सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 347

युद्धकांड ३९७
उस राक्षस के जबड़े पर ऐसा घूसा मारा कि वह राक्षस छटपटाकर गिर पड़ा, उसके दाँत
टूट गये और रक्त उगलते हुए वह मर गया। सभी राक्षस आश्चर्य-चकित हो गये ।
इसके पश्चात् वपाश नामक राक्षस ने कपियो पर आक्रमण किया और उनको
जर्जरित करने लगा । तब गज ने उस पर ऐसी बाण-वृष्टि की कि सारा आकाश बाणो से
आच्छादित हो गया । किन्तु, वपाश ने उन सब बाणो को बीच में ही काट डाला और
गज का वध करने के लिए अग्नि-सम सात बाण उस पर चलाये और इससे सन्तुष्ट न होकर
फिर उस पर पच्चीस बाण चलाये और उसके पश्चात् एक सौ ऐसे बाण चलाये, जो उसके
शरीर को पार कर गये । उन बाणो से गज अत्यधिक पीडित हुआ और वपाश के रथ
को चूर-चूर करते हुए उस पर आक्रमण किया और गरुड पक्षी जिस प्रकार किसी कंगूरे
को नीचे गिरा देता है, वैसे ही उसका सिर धड से नीचे गिरा दिया । इस पर क्रुद्ध
होकर धूम्र तथा दुर्धर नामक राक्षसो ने भयंकर अस्त्रो के प्रयोग से वानरो को पीडित करते
हुए उनके पैर उखाड दिये। तब क्रोधन तथा मेघपुष्प नामक वीर वानरो ने उनके रथो
पर कूदकर अपने करतलो से उनके मस्तक पर प्रहार किया और युद्ध करके उन्हें मार डाला ।
उनको आहत देखकर सभी राक्षस भयभीत हो तुरत भाग खड़े हुए ।
इस प्रकार राक्षसो को भागते हुए देखकर शतमाय अपनी शक्ति का प्रदर्शन
करते हुए गज से भिड गया । तब गज ने एक लट्ठ लेकर उसका सामना किया । इतने में
बडे वेग से ऋषभ, शतवली, पनस, गवाक्ष तथा अगद एक साथ उस पर वृक्षो तथा पर्वतो
की अविरत वृष्टि करने लगे, किन्तु शतमाय ने शर, तोमर, भाले, चक्र, गदा,
खड्ग आदि श्रेष्ठ शस्त्रो की वर्षा करके वीरो को क्रूर गति से त्रस्त कर दिया । उसके
हाथो से यो पीडित होकर वानर-नायक रोषोद्दीप्त हो शतमाय पर पिल पडे । गवाक्ष ने
उसके रथ के घोड़ो को मार डाला, अगद ने उसका झडा काट डाला, पनस ने उसके
रथ को पैरो तले कुचल डाला, ऋषभ ने सारथी को मार डाला और नल ने उसके शस्त्रास्त्रो
को काट डाला और शतवली ने अपनी मुष्टियो से उस पर प्रहार किया । किन्तु,
शतमाय ने उन मुष्टि के आघातो की उपेक्षा करके तलवार और ढाल लेकर गरुड के
समान बडे लाघव से आकाश की ओर उछला । तब बडी तत्परता के साथ (युद्ध-भूमि में)
पडे हुए खड्ग, ढाल आदि लेकर शतवली भी उसके पीछे आकाश की ओर उछला ।
आकाश में वे दोनो भेरुड पक्षियो (दो सिरवाले पक्षी) के समान एक दूसरे पर वार
करने लगे । वे कभी पैंतरें बदलते, कभी निकट आते, फिर शीघ्र ही दूर हट जाते; कभी
गिरते तो कभी उठते और एक दूसरे को गिराने की चेष्टा करते हुए लडने लगे । तब
शतमाय ने अपने खड्ग को चमकाकर शतवली के विशाल वक्ष पर प्रहार किया, किन्तु
शतवली ने अपनी ढाल को आगे करके उस वार से अपने को बचा लिया और अपने
तीक्ष्ण कृपाण से शतमाय की जाँघो को काट डाला, तो वह राक्षस सिर के बल पृथ्वी पर
गिर पड़ा और उसका सिर पर्वत-शिखर के समान छिन्न-भिन्न होकर छितरा गया ।
शतमाय की मृत्यु को देखकर शतवली के साथ सभी वानरो ने हर्ष का गभीर
निनाद किया ।