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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 508 में से

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पृष्ठ 357

युद्धकांड ३८७
तेज तथा सुदर आकार से विलसित है । भला, राक्षसो में ऐसा तेजस्वी कौन है ? यदि
यह क्रूरकर्मी नही होता, तो वह समस्त ससार के लिए पूज्य होता । इसके सभी राक्षस-
वीर सैनिक, पर्वताकारवाले, अपार शक्तिशाली, योद्धा, क्रूर-चरित्र तथा भयकर है। इसके
पश्चात् उग्रलोचन (शिव) के पिनाक को वश में लाने में निपुण राम तथा लक्ष्मण ने
धनुष तथा वाण धारण किये मानो (ससार को) बता रहे हो कि क्रुद्ध होने पर भी धर्म-
मार्ग का ही अनुसरण करनेवाले इन राजकुमारो की समता कौन कर सकता है ।'
तब रावण ने अपने सभी राक्षस-वीरो को देखकर कहा--'नगर के द्वारो पर तथा
बड़े-बड़े आँगनो में असख्य सैनिक लका के रक्षणार्थ रहें । जब हम और तुम युद्ध के लिए
चले जायेंगे, उस समय यदि वानर लका में प्रवेश करें, तो हमारी शक्ति किस काम की
होगी ? इसलिए इसका ध्यान रहे।' तब असख्य राक्षस इस रक्षण-कार्य के लिए चले गये ।
इसके पश्चात् रावण ने धनुष तथा बाण धारण किये हुए बड़े वेग से वानरो की
सेना पर ऐसे आक्रमण किया, जैसे दावाग्नि वनो को घेर लेती हो और पृथ्वी आकाश से
भिड जाती हो । उसने अत्यत तीक्ष्ण वाणो की ऐसी तीव्र वर्षा की कि यह विदित नही
होता था कि यह आकाश है, यह पृथ्वी है और ये दिशाएँ है । अपने उद्दण्ड बल को
प्रकट करते हुए उस राक्षस ने झुंड-के-झुंड वानरो को सहज ही खडित करके चूर-चूर
कर दिया, अस्थि, मज्जा, मास तथा रक्त से सारी युद्ध-भूमि को भर दिया और अपने धनुष
के टकारो से दिशाओ को प्रतिध्वनित करने लगा । गिरनेवाले, भ्रमित होनेवाले, मरनेवाले,
चकरानेवाले, भयभीत होनेवाले, आर्त्तनाद करनेवाले तथा विकृताग होनेवाले वानरो से रण-
भूमि को पूर्ण देखकर देवता सभ्रमित तथा व्याकुल हो गये ।
उस समय क्रूर कालानल की दुर्वार लीला के समान भयकर दशानन को अत्यत
भयानक रूप धारण करके गरजते हुए देखकर सुग्रीव ने उसका सामना किया और एक
पर्वत उठाकर उस पर फेंका, किन्तु रावण ने उसे बीच में ही अपने विपुल अस्त्रो से
चूर-चूर कर दिया और अपनी दीप्ति-ज्वालाओ को आकाश में फैलाते हुए, जलनेवाले एक
तीक्ष्ण शर को सुग्रीव के वक्ष पर चलाया, तो वह शर उसके शरीर के आर-पार निकल-
कर पृथ्वी में गड गया । तुरत सुग्रीव लडखडाते हुए पृथ्वी पर गिर पडा । यह देखकर
दानव हर्षध्वनि करने लगे और वानर अश्रु-धाराएँ बहाने लगे । इस पर महान् बाहुबली
ऋषभ, सुदंष्ट्र, गज, गवाक्ष, गवय, नल तथा ज्योतिर्मुख नामक वानरो ने क्रोधोन्मत्त होकर
रावण पर पर्वतो तथा वृक्षो से अविरत प्रहार किया । किन्तु, रावण ने उन सब को
बीच में ही खडित कर दिया और उन सातो वानरो को एक ही बाण से मृत-सा
कर दिया ।
६२. हनुमान् का रावण से युद्ध करके मूर्च्छित होना
अपनी सेना के नायको को इस प्रकार गिरते देखकर हनुमान् अत्यधिक क्रुद्ध हुआ
और बड़े दर्प मे रावण के रथ पर कूदकर उससे कहने लगा--'हे रावण, कदाचित् तुम
गर्व से फूलते रहे हो कि मैंने देवेन्द्र आदि देवताओ तथा राक्षसो पर विजय प्राप्त की है,
किन्तु मेरे सामने तुम्हारी दाल नही गल सकती, मैं तुम्हारा तेल निकाल दूँ गा । चिरकाल