रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ३२३
५८ मंदोदरी के हित-वचन.
रावण की सभी बातें सुनकर, मंदोदरी शीघ्र माल्यवान् के पीछे, दैत्य-स्त्रियो के
साथ रावण की सभा की ओर चली। उसके पीछे-पीछे अतिकाय तथा प्रतीहारी चलने लगे ।
आयुधो से अलंकृत अन्य सैनिक भी उनका अनुसरण करने लगे । चामरिक-समूह
चामर डुला रहे थे और सभी मंत्री भी उसके साथ चल रहे थे । अपने समस्त आभूषणो
की शोभा को चारो ओर विकीर्ण करती हुई उसने रावण की सभा में ऐसे प्रवेश किया,
मानो नील-मेघो के मध्य विलसित होनेवाली बिजली हो ।
रावण ने मंदोदरी को अपने सिंहासन के अर्द्ध भाग पर आसीन कराया और प्रिय
वचन कहते हुए बुद्धिमान् मन्त्रियो को उचित आसनों पर बिठाया । प्रणाम करनेवाले
अतिकाय को प्रसन्नता से अपने निकट ही एक आसन पर बिठाया ? उसके पश्चात् दानवेश्वर ने
अपनी स्त्री से कहा--'हे कुवलयनेत्री, तुम तो इस प्रकार कभी सभा में नही
आती । आज तुमको कंपित शरीर से इस प्रकार सभा में आते देखकर मुझे आश्चर्य
हो रहा है ! तुम्हारे आगमन का क्या कारण है ?'
तब मंदोदरी ने अपने पति को देखकर कहा- "हे दनुजेश, आज मुझे यहाँ आने
की आवश्यकता पड़ी, इसलिए मैं आई हूँ । आप मेरे आगमन को बुरा न मानिए ।
हे देव, आपने देखा कि धूम्राक्ष आदि हमारे सेनापति युद्ध में कैसे मारे गये ? राम ने जन्म-स्थान
में चौदह सहस्र राक्षसो का सहार किया था और खर तथा त्रिशिर का वध किया था ।
मैं कहती हूँ कि ऐसा वीर एक साधारण मनुष्य नही हो सकता । इतना ही नही, राम ने
दण्डक-वन में महान् बलशाली कबंध का सहार किया । मारीच की मायाओ की उपेक्षा
करके उन्होने उसका वध किया । एक भयंकर अस्त्र से वालि का सहार किया । राघव ने
देवताओ के हित के लिए इस ससार में जन्म लिया है । वे स्वयं आदिनारायण है अन्यथा
इस पृथ्वी पर ऐसा पराक्रमी नर कहाँ मिलेगा ? उन्होने ही तो नीलकंठ के धनुष को भग्न
किया था ? अपने पिता की आज्ञा से जिस समय वे वन में तपस्वी का जीवन व्यतीत
करते थे, उसी समय आप सीता को हर लाये । रामचन्द्र ने आपका क्या अहित किया था।
राम-लक्ष्मण से युद्ध करने की क्षमता तीनो लोको में कौन रखता है ? यदि साम, दान
तथा भेद से शत्रु वश में आ जाय, तो दण्ड का उपाय अपनाना उचित नही । यदि आप
दण्ड देना भी चाहें, तो क्या राम-लक्ष्मण आपसे दण्ड भोगेंगे ? हे देव, राम परमात्मा हैं,
अत आप उनके समक्ष नतमस्तक हो, तो इसमें कोई दोष नही । यदि आप उनसे शरण
मांगें, तो वे आपको अवश्य अपनायेंगे । शरण माँगने से आपका शुभ ही होगा, हानि नही ।
काकुत्स्थवंशी राम के गुण, रूप, कृपा आदि गुण-गण का वर्णन करना कैसे संभव है ?
यदि वे क्रोध में आ जायें, तो इन्द्रादि देवता भी ठहर नही सकते, तब आपके लिए (उनका
सामना करना) कैसे संभव है ? अब आप इस प्रयत्न को छोड़ दीजिए । व्यर्थ ही दर्प की
अग्नि में नाश मत होइए । हठ छोड़िए और संताप त्यागकर सीता को लौटा दीजिए ।
इसी में आपका हित होगा । हे लंकेश, आप अपने कुल तथा लंका की रक्षा कीजिए ।
ऊँचे वाहनो तथा मणि-भूषणो के साथ आप जानकी को लौटा दीजिए और उपाक्ष, अतिकाय