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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 508 में से

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पृष्ठ 366

३३६ रंगनाथ रामायण
अग्नि-ज्वालाओ के समक्ष न टिक सकने के कारण असमय 'ही रावण न इसे जगाने के
लिए राक्षसो को भेजा । इसलिए यह युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर राजा के अत पुर में जा
रहा है । बहुत शीघ्र यह रावण की आज्ञा लेकर हम पर आक्रमण करने के लिए आयगा।
उसके आने के पहले आप सारी कपि-सेना में यह घोषित करवाइए कि कोई इसके
आकार को देखकर युद्ध-क्षेत्र से भाग न जाय, यह दनुज नही है, यह यत्र की सहायता
मे बना हुआ भयकर रूपवाला काठ का एक पुतला है । इस प्रकार घोषित कराकर आप
वानरो का भय दूर कर दीजिए और उन्हें युद्ध के लिए सन्नद्ध कीजिए ।” तब राम ने
नील को ऐसी घोषणा करने की आज्ञा देकर भेजा ।
कुभकर्ण को आते देखकर नगर की स्त्रियाँ उस पर फूलो की वर्षा करने लगी ।
निदान, कुभकर्ण चद्रिका के निवास-सदृश सुशोभित होनेवाले उस सभा-मंडप में ऐसे पहुँचा, जैसे
उज्ज्वल किरणो से सुशोभित होनेवाला सूर्य धवल मेघ-समूह में प्रवेश करता हो । वहाँ
पहुँचकर उसने अपने अग्रज को प्रणाम किया, तो रावण ने उसे बड़े प्रेम से अपने हृदय से
लगा लिया और उसे एक स्वर्णासन पर बिठाया । उसके पश्चात् कुभकर्ण ने अपने अग्रज
को देखकर कहा—'हे असुरनाथ, आपका मुझे जगाने का क्या कारण है ? किसने आपका
अपकार किया ? मै किसे मार डालू ? क्या आज्ञा है ?'
तब रावण ने कुभकर्ण से कहा—'अपनी निद्रा की अधिकता के कारण यहाँ के
कार्यों की गति-विधि से तुम अनभिज्ञ हो । इसलिए मै तुम्हें सभी बातें समझाता हूँ, सुनो।
दशरथ-नन्दन (राम) सुग्रीव को मित्र बनाकर समुद्र पर सेतु बाँधकर मुझ पर चढाई करने
के लिए आया है और अपनी सेना के साथ लका को घेरे हुए पडा है । उससे युद्ध करने
गये हुए प्रहस्त आदि वीर राक्षसो का उसने सहार किया है, किन्तु उस युद्ध में एक भी
वानर-वीर मरा नही है । इसलिए तुम उन राम-लक्ष्मण को जीतकर वालि-पुत्र तथा सूर्य-
नदन का वध करो और लका के यश की रक्षा करो ।'
७०. कुंभकर्ण का हितोपदेश
रावण के ऐसे दीन वचनो को सुनकर कुंभकर्ण ने रावण से कहा--“उस दिन एकात
में सभी मंत्रियो ने जिस विपत्ति की संभावना की थी, वही आज अचूक रूप से प्रत्यक्ष
हुई है । यह किसी भी प्रकार टलनेवाली नही है । जो मदाध होकर, आगे-पीछे का
विचार किये बिना कार्य करता है, वह सब प्रकार से हानि उठाता ही है, ऐसा व्यक्ति आपके
सिवा और कौन हो सकता है ? जो राजा अपने बुद्धिमान् मत्रियो की मंत्रणा के अनुसार
कार्य करता है, उसे अपने तथा मत्री दोनो के उत्साह तथा शक्ति से अगणित फल प्राप्त
होगा । राजा को चाहिए कि वह देश और काल का विचार करे, जन तथा धन को समृद्ध
रखे, किसी कार्य के प्रारंभ करने के पूर्व उसके सबंध में सोच-विचार कर ले, उसमें पडने-
वाले विघ्नो का निवारण करे और कार्य में कृत-कृत्य होकर सतत राज्य-सुख का आनंद
प्राप्त करते हुए पृथ्वी का पालन करे । उसे शत्रु के बल तथा शक्ति का मूल्यांकन करके,
यदि शत्रु अपने से बलवान् हो, तो उससे सधि का प्रस्ताव करना चाहिए। यदि शत्रु अपने
समान बलशाली हो, तो उसके विरुद्ध अपना बल तथा पराक्रम प्रकट करके, उसे अपने वश में