रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 364, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३३४ रंगनाथ रामायण
राक्षस तथा गंधवों की ओर से कोई भय कभी नहीं हुआ । अभी मानवों ने हम में भय
उत्पन्न किया है । देव-शत्रु रावण के जानकी को ले आने से क्रुद्ध होकर रविकुलोत्तम राम
अत्यन्त पराक्रमी वानरों के साथ लंका पर चढ़ आये हैं । इसके पहले अकेले एक वानर ने
अक्षयकुमार का वध करने के पश्चात् लंका को भस्म करके अपनी शक्ति को प्रकट किया था।
अब इन महान् कपियों को जीतनेवाला कौन है ? राम देवों तथा असुरों से भी
अधिक पराक्रमी है और रावण भी उनके साथ युद्ध करके हार गये हैं और त्रस्त होकर
लंका में लौट आये हैं ।'
इन वचनों को सुनकर उस निशाचर की आँखो से अग्नि-कण निकलने लगे । उसने
भीषण क्रोध से उद्दीप्त होकर दाँत पीसते हुए कहा--'युद्ध में सभी वानरों तथा अत्यन्त
पराक्रमी दाशरथियों को वध किये बिना, वानरों के रक्त-मासो से राक्षस-समूह को तृप्त
किये बिना तथा स्वयं राम-लक्ष्मण के रक्त का पान किये बिना मैं कौन-सा मुँह लेकर
रावण के सम्मुख आऊँ ? मैं वैसा करने के पश्चात् ही वहाँ आऊँगा ।'
इस पर महोदर ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा--'हे वीर, दशकंठ से
मिलने के पश्चात्, आप ऐसा ही कीजिए । उनका आदेश लेकर आप शत्रुओं पर विजय
प्राप्त कीजिए ।' तब उसने कहा-'ऐसा ही हो' और राक्षसों की ओर देखने लगा । तब
उन राक्षसों ने इक्कीस मनुष्यों के मांस का ढेर उसके सामने लगा दिया । फिर वे अस्सी
महिष, सात सौ बकरियाँ, एक सहस्र सूकर, चार सहस्र मोटे मोटे खरगोश तथा छह सौ
मृग ले आये और उनका वध करके अलग-अलग पकाया और उस मांस को उसके सामने
लाकर रखा । कुंभकर्ण सारे मांस को खाकर तृप्त हुआ । उसके पश्चात् उसने दो सहस्र
घट मद्य पीकर ऐसी डकार ली कि सभी दिशाएँ विदीर्ण-सी हो गईं । फिर अपनी मूँछों
पर ताव देते हुए, आँखो को घुमाते हुए अपनी गति से सारी पृथ्वी को कँपाते हुए, अपनी
गुफा से यो निकल पड़ा, मानो राहु के मुँह-गह्वर से मुक्त प्रलय-काल का सूर्य हो, या बलि-
महाराज को दंड देकर, सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होनेवाले त्रिविक्रम हो ।
उस प्रकार दीर्घ तथा भीषण आकारवाले राक्षसवीर को आते देखकर किले के
बाहर रहनेवाले सभी वानर त्रस्त हो उठे । कुछ वानर विस्मित हुए, कुछ जहाँ-तहाँ
छिपने लगे, तो कुछ वानरों के पैर लड़खड़ाने लगे, कुछ भयभीत हो उठे, तो कुछ मूर्च्छित
होकर गिर पड़े, कुछ समुद्र में कूद पड़े, तो कुछ दाँतो-तले उँगली दबाये खड़े रहे और
कुछ राम की आड़ में जा खड़े हुए । तब राम ने उन्हें देखकर लक्ष्मण को धनुष-बाण
लाने की आज्ञा दी । तत्पश्चात् उन्होंने विभीषण को देखकर कहा--'हे विभीषण, पृथ्वी
तथा आकाश का स्पर्श करनेवाले विशाल शरीर से मपन्न प्रलय-काल के मेघों के बीच
चमकनेवाली बिजलियों के समान आभूषणों की कांति से दीप्त तथा तीनों लोकों को एक
साथ निगलने योग्य मुँह से युक्त यह कौन है, जो वहाँ नगर के मार्ग से जा रहा है ?
क्या, वह यमराज है, या प्रलय-काल का अनिल है, या प्रलय-काल का रुद्र है, या प्रलय-
मारुत है, या प्रलय-काल का सूर्य है, या प्रलय-काल का शेष-नाग है, या प्रलय-मृत्यु है, या
प्रलय-काल का वरुण है, या प्रलय-काल का यम है या प्रलय-काल का भैरव है या प्रलय-काल