष्मी
स्वयं सीता होकर इस पृथ्वी पर जन्मी हैं। मैं जानता हूँ कि विष्णु स्वयं रघुराम होकर
जन्मे हैं । मैं यह भी जानता हूँ कि युद्ध में राम के हाथों मेरी मृत्यु अवश्य होगी । अब
तुमसे मैं क्यों छिपाऊँ ? मैं काम-वश हो सीता को नहीं लाया, क्रोधाभिभूत होकर
बलात् मैं सीता को नहीं लाया; युद्ध में रघुराम के हाथो मरकर वंदनीय विष्णु का परम-
धाम प्राप्त करने के निमित्त ही मैं सीता को लाया हूँ ।'
इस प्रकार के वचन कहनेवाले रावण को देखकर कुंभकर्ण ने कहा- 'हे दानवनाथ,
जब मैं आपकी सेवा करने के लिए प्रस्तुत हूँ, तब आप व्याकुल क्यों होते हैं ? आप
आनन्द से रहिए । मैं शत्रु का नाश करूँगा ।' इसके पश्चात् उसने सारी सभा की ओर
एक बार ध्यान से देखा और कहा- 'हे इन्द्र के शत्रु, इस सभा में निर्मल चरित्रवान्,
विभीषण नहीं दीख रहा है । वह कहाँ है ?' तब रावण ने कहा- "राम-लक्ष्मण के लंका
पर आक्रमण करने का समाचार सुनकर उस संबंध में परामर्श करने के लिए सभी लोग
एकत्र हुए थे । निद्रा के वशीभूत होकर तुम तो शीघ्र यहाँ से चले गये । तब विभीषण ने
राम के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करके उसकी प्रशंसा में ऐसे हृदय-विदारक शब्द मुझसे
कहे कि क्रोध में आकर मैंने दृढ़ता के साथ कहा- 'यदि तुम यहाँ रहो तो मैं तुम्हारे
प्राण ले लूँगा । तब वह मुझे छोड़कर राम की शरण में चला गया और अब वही है ।"
७२ कुंभकर्ण की गर्वोक्तियाँ
तब कुंभकर्ण ने सोचा कि अब परिस्थिति बड़ी विकट हो गई है, मुझे अवश्य युद्ध
में जाना ही चाहिए । अब मैं (अपनी गुफा में) लौट नहीं सकता । इस प्रकार, निश्चय
करके उसने रावण के सामने दृढ़ता से यह प्रतिज्ञा की-' 'मैं यमराज से भी भिड़कर
उसका नाश करूँगा, ब्रह्मा को भी पकड़कर उसका मर्दन करूँगा, आदिशेष को भी पकड़कर
उसे चारो ओर आकाश में घुमाऊँगा, विहगेन्द्र (गरुड) को भी त्रस्त करूँगा, प्रलयाग्नि
को भी निगल जाऊँगा । समुद्र का सारा जल पी जाऊँगा, विष्णु को भी युद्ध में परास्त
कर दूँगा । रुद्र को भी नामावशिष्ट करूँगा, नैऋत को भी पकड़कर खड-खड कर दूँगा,
मृत्यु का भी गला घोट दूँगा, वरुण का भी तेज नष्ट करूँगा, कुबेर का भी पेट चीर
डालूँगा, सूर्यबिंब को भी अपनी मुष्टि में कस लूँगा और ब्रह्माण्ड को भी ठुकरा दूँगा ।
ऐसी दशा में मेरे उद्धत रण-कौशल के समक्ष, इन वानरों को निगल जाना कौन बड़ा
काम है ? हे असुरेन्द्र, मैं अवश्य इन कपियों को पहाड़ो पर भगाकर, उन मानवो का
वध कर दूँगा, आप निश्चिन्त रहिए । जब राम मेरे हाथ से मारे जायँगे, तब सीता
अनाथा बन जायगी और आपकी कामना पूरी होगी ।'
इन बातों को सुनकर महोदर ने बाहुबली कुभकर्ण से कहा-'हे वीर, तुमने श्रेष्ठ
कुल में जन्म लिया हूँ और तुम्हारा यह उत्कट गर्व उचित ही है; किन्तु नीति तथा
अनीति का विचार किये बिना क्या कोई वीर ऐसे शत्रु-वध की प्रतिज्ञा करता है ? भयंकर
सिंह की भाँति क्रोधोन्मत्त होकर प्रखर तेज से विलसित होनेवाला राम, केवल मानव नहीं है,
स्वयं विष्णु इस रूप में आया हुआ है । एक ही बाण से वालि का संहार करने-