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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 508 में से

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पृष्ठ 363

युद्धकांड ३३३
करने लगे, कुछ पर्वत गुफाओ को प्रतिध्वनित करते हुए सिंह-सम गर्जन करने लगे,
कुछ अपने हाथो में उसके केश लपेटकर नोचने लगे, कुछ उसके कर्ण-पुटो में प्रवेश करके
उसके परदो को दाँतो मे काटने लगे और कुछ अविराम गति से गदा, मुद्गर, खड्ग,
मूसल आदि से उसके मुख तथा वक्ष पर प्रहार करने लगे । तब उस राक्षस की नीद
थोडी उचटी । उसने एक जँभाई ली और फिर सोने लगा । तब राक्षसो ने उसे बडे-बडे
रस्सो से बाँध दिया और एक सहस्र घट उबलता हुआ तेल उसके कानो में उडेल दिया,
नथुनो में जलती हुई शलाकाएँ रखी, एक साथ भयकर गति से वे भेरियो का निनाद
करने लगे और लगातार हाथी तथा घोडो से उसका वक्ष रौंदवाने लगे । तब कुभकर्ण
किंचित् शकित-सा हुआ और सर्प के समान भयकर हाथो को फैलाया, थोडा-सा जगा,
हुंकार भरकर अँगडाई ली और अपने विशाल मुख को विकृत करते हुए जँभाई ली और
आँखें खोलकर भयकर रूप धारण किये ऐसे बैठ गया, मानो उसने यह सोच लिया हो कि
जब राम मुझे महान् सायुज्य पद ही देनेवाले है, तब मुझे इस निद्रा की क्या आवश्यकता है
और अपनी निद्रा त्याग दी । उसका मुँह प्रलयकाल के सूर्य-बिंब के समान लाल था,
और विंध्याचल की गुफाओ से निकलनेवाले पवन के समान उसकी उसासे चल रही थी
और उसकी आँखें प्रलय-काल के अर्क-बिंब के समान लाल दीख रही थी ।
इस प्रकार, उसके जगकर बैठने के पश्चात् सभी राक्षस दानवेश्वर के पास जाकर
बोले- 'हे देव, कई प्रकार से पीडा पहुँचाने के पश्चात् आपके अनुज जगे हैं, हम उनसे
युद्ध में जाने की प्रार्थना करें या आपके सम्मुख उन्हें लिवा लायें ? आप जो आज्ञा दें ।'
तब रावण ने बड़ी प्रीति से कहा- 'उसको यही लिवा लाओ ।'
६८. राघवों की युद्ध-यात्रा पर कुंभकर्ण का क्रुद्ध होना
रावण की आज्ञा के अनुसार राक्षस कुभकर्ण के पास गये । अपने समक्ष अडे हुए
राक्षस-समूह को देखकर उसने कहा- 'तुम लोगो ने मुझे क्यो जगाया ? अब रावण के
लिए कौन-सा कार्य आ पडा है ? कहो, बात क्या है ?' तब उन्होने कहा- 'आप स्वय
प्रभु रावण से ही सारी बातें जान लें ? आपको लिवा लाने के लिए उन्होने हमें भेजा है।
इससे अधिक हम और कुछ नही जानते ।'
तब कुभकर्ण उठा, जी भरकर स्नान किया, सुदर वस्त्राभूषण पहने और प्रकाशमान
किरीट धारण किया । उसके पश्चात् बडे मोद से राक्षसो ने कई प्रकार के मिष्टान्न,
पकवान, मधु, महिष तथा सूकर का मास, भेजा तथा घी के बरतन लाकर उसके सामने रखे ।
कुभकर्ण ने पहले बडी प्रीति के साथ मेदा तथा मास खाया, छककर रक्त तथा
मधु पिया और अत्यधिक सतुष्ट हुआ । तब सभी राक्षस प्रणाम करके उसके समक्ष खडे
हुए । तब कुभकर्ण ने उन्हें देखकर कहा- 'दानवेश्वर अपने पुत्र तथा वधुजनो के साथ
कुशल है ? लका पर कोई विपत्ति तो नही आई ? यदि उस पर कोई विपत्ति आ पडी है,
तो मैं उस भय को दूर कर दूँगा । अमरेन्द्र से भी भिडकर उसे स्वर्ग मे भगा दूँगा,
प्रलय-काल की अग्नि को भी बुझा दूँगा, शत्रुओ के तीव्र दर्प को भग कर दूँगा ।'
तब उपाक्ष ने हाथ जोड़कर कुभकर्ण से कहा- 'हे राक्षसवीर, सुनिए, हमें देवता,