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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 508 में से

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पृष्ठ 349

इतने में मूर्च्छित अंगद ने आँखें खोलीं । अपने मुँह से बहनेवाले रक्त को वार-
वार पोंछते हुए, एक विशाल गदा लिये हुए वह उस महाकाय के रथ पर कूद पड़ा और
अपनी उद्दण्ड शक्ति को प्रकट करते हुए उसके सारथी को मार डाला । फिर, उसके धनुष
के खण्ड-खण्ड कर दिये, सभी अश्वों को मार गिराया और उसके पश्चात् उस राक्षस-वीर
पर गदा का ऐसा प्रहार किया कि महाकाय का मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगा । तब
महाकाय भी रथ से नीचे उतरकर भयंकर गदा से अंगद पर प्रहार किया; किन्तु अंगद ने
प्रतिघात किया । महाकाय ने अंगद का वार बचाकर उद्धत गति से अंगद के सिर पर
गदा-दण्ड से प्रहार किया । उस प्रहार के कारण अंगद के सिर से रक्त फूट निकला ।
किन्तु, अंगद ने बिना धैर्य खोये, अपनी गदा से महाकाय पर ऐसा प्रहार किया कि महाकाय
का सिर फूट गया । तब भी महाकाय ने भयंकर आघात करके उसे रक्त की बाढ में
ऐसा डुबोया, मानो उसने सोच लिया कि इसके पिता ने मेरे पिता को एक सहस्र
वार समुद्र में डुबोया था और उसका प्रतिशोध मुझे लेना चाहिए । इस प्रकार, इन्द्र का
पोता तथा महाकाय दोनों भयंकर युद्ध करते हुए रक्त-सिक्त होकर ऐसे दीखने लगे, मानो
रक्त-वर्ण की नदियों से विलसित दो महापर्वत हों । दोनों की गदाओं के आपस में
टकराकर छिन्न-भिन्न होने से, वे दोनों वीर इस प्रकार मल्लयुद्ध करने लगे, जैसे पूर्वकाल में
इन्द्र तथा बल नामक राक्षस ने आपस में द्वंद्व-युद्ध किया था । उनके पदाघात से धूलि
उड़-उड़कर आकाश में व्याप्त हो गई । वे वालि-सुग्रीव के द्वंद्व-युद्ध का स्मरण दिलाते हुए
परस्पर ऐसे भिट गये थे कि मालूम नहीं होता था कि यह वानर है, और यह राक्षस है ।
तब सभी वानर अंगद को उत्साह देते हुए कहने लगे—'हे वीर, इस दुष्ट राक्षस
की उपेक्षा क्यों करते हो ? तुम वालि के पुत्र हो । वालि के समान तुम्हारा बाहुबल भी
श्रेष्ठ है । जब वालि ने दुन्दुभी से युद्ध किया था, तब उसने दुंदुभी को इतनी देर तक
ठहरने नहीं दिया था । तुम अपने पराक्रम का प्रदर्शन करके इस देवताओं के शत्रु का
संहार शीघ्र कर डालो ।' इस प्रकार, जब वानरों ने उत्साहवर्द्धक जय-निनाद किया, तब
अंगद ने उस राक्षस पर अपनी मुष्टि से तीव्र प्रहार किया । वह उस आघात से चकराकर
पृथ्वी पर गिर पड़ा । पृथ्वी पर गिरे हुए उस राक्षस के वक्ष को पैरों से दबाकर अंगद ने
उसका कंठ मरोड़कर सिर को धड़ से अलग कर दिया और उसे ऊपर उछालकर विजय-
गर्जन किया । अंगद को देखकर सभी वानरों ने विपुल हर्ष-नाद किया । यह देखकर सभी
दानव तितर-बितर हो गये । कुछ समुद्र में कूद पड़े, कुछ लंका में घुस गये और शेष
राक्षस चारों दिशाओं में भाग गये । सभी वानरों ने अंगद की प्रशंसा की और उसे सीता-
पति के समक्ष ले जाकर सारा वृत्तांत उन्हें कह सुनाया । रघुपति यह समाचार सुनकर
अत्यंत प्रसन्न हुए और बड़े हर्ष से हृदय से लगाकर और कृपा-पूर्ण दृष्टि से देखकर मंदहास
करने लगे ।
हतशेष राक्षसों ने जब यह वृत्तांत रावण को सुनाया, तब राक्षस-कुलाधीश ने बड़ी
प्रीति से मृत महाकाय का स्मरण किया । वह दुख से, आँखों में आँसू भरे, सिर झुकाये
खड़ा रहा और फिर संभ्रमचित्त से अंतःपुर में चला गया । रात-भर चिंता में निमग्न