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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 508 में से

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पृष्ठ 350

३२० रंगनाथ रामायण
रहने से वह सो भी नही सका । प्रात काल होते ही वह अपने सामंतो के साथ, अपने
उज्ज्वल रथ पर बैठकर अतःपुर से निकला और दुर्ग के स्तूप पर चढकर अपने विशाल
दुर्ग को ध्यान से देखा । फिर, वहाँ के सैनिको के शिविरो का निरीक्षण किया और दुर्ग
की रक्षा के लिए और अधिक सैनिको को नियुक्त किया । उसके पश्चात् रावण ने प्रहस्त
से कहा—'यह प्रसिद्ध दुर्ग अभेद्य है । यह किसी भी पराक्रमी शत्रु के वश में आनेवाला
नही है । आज वानर-समूह ने इसे भेद डाला है, यह देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा है ।
इतना ही नही, श्रीराम के बाहुवल का विक्रम दुर्वार प्रतीत हो रहा है । युद्ध करने योग्य
या तो तुम हो, या मै हूँ या मेरा भाई कुभकर्ण है । निद्रा में मग्न हो, मेरा भाई जाग
नही रहा है । इसलिए या तो तुम युद्ध करने के लिए जाओ या मै जाऊँ ।'
तब प्रहस्त ने राक्षसेश्वर से कहा—"हे देव, मै अभी जाता हूँ और उन नरो का
ऐसा सहार करता हूँ कि देवता भी मेरे बाहुवल की प्रशसा करेंगे । मै अपने प्रताप का
ऐसा प्रदर्शन करूँगा कि भूत, प्रेत तथा डाकिनी छककर रक्त-पान करेंगे और मोद-मग्न
होकर कह उठेंगे, 'लो देखो, प्रहस्त उन वन्दरो की कैसी दुर्गति कर रहा है ।' आपने
मुझे युद्ध में जाने का आदेश दिया, तो ऐसे समय में, मेरा आपको हितोपदेश देना उचित
तो नही है । फिर भी, एक बात सुन लीजिए । मेरा विचार है यह कार्य आपके लिए
उचित नही है । अब आप मानें या न मानें । आप स्वयं विचार करके देख लें । मै
आपकी आज्ञा का उल्लघन नही करता । पहले आपने अपने बुद्धिमान् मंत्रियो के हित-वचन
नही सुने । अब तो सुनिए और सीता को भूपाल के पास पहुँचा दीजिए । यह युद्ध
अनावश्यक है ।"
५६. प्रहस्त का युद्ध
इतना कहने के पश्चात् प्रहस्त रावण की आज्ञा लेकर युद्ध के लिए रवाना हुआ ।
उसने अपने वेत्रधरो को भेजकर अपनी चतुरगिणी सेना को एकत्रित किया और मणिमय
किकिणी के रणन से मुखरित होनेवाले ऐसे रथ पर सवार होकर चला, जिसका मेघ-
समान घोष तबतक सुनाई पड़नेवाला था, जबतक वानरो के श्रेष्ठ अगो के पवन उसका
स्पर्श नही करे, और जिसके ऊपर की सर्प-ध्वजा तबतक लहरानेवाली थी, जबतक
वानर-रूपी गरुड उस पर उतर नही आवे । उसके निकलते समय तुरहियो की जो ध्वनि हुई,
उससे दिशाएँ चक्कर काटने लगी, आकाश विचलित हो गया, नक्षत्र टूटकर गिरे और
वसुंधरा विदीर्ण-सी हो गई । इस प्रकार, प्रहस्त पूर्व के द्वार से कालांतक के समान युद्ध
करने के लिए निकला ।
दैत्यो के सिंहगर्जनी के साथ निकलनेवाले प्रहस्त की उग्र मूर्ति को देखकर राम-
चन्द्र आश्चर्य करने लगे और उसे विभीषण को दिखाकर बोले,—'हे विभीषण, तेज, वल,
तथा शौर्य से विस्मित होनेवाले इस राक्षस-नेता का नाम क्या है ? विपुल साहस के
साथ उसका वानरो पर आक्रमण करना देखकर मुझे आश्चर्य होता है ।'
तब विभीषण ने कहा—'हे देव, यह रावण की समस्त सेना का सेनापति है ।
इनकी अपनी सेना रावण की सेना की तीन चौथाई है । अपने साहस के लिए तीनो