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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 508 में से

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पृष्ठ 368

३६८ रंगनाथ-रामायण
हरि-ने भी मर्त्यलोक में जन्म लिया है।' इतना कहकर नारद चले गये। हे दैत्य-राज,
सूर्य-वंश-तिलक आदि देव ही हैं, वे मनुज नही हैं। अत, सीता को उन्हें सौंप दीजिए। उनकी
शरण लीजिए और सभी वानरो को देवता जानिए। हे दानवेन्द्र, मेरी बात सत्य मानिए।"
७१. रावण का कुंभकर्ण के उपदेश का तिरस्कार करना
कुंभकर्ण के इन वचनो को सुनकर दशानन मन-ही-मन संताप की अग्नि में जल
गया और थोडी देर तक मौन बैठा रहा। फिर, दीर्घ निःश्वास छोडकर अत्यन्त चिंताक्रान्त
हुआ और साथ-ही-साथ भयभीत भी, किन्तु अपने भय को प्रकट किये बिना उसने
क्रुद्ध होकर अपने अनुज को देखकर कहा--“बार-बार 'विष्णु', 'विष्णु', कहकर क्या प्रलाप
कर रहे हो ? इतना भय तुम्हें कैसे होने लगा। स्वयं विष्णु से भी मै नही डरता, तब
मानव-वेशधारी विष्णु से मैं क्यो भयभीत होऊँगा ? मुझे बार-बार ऐसा भय क्यो दिखाते हो ?
भले ही तुम भयभीत हो जाओ । चाहे राघव विष्णु ही क्यो न हो, उसका अनुज
इन्द्र ही क्यो न हो, सुग्रीव हर ही क्यो न हो, उन्हें मुझसे युद्ध करना ही पडेगा ।
समस्त नीतिशास्त्रो के ज्ञाता होते हुए भी तुम चाहते हों कि जिस राम से मैने विरोध
ठान लिया है, उसके साथ हीन मित्रता कर लूँ ? नीति-शास्त्र का तुम्हारा सारा ज्ञान
आज निष्फल हुआ । युद्ध-भूमि में हमारा सहार करके, मुनियो तथा सुरो की रक्षा करने
का विचार करके, जगदेकरक्षक तथा कमलनाभ ने अपने देवत्व को त्यागकर, धोखे से
मानवत्व को धारण कर लिया है और इस जगत् पर राम होकर जन्म लिया है, भला,
उससे हमारी संधि कैसे संभव है ? मै अपने गर्व को छोड़कर वानरो के आश्रय में रहने-
वाले उस राम के पास कैसे जाऊँ ? यही कमलनाभ वामन का रूप धरकर बलि के यज्ञ
में गया, तीन चरण पृथ्वी दान में ली और फिर उसे बंदी बनाया। इसने तुरन्त उपकार
करनेवाले का अपकार कर दिया। ऐसी दशा में हम विरोधियो का सहार किये बिना
वह रहेगा क्यों ? हमारे और राम के मध्य संधि हो कैसे सकती है ? जब हम दोनों ने
इन्द्र-लोक पर चढ़ाई की थी और अपने बाहुबल का प्रदर्शन करते हुए महान् पराक्रमी
इन्द्र आदि देवताओ को परास्त किया था, तब यह विष्णु कहाँ था ? क्या, तुमको इसलिए
मैंने जगाया कि मैं तुमसे उपदेश सुनूँ ? भला, तुम्हें यह भय क्यो हुआ ? प्राणों के
भय से इतनी बातें क्यों करते हो ? यदि तुम्हें प्राण प्रिय है, तो तुम कुशलतापूर्वक रहो ।
मैंने तो दीर्घ आयु पाई है; तीनों लोको को जीता है, कई प्रकार के राज-सुखों का
अनुभव किया है और अपना अनुपम तेज समस्त ससार में व्याप्त किया है। मै और लोगो
के समान हीन पराक्रमी राम को प्रणाम नही करूँगा । मैने तुम्हें युद्ध में जाने का आदेश
दिया, तो जाने की इच्छा नही रखते हुए ऐसे वचन तुम क्यो कहते हों ? अब तुम जाकर
सुख से सो जाओ । शत्रु सोनेवाले को नही मारते । मैं स्वयं राम-लक्ष्मण का, सुग्रीव का
तथा अन्य भयंकर-पराक्रमी वानरो का सहार करूँगा । सभी देवताओ का वध मै स्वयं
करूँगा । विष्णु को भी मैं ही मार डालूँगा । उस विष्णु के अनुचर-शूरो को युद्ध में
जहाँ भी मिलेंगे, मैं अपनी शक्ति दिखाते हुए मारूँगा। तुम कायर की भाँति चिरंकाल तक
जीवित रहो ।”