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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 345

युद्धकांड ३१५

५४. महाकाय का युद्ध

शत्रुओ के हाथ में अकंपन को मरा हुआ जानकर दशकंठ बहुत खिन्न हुआ और
उसने महाकाय को बुलाकर कहा- 'अपने शौर्य को प्रकट करते हुए नरो तथा वानरो का
सहार करो।' तब वह पराक्रमी शीघ्र युद्ध की सज्जा से सज्जित हो, रमणीय मयूर-ध्वजा
से अलंकृत, मणियो की प्रभा से विलसित शस्त्रास्त्रो से परिपूर्ण तथा पिशाच-मुखवाले गधे
जुते हुए रथ पर बैठकर, दक्षिण द्वार से बडे वेग के साथ निकला। उसके साथ ही विविध
शस्त्रास्त्रो से युक्त उसकी सेना, भेरी, डका तथा तुरहियो का गभीर शब्द करती हुई चलने लगी।
उस समय उनपर हड्डियो की वर्षा हुई, बिजलियाँ गिरी, छत्र तथा ध्वजाएँ टूटकर
गिर पडी । किन्तु, महाकाय इन अपशकुनो की उपेक्षा करते हुए आगे बढा और बडी क्रूरता
से वानर-सेना पर आक्रमण किया। तब वानर भी उन पर तरु-शैल-समूह की वर्षा करने
हुए उनसे भिड गये ।
दानव उस वानर-सेना पर अपना पराक्रम दिखाने लगे । उन्होने अत्यत चंचल गति
से कपि-सेना के मध्य रथ चलाये, गज-समूह को वानर-सेना से टकरा दिया, अश्वो को
उनके ऊपर चलाया और पदाति-सेना उनपर टूट पडी । फिर, उन्होने वानर-सैनिको को
अपने करवालो से काटते हुए गदा के प्रहारो से उन्हें व्याकुल करते हुए, भालो से बेधते
हुए, शूलो से चीरते हुए, लाठियो से पीटते हुए, वरछियो से भोकते हुए, शरवृष्टि करते
हुए, चक्रो को चलाते हुए, परशुओ से काटते हुए अत्यत क्रोध के साथ अपने मुद्गरो के
प्रहार से वानरो को दण्ड देने लगे । इधर वानर भी उन वीर राक्षसो पर शैल-वृक्षो की
वर्षा करने लगे । उस घोर युद्ध के कारण धूलि उडकर रवि-मडल तक व्याप्त हो गई।
उस धूलि के कारण अविरत युद्ध करनेवाली दोनो पक्षो की सेनाएँ एक दूसरे को नहीं
देख पाती थी । भयकर राक्षस लगातार अपने ऊपर गिरनेवाले तरु-शैलो को लक्ष्य करके
असख्य बाण चलाकर आकाश को ढक देते थे । वानर-वीर राक्षसो के चलाये हुए शस्त्र,
वाण तथा लाठियो को अपनी ओर आते देखकर उनको लक्ष्य करके, पर्वतो तथा वृक्षो को
फेंकते थे । युद्ध-भूमि में उडनेवाली धूलि उनके कर्णपुटो में भी भर गई थी और उनको
इसका पता नहीं चलता था कि कौन राक्षस है, और कौन वानर है । जो कोई उनके
समक्ष पड जाता था, वे उस पर प्रहार करके उसको मार डालते थे । दनुजो के शरीर से
बहनेवाले रक्त, नदियो के समान बहकर धूलि को भिगो देता था । धूलि-जनित अंधकार
को व्याप्त रहने पर भी दानवो को अपने दीप्त तेज से युद्ध करते देखकर, देवता भी आश्चर्य-
चकित हो गये । तब दैत्यो के प्रताप से नष्ट-भ्रष्ट हो वानर भयभीत हो गये और युद्ध-
भूमि से भागने लगे ।
उन्हें भागते हुए देखकर अगद ने कहा- 'हे कपियो, मेरे रहने हुए तुम ऐसे क्यो
भागे जा रहे हो ?' इस प्रकार के उत्साहपूर्ण वचनो से अगद ने उनको धैर्य देकर फिर
उन्हें युद्ध में प्रवृत्त किया । वह स्वय एक महापर्वत को उठाकर राक्षस-सेना पर आक्रमण
करने लगा । उसके पीछे भयंकर गर्जन करते हुए वानर-वीर भी चल पड़े । अगद ने क्रुद्ध
होकर पर्वतो तथा वृक्षो को राक्षसो की सेना पर फेंका । वह बायें हाथ से राक्षसो को